लैलूंगा नाबालिग अपहरण मामले में परिवार ने पुलिस पर ₹50 हजार रिश्वत और कार्रवाई में लापरवाही के गंभीर आरोप लगाए हैं। पढ़ें पूरा मामला।
रायगढ़/लैलूंगा। छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले से सामने आया लैलूंगा नाबालिग अपहरण का मामला कई गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। पीड़ित परिवार का आरोप है कि 17 वर्षीय किशोरी को पहले बहला-फुसलाकर अपने साथ ले जाया गया। परिवार के अनुसार, बाद में किशोरी को वापस लाया गया तो उसके करीब तीन महीने की गर्भवती होने की जानकारी सामने आई।
परिवार का आरोप है कि शिकायत के बावजूद पुलिस ने मामले में अपेक्षित कार्रवाई नहीं की। इसके बाद कथित आरोपी दोबारा घर पहुंचा और किशोरी को अपने साथ ले गया। परिवार ने लैलूंगा पुलिस पर गंभीर लापरवाही के साथ-साथ ₹50 हजार रिश्वत लेने का आरोप भी लगाया है। हालांकि, रिश्वत से जुड़ा यह आरोप फिलहाल परिवार के बयान पर आधारित है और इसकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
मामले की गंभीरता को देखते हुए अब लैलूंगा नाबालिग अपहरण प्रकरण में पुलिस की कार्रवाई, FIR में दर्ज विवरण और वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं।
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लैलूंगा नाबालिग अपहरण का मामला कब सामने आया?
परिवार के अनुसार, 26 जनवरी को रायपुर फुटूहापारा निवासी बताए जा रहे निखिल मांझी ने 17 वर्षीय किशोरी को बहला-फुसलाकर अपने साथ ले गया। परिजनों का दावा है कि किशोरी को घोरमुड़ा और पतरापारा क्षेत्र में रखा गया।
परिजनों ने काफी तलाश के बाद किशोरी को वापस लाने का दावा किया। इसके बाद उसकी स्वास्थ्य संबंधी स्थिति सामने आने पर परिवार को पता चला कि वह करीब तीन महीने की गर्भवती है। परिवार के अनुसार, स्वास्थ्य विभाग की ओर से उसका जच्चा-बच्चा कार्ड भी बनाया गया था।
इस घटनाक्रम के बाद लैलूंगा नाबालिग अपहरण मामले को लेकर परिवार ने पुलिस से कार्रवाई की मांग की।
यदि किशोरी की उम्र दस्तावेजों के अनुसार 18 वर्ष से कम है, तो उसके साथ हुए कथित अपराध की प्रकृति को देखते हुए पुलिस को उम्र, बयान, मेडिकल रिपोर्ट और अन्य साक्ष्यों के आधार पर उचित कानूनी कार्रवाई करनी होगी।
लैलूंगा नाबालिग अपहरण : थाने में समझौते का दबाव बनाने का आरोप
पीड़िता की मां सरिता धोबी का आरोप है कि मामले की शिकायत के बाद लैलूंगा थाने में कुछ स्थानीय लोगों की मौजूदगी में समझौते का प्रयास किया गया।
परिवार ने पाला बाई, धर्मेंद्र बंगाली, घनश्याम बेहरा और भुवनेश्वर चौहान सहित कुछ लोगों के नाम लिए हैं। परिवार का दावा है कि उन्हें खर्चा-पानी देने और दस्तावेजों पर हस्ताक्षर कराने की कोशिश की गई।
हालांकि, इन लोगों की भूमिका और कथित समझौते की कोशिश की स्वतंत्र पुष्टि इस रिपोर्ट के स्तर पर नहीं हुई है।
परिवार का कहना है कि वे किसी समझौते के पक्ष में नहीं थे। उनका कहना था कि यदि लैलूंगा नाबालिग अपहरण मामले में अपराध हुआ है तो आरोपी के खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए।
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9 तारीख को घर पहुंचने का दावा
परिवार के अनुसार, पहली घटना के बाद भी उन्हें पर्याप्त सुरक्षा और कानूनी कार्रवाई नहीं मिली। इसके बाद 9 तारीख को कथित आरोपी फिर उनके घर पहुंचा।
पीड़िता के पिता मंगतू का आरोप है कि उनके साथ मारपीट की गई। परिवार के अनुसार, मारपीट में उनके शरीर और घुटने में चोट आई।
परिवार का दावा है कि इसके बाद किशोरी को मोटरसाइकिल पर बैठाकर दोबारा ले जाया गया। साथ ही परिवार को जान से मारने की धमकी देने का भी आरोप लगाया गया।
यदि परिवार के ये दावे जांच में सही पाए जाते हैं तो लैलूंगा नाबालिग अपहरण मामले में पुलिस की तत्काल कार्रवाई और पीड़ित परिवार की सुरक्षा का सवाल और गंभीर हो जाता है।
लैलूंगा पुलिस पर ₹50 हजार रिश्वत का आरोप
इस पूरे मामले में सबसे गंभीर आरोप लैलूंगा पुलिस पर लगाया गया है। पीड़िता की मां सरिता धोबी ने आरोप लगाया है कि थाना प्रभारी ने कथित आरोपी पक्ष से ₹50 हजार की रिश्वत ली।
परिवार का कहना है कि कथित रिश्वत के कारण आरोपी के खिलाफ कार्रवाई नहीं की गई। हालांकि, इस आरोप की स्वतंत्र पुष्टि अभी उपलब्ध नहीं है।
किसी पुलिस अधिकारी पर रिश्वत लेने का आरोप बेहद गंभीर है। इसकी पुष्टि के लिए निष्पक्ष जांच, शिकायत रिकॉर्ड, उपलब्ध दस्तावेज और अन्य साक्ष्यों की जांच आवश्यक होगी।
यही वजह है कि लैलूंगा नाबालिग अपहरण मामले में परिवार द्वारा लगाए गए रिश्वत के आरोप की भी वरिष्ठ स्तर पर जांच की मांग उठ रही है।
लैलूंगा नाबालिग अपहरण : नामजद आरोपी के बावजूद FIR में अज्ञात क्यों?
