दिल्ली की चर्चित आबकारी नीति मामले में एक बार फिर बड़ा कानूनी मोड़ आ गया है। केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) ने ट्रायल कोर्ट के उस फैसले को खुली चुनौती दी है, जिसमें सभी आरोपियों को बरी कर दिया गया था। एजेंसी ने इस आदेश को कानून और तथ्यों के खिलाफ बताते हुए दिल्ली हाई कोर्ट में 974 पन्नों की विस्तृत रिवीजन याचिका दाखिल की है। अब इस हाई-प्रोफाइल मामले की अगली सुनवाई 9 मार्च को तय की गई है, जिस पर देशभर की नजरें टिकी हुई हैं।

CBI का कहना है कि निचली अदालत ने आरोप तय करने के शुरुआती चरण में ही ऐसे निष्कर्ष निकाल दिए, जो आमतौर पर पूरी सुनवाई के बाद सामने आते हैं। एजेंसी के अनुसार, स्पेशल जज द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया एक तरह से “मिनी ट्रायल” जैसी थी, जो कानूनन सही नहीं मानी जाती। CBI का दावा है कि अदालत को केवल यह देखना था कि प्रथम दृष्टया मामला बनता है या नहीं, लेकिन फैसले में साक्ष्यों का विस्तृत विश्लेषण कर अंतिम निष्कर्ष जैसा रुख अपनाया गया।

जांच एजेंसी ने अपनी याचिका में यह भी आरोप लगाया है कि ट्रायल कोर्ट ने पूरे कथित साजिश मामले को समग्र रूप से देखने के बजाय अलग-अलग हिस्सों में बांटकर मूल्यांकन किया। इससे केस की पूरी तस्वीर अदालत के सामने सही तरीके से नहीं आ सकी। CBI के मुताबिक, इसी वजह से आरोपियों को बरी करने का आदेश वास्तविक तथ्यों से मेल नहीं खाता।

एजेंसी ने हाई कोर्ट से मांग की है कि ट्रायल कोर्ट के फैसले की न्यायिक समीक्षा की जाए और यह तय किया जाए कि क्या साक्ष्यों का आकलन सही तरीके से किया गया था। CBI का कहना है कि यदि इस स्तर पर ही इस तरह के निष्कर्ष स्वीकार कर लिए जाते हैं, तो गंभीर आर्थिक अपराधों की जांच पर गलत संदेश जाएगा।

मामले में एक और विवाद तब जुड़ गया जब ट्रायल कोर्ट ने जांच अधिकारी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई की सिफारिश कर दी। CBI ने इसे हैरान करने वाला कदम बताते हुए कहा कि बिना पर्याप्त आधार के ऐसी टिप्पणी करना जांच प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल खड़े करता है। एजेंसी ने हाई कोर्ट से इस टिप्पणी की वैधता की भी समीक्षा करने की मांग की है।

दिल्ली आबकारी नीति मामला पहले से ही देश की सबसे चर्चित राजनीतिक और कानूनी लड़ाइयों में शामिल रहा है। ऐसे में CBI की नई याचिका ने इस केस को फिर से सुर्खियों के केंद्र में ला दिया है। अब हाई कोर्ट को यह तय करना होगा कि ट्रायल कोर्ट का फैसला बरकरार रहेगा या फिर मामले की कानूनी दिशा पूरी तरह बदल जाएगी।

फिलहाल सभी पक्षों की नजर 9 मार्च की सुनवाई पर टिकी है, जहां यह स्पष्ट होगा कि क्या आरोपियों को मिली राहत कायम रहेगी या जांच एजेंसी को केस दोबारा आगे बढ़ाने का मौका मिलेगा।

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