विधानसभा सचिवालय पर शिकंजे की मांग! 8.65 करोड़ की सुरक्षा राशि, 125 टीवी और सरकारी संपत्ति पर जांच की आंच

विधानसभा सचिवालय पर शिकंजे की मांग!

विधानसभा सचिवालय में सुरक्षा खर्च, 125 टीवी और पुरानी सरकारी संपत्ति के रिकॉर्ड की जांच की मांग उठी है। जानिए अब कार्रवाई की मांग क्यों तेज हुई।

रायपुर। छत्तीसगढ़ विधानसभा का नया भवन भले ही आधुनिक सुविधाओं और भव्य निर्माण के लिए जाना जाता हो, लेकिन अब इसी परिसर की व्यवस्था को लेकर कई गंभीर सवाल सामने आ रहे हैं। मामला विधानसभा सचिवालय की सुरक्षा व्यवस्था, सरकारी खरीद और पुरानी संपत्ति के रखरखाव से जुड़ा है। दस्तावेजों में करीब 8.65 करोड़ रुपये की सुरक्षा राशि, उद्घाटन कार्यक्रम के दौरान लगाए गए 125 स्मार्ट टीवी और पुराने विधानसभा भवन में मौजूद करोड़ों रुपये की सरकारी संपत्ति को लेकर सवाल उठाए गए हैं।

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मामला इसलिए भी गंभीर है क्योंकि यहां बात किसी निजी संस्था के खर्च की नहीं, बल्कि सरकारी धन और सार्वजनिक संपत्ति की है। ऐसे में यदि खरीद, स्थापना, स्टॉक और संपत्ति के हस्तांतरण में कहीं भी नियमों की अनदेखी हुई है तो जिम्मेदारी तय करने की मांग उठना स्वाभाविक है।

हालांकि, दस्तावेजों में उठाए गए सवालों को अंतिम निष्कर्ष नहीं माना जा सकता। वास्तविक स्थिति जांच, सरकारी रिकॉर्ड और संबंधित अधिकारियों के जवाब के बाद ही साफ होगी।

विधानसभा सचिवालय की सुरक्षा पर 8.65 करोड़ का सवाल

नए विधानसभा भवन की सुरक्षा के लिए करीब 8 करोड़ 65 लाख रुपये की राशि का उल्लेख सामने आया है। अब सवाल यह है कि इतनी बड़ी रकम से कौन-कौन से सुरक्षा उपकरण और व्यवस्थाएं तैयार की गईं।

क्या पूरी राशि खर्च हुई? अगर खर्च हुई तो किस मद में हुई? कौन-कौन से उपकरण खरीदे गए? उनकी स्थापना कब हुई? आज वे उपकरण कहां मौजूद हैं और क्या सभी सुरक्षा व्यवस्थाएं काम कर रही हैं?

ये सवाल इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि विधानसभा भवन सामान्य सरकारी कार्यालय नहीं है। यहां मुख्यमंत्री, मंत्री, विधायक, अधिकारी और दूसरे महत्वपूर्ण लोगों की आवाजाही होती है। विधानसभा की कार्यवाही और बड़े कार्यक्रमों के दौरान सुरक्षा की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है।

ऐसे में विधानसभा सचिवालय को सुरक्षा खर्च से संबंधित रिकॉर्ड सामने रखकर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।

125 स्मार्ट टीवी की खरीद के बाद क्यों मचा सवाल?

विधानसभा भवन के उद्घाटन कार्यक्रम से जुड़ा दूसरा मामला करीब 125 स्मार्ट टीवी का है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक 1 नवंबर 2025 के उद्घाटन कार्यक्रम के दौरान अलग-अलग स्थानों पर टीवी लगाए गए थे।

कार्यक्रम समाप्त होने के बाद इन टीवी को वहां से हटा दिया गया। यहीं से सवाल शुरू हुआ कि आखिर इनकी खरीद किस उद्देश्य से की गई थी।

अगर ये टीवी विधानसभा भवन के स्थायी उपयोग के लिए खरीदे गए थे तो इन्हें कार्यक्रम के बाद हटाने की जरूरत क्यों पड़ी?

और यदि इनका इस्तेमाल सिर्फ कार्यक्रम के लिए होना था तो इतनी संख्या में टीवी खरीदने का निर्णय क्यों लिया गया?

विधानसभा सचिवालय को इस मामले में खरीद आदेश, भुगतान विवरण और स्टॉक रजिस्टर के आधार पर जवाब देना चाहिए। सबसे जरूरी बात यह है कि 125 टीवी वर्तमान में कहां हैं और किसके नियंत्रण में हैं।

विधानसभा सचिवालय की स्टॉक रजिस्टर की जांच क्यों जरूरी?