पीड़ित परिवार का एक बड़ा सवाल FIR को लेकर भी है। परिवार का कहना है कि उन्होंने पुलिस को कथित आरोपी निखिल मांझी का नाम बताया था।
इसके बावजूद परिवार का दावा है कि FIR में आरोपी का नाम दर्ज करने के बजाय अज्ञात व्यक्ति द्वारा किशोरी को ले जाने की बात दर्ज की गई।
यदि शिकायत में किसी व्यक्ति का नाम स्पष्ट रूप से दिया गया था, तो जांच के दौरान उसकी भूमिका की जांच करना जरूरी है। हालांकि, किसी व्यक्ति का नाम शिकायत या FIR में होना अपने आप में अपराध साबित नहीं करता।
जांच एजेंसी को बयान, मेडिकल रिपोर्ट, तकनीकी साक्ष्य और अन्य उपलब्ध तथ्यों के आधार पर निष्कर्ष तक पहुंचना होता है।
लैलूंगा नाबालिग अपहरण मामले में FIR की वास्तविक कॉपी और पुलिस रिकॉर्ड सामने आने के बाद इस सवाल का सही जवाब मिल सकता है।
POCSO को लेकर भी उठे सवाल
किशोरी की उम्र यदि 17 वर्ष है और दस्तावेजों से इसकी पुष्टि होती है, तो मामले में बाल संरक्षण से जुड़े कानूनों की प्रासंगिकता की जांच आवश्यक है।
POCSO कानून बच्चों को यौन अपराधों से सुरक्षा देने के लिए बनाया गया है। इसलिए लैलूंगा नाबालिग अपहरण मामले में किशोरी के बयान, उम्र, मेडिकल रिपोर्ट और घटना की परिस्थितियों के आधार पर संबंधित धाराओं की समीक्षा महत्वपूर्ण होगी।
यह कहना उचित नहीं होगा कि केवल परिवार के आरोप के आधार पर कौन-सी धारा अनिवार्य रूप से लगेगी। अंतिम धाराएं जांच और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर तय होती हैं।
SP कार्यालय तक पहुंचा परिवार
परिवार का कहना है कि लैलूंगा थाने में अपेक्षित सुनवाई नहीं होने के बाद वे रायगढ़ स्थित पुलिस अधीक्षक कार्यालय पहुंचे।
परिवार के मुताबिक, SP कार्यालय से थाना स्तर पर फोन भी किया गया। इसके बाद भी उन्हें तत्काल राहत नहीं मिली।
यह दावा भी जांच का विषय है कि SP कार्यालय से थाना पुलिस को क्या निर्देश दिए गए और उन निर्देशों पर क्या कार्रवाई हुई।
लैलूंगा नाबालिग अपहरण मामले में शिकायत की तारीख, पुलिस रिकॉर्ड, FIR, वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देश और जांच की प्रगति की समीक्षा से वास्तविक स्थिति सामने आ सकती है।
परिवार ने बेटी की सुरक्षा की मांग की
पीड़ित परिवार का कहना है कि उन्हें लगातार डर के माहौल में रहना पड़ रहा है। परिवार ने आरोप लगाया कि उन्हें जान से मारने की धमकियां दी गईं।
परिवार की मांग है कि किशोरी को सुरक्षित बरामद किया जाए और दोषी पाए जाने वाले व्यक्ति के खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई की जाए।
लैलूंगा नाबालिग अपहरण मामले में परिवार की सुरक्षा भी महत्वपूर्ण मुद्दा है। यदि धमकी की शिकायत दर्ज हुई है तो पुलिस को उसकी भी जांच करनी चाहिए।
पुलिस से पूछे जा रहे हैं ये बड़े सवाल
इस मामले में कई सवालों के जवाब पुलिस और प्रशासन से अपेक्षित हैं।
पहला सवाल: किशोरी की उम्र की आधिकारिक पुष्टि कैसे की गई?
