कोरबा। कहते हैं दीवारें मजबूत हों तो नींव पर भरोसा किया जा सकता है, मगर कोरबा में तो नींव से लेकर सरिया तक हर चीज़ “पतली” निकली। जिले के कलेक्टर कुणाल दुदावत रविवार को जब खनन प्रभावित इलाकों का दौरा करने निकले, तो वहां जो नजारा मिला उसने पूरे निर्माण महकमे की पोल खोलकर रख दी। कागज़ों पर 8 MM का सरिया दर्ज था, मौके पर नाप हुआ तो निकला महज 6 MM — यानी सरकारी फाइलों में मोटाई पूरी, ज़मीन पर मामला आधा-अधूरा। यह सिर्फ सरिया की कहानी नहीं, यह उस पूरे सिस्टम की कहानी है जो कागज़ पर मजबूत दिखता है और ज़मीन पर हवा में लटका मिलता है।

जब कलेक्टर ने खुद मंगवाई सीढ़ी, तब खुली पोल
आमतौर पर निरीक्षण का मतलब होता है गाड़ी से उतरना, भवन का बाहर से मुआयना करना, कागज़ देखना और आगे बढ़ जाना। मगर कोरबा कलेक्टर कुणाल दुदावत ने इस बार निरीक्षण की परिभाषा ही बदल दी। जनपद पंचायत कटघोरा के ग्राम पंचायत जेन्जरा में निर्माणाधीन आंगनबाड़ी भवन पर पहुंचते ही उन्हें सरिया की गुणवत्ता और मोटाई पर शक हुआ। शक इतना गहरा था कि उन्होंने सीढ़ी मंगवाकर खुद स्लैब तक पहुंचने का इंतजाम कराया और जनपद पंचायत के सब इंजीनियर को मौके पर ही सरिया नपवाने के निर्देश दे डाले।
नतीजा चौंकाने वाला निकला। सब इंजीनियर ने पहले दावा किया कि भवन में 8 एमएम सरिया लगाया गया है, मगर जब नाप हुआ तो कई जगह 8 एमएम की जगह 6 एमएम सरिया निकला। यानी जो सरिया कागज़ पर “मजबूती” का प्रमाणपत्र लिए बैठा था, ज़मीन पर वह उतना ही कमजोर निकला जितनी कमजोर होती है सरकारी निगरानी व्यवस्था। सरिया की मोटाई भले 2 एमएम कम निकली हो, मगर लापरवाही की मोटाई इतनी गहरी थी कि कलेक्टर को खुद फील्ड में उतरकर नाप करानी पड़ी। कोरबा जिला प्रशासन की आधिकारिक वेबसाइट
आंगनबाड़ी की नींव में सरिया कम, सिस्टम में जवाबदेही कम
यह घटना सिर्फ एक भवन या एक सरिया के मामले तक सीमित नहीं है। यह इस बात का आईना है कि जिन योजनाओं का मकसद बच्चों को सुरक्षित आंगनबाड़ी, बेहतर स्कूल और सुव्यवस्थित पीडीएस भवन देना है, उनके निर्माण में कैसी लापरवाही बरती जा रही है। जिला खनिज न्यास यानी डीएमएफ की राशि खासतौर पर खनन प्रभावित क्षेत्रों के विकास के लिए तय होती है, ताकि जिन इलाकों ने खनन का बोझ झेला है, वहां के नागरिकों को कम से कम बुनियादी सुविधाएं तो मजबूत मिलें। मगर जब उसी राशि से बन रहे भवन में सरिया ही “आधा-अधूरा” निकले, तो सवाल उठता है कि आखिर डीएमएफ मद की राशि किस दिशा में खर्च हो रही है — बच्चों की सुरक्षा में, या फिर ठेकेदारों की जेब में।
कलेक्टर कुणाल दुदावत ने मौके पर ही साफ कर दिया कि निर्माण कार्यों में गुणवत्ता से किसी भी तरह का समझौता बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। उन्होंने पंचनामा तैयार कराने और संबंधित के विरुद्ध एफआईआर दर्ज कराने के निर्देश दिए, साथ ही जनपद पंचायत कटघोरा के सब इंजीनियर रामकुमार पोर्ते को निलंबित करने का आदेश भी सुना दिया। यानी सिर्फ नाराजगी जताकर नहीं छोड़ा गया, बल्कि सीधे कार्रवाई का डंडा भी चला। मगर सवाल यह है कि अगर कलेक्टर खुद सीढ़ी लेकर न पहुंचते, तो क्या यह गड़बड़ी कभी सामने आती?