सरकारी सामान की खरीद के बाद उसकी स्टॉक एंट्री होना जरूरी होता है। इसलिए 125 टीवी के मामले में स्टॉक रिकॉर्ड सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज बन सकता है।

रिकॉर्ड से यह पता चल सकता है कि टीवी कब खरीदे गए, कितनी कीमत पर खरीदे गए, कहां लगाए गए और कार्यक्रम के बाद उन्हें कहां स्थानांतरित किया गया।

यदि टीवी दूसरे सरकारी परिसर में भेजे गए हैं तो उसका रिकॉर्ड भी होना चाहिए। यदि वे स्टोर में रखे हैं तो स्टोर की एंट्री मौजूद होनी चाहिए।

यही वजह है कि मामले में सिर्फ आरोप-प्रत्यारोप के बजाय रिकॉर्ड की जांच की मांग महत्वपूर्ण हो जाती है।

पुराने विधानसभा भवन की संपत्ति का हिसाब भी सामने आए

नए भवन में हुई खरीद के साथ पुराने विधानसभा भवन की संपत्ति को लेकर भी सवाल उठे हैं। दस्तावेजों में पुराने परिसर में 300 से ज्यादा एसी और 100 से अधिक स्मार्ट टीवी सहित बड़ी मात्रा में फर्नीचर और अन्य सामान होने का उल्लेख किया गया है।

अब जांच का सवाल यह है कि भवन स्थानांतरण के समय इस पूरी संपत्ति की सूची तैयार हुई थी या नहीं।

नए भवन तक पहुंचा कितना सामान, रिकॉर्ड में क्या है? पुराने परिसर में बची सरकारी संपत्ति का क्या हुआ? खराब घोषित सामान की सूची आखिर किसके पास है? नीलामी में भेजी गई सामग्री का हिसाब कौन देगा?

और अगर किसी सामान को बेचकर राशि मिली तो वह सरकारी खाते में कितनी जमा हुई?

इन सवालों का जवाब बिना रिकॉर्ड जांचे नहीं मिल सकता।

एसी, टीवी और फर्नीचर पर कार्रवाई की प्रक्रिया क्या रही?

सरकारी संपत्ति को अनुपयोगी घोषित करने के लिए निर्धारित प्रक्रिया होती है। यदि पुराने भवन का कोई सामान खराब या इस्तेमाल के लायक नहीं था तो उसके लिए संबंधित रिकॉर्ड तैयार किया जाना चाहिए था।

पूरी राशि खर्च हुई है तो उसका रिकॉर्ड सामने आना चाहिए। खर्च का विवरण मिलने पर यह भी पता चलेगा कि रकम किन उपकरणों पर लगी। वहीं, लगाए गए उपकरणों की वर्तमान स्थिति भी स्पष्ट होनी चाहिए।

यही कारण है कि विधानसभा सचिवालय से पुराने भवन की संपत्ति का पूरा भौतिक सत्यापन कराने की मांग उठ सकती है।

एक बार स्टॉक रजिस्टर और मौके पर मौजूद सामान का मिलान हो जाए तो स्थिति काफी हद तक साफ हो सकती है।

विधानसभा सचिवालय की पंचकर्म यूनिट के सामान पर सवाल

पुराने विधानसभा परिसर में 30 जुलाई 2021 को शुरू की गई पंचकर्म यूनिट के सामान को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं।

अब यह जानना जरूरी है कि यूनिट के लिए खरीदा गया सामान वर्तमान में कहां है। क्या वह अभी इस्तेमाल में है या किसी दूसरे स्थान पर स्थानांतरित किया गया? अगर सामान खराब हो चुका है तो उसके निपटारे की प्रक्रिया क्या रही?

इसका जवाब भी रिकॉर्ड के आधार पर सामने आना चाहिए।

सचिव की भूमिका पर निष्पक्ष जांच की मांग

मामले में विधानसभा सचिवालय के प्रशासनिक नेतृत्व की भूमिका को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। दस्तावेजों में तत्कालीन अधिकारियों की भूमिका की जांच की जरूरत बताई गई है। सचिव दिनेश शर्मा की भूमिका की निष्पक्ष जांच का उल्लेख भी सामने आया है।

विधानसभा सचिवालय : सचिव

यह स्पष्ट करना जरूरी है कि जांच का उल्लेख किसी अधिकारी को दोषी साबित नहीं करता। किसी भी अधिकारी की जिम्मेदारी तय करने के लिए प्रमाण और आधिकारिक जांच जरूरी है।

