पुलिस–राजस्व की मौजूदगी में जब्ती, फिर ऐसा जादू कि सबूत ही उड़नछू
बलरामपुर/वाड्रफनगर/बसंतपुर | विशेष रिपोर्ट
छत्तीसगढ़ के बलरामपुर जिले में इन दिनों एक नया ‘करतब’ चर्चा में है। यहाँ अवैध धान से लदी पिकअप न सिर्फ पकड़ी गई, बल्कि पुलिस और राजस्व अमले की मौजूदगी में फोटो खिंचवाकर… गायब भी हो गई। कागजों में कार्रवाई, ज़मीन पर शून्य। मानो सिस्टम ने खुद ‘मिस्टर इंडिया’ का चोगा ओढ़ लिया हो।
कानून की किताब खुली, पर पन्ने खाली
बताया जाता है कि 8 जनवरी 2026 की रात ग्राम बसंतपुर (नमोरी) में उत्तर प्रदेश की ओर जा रही लगभग 65 बोरी अवैध धान से लदी बिना नंबर की पिकअप पकड़ी गई। मौके पर नायब तहसीलदार और बसंतपुर पुलिस मौजूद—यानि सब कुछ “ऑफिशियल”। तस्वीरें खिंचीं, मुस्कानें आईं, और फिर… पिकअप हवा हो गई।
न FIR, न राजसात की प्रक्रिया, न नीलामी—कानून पूछता रह गया, “मैं करूँ तो करूँ क्या?”
बिना FIR ‘आजादी’, नियमों को राम-राम
जब्ती के बाद भी एक महीना बीत गया, लेकिन न तो मोटर व्हीकल एक्ट की धाराएँ दिखीं, न आवश्यक वस्तु अधिनियम की। बिना नंबर वाहन, अवैध धान, फरार ड्राइवर—सब कानूनी नोटिस बोर्ड से बाहर। चर्चा है कि किसी ‘ऊपरी दबाव’ या ‘सेटिंग’ ने पिकअप को ऐसा पंख दिया कि वह सबूतों सहित उड़ गई।
सिस्टम की तस्वीरें, कार्रवाई अदृश्य
सबसे बड़ा सवाल यही है, जब फोटो साक्ष्य मौजूद हैं, अधिकारी मौके पर थे, तो फिर सबूत कहाँ गए? क्या कैमरे ने सिर्फ मुस्कान कैद की, जिम्मेदारी नहीं? क्या यह वही मॉडल है जिसमें पहले फोटो, बाद में फाइल और अंत में खामोशी?
संपादक की शिकायत, सवालों की बौछार
इस ‘गायब’ खेल पर भारत सम्मान न्यूज़ के प्रधान संपादक जितेंद्र कुमार जायसवाल ने चुप्पी तोड़ी। 2 फरवरी 2026 को SDOP वाड्रफनगर को औपचारिक आवेदन देकर FIR की मांग की गई। शिकायत की प्रतिलिपि संभाग आयुक्त (सरगुजा), IG (सरगुजा रेंज), जिला कलेक्टर और SP बलरामपुर तक पहुँची, ताकि मामला “फाइल-फ्रिज” में न जाए।
शिकायत में उठे तीखे सवाल
- किसके आदेश पर अवैध धान और बिना नंबर वाहन को छोड़ा गया?
- फरार ड्राइवर पर कार्रवाई क्यों शून्य?
- क्या लापरवाही/साठगांठ में शामिल अधिकारियों पर FIR होगी?
जनता की अदालत: धान गया कहाँ?
गाँव-शहर में चर्चा है, क्या यह अवैध धान किसी बड़े नेटवर्क का हिस्सा था? क्या जाँच ‘रोज़ी रेट’ के हिसाब से आगे-पीछे होती है? क्या नियम सिर्फ कागजों के लिए हैं?
लोग पूछ रहे हैं— जब अधिकारी सामने थे, तो गायब किसने किया?
प्रशासन के सामने दो रास्ते
1. तथ्यों के आधार पर स्वतंत्र जांच, FIR, जिम्मेदारों पर कार्रवाई, और जब्त माल का ट्रैक।
2. मामले को ठंडे बस्ते में डालकर सिस्टम की साख को और ठंडा करना।
अब गेंद प्रशासन के पाले में है—या तो कानून चलेगा, या जादू।
यह मामला सिर्फ एक पिकअप या 65 बोरी धान का नहीं, बल्कि उस भरोसे का है जो जनता कानून पर करती है। अगर सबूत ही ‘अदृश्य’ हो जाएँ, तो न्याय किसे दिखेगा?
बलरामपुर की इस कहानी में क्लाइमेक्स बाकी है—देखना यह है कि ‘मिस्टर इंडिया’ बेनकाब होता है या फाइल फिर मुस्कुरा देती है।



