रिपोर्ट: समीर वर्मा
बलौदाबाजार जिले के कसडोल विधानसभा क्षेत्र के ग्राम मुंडा में बच्चों की प्यास पर प्रशासन की बेरुखी भारी पड़ रही है। गांव के आंगनबाड़ी केंद्र में पिछले चार महीनों से बोर खराब पड़ा है, लेकिन जिम्मेदारों के कान पर जूं तक नहीं रेंगी। सवाल सीधा है—क्या मासूम बच्चों की बुनियादी जरूरतें भी अब प्राथमिकता में नहीं रहीं?
आंगनबाड़ी वह जगह है जहां सरकार पोषण, प्राथमिक शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं का दावा करती है। लेकिन ग्राम मुंडा की हकीकत इन दावों की पोल खोल रही है। यहां छोटे-छोटे बच्चे पानी के लिए तरस रहे हैं। पीने का स्वच्छ पानी तक उपलब्ध नहीं है।
बोर खराब होने के कारण आंगनबाड़ी की कार्यकर्ताओं और मितानिनों को दूर स्थित शासकीय स्कूल से पानी ढोकर लाना पड़ रहा है। सोचिए, जहां बच्चों को पढ़ाई और पोषण मिलना चाहिए, वहां समय पानी ढोने में बर्बाद हो रहा है। यह न सिर्फ शर्मनाक है, बल्कि गंभीर लापरवाही भी है।

गर्मी का मौसम सिर पर है। तापमान बढ़ते ही पानी की जरूरत और बढ़ जाएगी। ऐसे में अगर समय रहते व्यवस्था नहीं सुधारी गई, तो बच्चों के स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ सकता है। निर्जलीकरण, बीमारियां और संक्रमण का खतरा बढ़ सकता है। क्या प्रशासन किसी बड़ी घटना का इंतजार कर रहा है?
ग्रामीणों का कहना है कि समस्या की जानकारी पंचायत और संबंधित विभाग को दी जा चुकी है। फिर भी चार महीने तक कोई कार्रवाई नहीं होना यह बताता है कि जिम्मेदार लोग या तो अनजान बने हुए हैं या फिर आंखें मूंदे बैठे हैं। ग्राम पंचायत की जिम्मेदारी है कि गांव में मूलभूत सुविधाएं सुनिश्चित करे। लेकिन यहां तो हालात यह हैं कि आंगनबाड़ी जैसे संवेदनशील केंद्र में पानी तक नहीं है।
सबसे बड़ा सवाल—क्या बच्चों की प्यास से भी बड़ी कोई प्राथमिकता है? योजनाओं और भाषणों में पोषण और विकास की बात होती है, लेकिन जमीन पर मासूम बच्चे पानी के लिए भटक रहे हैं।
ग्रामीणों ने अब साफ शब्दों में चेतावनी दी है कि यदि जल्द बोर की मरम्मत नहीं कराई गई, तो वे आंदोलन का रास्ता अपनाएंगे। उनकी मांग है कि तुरंत मरम्मत हो, और चार महीनों की इस लापरवाही के लिए जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई तय की जाए।

