‘पेंशन भी, पैकेज भी! महानदी जल विवाद ने रिटायर अफसरों को बना दिया ‘डबल इंजन की सैलरी सरकार’

महानदी जल विवाद: 75 करोड़ खर्च, फिर भी नतीजा सूखा क्यों?

रायपुर। किसी ने सच ही कहा है सरकारी फाइलों में नदियां भले सूख जाएं, पर बजट का बहाव कभी नहीं थमता। छत्तीसगढ़ और ओडिशा के बीच वर्षों से चला आ रहा महानदी जल विवाद एक बार फिर सुर्खियों में है, मगर इस बार वजह पानी नहीं, बल्कि पैसा है। बीते पांच वर्षों में महानदी जल विवाद अभिकरण में राज्य का पक्ष रखने के नाम पर वकीलों को करीब 75 करोड़ रुपए बांटे जा चुके हैं। इतनी बड़ी रकम खर्च होने के बाद उम्मीद थी कि नतीजा भी उतना ही “बड़ा” निकलेगा मगर हुआ ठीक उलटा। महानदी जल विवाद का हाल आज भी वहीं का वहीं है, जहां पांच साल पहले था। यानी न पानी बंटा, न विवाद सुलझा बंटा तो सिर्फ बजट, और वो भी सलीके से, कमीशन के हिसाब से।

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महानदी जल विवाद

जब सरकारी खजाना बना “रिटायरमेंट के बाद की जैकपॉट स्कीम”

अब जरा इस खेल का असली मजा समझिए। महानदी जल विवाद में राज्य सरकार को तथ्य और तर्क पेश करने थे, तो सरकार ने क्या किया? नए दिमाग नहीं ढूंढे, बल्कि पुराने रिटायर अफसरों को वापस बुला लिया, जैसे किसी क्रिकेट टीम में जब युवा खिलाड़ी फेल हो जाएं तो कोई पचास साल के रिटायर खिलाड़ी को फिर मैदान में उतार दे, और वो भी दोहरी फीस पर। सेवानिवृत्त मुख्य अभियंता आरके नगरिया साहब 30 अप्रैल 2023 को रिटायर हुए, लेकिन मई 2023 से ही फिर विभाग में “सेवा” देने लगे। दूसरी तरफ आरएस नायडू साहब 31 दिसंबर 2021 को रिटायर हुए और जनवरी 2022 से ही दोबारा वेतन की गाड़ी पर सवार हो गए।

रिटायरमेंट और नौकरी के बीच का गैप इतना कम था कि लगता है इस्तीफे और नियुक्ति पत्र एक ही लिफाफे में आए हों। और सबसे दिलचस्प बात इन दोनों महानुभावों को अपनी नियमित पेंशन तो मिल ही रही है, ऊपर से महानदी जल विवाद में “विशेषज्ञ सेवा” के नाम पर हर महीने डेढ़ लाख रुपए अलग से मिल रहे हैं। यानी सरकारी खजाने से डबल कमाई का जुगाड़ न वेतन आयोग की झंझट, न प्रमोशन का इंतजार, बस सीधा पेंशन के ऊपर पैकेज। किसी आम रिटायर कर्मचारी से पूछिए, वो इसे “सरकारी लॉटरी” ही कहेगा।

महानदी जल विवाद : “विशेषज्ञता” या सिर्फ पेंशन बढ़ाने की तरकीब?

अब सवाल यह उठता है कि इतनी मोटी सैलरी लेने वाले ये अफसर आखिर महानदी जल विवाद में कर क्या रहे हैं? विभागीय सूत्रों की मानें तो इनका प्रदर्शन “निराशाजनक” शब्द से भी आगे की चीज है। हर महीने डेढ़ लाख रुपए की तनख्वाह के बदले, ट्रिब्यूनल के सामने कोई ठोस तथ्य, कोई पुख्ता आंकड़ा, कोई निर्णायक जानकारी अब तक पेश नहीं हो पाई। यानी काम कम, कागज ज्यादा; बैठकें ज्यादा, नतीजे शून्य। यह वैसा ही है जैसे कोई ट्यूशन टीचर हर महीने मोटी फीस ले, लेकिन बच्चा साल भर बाद भी वहीं का वहीं फेल हो।

