बलरामपुर/बिलासपुर। न्यायालय के आदेशों का कितना सम्मान होता है, इसकी एक और मिसाल बलरामपुर के चर्चित जाति प्रमाण पत्र विवाद में देखने को मिल रही है। आरोप है कि अनुसूचित जनजाति (ST) के कथित फर्जी जाति प्रमाण पत्र के सहारे चुनाव जीतकर विधायक बनने के मामले में आज तक प्रशासन कोई ठोस फैसला नहीं कर पाया है। अब शिकायतकर्ता ने फिर से गुहार लगाई है कि आखिर हाईकोर्ट के आदेश का इंतजार हो रहा है या फिर किसी और आदेश का?

मामला प्रतापपुर विधानसभा क्षेत्र की विधायक शकुंतला सिंह पोर्ते से जुड़ा है। शिकायतकर्ता का दावा है कि विधायक ने गोंड जनजाति का जो प्रमाण पत्र प्रस्तुत किया, वह नियमों के अनुरूप नहीं है। इस संबंध में पहले भी दस्तावेज और साक्ष्य संबंधित समितियों के सामने रखे जा चुके हैं।

बताया जा रहा है कि शिकायत पर कार्रवाई नहीं होने के कारण मामला हाईकोर्ट तक पहुंचा। न्यायालय ने स्पष्ट निर्देश देते हुए निर्धारित समय-सीमा में शिकायत का निराकरण करने को कहा था। लेकिन आरोप है कि आदेश की प्रतियां अधिकारियों तक पहुंचने के बावजूद फाइलें अब भी सरकारी रफ्तार से ही चल रही हैं।

हालात ऐसे हैं कि शिकायतकर्ता को अब अवमानना याचिका तक दायर करनी पड़ी है। सवाल यह है कि जब अदालत कार्रवाई के निर्देश दे चुकी है, तो फिर जांच पूरी होने में आखिर इतनी देरी क्यों? क्या फाइलें किसी खास वजह से आगे नहीं बढ़ रहीं, या फिर सिस्टम को अदालत के आदेशों से ज्यादा अपनी सुस्ती पर भरोसा है?

शिकायतकर्ता ने राज्य और जिला स्तरीय प्रमाण पत्र सत्यापन समितियों से मांग की है कि मामले की निष्पक्ष जांच कर जल्द अंतिम निर्णय लिया जाए। यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो संबंधित जाति प्रमाण पत्र को निरस्त किया जाए।

फिलहाल प्रशासन की ओर से कोई आधिकारिक जवाब सामने नहीं आया है, लेकिन एक सवाल जरूर खड़ा हो गया है— क्या हाईकोर्ट के आदेश भी सरकारी फाइलों के बोझ तले दब जाते हैं, या फिर इस मामले में किसी बड़े फैसले का इंतजार है?

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