गौरेला–पेंड्रा–मरवाही।
शासन चाहे जितने दावे कर ले कि समर्थन मूल्य पर धान खरीदी आसान है, लेकिन ज़मीनी हकीकत इससे बिल्कुल उलट नजर आ रही है। जीपीएम जिले के मरवाही विकासखंड से एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने सरकारी सिस्टम की पोल खोल कर रख दी है।
ग्राम लिटियासरई के किसान मोहन सिंह ने इस साल केसीसी ऋण लेकर अपनी 10 एकड़ जमीन में धान की खेती की। खेत में खून-पसीना बहाया, फसल तैयार की और जब धान बेचने समिति पहुंचे, तो वहां ऐसा झटका लगा कि किसान के पैरों तले जमीन खिसक गई।

रिकॉर्ड में धान नहीं, तरोई दर्ज!
कागजों में किसान के 18 रकबे में से 14 रकबे में धान की जगह तरोई फसल दर्ज पाई गई। समिति ने साफ कह दिया— “जितना रकबा धान का दर्ज है, उतने का ही टोकन कटेगा।” यानि किसान ने खेत में धान बोया, लेकिन रिकॉर्ड की गलती के कारण पूरी फसल बेचने से वंचित रह गया।
पीड़ित किसान के बेटे हरि सिंह बताते हैं कि “गिरदावरी या डीसीएस पंजीयन में किसी की गलती हुई है, लेकिन सजा किसान को मिल रही है।”
मोहन सिंह कहते हैं, “पूरे खेत में धान लगाया था। जब रिकॉर्ड देखा तो तरोई लिखा था। सिर पकड़कर बैठ गया। अब राजस्व दफ्तर के चक्कर काट रहा हूं।”

सिर्फ एक किसान नहीं, कई पीड़ित
किसान का कहना है कि उनके गांव में और भी कई किसान हैं, जिनके खेतों में धान बोया गया, लेकिन कागजों में दूसरी फसल दर्ज कर दी गई। ऐसे किसान भी समर्थन मूल्य से वंचित होकर दर-दर भटक रहे हैं।
प्रशासन ने क्या कहा?
इस मामले में जब मरवाही एसडीएम देवेंद्र सिरमौर से बात की गई तो उन्होंने कहा— “मामला संज्ञान में आया है। यदि धान की जगह दूसरी फसल दर्ज है, तो फिजिकल वेरिफिकेशन कराया जाएगा। जांच के बाद आगे की कार्रवाई होगी।”।

अब सवाल ये है कि❓ गलती सिस्टम की, भुगतना किसान क्यों?❓ जब तक जांच होगी, तब तक किसान अपनी फसल लेकर कहां जाएगा?
मरवाही के इस मामले ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि कागजों की गलती किसानों की मेहनत पर भारी पड़ रही है। अब देखना होगा कि प्रशासन कब तक सिर्फ जांच की बात करेगा और किसान को उसका हक कब मिलेगा।