टाइल्स भी निकले “मापदंड से बाहर” — स्कूल की फर्श पर भी लापरवाही की परत
सरिया की गड़बड़ी अकेली नहीं थी। उसी जेन्जरा गांव में निर्माणाधीन स्कूल भवन के निरीक्षण के दौरान कलेक्टर ने फर्श में लगाए गए टाइल्स की गुणवत्ता और मापदंड की भी जांच कराई। नतीजा फिर वही — टाइल्स तय मापदंड के अनुरूप नहीं पाए गए। यानी जिस स्कूल में बच्चे पढ़ने आएंगे, उसकी फर्श तक मानकों पर खरी नहीं उतरी। कलेक्टर ने इस पर भी नाराजगी जाहिर करते हुए अधिकारियों को गुणवत्ता सुनिश्चित करने के सख्त निर्देश दिए।
यह घटना बताती है कि लापरवाही सिर्फ किसी एक भवन या किसी एक सामग्री तक सीमित नहीं थी, बल्कि निर्माण कार्यों की पूरी श्रृंखला में गुणवत्ता को लेकर एक ढीला-ढाला रवैया अपनाया जा रहा था। सरिया कम मोटाई का, टाइल्स मापदंड से बाहर — यानी नींव से लेकर फर्श तक, हर स्तर पर सिस्टम ने अपनी जिम्मेदारी में कटौती कर रखी थी।
पीडीएस भवन की प्लिंथ जमीन में धंसी, निगरानी भी उतनी ही “नीची”
निरीक्षण का सफर यहीं नहीं थमा। ग्राम पंचायत सलोरा में निर्माणाधीन पीडीएस भवन पर पहुंचे कलेक्टर ने पाया कि भवन की प्लिंथ जमीन के स्तर से काफी नीचे है। यानी जिस भवन से राशन जैसी बुनियादी ज़रूरत की चीज़ें बंटनी हैं, उसकी बुनियाद ही ज़मीन में धंसी हुई मिली। कलेक्टर ने इस पर भी नाराजगी जताते हुए गुणवत्ता की जांच कर आवश्यक कार्रवाई सुनिश्चित करने के निर्देश दिए।
गौर करने वाली बात यह है कि तीन अलग-अलग भवन — आंगनबाड़ी, स्कूल और पीडीएस — तीनों में अलग-अलग तरह की गड़बड़ी मिली। कहीं सरिया कमजोर, कहीं टाइल्स गड़बड़, कहीं प्लिंथ नीची। यानी गड़बड़ी का कोई एक “पैटर्न” नहीं, बल्कि हर भवन में अपने-अपने तरीके से मानकों की अनदेखी की गई। यह इस बात का सबूत है कि निगरानी तंत्र इतना ढीला पड़ चुका था कि हर स्तर पर अलग-अलग तरह की लापरवाही पनप गई।
स्कूल भवन का निर्माण अटका, अक्टूबर की डेडलाइन थमाई गई
निरीक्षण के दौरान कलेक्टर ने शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय कटघोरा के निर्माणाधीन भवन का भी जायजा लिया, जिसे सहायक आयुक्त आदिवासी विकास विभाग की निर्माण एजेंसी बना रही है। यहां भी देरी की परतें साफ नजर आईं। भवन निर्माण में हो रहे विलंब पर कलेक्टर ने नाराजगी जताते हुए अधिकारियों को काम में तेजी लाने और अक्टूबर माह तक निर्माण पूर्ण करने के सख्त निर्देश दिए।
इसके अलावा जेन्जरा में स्थित एक जर्जर आंगनबाड़ी भवन का भी निरीक्षण किया गया और उसकी मौजूदा स्थिति की जानकारी ली गई। यानी एक तरफ नए भवन बनते समय गुणवत्ता से समझौता हो रहा है, दूसरी तरफ पुराने भवन जर्जर हालत में हैं और उनकी सुध लेने वाला भी कोई नहीं। नए भवन कमजोर सरिया से बन रहे हैं और पुराने भवन जर्जर होकर गिरने की कगार पर हैं — यानी नए और पुराने, दोनों मोर्चों पर हालात एक जैसे ही निराशाजनक निकले।
