DGP साहब की गाड़ी, मरने वाले पर ठीकरा ? छत्तीसगढ़ पुलिस की यह कैसी ‘नौटंकी’ है!

छत्तीसगढ़ पुलिस की यह कैसी 'नौटंकी'

पहले “टोटली इनकॉम्पिटेंट” का तमगा, फिर अपनी ही गाड़ी की दुर्घटना में मासूमियत का नाटक — नौटंकी का यह डबल शो किसने बुक किया?

छत्तीसगढ़ पुलिस के बड़े दफ्तर में इन दिनों जो हो रहा है, उसे सीधे शब्दों में एक ही नाम दिया जा सकता है, नौटंकी। पर्दा उठता है, सफाई शुरू होती है, अदालत सवाल पूछती है, और जवाब की जगह एक और नौटंकी शुरू हो जाती है। कहानी नहीं है यह, बिल्कुल सीधी खबर है — बस मसाला इतना गजब है कि किसी बड़े स्टेज शो को भी मात दे दे। फर्क सिर्फ इतना है कि इस नौटंकी में असली किरदार हैं, असली मौत है, और असली परिवार है जिसने अपना बेटा खोया।

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चलिए सिलसिलेवार समझते हैं कि यह नौटंकी शुरू कहां से हुई, और कैसे एक के बाद एक परदे उठते चले गए।

सुप्रीम कोर्ट का माइक, और DGP साहब की ‘परफॉर्मेंस’

बिलासपुर की कस्टोडियल डेथ यानी हिरासत में हुई मौत का मामला जब सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, तो वहां जो हुआ उसे किसी हैरतअंगेज ट्विस्ट से कम नहीं कहा जा सकता। सुनवाई के दौरान अदालत ने राज्य के पुलिस महानिदेशक की कार्यशैली को लेकर जो टिप्पणी की, वह शब्द दर शब्द चुभने वाली थी “पूरी तरह अयोग्य।” सोचिए जरा, देश की सबसे बड़ी अदालत जब किसी राज्य के सबसे बड़े पुलिस अफसर के लिए यह शब्द चुनती है, तो यह कोई हल्की-फुल्की झिड़की नहीं होती, यह सीधा रेड कार्ड होता है।

लेकिन यह छत्तीसगढ़ है, यहां रेड कार्ड दिखाने के बाद भी खेल रुकता नहीं, नौटंकी आगे बढ़ती रहती है। उम्मीद थी कि इतनी तीखी टिप्पणी के बाद महकमे में हड़कंप मचेगा, समीक्षा होगी, सुधार के कदम उठेंगे। लेकिन असली नौटंकी तो अभी बाकी थी और वह मंच पर आई सड़क के रास्ते।

गाड़ी DGP दफ्तर के नाम, गलती मरने वाले के सिर

27 सितंबर 2023 की तारीख को याद रखिए, क्योंकि यहीं से नौटंकी का असली रोमांच शुरू होता है। एक सड़क दुर्घटना हुई, और उसमें बैजनाथ कंवर नाम के एक युवक की जान चली गई। जिस मिनी बस से यह दुर्घटना हुई, वह किसी आम आदमी की गाड़ी नहीं थी, बल्कि रिकॉर्ड में सीधे छत्तीसगढ़ पुलिस महानिदेशक कार्यालय, रायपुर के नाम पर दर्ज थी। यानी जिस दफ्तर को अभी-अभी सुप्रीम कोर्ट से “अयोग्यता” का सर्टिफिकेट मिला था, उसी दफ्तर के नाम की गाड़ी ने सड़क पर एक और जिंदगी छीन ली।

अब स्वाभाविक तौर पर मृतक का परिवार मुआवजे के लिए मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण पहुंचा। और यहीं से शुरू हुई असली नौटंकी — पुलिस और वाहन स्वामी पक्ष की तरफ से दलील आई कि गलती तो मरने वाले की ही थी! कहा गया कि मृतक खुद तेज और लापरवाही से मोटरसाइकिल चला रहा था। यानी जिसकी जान गई, ठीकरा भी उसी के सिर फोड़ने की तैयारी हो गई। मरने वाला बचाव में एक शब्द भी नहीं बोल सकता था, तो शायद यही सबसे “सुविधाजनक” स्क्रिप्ट लिखी गई।

क्या नौटंकी है — मरने वाला ही दोषी, गाड़ी वाला दफ्तर बेकसूर!

अधिकरण ने कहा, “यह ड्रामा यहां नहीं चलेगा”

लेकिन अधिकरण कोई थिएटर का दर्शक नहीं था जो तालियां बजाकर मान लेता। गवाहों के बयान खंगाले गए, दस्तावेजी सबूतों की बारीकी से जांच हुई, और जब पर्दा पूरी तरह उठा तो नौटंकी की पूरी स्क्रिप्ट धराशायी हो गई। अधिकरण ने साफ पाया कि दुर्घटना असल में मिनी बस चालक की तेज रफ्तार और लापरवाही से हुई थी, और मृतक पर लगाया गया लापरवाही का आरोप कहीं से भी साबित नहीं हुआ।

यानी जो नौटंकी मरने वाले को खलनायक बनाकर रची गई थी, वह खुद ही बुरी तरह फ्लॉप हो गई। असली विलेन निकले चालक और वाहन स्वामी। सोचिए, कितनी बेशर्म नौटंकी होगी जिसमें एक शोकाकुल परिवार को अपने ही मृत बेटे की बेगुनाही अदालत में जाकर साबित करनी पड़े — सिर्फ इसलिए क्योंकि गाड़ी के मालिक बनने वाले दफ्तर को अपनी जवाबदेही से बचना था।

