बैगा जाति प्रमाण पत्र मामला: 55 लोगों की सरकारी नौकरी पर सवाल, पूर्व विधायक ने की राज्य स्तरीय जांच की मांग

बिलासपुर/मस्तूरी। बिलासपुर जिले के मस्तूरी विकासखंड स्थित ग्राम पौड़ी से जुड़ा एक बड़ा मामला सामने आया है, जिसमें विशेष पिछड़ी जनजाति बैगा जाति प्रमाण पत्र को फर्जी तरीके से बनवाकर 55 लोगों द्वारा सरकारी नौकरी हासिल करने का आरोप लगाया गया है। इस पूरे प्रकरण को लेकर भरतपुर-सोनहत के पूर्व विधायक गुलाब कमरो ने राज्यपाल छत्तीसगढ़ और आदिम जाति एवं अनुसूचित जाति विकास विभाग के सचिव को पत्र लिखकर राज्य स्तरीय जांच की मांग उठाई है।

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पूर्व विधायक ने अपने पत्र में मांग की है कि इस मामले की जांच राज्य स्तरीय जाति सत्यापन छानबीन समिति से कराई जाए और यदि बैगा जाति प्रमाण पत्र फर्जी पाए जाते हैं, तो उन्हें तुरंत निरस्त कर दोषी व्यक्तियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए।

क्या है बैगा जाति प्रमाण पत्र का पूरा मामला

आरोप के मुताबिक, ग्राम पौड़ी, थाना सीपत, विकासखंड मस्तूरी में कुछ अन्य जातियों के लोगों ने कूट रचित दस्तावेजों के सहारे विशेष पिछड़ी जनजाति बैगा का जाति प्रमाण पत्र तैयार करवाया। इन्हीं प्रमाण पत्रों के दम पर 55 व्यक्तियों ने शासकीय सेवा में नियुक्ति हासिल कर ली, जबकि शिकायतकर्ताओं का दावा है कि इन लोगों का बैगा समुदाय से कोई वास्तविक नाता ही नहीं है।

शिकायत में कहा गया है कि इन व्यक्तियों के पूर्वज भी कभी संबंधित इलाके में नहीं रहे, जिससे यह साफ संकेत मिलता है कि बैगा जाति प्रमाण पत्र हासिल करने के लिए तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया। छत्तीसगढ़ आदिम जाति विभाग

राज्यपाल और शासन को भेजा गया पत्र

पूर्व विधायक गुलाब कमरो ने 6 सितंबर 2026 को यह पत्र जारी किया है। इसकी एक प्रति महामहिम राज्यपाल, छत्तीसगढ़, राजभवन को भेजी गई है, जबकि दूसरी प्रति आदिम जाति एवं अनुसूचित जाति विकास विभाग के सचिव के पास भेजी गई है। पत्र में स्पष्ट रूप से मांग की गई है कि फर्जी जाति प्रमाण पत्र के आधार पर हुई नियुक्तियों की समीक्षा कर दोषियों पर कार्रवाई की जाए।

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बैगा जाति प्रमाण पत्र मामले पर शिकायत किसने की

इस मामले की जानकारी पूर्व विधायक तक पहुंचाने का काम नांगा बैगा जन शक्ति संगठन के अध्यक्ष/सचिव राम सिंह बैगा, जेड राम बैगा और प्रेमलाल बैगा ने किया। इसके अलावा जिलाध्यक्ष बैगा समाज, जिला गौरेला-पेंड्रा-मरवाही और अन्य बैगा समाज पदाधिकारियों ने भी इस मुद्दे को गंभीरता से उठाया।

शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि कूट रचित दस्तावेजों के आधार पर हासिल किए गए बैगा जाति प्रमाण पत्र से बिलासपुर और गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिले में कुल 55 लोगों ने सरकारी नौकरी पाई है। हालांकि यह पूरा प्रकरण अभी जांच का विषय है और आरोपों की सत्यता प्रमाणित होना बाकी है।

बैगा जाति प्रमाण पत्र मामले पर शिकायत किसने की

2025 में भी हुई थी शिकायत, कार्रवाई नहीं हुई

यह पहला मौका नहीं है जब यह मुद्दा शासन के सामने रखा गया हो। पत्र में उल्लेख है कि 16 सितंबर 2025 को भी इसी मामले को लेकर महामहिम राज्यपाल, मुख्यमंत्री छत्तीसगढ़ शासन और अध्यक्ष, राज्य अनुसूचित जनजाति आयोग को लिखित शिकायत भेजी गई थी। लेकिन शिकायतकर्ताओं के अनुसार, उस समय जाति प्रमाण पत्र से जुड़े इस गंभीर मामले पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। यही वजह है कि अब पूर्व विधायक गुलाब कमरो ने दोबारा इस मुद्दे को शासन के सामने उठाते हुए राज्य स्तरीय जांच की मांग की है।

बैगा समाज से संबंध न होने का दावा

शिकायत में सबसे गंभीर आरोप यह है कि जिन 55 लोगों ने नौकरी हासिल की, उनका विशेष पिछड़ी जनजाति बैगा समाज से कोई वास्तविक संबंध नहीं है। इसके समर्थन में शिकायतकर्ताओं ने ग्राम स्तर पर तैयार किया गया कथित पंचनामा भी संलग्न किया है।

