पावनछत्तीसगढ़, ‎‎रायपुर ।

बलरामपुर से कुमार जितेंद्र की रिपोर्ट 

‎बलरामपुर में एक चिट्ठी ने ऐसा धमाका किया कि सिस्टम के कानों से धुआँ और सत्ता के सिर से ताज हिल गया। नाम आया — विनोद अग्रवाल उर्फ ‘मग्गू भाई’, और भाईसाब! ये कोई आम आदमी नहीं, बल्कि “स्थानीय लोकतंत्र का सिंड्रेला मैन” हैं — जिनके सामने पुलिस, प्रशासन और विभाग—all fall down!

‎क्रशर नहीं, ‘मोक्ष मशीन

‎बरियों के आदिवासी शिव नारायण की मौत सुनकर जनता शोक में थी, पर मग्गू भाई का दर्शन अलग ही निकला। 
‎पत्रकार लिखते हैं—“सेठ के क्रशर में मरना यानी सीधा गोल्डन टिकेट टू स्वर्ग!” ‎पुलिस रो रही, पर भक्त बोल रहे — “धन्य धन्य मग्गू स्वामी!” ‎लो जी, हादसे को भी इंडिया का नया स्पिरिचुअल स्टार्टअप बना दिया।

‎सबूत जलाओ, यज्ञ करो

‎जब खनिज विभाग के घोटाले का मामला गरमा गया, मग्गू सेठ ने innovation दिखाया। ‎किसी ने फाइल गायब की, तो किसी ने केस टाल दिया — पर सेठ जी ने सीधा *“अग्नि को समर्पण”* कर दिया। ‎पूरा ऑफिस फूंककर बोले — “यह सबूत नहीं, यह हवन है!” 
‎अब राख ढूँढे पत्रकार और तिलक लगाए सेठ जी!

‎पुलिस ढूंढती, सेठ जी दावत उड़ाते

‎कानून का सेक्शन खोलो या कुकर, दोनों में प्रेशर एक जैसा दिखेगा। ‎पुलिस का दावा — “फरार हैं!” ‎हकीकत — “घर पर पार्टी चल रही है भाई की सालगिरह की।” ‎पुलिस विदेशों में ढूंढ रही थी, इधर मगरमच्छ के बिरयानी चावलों में तड़का लग रहा था। ‎इसे कहते हैं “FIR में फरारी, वॉट्सऐप पर वफादारी!”

‎मौत का कुआं — सार्वजनिक सेवा केंद्र

‎ग्रामीण इलाकों में सेठ जी ने “फ्री फॉल सर्विस” शुरू की — ‎इतने गहरे कुएं खुदवाए कि मवेशी गिरें या इंसान, दोनों जाएं सीधे गति को प्राप्त। ‎पत्रकार लिखते हैं — “इसे हादसा नहीं, सामाजिक नवाचार समझिए।” ‎सस्ता इंश्योरेंस प्लान क्या मिलेगा भाई!

आदिवासियों का ‘विकास’ — जमीन तुम दो, पुण्य हम देंगे

‎कमला देवी जैसी महिलाएं अब “सेठ-भक्त” बन गईं, क्योंकि उनकी जमीन पर सेठ जी ने *विकास का प्रोजेक्ट* शुरू किया — अपने नाम से नहीं, बल्कि उनके नाम से! 
‎यानी जमीन भी गई और ब्लेसिंग भी मिल गई। ‎सेठ जी कहते हैं — “जंगल से शहर भेजे थे, अब वापिस भेज रहे हैं — ताकि प्रकृति संतुलित रहे।” ‎वाह! पर्यावरण योद्धा भी शर्मा जाएं।

‎पत्रकारों का ‘आंतरिक शुद्धिकरण

‎जो पत्रकार सच्चाई दिखाए, उसे दिखा दिया जाता है थाने का रास्ता। ‎“एक मुकदमा मुफ्त, अगला आधे दाम में।” 
‎सेठ जी और पुलिस का रिश्ता वैसा ही है जैसे बैटरी और वायर — जिसमें करंट हो तो रौशनी भी उन्हीं की।

‎क्राइम कुंडली पढ़िए, श्रद्धा से

‎2009 से अब तक केसों की लाइन ऐसी है जैसे लंबी यमुना एक्सप्रेसवे — ‎हत्या, अपहरण, मारपीट, बलवा — सब included package! ‎और फिर भी सिस्टम चुप। जैसे Netflix पर “Crime Series” चल रही हो और सब binge-watch में हों।

‎जनहित vs सेठहित
‎‎पत्रकार का व्यंग्य एकदम साफ — sc‎“राज करेगा, जुल्म करेगा, और इनाम भी वही लेगा।” ‎इसलिए सिफारिश है कि मग्गू भाई और उनके मददगार अफसरों को “लोकसेवा श्री” अवार्ड मिले। पत्रकारों को… बस जेल का ठिकाना मिले। ‎क्योंकि लोकतंत्र में अब “लाभार्थी” वही है जिसके पास लाभ बांटने का सिस्टम हो।

‎‎अब देखना यह है कि दिल्ली की फाइल इस “बलरामपुर बम” पर कार्रवाई करती है या फिर उसे भी मोक्ष का रास्ता दिखा दिया जाएगा। 
‎खबर खत्म नहीं हुई, बस “हवन” पूर्ण हुआ है।

पत्रकार जितेंद्र कुमार जायसवाल

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