महानदी जल विवाद की सुनवाई दर सुनवाई आगे बढ़ती रही, तारीखें बदलती रहीं, टीमें आती-जाती रहीं, लेकिन जो एक चीज कभी नहीं बदली, वो थी नतीजे की गैरमौजूदगी। यह ट्रिब्यूनल किसी अनंत सीरियल जैसा हो गया है, जिसमें हर एपिसोड में नई सुनवाई, नई तारीख, नया बयान, पर कहानी का ‘द एंड’ कभी नहीं आता।

बोधघाट कनेक्शन: पुराना खिलाड़ी, पुराना ही खेल

महानदी जल विवाद में जिन अफसरों को जिम्मेदारी दी गई, उनका ट्रैक रिकॉर्ड भी कुछ कम दिलचस्प नहीं है। मुख्य अभियंता आरके नगरिया इससे पहले बोधघाट परियोजना में भी सुर्खियों में रह चुके हैं। उस परियोजना के सर्वेक्षण कार्य में ठेकेदार को लगभग 13 करोड़ रुपए का भुगतान कर दिया गया, लेकिन आज तक कोई ठोस प्रगति सामने नहीं आई यानी 13 करोड़ रुपए सीधे “निष्फल व्यय” के खाते में चले गए। और तो और, सर्वेक्षण के नाम पर 44 करोड़ रुपए का प्राक्कलन तैयार किया गया, जिसे बाकायदा तकनीकी स्वीकृति भी दे दी गई। यानी कागजों पर काम पूरा, जमीन पर कुछ नहीं यह कोई इंजीनियरिंग नहीं, “पेपरवर्क इंजीनियरिंग” का मास्टरक्लास है। जल शक्ति मंत्रालय

बोधघाट कनेक्शन

तो जब बोधघाट परियोजना में यही फॉर्मूला आजमाया जा चुका था, तो महानदी जल विवाद में भी वही पुराना नुस्खा दोहराया जाना कोई हैरानी की बात नहीं। कहते हैं इतिहास खुद को दोहराता है, यहां भी वही हो रहा है, बस किरदार वही, मंच बदल गया है।

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जब विवाद ही बन जाए स्थायी नौकरी की गारंटी

महानदी जल विवाद को लेकर एक बात साफ नजर आती है, इसे सुलझाने से ज्यादा दिलचस्पी इसे लटकाए रखने में दिख रही है। आखिर सोचिए, अगर विवाद सुलझ गया, तो डेढ़ लाख रुपए महीने की “बोनस सैलरी” वाली स्कीम भी बंद हो जाएगी। फिर इन अफसरों को वापस घर बैठकर सिर्फ पेंशन पर गुजारा करना पड़ेगा और यह किसे मंजूर होगा? इसलिए जानकारों का कहना है कि इन सेवानिवृत्त अधिकारियों की असली रणनीति यही है कि महानदी जल विवाद जितना लंबा खिंचे, उतना अच्छा। विवाद अनसुलझा रहेगा, तो सैलरी चलती रहेगी — यह कोई विवाद-समाधान मॉडल नहीं, बल्कि “सतत आय योजना” बन चुकी है। महानदीजलविवाद अधिकरण

यह ठीक वैसा ही है जैसे कोई डॉक्टर मरीज को ठीक करने की बजाय बीमारी को बस “मैनेज” करता रहे, ताकि क्लिनिक की कमाई चलती रहे। महानदी जल विवाद के मामले में भी यही तस्वीर उभरती दिख रही है, समाधान से ज्यादा प्राथमिकता “सतत रोजगार” को मिल रही है।

75 करोड़ का हिसाब-किताब: कहां गया, किसको मिला?

अब जरा इस 75 करोड़ रुपए के आंकड़े पर गौर कीजिए। यह कोई छोटी रकम नहीं है। इतने पैसों में कई गांवों में पानी की टंकियां बन सकती थीं, स्कूलों में बेंच-डेस्क आ सकते थे, अस्पतालों में जरूरी उपकरण खरीदे जा सकते थे। लेकिन यह पैसा गया कहां? महानदी जल विवाद में वकीलों की फीस के नाम पर। सवाल यह है कि आखिर पांच साल में इतनी बड़ी रकम खर्च करने के बावजूद ट्रिब्यूनल के सामने राज्य का पक्ष इतना कमजोर क्यों रहा कि कोई निर्णायक प्रगति ही नहीं हो पाई?