इसके अलावा बैगा जाति प्रमाण पत्र के आधार पर तैयार की गई ग्रामवार बैगा परिवार सूची भी पत्र के साथ जोड़ी गई है। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि इस आधिकारिक सूची में सरकारी सेवा में कार्यरत बताए जा रहे 55 व्यक्तियों में से किसी का भी नाम दर्ज नहीं है, जो पूरे मामले पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

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विधानसभा में भी उठ चुका है बैगा जाति प्रमाण पत्र का मुद्दा

पत्र में यह जानकारी भी दी गई है कि फर्जी जाति प्रमाण पत्र से जुड़ा यह विषय छत्तीसगढ़ विधानसभा में सवाल के रूप में भी उठाया जा चुका है। इससे इस मामले की गंभीरता और बढ़ जाती है, क्योंकि यह अब सिर्फ स्थानीय शिकायत तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि विधानसभा स्तर पर भी चर्चा का विषय बन चुका है।

अगर जांच में यह साबित होता है कि गलत जानकारी या कूटरचित दस्तावेजों के आधार पर आरक्षित श्रेणी का जाति प्रमाण पत्र हासिल कर सरकारी नौकरी ली गई है, तो संबंधित व्यक्तियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई के साथ-साथ उनकी नियुक्ति की वैधानिकता की भी समीक्षा हो सकती है।

पूर्व विधायक की प्रमुख मांगें

पूर्व विधायक गुलाब कमरो ने अपने पत्र में राज्य सरकार से आग्रह किया है कि पूरे प्रकरण को गंभीरता से लेते हुए राज्य स्तरीय जाति सत्यापन छानबीन समिति से जांच कराई जाए। उनकी मांग है कि जांच में निम्नलिखित बिंदुओं पर स्पष्टता लाई जाए:

  • संबंधित 55 व्यक्तियों के जाति प्रमाण पत्र किस आधार पर और किन दस्तावेजों के सहारे जारी हुए
  • प्रमाण पत्र बनवाते समय प्रस्तुत किए गए दस्तावेज वास्तविक और वैध थे या नहीं
  • इन व्यक्तियों का बैगा जनजाति से वाकई कोई संबंध है या नहीं
  • इन्हें किन विभागों और किन पदों पर शासकीय नियुक्ति दी गई
  • नियुक्ति के दौरान जाति प्रमाण पत्र का सत्यापन किस स्तर पर और किसके द्वारा किया गया
  • यदि प्रमाण पत्र गलत साबित होते हैं, तो उन्हें जारी करने और उनका उपयोग करने के लिए कौन जिम्मेदार होगा

नियुक्ति निरस्त करने और कार्रवाई की मांग

शिकायत के अंत में पूर्व विधायक ने स्पष्ट मांग रखी है कि यदि जांच में आरोप सही साबित होते हैं, तो फर्जी पाए गए बैगा जाति प्रमाण पत्र तुरंत निरस्त किए जाएं। साथ ही, इनके आधार पर मिली नियुक्तियों की समीक्षा कर आवश्यक प्रशासनिक कार्रवाई की जाए और दोषी व्यक्तियों पर दंडात्मक कार्रवाई सुनिश्चित की जाए, ताकि आने वाले समय में इस तरह की अनियमितता दोबारा न हो सके।

जांच के बाद ही स्पष्ट होगी असली तस्वीर

फिलहाल यह पूरा मामला शिकायत और आरोपों के स्तर पर ही है। पत्र में लगाए गए आरोपों की पुष्टि अभी किसी सक्षम जांच एजेंसी या राज्य स्तरीय जाति सत्यापन समिति द्वारा होना बाकी है। इसलिए जांच पूरी होने से पहले संबंधित 55 व्यक्तियों को दोषी मान लेना उचित नहीं होगा। जाति प्रमाण पत्र से जुड़े ऐसे मामलों में निष्पक्ष जांच के बाद ही सही स्थिति सामने आ पाती है।

आगे क्या होगा

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि राज्य सरकार इस शिकायत पर क्या रुख अपनाती है और क्या वाकई राज्य स्तरीय जाति सत्यापन छानबीन समिति से इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच कराई जाती है। यदि जांच में बैगा जाति प्रमाण पत्र से जुड़े आरोप सही साबित होते हैं, तो यह मामला सिर्फ फर्जी प्रमाण पत्रों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि आरक्षित वर्ग के अधिकारों, सरकारी भर्ती प्रक्रिया की पारदर्शिता और प्रशासनिक सत्यापन व्यवस्था की खामियों पर भी गंभीर सवाल खड़े करेगा।

अंततः यह देखना अहम होगा कि इन 55 कथित नियुक्तियों की निष्पक्ष राज्य स्तरीय जांच कब और कैसे पूरी होती है, और अगर जाति प्रमाण पत्र फर्जी पाए जाते हैं तो इसके लिए जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई कब तक होती है।

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