फाइलें रुकीं, भुगतान अटका, विकास की रफ्तार धीमी
निर्माण कार्यों की गुणवत्ता के अलावा कलेक्टर ने प्रशासनिक सुस्ती पर भी कड़ा रुख अपनाया। निरीक्षण के दौरान उन्होंने जनपद पंचायत में लंबित फाइलों और उपयोगिता प्रमाण पत्रों को लेकर भी अधिकारियों को सख्त हिदायत दी। उन्होंने साफ कहा कि पूर्ण हो चुके कार्यों के उपयोगिता प्रमाण पत्रों को अनावश्यक रूप से लंबित न रखा जाए, क्योंकि फाइलें रुकने से न सिर्फ निर्माण कार्यों का भुगतान अटकता है, बल्कि आगे के विकास कार्यों में भी देरी होती है।
यानी लापरवाही सिर्फ ईंट-सरिया तक सीमित नहीं, बल्कि दफ्तर की मेज़ों पर पड़ी फाइलों तक फैली हुई है। एक तरफ भवन कमजोर सामग्री से बन रहे हैं, दूसरी तरफ जो काम पूरे हो चुके हैं, उनके प्रमाण पत्र भी फाइलों में दबे पड़े हैं। कलेक्टर ने जनपद पंचायत कटघोरा के मुख्य कार्यपालन अधिकारी को निर्देश दिया कि कर्मचारियों के कार्यों की जांच की जाए और अनावश्यक रूप से फाइलें रोकने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई हो। ग्राम पंचायत जेन्जरा के उपयोगिता प्रमाण पत्र पर समय पर कार्रवाई न होने पर संबंधित बाबू का वेतन रोकने के निर्देश भी दे दिए गए। यानी जिसने फाइल रोकी, उसकी सैलरी भी रुक गई — एक तरह का “जैसे को तैसा” जवाब।
डीएमएफ की राशि किसके लिए, यह सवाल फिर उठा ?
जिला खनिज न्यास यानी डीएमएफ मद की राशि इसीलिए बनाई गई थी ताकि खनन प्रभावित क्षेत्रों में रहने वाले नागरिकों को बेहतर स्कूल, आंगनबाड़ी और पीडीएस जैसी बुनियादी सुविधाएं मिल सकें। मगर कोरबा के इस निरीक्षण ने यह सवाल फिर खड़ा कर दिया कि क्या डीएमएफ की राशि वाकई उसी मकसद के लिए खर्च हो रही है, या फिर कागजी मंजूरी और वास्तविक निर्माण के बीच का फासला इतना बड़ा हो चुका है कि सुविधाएं सिर्फ “स्वीकृत” रह जाती हैं, ज़मीन पर उतरते-उतरते कमजोर पड़ जाती हैं।
कलेक्टर ने साफ शब्दों में कहा कि डीएमएफ की राशि से होने वाले निर्माण कार्यों में गुणवत्ता से किसी भी प्रकार की लापरवाही या अनियमितता पाए जाने पर जिम्मेदार अधिकारियों और निर्माण एजेंसियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। यह चेतावनी जितनी सख्त है, उतना ही बड़ा सवाल यह भी है कि यह सख्ती सिर्फ एक निरीक्षण तक सीमित रहेगी या आगे भी इसी तरह की निगरानी जारी रहेगी।
निरीक्षण में कलेक्टर कुणाल दुदावत के साथ कौन – कौन रहा मौजूद ?
