रायपुर |विशेष रिपोर्ट
छत्तीसगढ़ में धान खरीदी को लेकर सरकार के बड़े-बड़े दावे अब ज़मीन पर दम तोड़ते नज़र आ रहे हैं। जिस प्रदेश को धान का कटोरा कहा जाता है, वहीं आज किसान धान लेकर सड़क पर खड़ा है और सरकार एसी कमरों में बैठकर आंकड़ों का ढोल पीट रही है। हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि अब सवाल सिर्फ धान खरीदी का नहीं, बल्कि किसान के पहचान का बन गया है।
धान है, किसान है, MSP है— लेकिन टोकन नहीं है।
सरकारी आंकड़े बनाम जमीनी सच्चाई
सरकार की फाइलों में सब कुछ ठीक-ठाक दिखता है, लेकिन खेत से सड़क तक की सच्चाई कुछ और ही कहानी कहती है।
छत्तीसगढ़ में लगभग 13.7 लाख किसान पंजीकृत हैं। धान खरीदी का सरकारी लक्ष्य 165 लाख मीट्रिक टन तय किया गया। अब तक सरकार 110 से 115 लाख मीट्रिक टन धान खरीदी का दावा कर रही है।
लेकिन इसके बावजूद करीब 50 लाख मीट्रिक टन धान अभी भी बकाया है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि पूरे राज्य में करीब 17 लाख टोकन ही जारी किए गए, जबकि 1.5 से 2 लाख किसान ऐसे हैं जिन्हें आज तक टोकन ही नहीं मिला।
सवाल सीधा है—जब किसान लाखों में हैं, तो टोकन गिनती के क्यों?
टोकन नहीं, तो खरीदी नहीं
छत्तीसगढ़ में अब धान बेचना किसान के बस की बात नहीं रही। सरकार ने “तुहार टोकन” को अनिवार्य कर दिया है। टोकन नहीं तो खरीदी नहीं—यह नियम बन चुका है।
लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है किसान समिति के चक्कर काट रहा है, ऐप पर लिखा आता है— “आज टोकन उपलब्ध नहीं, समिति जवाब देती है— “ऊपर से आदेश नहीं है”
इस सरकारी गोलमाल में किसान का धान
👉 घर में पड़ा सड़ रहा है
👉 नमी बढ़ रही है
👉 और किसान कर्ज़ में डूबता जा रहा है
सरकार क्यों फेल हुई?
पहला कारण — खसरा और रिकॉर्ड की गड़बड़ी
हजारों किसानों के खसरा नंबर, फसल एंट्री और भूमि रिकॉर्ड सरकारी सिस्टम से मैच ही नहीं हो रहे। गलती सरकारी दफ्तरों की, लेकिन सजा किसान को मिल रही है।
दूसरा कारण — तुहार टोकन ऐप की नाकामी
सरकार डिजिटल सिस्टम का ढिंढोरा पीट रही है, लेकिन
सर्वर बार-बार डाउन, गांवों में स्मार्टफोन नहीं, इंटरनेट नाम की चीज़ नहीं डिजिटल व्यवस्था ने किसान की मदद नहीं की, उसे सिस्टम से बाहर कर दिया।
तीसरा कारण — खरीदी केंद्र खुले, लेकिन टोकन बंद
कई जिलों में खरीदी केंद्र तो खुले हैं, लेकिन टोकन पर अनौपचारिक रोक लगी हुई है। कभी बारदाना नहीं, कभी गोदाम भरे, तो कभी भुगतान का दबाव। हर बहाना तैयार है, बस किसान की परेशानी सुनने वाला कोई नहीं।
जब किसान सड़क पर उतरा
सरगुजा, बलरामपुर, कोरबा, दुर्ग और रायपुर ग्रामीण जैसे जिलों में किसानों का सब्र टूट चुका है। किसानों ने नेशनल हाईवे जाम किए, सरकार के खिलाफ नारे लगे—“टोकन दो या खरीदी बंद करो”।
कोरबा में तो हालात इतने भयावह हो गए कि टोकन न मिलने से टूटे किसान ने कीटनाशक पी लिया। यह सिर्फ एक घटना नहीं, यह सरकार की संवेदनहीनता का आईना है।
किसान पर सीधा आर्थिक हमला
जो किसान मजबूरी में खुले बाजार में धान बेच रहा है,
उसे MSP से 500 से 800 रुपए प्रति क्विंटल कम दाम मिल रहा है। कर्ज़ चुकाने की तारीख सिर पर है, बच्चों की फीस अटकी है, खाद-बीज और बिजली का भुगतान बाकी है। किसान हर तरफ से पिस रहा है।
सरकार का दावा, किसान का सवाल
सरकार कहती है— “धान खरीदी रिकॉर्ड स्तर पर हुई है।”
“टोकन सिस्टम 24×7 चालू है।”
लेकिन सवाल यह है—जिस किसान को टोकन ही नहीं मिला, उसके लिए यह रिकॉर्ड किस काम का?
सिस्टम जीता, किसान हारा
छत्तीसगढ़ में अब यह साफ हो चुका है कि—सरकार की नीतियां ज़मीन से कटी हुई हैं, डिजिटल व्यवस्था ने किसान को और कमजोर किया है ।
टोकन नहीं = खरीदी नहीं
खरीदी नहीं = किसान बर्बाद
जब तक—
ऑफलाइन टोकन की व्यवस्था, खसरा और रिकॉर्ड में सुधार, जिलेवार अतिरिक्त टोकन नहीं दिए जाते,तब तक छत्तीसगढ़ का किसान हर साल इसी तरह सड़क पर उतरता रहेगा।

