महंगाई, बेरोजगारी और किसान संकट पर खामोशी; मंत्रियों–VVIPs पर 1102 करोड़ की शाही बरसात
रायपुर। संसद में पेश बजट-2026 ने एक बार फिर यह साफ कर दिया है कि सरकार की प्राथमिकताओं की सूची में आम आदमी सबसे नीचे और VIP संस्कृति सबसे ऊपर है। यह बजट किसी अर्थशास्त्र की किताब का अध्याय नहीं, बल्कि सत्ता की मानसिकता का आईना है—जहां जनता से सब्र मांगा जाता है और सत्ता अपने लिए सुविधाएं लिखवा लेती है।
देश का नागरिक महंगाई, बेरोजगारी, टैक्स और कर्ज के बोझ से जूझ रहा है, लेकिन सरकार ने मंत्रियों, प्रधानमंत्री कार्यालय, राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद, पूर्व राज्यपालों और राजकीय मेहमानों पर 1102 करोड़ रुपये खर्च करने का प्रावधान कर दिया। यह कोई छोटी बढ़ोतरी नहीं—यह नीति है, संकेत है, इरादा है।
जनता के लिए उपदेश, नेताओं के लिए बजट
पिछले साल मंत्रियों और VIP सुविधाओं पर खर्च 978.20 करोड़ रुपये था। इस साल वही खर्च बढ़ाकर 1102 करोड़ कर दिया गया। यानी एक झटके में 124 करोड़ की बढ़ोतरी—और जनता के हिस्से में? वही पुराना जुमला—“धैर्य रखें, हालात कठिन हैं।”
कठिन हालात अगर हैं तो किसके लिए? क्या कठिनाई सिर्फ रसोई गैस, दूध, दवा और स्कूल फीस चुकाने वाले परिवारों के लिए है? सत्ता के गलियारों में तो कठिनाई दिखाई नहीं देती—वहां तो फाइलों के बीच सुविधाओं की स्याही सूखने से पहले अगला खर्च मंजूर हो जाता है।
VVIP उड़ानें, जनता की धक्का-मुक्की
बजट में काउंसिल ऑफ मिनिस्टर्स—यानी कैबिनेट मंत्रियों, राज्य मंत्रियों और पूर्व प्रधानमंत्रियों—की सैलरी, भत्ते और यात्राओं के लिए 620 करोड़ रुपये रखे गए हैं। इसमें VVIPs के लिए स्पेशल फ्लाइट ऑपरेशन्स भी शामिल हैं।
एक तरफ आम नागरिक ट्रेन की जनरल बोगी में जान हथेली पर रखकर सफर करता है, दूसरी तरफ सत्ता के प्रतिनिधि स्पेशल विमानों में उड़ते हैं। जनता से सादगी की अपील और खुद के लिए शाही इंतजाम—यही है बजट-2026 का मूल दर्शन।
PMO और सुरक्षा पर करोड़ों, जनता की सुरक्षा पर सवाल
प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) के प्रशासनिक खर्च के लिए 73.52 करोड़ रुपये, राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद (NSC) और उसके स्पेस प्रोग्राम के लिए 256.19 करोड़ रुपये, और प्रिंसिपल साइंटिफिक एडवाइजर कार्यालय व नेशनल रिसर्च फाउंडेशन के लिए 65 करोड़ रुपये।
सरकार इसे “राष्ट्रहित” कहेगी। लेकिन राष्ट्र आखिर बनता किससे है? भूखा नागरिक, बेरोजगार युवा और इलाज के लिए कर्ज लेने वाला परिवार क्या राष्ट्र का हिस्सा नहीं? जब रोजगार नहीं, आय नहीं, स्वास्थ्य और शिक्षा सस्ती नहीं—तो सुरक्षा किसकी और किससे?
