अम्बिकापुर। शहर की सियासत इन दिनों ठंडी नहीं, उबल रही है। वजह—मतदाता सूची से कथित तौर पर वैध नामों का गायब होना। विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण के नाम पर जो खेल सामने आ रहा है, उसने आम मतदाताओं को भी चौंका दिया है। इस पूरे मामले पर कांग्रेस ने तीखा हमला बोलते हुए इसे “घोर लापरवाही” और “लोकतांत्रिक अधिकारों पर सीधा प्रहार” बताया है।

शहर में चर्चा है कि जिन लोगों ने बरसों से वोट डाला, जिनके आधार, राशन कार्ड, बिजली बिल, मकान और पहचान सब कुछ उसी वार्ड में है—उन्हें कागज़ों में “मृत” या “अन्यत्र स्थानांतरित” दिखा दिया गया। सवाल उठ रहा है—आख़िर यह चूक है या कोई सोची-समझी चाल?

जिंदा आदमी को कागज़ में मार दिया!”

कांग्रेस नेताओं का आरोप है कि ऑनलाइन फॉर्म-7 का दुरुपयोग कर बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटाने की अनुशंसा की गई। फॉर्म-7 वह प्रक्रिया है जिसके जरिए किसी मतदाता का नाम हटाने का आवेदन किया जाता है। नियम साफ कहते हैं कि शिकायतकर्ता उसी मतदान केंद्र का मतदाता होना चाहिए और ठोस आधार के साथ आवेदन करना चाहिए।

लेकिन आरोप है कि यहां नियमों की धज्जियां उड़ाई गईं।
कई मामलों में शिकायतकर्ता का उस बूथ से कोई लेना-देना नहीं था। फिर भी आवेदन स्वीकार हो गए।

कांग्रेस का दावा है कि सिर्फ शहर में ही अब तक 1143 ऐसे वैध मतदाता चिन्हित हुए हैं जिनके नाम काटने की कोशिश हुई। इनमें निर्वाचित पार्षद, पूर्व पार्षद, बूथ-स्तरीय कार्यकर्ता और शासकीय सेवाओं में कार्यरत कर्मचारी तक शामिल हैं।

एक स्थानीय नेता ने तीखा तंज कसते हुए कहा—
“जो रोज़ बाजार में दिखता है, जो हर चुनाव में वोट देता है, उसे कागज़ में ‘मृत’ बना दिया गया। इससे बड़ा मज़ाक लोकतंत्र के साथ क्या होगा?”

ज्ञापन और चेतावनी

कांग्रेस का प्रतिनिधिमंडल शहर अध्यक्ष के नेतृत्व में मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी को ज्ञापन सौंप चुका है। पार्टी की मांगें सीधी और सख्त हैं—

* नियम-विरुद्ध भरे गए सभी फॉर्म-7 तत्काल निरस्त हों।
* पूरे मामले की निष्पक्ष और समयबद्ध जांच हो।
* दोषियों पर कठोर कार्रवाई हो।
* भविष्य में केवल नियमसम्मत आवेदनों को ही स्वीकार किया जाए।
* वैध मतदाताओं के नाम हटने से रोकने के लिए सुरक्षा उपाय लागू किए जाएं।

पार्टी ने साफ चेतावनी दी है कि गलत जानकारी देकर फॉर्म-7 भरने वालों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने की पहल की जाएगी।

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लोकतंत्र की नींव हिलाने की कोशिश?”

राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि मतदाता सूची किसी भी चुनाव की रीढ़ होती है। अगर सूची ही संदिग्ध हो जाए, तो निष्पक्ष चुनाव का दावा कैसे टिकेगा?

कांग्रेस नेताओं का आरोप है कि यह सिर्फ तकनीकी गलती नहीं हो सकती। इतने बड़े पैमाने पर नाम हटाने की कोशिश प्रशासनिक लापरवाही से आगे की बात लगती है।

एक वरिष्ठ कार्यकर्ता ने कहा—
“अगर आज 1143 नाम हैं, तो कल हजारों हो सकते हैं। क्या हम चुप बैठें और देखें कि हमारे वोट का अधिकार कागज़ पर मिटा दिया जाए?”

