कोरिया। एक गरीब मजदूर का बच्चा डूबकर मर गया। घर में मातम था, आंखों में आंसू थे, और चूल्हा भी ठंडा पड़ा था। लेकिन आरोप है कि इसी दर्द के बीच खाकी ने ‘कमाई’ का मौका तलाश लिया। जांच के नाम पर डर दिखाया गया, रकम मांगी गई, और सौदा तय किया गया। फर्क बस इतना रहा कि इस बार कहानी वहीं खत्म नहीं हुई—रिश्वत लेते अधिकारी रंगे हाथों पकड़ लिए गए।
मामला कोरिया जिले के बचरापोड़ी चौकी का है। यहां पदस्थ उप निरीक्षक अब्दुल मुनाफ को 25,000 रुपये लेते हुए एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) ने पकड़ लिया। सहायक उप निरीक्षक गुरु प्रसाद यादव को भी कथित साजिश और रिश्वत मांगने के आरोप में गिरफ्तार किया गया है। दोनों पर भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत कार्रवाई की गई है।
हादसा जो त्रासदी था, बना ‘मौका’?
घटना एक ईंट भट्ठा परिसर से जुड़ी है। काम के दौरान खोदे गए गड्ढे में पानी भर गया था। मजदूर मोहित घसिया का छोटा बेटा खेलते-खेलते उसी गड्ढे में गिर गया और डूब गया। परिवार टूट गया। आसपास के लोग सन्न थे। हर कोई इसे दुर्भाग्यपूर्ण हादसा मान रहा था।
लेकिन आरोप है कि चौकी स्तर पर संवेदनशीलता दिखाने के बजाय जांच को डर का औजार बना दिया गया। प्रार्थी सत्येंद्र कुमार प्रजापति के मुताबिक, मामले में बड़ी धाराएं लगाने और जेल भेजने की बात कहकर दबाव बनाया गया। और फिर शुरू हुई ‘रकम’ की बात।
50 हजार की मांग, 25 हजार में ‘डील’?
शिकायत के अनुसार, पहले 50,000 रुपये की मांग की गई। कहा गया कि मामला शांत कराना है तो “सहयोग” करना पड़ेगा। गरीब परिवार के लिए यह रकम पहाड़ जैसी थी। बातचीत हुई, मोलभाव हुआ और कथित तौर पर 25,000 रुपये में सौदा तय हुआ।
यहां सवाल उठता है—क्या कानून अब बोली लगाकर चलता है? क्या दुख में डूबे परिवारों को राहत देने के बजाय उनसे रकम वसूलना नई प्रवृत्ति बनती जा रही है?
तबादला हुआ, पर खेल जारी?
आरोप है कि सहायक उप निरीक्षक गुरु प्रसाद यादव का तबादला हो गया, लेकिन कथित रिश्वत की मांग खत्म नहीं हुई। नए चौकी प्रभारी उप निरीक्षक अब्दुल मुनाफ ने पद संभाला और प्रार्थी को चौकी बुलाकर रकम देने को कहा गया।
यानी कुर्सी बदली, पर कथित सोच वही रही। यह आरोप पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
ACB का ट्रैप: रंगे हाथों गिरफ्तारी
भ्रष्टाचार से परेशान होकर प्रार्थी ने एंटी करप्शन ब्यूरो से संपर्क किया। शिकायत की जांच के बाद ट्रैप की योजना बनाई गई। तय समय पर जैसे ही 25,000 रुपये उप निरीक्षक को दिए गए, ACB की टीम ने उन्हें रंगे हाथों पकड़ लिया।
इसके बाद जांच में सामने आए तथ्यों के आधार पर एएसआई गुरु प्रसाद यादव को भी गिरफ्तार किया गया। दोनों के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 (संशोधित 2018) की धारा 7 और 12 के तहत मामला दर्ज किया गया है।

खाकी पर तीखा तंज
पुलिस की वर्दी को सम्मान, अनुशासन और सुरक्षा का प्रतीक माना जाता है। लेकिन जब उसी वर्दी पर रिश्वत का आरोप लगे, तो सवाल उठना स्वाभाविक है।
क्या जांच का मतलब डर दिखाकर पैसा वसूलना है?
क्या गरीब की मजबूरी को ‘कमजोरी’ समझ लिया जाता है?
क्या थाने और चौकियां इंसाफ की जगह सौदेबाजी के केंद्र बनते जा रहे हैं?
यह मामला सिर्फ दो अधिकारियों की गिरफ्तारी का नहीं है। यह उस मानसिकता पर चोट है, जहां पद का इस्तेमाल सेवा के बजाय दबाव बनाने के लिए किया जाता है।
आम आदमी का भरोसा डगमगाया
एक गरीब व्यक्ति जब चौकी जाता है तो उसे उम्मीद होती है कि वहां न्याय मिलेगा। लेकिन अगर उसे डर, धमकी और रकम की मांग मिले तो वह किस पर भरोसा करे?
ऐसे मामलों से पुलिस की छवि को गहरा नुकसान पहुंचता है। ईमानदार अधिकारियों की मेहनत भी दागदार होती है। एक की गलती पूरे विभाग पर सवाल खड़े कर देती है।
सिस्टम की जवाबदेही
अब निगाहें विभागीय कार्रवाई पर हैं। क्या सिर्फ गिरफ्तारी काफी है? क्या आंतरिक निगरानी तंत्र मजबूत किया जाएगा? क्या भविष्य में ऐसी घटनाएं रोकने के लिए सख्त दिशा-निर्देश जारी होंगे?
अगर कार्रवाई सिर्फ औपचारिकता बनकर रह गई, तो संदेश गलत जाएगा। जरूरत है पारदर्शिता और जवाबदेही की।
गरीब की हिम्मत, सिस्टम की परीक्षा
इस मामले में एक बात उल्लेखनीय है—शिकायतकर्ता ने डर के बजाय शिकायत का रास्ता चुना। अक्सर लोग कहते हैं कि “पुलिस से उलझना ठीक नहीं”, लेकिन यहां शिकायत की गई और कार्रवाई भी हुई।
यह दिखाता है कि व्यवस्था में खामियां जरूर हैं, पर सुधार की गुंजाइश भी है।
बड़ा सवाल
क्या यह अकेली घटना है? या यह उस गहरे रोग का लक्षण है, जो समय-समय पर सामने आता रहता है?
जब तक विभागीय अनुशासन सख्त नहीं होगा, जब तक शिकायतों पर त्वरित और निष्पक्ष कार्रवाई नहीं होगी, तब तक ऐसी खबरें आती रहेंगी।
एक मासूम की मौत पहले ही एक त्रासदी थी। उस पर अगर रिश्वत का आरोप जुड़ जाए तो यह समाज के लिए दोहरी चोट है।
ACB की कार्रवाई ने फिलहाल यह संदेश दिया है कि कानून से ऊपर कोई नहीं। लेकिन असली चुनौती आगे है—क्या पुलिस विभाग इस घटना से सबक लेगा?
खाकी का सम्मान तभी बचेगा जब वह खुद को कानून के दायरे में रखे। क्योंकि वर्दी का असली वजन रुतबे से नहीं, ईमानदारी से बढ़ता है।
यह मामला याद दिलाता है, अगर इंसाफ बिकने लगे, तो समाज टूटने लगता है और अगर भ्रष्टाचार पर चोट हो, तो उम्मीद जिंदा रहती है।

