छत्तीसगढ़ में इन दिनों अपनी मातृभाषा के सम्मान और पहचान को लेकर एक बड़ा जन-जागरण देखने को मिल रहा है। “जोहार छत्तीसगढ़” के भावनात्मक आह्वान के साथ प्रदेशभर में एक संगठित मुहिम चल रही है, जिसका उद्देश्य छत्तीसगढ़ी भाषा को आगामी जनगणना 2026-27 में विशेष रूप से शामिल कराना और साथ ही भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में इसे स्थान दिलाना है। यह अभियान अब एक जनआंदोलन का रूप लेता जा रहा है, जिसमें आम नागरिक बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं।

इस पहल के तहत लोगों से अपील की जा रही है कि वे अपने-अपने नाम से प्रधानमंत्री कार्यालय को पत्र भेजें। इन पत्रों में छत्तीसगढ़ी भाषा की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और सामाजिक महत्ता को रेखांकित करते हुए इसे राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता देने की मांग की जा रही है। अभियान से जुड़े लोग यह भी आग्रह कर रहे हैं कि अधिक से अधिक लोग इस मुहिम में भाग लें, ताकि सरकार तक एक मजबूत और स्पष्ट संदेश पहुंच सके।

अभियान की खास बात यह है कि इसमें किसी राजनीतिक दल की अगुवाई नहीं, बल्कि आम जनता की स्वेच्छा और जुड़ाव है। गांव-गांव, शहर-शहर लोग इस विषय पर चर्चा कर रहे हैं और अपने स्तर पर पहल कर रहे हैं। कहीं लोग सामूहिक रूप से पत्र लिख रहे हैं, तो कहीं सोशल मीडिया के माध्यम से जागरूकता फैलाई जा रही है। युवाओं के साथ-साथ बुजुर्ग और महिलाएं भी इस मुहिम में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।

लोगों को यह सुझाव दिया जा रहा है कि वे अपने पत्रों को प्रिंट कर स्पीड पोस्ट के जरिए प्रधानमंत्री कार्यालय भेजें, ताकि उनकी बात औपचारिक रूप से दर्ज हो सके। इसके अलावा, डिजिटल माध्यम का उपयोग करते हुए प्रधानमंत्री कार्यालय की आधिकारिक ईमेल आईडी पर भी पत्र भेजने की अपील की जा रही है। इस तरह ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों माध्यमों से आवाज उठाने की रणनीति अपनाई जा रही है।

छत्तीसगढ़ी भाषा को लेकर लोगों का भावनात्मक जुड़ाव इस अभियान में साफ झलकता है। यह केवल एक भाषा नहीं, बल्कि प्रदेश की संस्कृति, परंपरा और पहचान का अभिन्न हिस्सा है। लोकगीतों, कहावतों, रीति-रिवाजों और दैनिक जीवन में छत्तीसगढ़ी की गहरी उपस्थिति है। इसके बावजूद, इसे अब तक वह संवैधानिक मान्यता नहीं मिल पाई है, जिसकी मांग लंबे समय से की जाती रही है।

विशेषज्ञों का मानना है कि जनगणना में किसी भाषा का स्पष्ट उल्लेख होना बेहद महत्वपूर्ण होता है। इससे उस भाषा को बोलने वाले लोगों की वास्तविक संख्या सामने आती है, जो आगे चलकर उसे आधिकारिक मान्यता दिलाने में अहम भूमिका निभाती है। ऐसे में छत्तीसगढ़ी भाषा को जनगणना 2026-27 में शामिल कराना इस पूरी मुहिम का एक महत्वपूर्ण और रणनीतिक हिस्सा माना जा रहा है।

इस अभियान के तहत लोगों से यह भी कहा जा रहा है कि वे अपने दोस्तों, सहेलियों, सहकर्मियों और रिश्तेदारों को भी इस मुहिम से जुड़ने के लिए प्रेरित करें। जितने अधिक लोग इसमें शामिल होंगे, उतनी ही प्रभावी ढंग से यह मुद्दा राष्ट्रीय स्तर पर उठेगा। कई स्थानों पर छात्र-छात्राएं और सामाजिक संगठन मिलकर सामूहिक रूप से पत्र लेखन अभियान भी चला रहे हैं।

“पढ़बो, लिखबो, गोठीयाबो छत्तीसगढ़ी” जैसे नारों के माध्यम से भाषा के उपयोग को बढ़ावा देने पर भी जोर दिया जा रहा है। अभियान से जुड़े लोग मानते हैं कि केवल मान्यता की मांग करना ही काफी नहीं है, बल्कि रोजमर्रा के जीवन में भी छत्तीसगढ़ी भाषा का अधिक से अधिक उपयोग करना जरूरी है। इससे भाषा को जीवंत बनाए रखने और आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने में मदद मिलेगी।

हालांकि, इस मांग को लेकर अभी तक केंद्र सरकार की ओर से कोई ठोस प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन जिस तरह से यह मुहिम तेजी से फैल रही है, उससे यह स्पष्ट है कि आने वाले समय में यह एक बड़ा मुद्दा बन सकता है। लगातार भेजे जा रहे पत्र सरकार के सामने एक जनभावना के रूप में उभर रहे हैं, जिसे नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा।

यह मुहिम केवल भाषा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह छत्तीसगढ़ की अस्मिता, गौरव और पहचान से भी जुड़ा हुआ है। लोगों का मानना है कि जब तक उनकी मातृभाषा को उचित सम्मान और मान्यता नहीं मिलेगी, तब तक उनकी सांस्कृतिक पहचान अधूरी रहेगी। यही कारण है कि अब हर वर्ग के लोग इस दिशा में एकजुट होकर प्रयास कर रहे हैं।

अंततः, यह अभियान एक स्पष्ट संदेश देता है—
अपनी भाषा, अपनी पहचान और अपने अधिकार के लिए आवाज उठाना जरूरी है।
छत्तीसगढ़िया समाज अब अपनी भाषा के सम्मान के लिए जाग चुका है और संगठित रूप से आगे बढ़ रहा है।

“पढ़बो, लिखबो, गोठीयाबो…
छत्तीसगढ़ी के मान बढ़ाबो…
छत्तीसगढ़ी… छत्तीसगढ़ी… छत्तीसगढ़ी…
जय छत्तीसगढ़ महतारी।”

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