रायपुर/जशपुर/घरघोड़ा |

छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले में जनसंपर्क विभाग ने लोकतंत्र की किताब फाड़कर “नवाबी नियमावली” लागू कर दी है। यहाँ अब पत्रकारिता कोई संवैधानिक अधिकार नहीं, बल्कि साहसिक अपराध बन चुकी है। खबर छापो तो आपराधिक ठप्पा, सवाल पूछो तो एक करोड़ रुपये का नोटिस— यही है जशपुर का नया “जनसंपर्क मॉडल”।

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यह कोई व्यंग्य नहीं, बल्कि हकीकत है। एक पत्रकार ने विभागीय प्रताड़ना से तंग आकर आत्महत्या के प्रयास की खबर क्या छाप दी— जनसंपर्क विभाग की सहायक संचालक ने अदालत बनने में एक पल नहीं लगाया। न्यायालय का इंतज़ार छोड़, सरकारी व्हाट्सएप ग्रुप को ही सुप्रीम कोर्ट घोषित कर दिया गया और पत्रकार को खुलेआम “अपराधी” करार दे दिया गया।

सच लिखना बना “घोर अपराध”

पत्रकार ऋषिकेश मिश्रा का कसूर सिर्फ इतना था कि उन्होंने यह सच जनता के सामने रखा कि जनसंपर्क कार्यालय का एक कर्मचारी प्रताड़ना से इस कदर टूट गया कि उसने आत्महत्या की कोशिश की।
20 अगस्त को कर्मचारी की थाने में लिखित शिकायत, 2 सितंबर को खबर प्रकाशित— और बस, यहीं से अफसरशाही का अहंकार उफान पर आ गया।

व्हाट्सएप बना अदालत, अफसर बने जज-जूरी

परिवाद के अनुसार, खबर सामने आते ही सहायक संचालक ने कानून, संविधान और न्यायिक प्रक्रिया को दरकिनार कर सरकारी व्हाट्सएप ग्रुप में पत्रकार को “अपराधी” घोषित कर दिया। जिस ग्रुप में कलेक्टर और एसपी जैसे वरिष्ठ अधिकारी जुड़े हों, वहाँ किसी पत्रकार को अपराधी कहना— यह केवल भाषा की गलती नहीं, बल्कि सत्ता के नशे में चूर मानसिकता का प्रमाण है।

एक करोड़ की मानहानि: डराने का हथियार

इतना ही नहीं, पत्रकार को 1 करोड़ रुपये का मानहानि नोटिस थमा दिया गया। सवाल सीधा है— क्या सरकारी कुर्सी पर बैठकर पत्रकारों को डराना अब जनसंपर्क विभाग की नई जिम्मेदारी है? क्या सच लिखने की कीमत अब करोड़ों में वसूली जाएगी?

शिकायत पत्र की प्रति

सिस्टम मौन, पत्रकार अदालत में

पत्रकार ने एसपी से लेकर मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री तक शिकायतें भेजीं, लेकिन सिस्टम जैसे कोमा में चला गया। न जांच, न कार्रवाई। आख़िरकार पत्रकार को मजबूर होकर घरघोड़ा न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाना पड़ा।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 और भारतीय न्याय संहिता 2023 की गंभीर धाराओं (308, 356, 352, 351) के तहत परिवाद दर्ज कराया गया है।

कलम बनाम कुर्सी का अहंकार

अब सवाल अदालत में है— क्या व्हाट्सएप पर बांटी गई “अपराधी” की डिग्री, असली कोर्ट में टिक पाएगी? या फिर यह साबित होगा कि पत्रकार चरणचुंबक नहीं, बल्कि आईना होते हैं— और आईना तोड़ने से चेहरा साफ नहीं होता।

वरिष्ठ पत्रकार का तीखा प्रहार

इस पूरे प्रकरण पर वरिष्ठ पत्रकार कुमार जितेन्द्र ने दो टूक शब्दों में चेतावनी दी—“ऐसे मामलों को टालना बेहद ख़तरनाक है। इससे पद और सत्ता का दुरुपयोग करने वाले अधिकारियों का मनोबल और बढ़ता है। कई पत्रकारों को पहले नोटिस से डराया गया, फिर षड्यंत्र रचकर जेल तक भिजवाया गया— यह प्रेस की स्वतंत्रता पर सीधा हमला है।”

उन्होंने साफ कहा कि यह मामला सिर्फ एक पत्रकार का नहीं, बल्कि पूरे पत्रकार समुदाय के सम्मान और अधिकारों का है। “यह नजीर बननी चाहिए, ताकि हर अधिकारी समझे— वह जनता का नौकर है, मालिक नहीं। सत्ता का घमंड लोकतंत्र और पत्रकारिता— दोनों के लिए घातक है।”

बड़ा सवाल
क्या जशपुर प्रशासन को अब यह सिखाने के लिए ट्यूशन लेनी पड़ेगी कि ‘आलोचना’ अपराध नहीं होती और ‘सच’ को दबाया नहीं जा सकता?

यह मामला अब सिर्फ जशपुर का नहीं रहा— यह लोकतंत्र बनाम दंभ, कलम बनाम कुर्सी की सीधी लड़ाई बन चुका है।

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