प्रशासन की चुप्पी पर सवाल

समाचार लिखे जाने तक निर्वाचन अधिकारियों की आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। यही चुप्पी लोगों के मन में और शंका पैदा कर रही है।

आख़िर इतने गंभीर आरोपों पर तत्काल स्पष्टीकरण क्यों नहीं? अगर सब कुछ नियमों के अनुसार हुआ है, तो तथ्य सामने क्यों नहीं रखे जा रहे?

स्थानीय नागरिकों का कहना है कि पुनरीक्षण प्रक्रिया में पारदर्शिता की भारी कमी है। लोगों को समय रहते सूचना नहीं मिलती। जब तक नाम कटने की जानकारी मिलती है, तब तक सुधार की प्रक्रिया जटिल हो जाती है।

आम जनता की चिंता

शहर के कई वार्डों में लोग अब अपनी मतदाता स्थिति ऑनलाइन और बूथ पर जाकर चेक कर रहे हैं। कुछ लोगों को जब पता चला कि उनका नाम हटाने की अनुशंसा की गई है, तो वे हैरान रह गए।

एक बुजुर्ग मतदाता ने कहा—
“मैं पिछले 30 साल से यहीं वोट डाल रहा हूं। अचानक पता चला कि मुझे ‘अन्यत्र स्थानांतरित’ दिखा दिया गया। मैं तो कहीं गया ही नहीं!”

युवाओं में भी नाराज़गी है। उनका कहना है कि पहली बार वोट डालने की तैयारी कर रहे थे, लेकिन नाम सूची में नहीं मिला।

विशेषज्ञों की राय

चुनाव प्रक्रिया पर नजर रखने वाले विशेषज्ञों का मानना है कि पुनरीक्षण के दौरान यदि डिजिटल सिस्टम की निगरानी मजबूत न हो, तो दुरुपयोग की आशंका बढ़ जाती है।

वे कहते हैं कि—

* हर फॉर्म-7 आवेदन की भौतिक सत्यापन प्रक्रिया अनिवार्य होनी चाहिए।
* शिकायतकर्ता की पहचान और बूथ संबद्धता की सख्ती से जांच हो।
* नाम हटाने से पहले संबंधित मतदाता को व्यक्तिगत सूचना दी जाए।

यदि ये कदम नहीं उठाए गए, तो ऐसे विवाद बार-बार सामने आते रहेंगे।

सियासत गरम, भरोसा ठंडा

इस पूरे घटनाक्रम ने शहर की राजनीति में हलचल मचा दी है। विपक्ष इसे लोकतंत्र पर हमला बता रहा है, तो सत्ता पक्ष की ओर से अब तक कोई ठोस बयान सामने नहीं आया।
लोग कह रहे हैं—
भाई, वोट ही नहीं रहेगा तो नेता किसके बनोगे?”

यह सवाल छोटा नहीं है। मतदाता सूची की शुद्धता सिर्फ एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियाद है।

आगे क्या?

अब सबकी नजर जांच और प्रशासनिक कार्रवाई पर टिकी है। अगर आरोप सही पाए गए, तो यह सिर्फ एक जिले का मामला नहीं रहेगा—पूरे प्रदेश में पुनरीक्षण प्रक्रिया पर सवाल उठेंगे।

फिलहाल माहौल गरम है, आरोप तीखे हैं और जनता जवाब चाहती है।

लोकतंत्र की ताकत मतदाता है। अगर वही सूची से गायब होने लगे, तो यह सिर्फ नाम कटना नहीं—भरोसा कटना है।

अम्बिकापुर की सियासत में यह मुद्दा आने वाले दिनों में और गरमाने वाला है। जनता देख रही है, सवाल पूछ रही है और जवाब का इंतजार कर रही है।

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