RTI से खुलासा: 3 महीनों में 67 न्यूज़/TV चैनलों को 18.57 करोड़ रुपये, कई चैनलों के नाम तक अनजान
रायपुर। विशेष रिपोर्ट
छत्तीसगढ़ में आम दर्शक जब टीवी खोलता है, तो उसे गिनती के 8–10 न्यूज़ चैनल ही दिखाई देते हैं। लेकिन जनसंपर्क विभाग की फाइलों में एक बिल्कुल अलग ही तस्वीर सामने आई है। सूचना के अधिकार (RTI) के तहत प्राप्त दस्तावेज़ बताते हैं कि छत्तीसगढ़ सरकार के जनसंपर्क विभाग ने सिर्फ़ अक्टूबर 2024 से दिसंबर 2024 के बीच 67 न्यूज़ और TV चैनलों को 18 करोड़ 57 लाख रुपये से अधिक का भुगतान विज्ञापन के नाम पर किया है।
यह कोई आरोप नहीं, बल्कि सरकारी दस्तावेज़ों में दर्ज तथ्य हैं। जनसंपर्क विभाग के विज्ञापन भुगतान से जुड़ी यह जानकारी RTI एक्टिविस्ट कुणाल शुक्ला द्वारा दायर सूचना के अधिकार आवेदन के माध्यम से सामने आई है।”
तीन महीनों में 18.57 करोड़, हर महीने करीब 6 करोड़ का खर्च
RTI से मिली जानकारी के अनुसार जनसंपर्क विभाग ने महज़ तीन महीनों में लगभग 6 करोड़ रुपये प्रतिमाह विज्ञापनों पर खर्च कर दिए। सवाल यह नहीं है कि सरकार विज्ञापन देती है, सवाल यह है कि इतने चैनल आखिर हैं कहां और किस आधार पर उन्हें भुगतान किया गया। अनजान चैनलों पर लाखों–करोड़ों की बारिश RTI दस्तावेज़ों में कई ऐसे मीडिया हाउस और कंपनियों के नाम दर्ज हैं, जिनके बारे में छत्तीसगढ़ की जनता ने शायद ही कभी सुना हो।
सूची में शामिल कुछ नाम हैं—
ओमेगा ब्रॉडकास्ट प्राइवेट लिमिटेड,
ओमेगा टीवी,
संगीत ऑडियो इंडिया,
सौभाग्य मीडिया,
सोफिया एंटरटेनमेंट,
शार्प आई एडवर्टाइजिंग,
ख़ुशी एडवर्टाइजमेंट आइडियाज़,
KDM बिज़नेस नेटवर्क,
जयपुर मीडिया एंड ब्रॉडकास्टिंग।
सवाल उठता है कि ये चैनल या मीडिया कंपनियां किस प्लेटफॉर्म पर छत्तीसगढ़ की जनता तक पहुंच बना रही हैं, और अगर इनकी पहुंच सीमित है तो फिर करोड़ों रुपये का विज्ञापन क्यों?
बाहरी राज्यों के चैनलों को भी छत्तीसगढ़ का पैसा
RTI में यह भी सामने आया है कि जनसंपर्क विभाग ने सिर्फ़ छत्तीसगढ़ ही नहीं, बल्कि झारखंड, कश्मीर, पंजाब, हरियाणा और उत्तराखंड जैसे राज्यों के न्यूज़/TV चैनलों को भी लाखों और करोड़ों रुपये के विज्ञापन दिए हैं।
जनता पूछ रही है—
क्या इन राज्यों के चैनल छत्तीसगढ़ की ज़मीनी समस्याएं उठाते हैं?
क्या वे यहां की योजनाओं की निगरानी करते हैं? अगर नहीं, तो फिर छत्तीसगढ़ के टैक्स का पैसा वहां क्यों भेजा गया?
कुछ बड़े भुगतान भी सवालों के घेरे में RTI दस्तावेज़ों के अनुसार— TV18 Broadcasting Ltd को 2.34 करोड़ रुपये से अधिक, Zee Media Corporation को 1.19 करोड़ रुपये से अधिक, Sahara India TV Network को 37 लाख रुपये से अधिक, SRS Media को 64 लाख रुपये से अधिक, Radhekrishna Multimedia को 73 लाख रुपये से अधिक ।
सवाल यह नहीं है कि बड़े चैनलों को विज्ञापन क्यों मिला, सवाल यह है कि क्या इसके लिए कोई पारदर्शी मापदंड तय था? क्या TRP, रीच और दर्शक संख्या का आकलन किया गया, या फिर फैसला फाइलों में बैठकर कर दिया गया?
जब ज़मीन पर समस्याएं, तब विज्ञापन पर करोड़ों!
आज छत्तीसगढ़ में—
* कई स्कूलों में शिक्षकों की कमी है
* अस्पतालों में डॉक्टर और दवाइयों का अभाव है
* किसान कर्ज़ और लागत से जूझ रहा है
* युवा बेरोज़गारी से परेशान है
इसके बावजूद जनसंपर्क विभाग के पास ऐसे चैनलों को करोड़ों देने के लिए बजट उपलब्ध है, जिनकी उपयोगिता और पहुंच पर ही सवाल खड़े हो रहे हैं।
क्या यहां भी 40% कमीशन का मॉडल?
RTI के सामने आने के बाद अब एक गंभीर सवाल चर्चा में है— क्या जनसंपर्क विभाग में भी 40% कमीशन का खेल चल रहा है? क्योंकि जब कम पहचाने जाने वाले चैनल, बिना स्पष्ट TRP, बिना ज़मीनी मौजूदगी को लगातार बड़े भुगतान किए जाएं, तो संदेह होना स्वाभाविक है।
RTI ने काग़ज़ खोले, अब जांच कब?
RTI ने नाम भी उजागर कर दिए, रकम भी सामने रख दी। अब ज़रूरत है CAG ऑडिट की, विजिलेंस जांच की और पूरे विज्ञापन वितरण सिस्टम की स्वतंत्र समीक्षा की
ताकि यह साफ़ हो सके कि यह पैसा जनता को सूचना देने में खर्च हुआ या फिर सूचना पर चुप्पी खरीदने में।
जनता का सवाल, सरकार से जवाब की उम्मीद
यह मामला किसी चैनल या संस्था के खिलाफ़ नहीं, बल्कि जनता के पैसे के उपयोग का है।
अगर सब कुछ नियमों के तहत हुआ है, तो जनसंपर्क विभाग को पूरा विज्ञापन डेटा सार्वजनिक करना चाहिए।क्योंकि जनसंपर्क का मतलब जनता से संवाद है, जनता का पैसा लुटाना नहीं।