यह वैसा ही सवाल है जो कोई भी आम आदमी अपने घर के बजट पर पूछेगा, अगर पांच साल तक हर महीने बड़ी रकम किसी काम पर खर्च होती रहे और नतीजा शून्य निकले, तो घर का मुखिया जरूर पूछेगा “पैसा गया कहां?” लेकिन सरकारी तंत्र में यह सवाल पूछने वाला कोई नहीं है, क्योंकि यहां जवाबदेही नाम की चीज फाइलों में दबी रहती है।

महानदी जल विवाद : जनता की भावना बनाम अफसरशाही की सुविधा

महानदी जल विवाद छत्तीसगढ़ के लिए सिर्फ कानूनी मसला नहीं, बल्कि किसानों, सिंचाई पर निर्भर परिवारों और भविष्य की जल सुरक्षा से जुड़ा भावनात्मक मुद्दा है। महानदी का करीब 357 किलोमीटर हिस्सा छत्तीसगढ़ से होकर गुजरता है, और इस पर बैराज, एनीकट और डायवर्जन को लेकर वर्षों से खींचतान चल रही है। आम जनता चाहती है कि यह मसला जल्द सुलझे ताकि सिंचाई और पेयजल की योजनाओं पर स्पष्टता आए। लेकिन जिस रफ्तार से महानदी जल विवाद में प्रगति हो रही है, उससे साफ है कि जनता की जरूरत और अफसरशाही की सुविधा — दोनों बिल्कुल अलग दिशाओं में चल रहे हैं।

एक तरफ मुख्यमंत्री स्तर पर बातचीत और आपसी सहमति की बातें होती हैं, ट्रिब्यूनल की टीमें मौके पर जाकर निरीक्षण करती हैं, बड़े-बड़े बयान दिए जाते हैं कि “समाधान जल्द निकलेगा” दूसरी तरफ जमीनी हकीकत यह है कि जिन अफसरों के कंधों पर तथ्य पेश करने की जिम्मेदारी है, वे पांच साल में भी ट्रिब्यूनल को संतुष्ट नहीं कर पाए। यह अंतर्विरोध ही महानदी जल विवाद की सबसे बड़ी विडंबना है — ऊपर से “सुलह” का माहौल, भीतर से “उलझाव” का इंतजाम।

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डेढ़ लाख की सैलरी बनाम आम रिटायर कर्मचारी की सच्चाई

जरा तुलना करके देखिए। छत्तीसगढ़ में हजारों ऐसे सरकारी कर्मचारी हैं जो रिटायर होने के बाद सिर्फ अपनी तय पेंशन पर गुजारा करते हैं, वो भी कई बार समय पर नहीं मिलती। दूसरी तरफ महानदी जल विवाद से जुड़े चुनिंदा अफसरों को पेंशन के ऊपर हर महीने डेढ़ लाख रुपए अतिरिक्त मिल रहे हैं, बिना किसी ठोस नतीजे के। यह असमानता ही सिस्टम की असली तस्वीर दिखाती है। जहां आम कर्मचारी को हर रुपए का हिसाब देना पड़ता है, वहीं “विशेषज्ञ” के तमगे के साथ नियुक्त किए गए चुनिंदा अफसरों से कोई सवाल पूछने वाला नहीं।

महानदी जल विवाद के इस पूरे प्रकरण में सबसे बड़ी विडंबना यही है कि जवाबदेही की जगह सुविधा को तरजीह दी गई है। काम का नतीजा भले शून्य हो, लेकिन भुगतान की रफ्तार पूरी रफ्तार से जारी है।

वकीलों की फौज, दलीलों का जंगल, नतीजा नदारद

महानदी जल विवाद में वकीलों को दी गई 75 करोड़ की रकम पर भी सवाल उठना लाजिमी है। आखिर पांच साल तक लगातार दलीलें दी जाती रहीं, सुनवाई दर सुनवाई तारीखें बढ़ती रहीं, लेकिन ट्रिब्यूनल के सामने राज्य का पक्ष इतना कमजोर क्यों साबित हुआ कि कोई निर्णायक मोड़ ही नहीं आया? क्या यह वकालत की कमजोरी है, या फिर उन अफसरों की नाकामी है जिन्हें तथ्य और आंकड़े जुटाकर वकीलों को सौंपने थे? दोनों ही स्थितियों में नुकसान जनता के पैसे का हुआ है।

