30 दिन बाद सूचना मुफ्त देने का कानून, फिर भी ₹480 की मांग, अधूरी जानकारी देकर जिम्मेदारों की जवाबदेही पर सवाल
koriya. पारदर्शिता और जवाबदेही के बड़े-बड़े दावे करने वाली पंचायत व्यवस्था अब खुद सवालों के घेरे में है। मामला ग्राम पंचायत डकईपारा का है, जहां सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत मांगी गई जानकारी को न सिर्फ तय समयसीमा के बाद भी रोके रखा गया, बल्कि प्रथम अपील के आदेश के बावजूद आवेदक पर ₹20 प्रति पेज की दर से ₹480 वसूलने का फरमान सुना दिया गया। यह केवल नियमों की अनदेखी नहीं, बल्कि कानून को खुली चुनौती जैसा प्रतीत हो रहा है।
30 दिन बीते, फिर भी ‘सूचना पर ताला’
आवेदक ने 15वें वित्त आयोग के तहत कराए गए विकास कार्यों, स्वीकृत राशि, खर्च का विवरण, कार्यादेश, माप पुस्तिका और भुगतान से जुड़े दस्तावेजों की प्रतिलिपि मांगी थी। कानून साफ कहता है कि 30 दिनों के भीतर सूचना उपलब्ध कराई जाए। लेकिन समयसीमा बीत जाने के बाद भी कार्यालय की ओर से कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया गया।
जब सूचना नहीं मिली तो आवेदक ने मजबूर होकर प्रथम अपील की। अपीलीय अधिकारी के स्तर से सूचना उपलब्ध कराने का आदेश जारी हुआ। आमतौर पर इस स्तर पर मामला सुलझ जाना चाहिए था। लेकिन यहां तो आदेश भी कागजों में दफन हो गया।
आदेश के बाद भी ‘शुल्क का शिकंजा’
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि देरी होने के बावजूद जनसूचना अधिकारी ने 24 पन्नों की प्रतिलिपि के लिए ₹480 जमा करने को कहा। यानी ₹20 प्रति पेज। जबकि राज्य के नियमों के अनुसार सामान्य दर ₹2 प्रति पेज है। और यदि सूचना निर्धारित समयसीमा के बाद दी जाती है तो वह पूरी तरह निःशुल्क होनी चाहिए।
कानून की धारा 7(6) स्पष्ट कहती है—यदि सूचना देने में देरी होती है, तो सूचना मुफ्त दी जाएगी। ऐसे में ₹20 प्रति पेज की मांग किस आधार पर की गई? क्या यह नियमों की अज्ञानता है या फिर जानबूझकर बनाया गया दबाव?
10 गुना ज्यादा वसूली—सवालों की बौछार
₹2 प्रति पेज की जगह ₹20 प्रति पेज। यानी दस गुना अधिक। क्या पंचायत कार्यालय ने खुद अपनी दरें तय कर ली हैं? क्या कानून अब स्थानीय स्तर पर ‘मनमर्जी’ से चलाया जाएगा? यह सिर्फ एक आवेदक का मामला नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र में सूचना के अधिकार की आत्मा पर चोट है।
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि यदि हर सूचना के लिए इस तरह भारी-भरकम शुल्क थोप दिया जाएगा, तो आम आदमी आरटीआई लगाने से पहले सौ बार सोचेगा। क्या यही उद्देश्य है—लोगों को हतोत्साहित करना?
जनपद आदेश भी बेअसर
सूत्रों के अनुसार, जनपद स्तर से भी सूचना उपलब्ध कराने का निर्देश जारी हुआ। लेकिन उसका पालन नहीं किया गया। सवाल उठता है—यदि उच्च स्तर के आदेश की भी अवहेलना हो रही है, तो फिर जवाबदेही तय कौन करेगा?
यह केवल प्रशासनिक चूक नहीं लगती। अधूरी जानकारी देने के आरोप भी सामने आए हैं। यदि दस्तावेज पूरे और पारदर्शी होते, तो क्या इतनी टालमटोल होती? या फिर कहीं न कहीं कुछ ऐसा है जिसे सार्वजनिक होने से रोका जा रहा है?
विकास कार्य या कागजी खेल?