पूर्व राज्यपालों की सुविधा, वर्तमान जनता की उपेक्षा
बजट में पूर्व राज्यपालों को सचिवीय सहायता के लिए 1.53 करोड़ रुपये और कैबिनेट सचिवालय व अफसरशाही के लिए 80 करोड़ रुपये का प्रावधान है।
जो सत्ता में रहा, उसकी सुविधा आज भी जारी है। जो आज जीने की जद्दोजहद में है—किसान, मजदूर, मध्यम वर्ग—उसके लिए बजट के पन्ने खामोश हैं। यह खामोशी कोई भूल नहीं, यह प्राथमिकता है।
विदेशी मेहमानों के लिए दावत, देशवासियों के लिए सख्ती
विदेशी राजकीय अतिथियों के मनोरंजन, राष्ट्रपति भवन के रिसेप्शन और राजकीय समारोहों के लिए 5.76 करोड़ रुपये। मतलब—विदेशी आएं तो रेड कार्पेट, देश का नागरिक सवाल करे तो “सब्र रखिए”। यह लोकतंत्र का कैसा चेहरा है, जहां नागरिक की आवाज़ पर ताला और मेहमानों की थाली में परोसा जाता है?
मिडिल क्लास: टैक्स मशीन से आगे कुछ नहीं
इनकम टैक्स स्लैब में राहत की उम्मीद फिर टूट गई। शिक्षा सस्ती नहीं, इलाज सस्ता नहीं, बीमा महंगा, ईंधन महंगा—लेकिन टैक्स तय। मिडिल क्लास को संदेश साफ है—आप कमाइए, टैक्स दीजिए, और चुपचाप लाइन में खड़े रहिए। सुविधाएं VIP को मिलेंगी; आपको भाषण मिलेगा।
किसान–मजदूर भाषणों में, बजट में नहीं
हर चुनाव में किसान का नाम, हर भाषण में मजदूर का जिक्र—लेकिन बजट में MSP की कानूनी गारंटी नहीं, स्थायी रोजगार का ठोस रोडमैप नहीं, ग्रामीण अर्थव्यवस्था को संजीवनी देने की योजना नहीं। वहीं मंत्रियों के लिए वेतन, भत्ता, यात्रा और सुरक्षा—सब पक्का। सवाल उठता है: क्या खेत में पसीना बहाने वाला नागरिक कम महत्वपूर्ण है, या सत्ता की कुर्सी पर बैठा प्रतिनिधि?
VIP संस्कृति का सुपर बजट
बजट-2026 एक संदेश देता है—जनता सरकार बनाए, जनता टैक्स दे, जनता सहन करे; और सत्ता अपने लिए खर्च बढ़ाए। यह बजट विकास का नहीं, विशेषाधिकार का दस्तावेज है। यह समानता का नहीं, विभाजन का लेखा है—जहां एक तरफ सुविधाओं का पहाड़ है और दूसरी तरफ उम्मीदों का सूखा।
व्यंग्य की स्याही में सच
सरकार कहेगी—“देश आगे बढ़ रहा है।” हां, बढ़ रहा है—लेकिन किस दिशा में? नेताओं की उड़ानें ऊंची हैं, जनता के सपने जमीन पर हैं। सरकार कहेगी—“सबका साथ, सबका विकास।” हां, साथ है—लेकिन खर्च में नहीं; विकास है—लेकिन VIP के लिए।
आंकड़े बोलते हैं, भाषण नहीं
आंकड़े बताते हैं कि सत्ता की सुविधा पर खर्च बढ़ा है, जबकि आम नागरिक की राहत पर सन्नाटा है। यह बजट पूछता नहीं—बताता है। और जो बताता है, वह डराता है: अगर यही प्राथमिकताएं रहीं, तो सामाजिक खाई और गहरी होगी।
लोकतंत्र की कसौटी
लोकतंत्र का मतलब सिर्फ चुनाव नहीं; बजट भी उसकी कसौटी है। जब बजट जनता की जरूरतों से मुंह मोड़े और सत्ता की सुविधाओं पर मुस्कुराए, तो सवाल उठना स्वाभाविक है। क्या सरकार जनता की है, या जनता सरकार के लिए?
जनता की कमाई, सत्ता की तिजोरी
बजट-2026 इतिहास में याद रखा जाएगा—एक ऐसे दस्तावेज के रूप में जिसने बताया कि जनता से वसूली और सत्ता की ऐश एक साथ कैसे चलती है। यह बजट चेतावनी है—धैर्य की परीक्षा ली जा रही है और इतिहास गवाह है—जब धैर्य टूटता है, तो सिर्फ बजट नहीं बदलते, सियासत की दिशा बदल जाती है।