इस पूरे निरीक्षण अभियान के दौरान जिला पंचायत सीईओ प्रतीक जैन, एसडीएम कटघोरा विपिन दुबे, अपर कलेक्टर माधुरी सोम ठाकुर, जनपद पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी और तहसीलदार सहित कई अन्य संबंधित अधिकारी मौजूद रहे। यानी पूरा प्रशासनिक अमला मौके पर मौजूद था, इसके बावजूद सरिया की मोटाई और टाइल्स की गुणवत्ता जैसी बुनियादी बातें अब तक जांची नहीं गई थीं — यह अपने आप में इस बात का संकेत है कि निगरानी का ढांचा कितना ढीला पड़ चुका है।
सरिया पतला, बहाने मोटे – कलेक्टर
अगर इस पूरे निरीक्षण को एक लाइन में समेटना हो, तो कहा जा सकता है — सरिया भले 6 एमएम का निकला हो, मगर उसे “8 एमएम” बताने वाले बहाने उतने ही मोटे और मजबूत थे। टाइल्स भले मापदंड से बाहर हों, मगर उन्हें मंजूर करने वाली फाइलें भी उतनी ही आसानी से आगे बढ़ती रहीं। प्लिंथ भले जमीन में धंसी मिली हो, मगर जिम्मेदारी हमेशा ऊपर से नीचे खिसकती रही।
यह घटना सिर्फ कोरबा के एक निरीक्षण की कहानी नहीं, बल्कि उस पूरे सिस्टम की कार्यप्रणाली का आईना है जहां कागज़ पर सब कुछ “मापदंड के अनुरूप” दिखता है, मगर ज़मीन पर हकीकत कुछ और ही निकलती है। कलेक्टर की सीढ़ी ने इस बार जो पोल खोली, वह सिर्फ एक भवन की नहीं, बल्कि पूरे निर्माण तंत्र की निगरानी व्यवस्था की पोल थी।
आगे क्या — निलंबन तक सीमित रहेगी कार्रवाई, या जड़ तक पहुंचेगी जांच?
फिलहाल सब इंजीनियर रामकुमार पोर्ते के निलंबन और एफआईआर के निर्देश के बाद यह देखना बाकी है कि यह कार्रवाई सिर्फ एक अधिकारी तक सीमित रहती है, या फिर उस पूरी निर्माण एजेंसी और आपूर्ति श्रृंखला तक पहुंचती है जिसने कमजोर सरिया और मापदंड से बाहर टाइल्स की आपूर्ति की। सवाल यह भी है कि जिन अन्य भवनों का निरीक्षण कलेक्टर खुद नहीं कर पाए, वहां क्या स्थिति है — क्या वहां भी सरिया की मोटाई और टाइल्स की गुणवत्ता उतनी ही “पतली” है जितनी जेन्जरा में मिली?
कोरबा जिले में डीएमएफ मद से बन रहे इन भवनों की गुणवत्ता को लेकर उठे सवाल अब सिर्फ एक निरीक्षण तक सीमित नहीं रहने चाहिए। असली परीक्षा यह होगी कि क्या यह सख्ती आगे भी जारी रहती है, या फिर एक बार फिर फाइलें आगे बढ़ेंगी, भवन बनते रहेंगे, और सरिया की मोटाई नापने के लिए किसी कलेक्टर को दोबारा सीढ़ी मंगवानी पड़ेगी।

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