15वें वित्त आयोग की राशि गांवों के विकास के लिए होती है—सड़क, नाली, पेयजल, सामुदायिक भवन, मरम्मत कार्य आदि। यदि इन कार्यों में सब कुछ नियमों के अनुसार हुआ है, तो फिर जानकारी देने में डर कैसा? देरी और महंगी प्रतिलिपि शुल्क की मांग से संदेह और गहराता है।
गांव के कुछ लोगों का कहना है कि कई कार्य कागजों में पूरे दिखाए गए हैं, जबकि जमीन पर स्थिति अलग है। ऐसे में दस्तावेज सामने आने से कई परतें खुल सकती हैं। क्या यही वजह है कि सूचना पर ‘ताला’ लगा है?
कानूनी प्रावधान—सख्त लेकिन लागू कौन करे?
ऐसी स्थिति में आवेदक के पास द्वितीय अपील या शिकायत का विकल्प है, जो छत्तीसगढ़ राज्य सूचना आयोग के समक्ष की जा सकती है। कानून में स्पष्ट प्रावधान है—
- ₹250 प्रतिदिन के हिसाब से जुर्माना
- अधिकतम ₹25,000 तक दंड
- विभागीय कार्रवाई
यदि आयोग यह पाता है कि सूचना जानबूझकर रोकी गई या गलत शुल्क वसूला गया, तो संबंधित अधिकारी पर आर्थिक दंड तय हो सकता है। लेकिन सवाल यह भी है—क्या हर नागरिक आयोग तक जाने की लंबी प्रक्रिया वहन कर सकता है?
जनता में आक्रोश
बैकुंठपुर और आसपास के क्षेत्रों में इस प्रकरण को लेकर चर्चा तेज है। लोगों का कहना है कि यदि सूचना पाने के लिए भी आम आदमी को ‘जुर्माना’ जैसा शुल्क देना पड़े, तो लोकतंत्र की बुनियाद कमजोर हो जाती है।
एक स्थानीय नागरिक ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा, “जब कानून मुफ्त सूचना देने की बात करता है, तो ₹480 क्यों? आदेश के बाद भी जानकारी क्यों नहीं? क्या पंचायत कानून से ऊपर है?” यह सवाल केवल डकईपारा का नहीं, बल्कि पूरे तंत्र की विश्वसनीयता से जुड़ा है।
पारदर्शिता बनाम ‘प्रशासनिक दबाव’
विशेषज्ञों का मानना है कि कई बार स्थानीय स्तर पर आरटीआई को ‘झंझट’ मान लिया जाता है। सूचना देने के बजाय आवेदक को हतोत्साहित करने की कोशिश की जाती है— कभी अधूरी जानकारी देकर, कभी अनावश्यक शुल्क लगाकर, तो कभी फाइलें लंबित रखकर। यदि यह प्रवृत्ति बढ़ी, तो आरटीआई का उद्देश्य—भ्रष्टाचार पर अंकुश और पारदर्शिता—कागजों में सिमट जाएगा।
अब नजर आयोग पर
सूत्र बताते हैं कि आवेदक अब आयोग की शरण लेने की तैयारी में है। यदि मामला आयोग तक पहुंचता है और दोष सिद्ध होता है, तो संबंधित अधिकारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई तय मानी जा रही है। यह प्रकरण एक मिसाल भी बन सकता है—या तो यह साबित करेगा कि कानून की ताकत जमीनी स्तर पर भी लागू होती है, या फिर यह दिखाएगा कि आदेश और प्रावधान सिर्फ पुस्तकों तक सीमित हैं।
बड़ा सवाल
क्या पंचायत व्यवस्था जवाबदेही से बच सकती है?
क्या सूचना मांगना अपराध है?
क्या कानून की अनदेखी पर कोई कार्रवाई होगी?
जब तक इन सवालों के ठोस जवाब नहीं मिलते, तब तक यह मामला क्षेत्र में आक्रोश और अविश्वास की आग को हवा देता रहेगा।
अब सबकी निगाहें इस पर हैं कि क्या संबंधित अधिकारी अपनी गलती सुधारेंगे, या फिर आयोग के आदेश के बाद ही कानून का पालन होगा। एक बात तय है—सूचना पर लगा यह ‘ताला’ जितना देर से खुलेगा, उतनी ही तेज आवाज में जवाबदेही की मांग उठेगी।