लेकिन अगर सुरक्षा राशि, सरकारी खरीद और संपत्ति प्रबंधन जैसे मामलों में सवाल उठे हैं तो संबंधित अधिकारियों की भूमिका की जांच से बचा नहीं जाना चाहिए।

जांच में यह देखा जाना चाहिए कि निर्णय किसने लिया, फाइल किस-किस स्तर से गुजरी, खरीद को मंजूरी किसने दी और सामान मिलने के बाद उसका सत्यापन किसने किया।

लंबे कार्यकाल पर भी उठे सवाल

विधानसभा सचिव के लंबे कार्यकाल को लेकर भी सवाल सामने आए हैं। चरणदास महंत के विधानसभा अध्यक्ष रहने के दौरान दिनेश शर्मा सचिव पद पर थे। बाद में डॉ. रमन सिंह विधानसभा अध्यक्ष बने, तब भी सचिव पद पर वही अधिकारी रहे।

किसी अधिकारी का लंबे समय तक एक पद पर रहना अपने आप में अनियमितता नहीं है। लेकिन जब उसी प्रशासनिक व्यवस्था से जुड़े कई मामलों पर सवाल सामने आएं तो उसकी समीक्षा की मांग उठना स्वाभाविक है।

सचिव के कार्यकाल की समय-समय पर समीक्षा हुई या नहीं, यह भी सवाल है। प्रशासनिक स्तर पर किसी तरह का मूल्यांकन किया गया था या नहीं, इसकी जानकारी सामने आनी चाहिए। विधानसभा अध्यक्षों ने सचिवालय की कार्यप्रणाली को लेकर कोई रिपोर्ट ली थी या नहीं, यह भी स्पष्ट होना बाकी है।

विधानसभा सचिवालय में जांच और जिम्मेदारी तय करने की मांग

इस पूरे मामले में सबसे जरूरी बात यही है कि आरोपों को राजनीतिक विवाद बनाने के बजाय दस्तावेजी जांच कराई जाए।

8.65 करोड़ रुपये की सुरक्षा राशि का पूरा हिसाब सामने आए।

125 स्मार्ट टीवी की खरीद और वर्तमान स्थिति की जांच हो।

पुराने भवन के एसी, टीवी और फर्नीचर का भौतिक सत्यापन कराया जाए।

पंचकर्म यूनिट के सामान की स्थिति स्पष्ट की जाए।

खरीद, भुगतान, स्टॉक और नीलामी से जुड़े रिकॉर्ड की जांच की जाए।

और यदि जांच में किसी स्तर पर नियमों की अनदेखी या वित्तीय गड़बड़ी सामने आती है तो संबंधित जिम्मेदारों पर नियमानुसार कार्रवाई की जाए।

विधानसभा की सुरक्षा व्यवस्था की आधिकारिक जानकारी

जनता के पैसे का हिसाब देना होगा

विधानसभा में बैठकर जनप्रतिनिधि सरकार से जनता के पैसे का हिसाब मांगते हैं। ऐसे में विधानसभा सचिवालय की अपनी प्रशासनिक व्यवस्था भी पारदर्शिता की कसौटी पर खरी उतरनी चाहिए।

अगर सभी खरीद नियमों के अनुसार हुई है तो रिकॉर्ड सामने आने से सवाल खत्म हो सकते हैं। अगर कोई गलती हुई है तो जांच के बाद जिम्मेदारी तय हो सकती है।

इसलिए फिलहाल सबसे बड़ा सवाल किसी व्यक्ति को दोषी ठहराना नहीं, बल्कि यह पता लगाना है कि सरकारी पैसा और सरकारी सामान किस प्रक्रिया से इस्तेमाल हुआ।

8.65 करोड़ की सुरक्षा राशि से लेकर 125 टीवी तक और पुराने भवन के एसी-फर्नीचर से लेकर पंचकर्म यूनिट के सामान तक—हर चीज का रिकॉर्ड सामने आना चाहिए।

अब गेंद विधानसभा सचिवालय के पाले में है। सवाल गंभीर हैं तो जवाब भी दस्तावेजों के साथ होना चाहिए। और अगर जांच में गड़बड़ी सामने आती है तो केवल सफाई नहीं, बल्कि जिम्मेदारी और कार्रवाई भी तय होनी चाहिए।

यही सरकारी संपत्ति के प्रति जवाबदेही है और यही जनता के पैसे के प्रति वास्तविक जिम्मेदारी भी।

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