दूसरा सवाल: क्या किशोरी की मेडिकल जांच कराई गई?
तीसरा सवाल: गर्भावस्था की जानकारी मिलने के बाद पुलिस ने क्या कार्रवाई की?
चौथा सवाल: परिवार द्वारा बताए गए निखिल मांझी की भूमिका की जांच हुई या नहीं?
पांचवां सवाल: यदि नामजद शिकायत दी गई थी तो FIR में अज्ञात क्यों लिखा गया?
छठा सवाल: दूसरी बार किशोरी को ले जाने की शिकायत पर पुलिस ने तत्काल क्या कदम उठाए?
सातवां सवाल: ₹50 हजार रिश्वत के आरोप की जांच कौन करेगा?
आठवां सवाल: SP कार्यालय से शिकायत के बाद थाना स्तर पर क्या कार्रवाई हुई?
इन सवालों के जवाब लैलूंगा नाबालिग अपहरण मामले की वास्तविक तस्वीर सामने लाने में महत्वपूर्ण होंगे।
गरीब परिवार बोला—हमें सिर्फ न्याय चाहिए
पीड़िता की मां सरिता धोबी का कहना है कि उनका परिवार आर्थिक रूप से कमजोर है और इसी वजह से उन्हें अपनी बात रखने में परेशानी हो रही है।
परिवार का कहना है कि वे किसी समझौते की मांग नहीं कर रहे। उनकी मांग केवल यह है कि उनकी बेटी सुरक्षित मिले और यदि किसी व्यक्ति ने अपराध किया है तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई हो।
परिवार का आरोप है कि उन्हें बार-बार डराया और धमकाया गया। इसलिए वे प्रशासन से अपनी और अपनी बेटी की सुरक्षा की मांग कर रहे हैं।
लैलूंगा नाबालिग अपहरण मामले में अब परिवार की निगाहें पुलिस और प्रशासन की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं।
निष्पक्ष जांच से ही सामने आएगा सच
यह मामला कई गंभीर आरोपों को एक साथ सामने लाता है। इसमें नाबालिग को कथित तौर पर बहला-फुसलाकर ले जाने, दोबारा ले जाने, मारपीट, धमकी, FIR में अज्ञात लिखे जाने और पुलिस पर रिश्वत लेने जैसे आरोप शामिल हैं।
लेकिन इन आरोपों को जांच पूरी होने से पहले अंतिम सत्य नहीं माना जा सकता। खास तौर पर पुलिस पर लगाए गए ₹50 हजार रिश्वत के आरोप की पुष्टि स्वतंत्र जांच से ही संभव है।
यदि जांच में पुलिसकर्मी या कोई अन्य व्यक्ति दोषी पाया जाता है तो उसके खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए। वहीं यदि परिवार के किसी आरोप में तथ्य नहीं मिलता है तो प्रशासन को उसकी स्थिति भी स्पष्ट करनी चाहिए।
लैलूंगा नाबालिग अपहरण मामले में सबसे पहली प्राथमिकता किशोरी की सुरक्षा और मामले की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
अब पुलिस की अगली कार्रवाई पर नजर
लैलूंगा नाबालिग अपहरण मामले ने थाना स्तर की कार्रवाई पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। परिवार द्वारा लगाए गए आरोपों की निष्पक्ष जांच होना जरूरी है।
अगर किशोरी की उम्र 18 वर्ष से कम है तो उसकी सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए। इसके साथ ही परिवार की शिकायत, FIR, मेडिकल रिकॉर्ड, बयान और अन्य साक्ष्यों की जांच होनी चाहिए।
लैलूंगा नाबालिग अपहरण मामले में पुलिस की ओर से आधिकारिक बयान सामने आने के बाद स्थिति और स्पष्ट होगी। यदि पुलिस के पास परिवार के आरोपों से अलग तथ्य हैं तो उन्हें भी सार्वजनिक किया जाना चाहिए।
फिलहाल पीड़ित परिवार न्याय और सुरक्षा की मांग कर रहा है। लैलूंगा नाबालिग अपहरण मामले में अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि पुलिस मामले की जांच किस दिशा में आगे बढ़ाती है और आरोपों पर क्या आधिकारिक कार्रवाई होती है।
POCSO Act की आधिकारिक जानकारी – India Code
Juvenile Justice Act की आधिकारिक जानकारी – India Code
NCPCR की आधिकारिक वेबसाइट