यह स्थिति किसी क्रिकेट मैच जैसी है जहां टीम के पास संसाधन भरपूर हों, कोच महंगे हों, प्रैक्टिस सेशन लंबे हों, लेकिन मैदान पर स्कोरबोर्ड फिर भी खाली रहे। महानदी जल विवाद में भी यही हो रहा है संसाधन भरपूर, खर्च भारी, पर स्कोरबोर्ड पर “प्रगति” का कॉलम अब भी शून्य पर अटका है।

महानदी जल विवाद : आपसी सहमति का शोर, ठोस काम की खामोशी

पिछले कुछ महीनों में महानदी जल विवाद को लेकर बार-बार यह सुनने को मिला है कि दोनों राज्य “आपसी सहमति” से समाधान निकालने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। ट्रिब्यूनल की टीमें मौके पर जाकर निरीक्षण कर चुकी हैं, दोनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों के बीच बैठकों की चर्चा भी होती रही है। लेकिन सवाल यह है कि जब जमीन पर तथ्य पेश करने वाली टीम ही पांच साल में ठोस डेटा नहीं जुटा पाई, तो “आपसी सहमति” का यह शोर आखिर किस आधार पर बुलंद हो रहा है? कहीं यह सिर्फ बयानबाजी का खेल तो नहीं, जिसमें असल मुद्दे पर काम धीमी आंच पर ही रखा जा रहा है? छत्तीसगढ़ शासन

महानदी जल विवाद को लेकर जितनी प्रेस विज्ञप्तियां जारी हुई हैं, उतनी अगर ठोस रिपोर्टें ट्रिब्यूनल के सामने पेश हुई होतीं, तो शायद यह मामला अब तक किसी नतीजे पर पहुंच चुका होता।

जवाबदेही कहां है? सवाल पूछने का वक्त आ गया

अब वक्त आ गया है कि महानदी जल विवाद से जुड़े हर पहलू पर सार्वजनिक जवाबदेही तय हो। जनता को यह जानने का पूरा हक है कि —

  • 75 करोड़ रुपए की वकीलों की फीस का ब्योरा क्या है, और इसका किस आधार पर भुगतान हुआ?
  • रिटायर अफसरों को दोबारा नियुक्त करने से पहले उनके पुराने रिकॉर्ड जैसे बोधघाट परियोजना का हश्र, क्यों नजरअंदाज किया गया?
  • हर महीने डेढ़ लाख रुपए की अतिरिक्त सैलरी देने से पहले परफॉर्मेंस का कोई पैमाना तय क्यों नहीं किया गया?
  • पांच साल में जब कोई ठोस प्रगति नहीं हुई, तो जिम्मेदारी किसकी तय होगी?

जब तक इन सवालों के जवाब सामने नहीं आते, तब तक महानदी जल विवाद सिर्फ एक कानूनी मसला नहीं, बल्कि सरकारी खर्च और जवाबदेही की कमी का प्रतीक बना रहेगा।

महानदी जल विवाद : पानी नहीं बंटा, बजट जरूर बंट गया

आखिर में बात इतनी ही है महानदी जल विवाद जिस मकसद के लिए शुरू हुआ था, वह मकसद आज भी अधूरा है। न छत्तीसगढ़ को कोई ठोस राहत मिली, न ओडिशा के साथ कोई स्थायी समझौता हुआ। लेकिन इस बीच जिन्हें फायदा जरूर मिला, वे हैं — वे वकील जिन्हें 75 करोड़ की फीस मिली, और वे रिटायर अफसर जिन्हें पेंशन के ऊपर डेढ़ लाख रुपए महीने की अतिरिक्त कमाई मिल रही है। महानदी जल विवाद का यह किस्सा दिखाता है कि कैसे सरकारी तंत्र में समस्या सुलझाने से ज्यादा फायदेमंद कई बार समस्या को जिंदा रखना साबित होता है।

जनता इंतजार कर रही है कि कब महानदी जल विवाद असल में सुलझेगा, कब पानी का बंटवारा तय होगा, और कब यह करोड़ों का खर्च किसी ठोस नतीजे में तब्दील होगा। लेकिन जब तक जवाबदेही तय नहीं होती, तब तक अंदेशा यही है कि यह विवाद यूं ही चलता रहेगा — फाइलें मोटी होती रहेंगी, सैलरी चढ़ती रहेगी, और नदी का पानी उतनी ही उलझन में बहता रहेगा, जितना पांच साल पहले बह रहा था।

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