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मुआवजे का हिसाब — नौटंकी में भी नंबर गेम

परिवार ने शुरुआत में 96 लाख रुपये मुआवजे की मांग रखी थी। दलील थी कि मृतक पेशे से चालक था और हर महीने करीब 18 हजार रुपये कमाता था। लेकिन ठोस आय-दस्तावेजों की कमी के चलते अधिकरण ने उसकी मासिक आय 11 हजार रुपये मानी। इसके बाद उम्र, भविष्य की संभावित आय वृद्धि, पांच आश्रितों की जिम्मेदारी और व्यक्तिगत खर्च की कटौती जैसे तमाम पहलुओं को जोड़कर कुल मुआवजा राशि 26 लाख 9 हजार 200 रुपये तय हुई। साथ ही 30 जनवरी 2024 से अंतिम भुगतान तक 9 प्रतिशत सालाना ब्याज देने का आदेश भी सुनाया गया।

इस पूरे हिसाब-किताब में भी एक अलग तरह की नौटंकी छिपी है, जिस परिवार ने अपना कमाने वाला बेटा खोया, उसे अपने ही बेटे की सैलरी साबित करने के लिए कागज खोजने पड़े, जबकि दूसरी तरफ सिर्फ एक लाइन की दलील “गलती मृतक की थी” गढ़ने में किसी को कोई मशक्कत नहीं करनी पड़ी। एक तरफ सबूत जुटाने की मेहनत, दूसरी तरफ जिम्मेदारी टालने की सहूलियत। यही तो नौटंकी की असली परिभाषा है।

गाड़ी किसके नाम, जिम्मेदारी किसके सिर?

अधिकरण ने चालक और वाहन स्वामी दोनों को संयुक्त रूप से और अलग-अलग रूप से जिम्मेदार ठहराया, लेकिन मुआवजा चुकाने की मुख्य जिम्मेदारी वाहन स्वामी पक्ष पर डाली, यानी सीधे उसी शीर्ष कार्यालय पर, जिसके नाम गाड़ी दर्ज थी। मतलब यह मामला सिर्फ एक ड्राइवर की निजी गलती तक सिमटकर नहीं रह गया, बल्कि इसकी आंच सीधे उस दफ्तर तक पहुंच गई जो कागजों में वाहन का मालिक था।

यहीं आकर नौटंकी का असली मजा और असली दर्द दोनों साथ-साथ सामने आते हैं। एक तरफ सुप्रीम कोर्ट की जुबान से निकला “अयोग्य” शब्द, दूसरी तरफ अधिकरण के फैसले में उसी दफ्तर के नाम दर्ज गाड़ी की जवाबदेही। दोनों मामले कानूनन अलग हैं, एक प्रशासनिक-आपराधिक सवाल था, दूसरा मुआवजे का सिविल मामला। लेकिन नौटंकी की स्क्रिप्ट में दोनों का प्लॉट एक जैसा ही निकलता है पहले बचाव, फिर बचाव फेल, फिर अदालत की डांट। Chhattisgarh Police की आधिकारिक वेबसाइट

एक ही महकमा, एक ही नाम, नौटंकी के दो अलग-अलग शो

यह सिर्फ इत्तेफाक मान लेना बड़ी भोली सोच होगी। एक तरफ महकमे के शीर्ष अधिकारी को अदालत में “अयोग्य” करार दिया गया, दूसरी तरफ उसी अधिकारी के नाम दर्ज वाहन से जुड़ी दुर्घटना में मृतक को दोषी ठहराने की नौटंकी भी अदालत के सामने टिक नहीं सकी। दोनों घटनाओं का समय भी करीब-करीब एक जैसा है, महकमा भी वही है, और स्क्रिप्ट का सार भी वही पहले जिम्मेदारी से मुंह मोड़ो, फिर सबूतों के सामने फंस जाओ।

अगर यह नौटंकी सिर्फ एक बार होती, तो शायद संयोग कहकर टाला जा सकता था। लेकिन जब एक ही तरह की नौटंकी बार-बार दोहराई जाए, तो यह सवाल लाजमी हो जाता है, क्या यह विभाग की स्थायी आदत बन चुकी है? क्या जिम्मेदारी से बचना अब पुलिस महकमे की डिफॉल्ट सेटिंग बन गई है, और जिम्मेदारी लेना सिर्फ तब होता है जब अदालत डंडा लेकर खड़ी हो जाए?

नौटंकी की भाषा, व्यवस्था की खामोशी

अगर कोई आम आदमी अपनी गाड़ी की दुर्घटना में मृतक को ही दोषी ठहराने की कोशिश करता, तो शायद यह इतनी बड़ी खबर नहीं बनती। लेकिन यहां किरदार आम नहीं है, गाड़ी की मालिक कोई निजी पार्टी नहीं, बल्कि पूरे राज्य की पुलिस व्यवस्था का सबसे ऊंचा दफ्तर है। जिस दफ्तर से कानून-व्यवस्था और ईमानदार जांच की उम्मीद जनता करती है, उसी दफ्तर के नाम दर्ज गाड़ी की दुर्घटना में एक निर्दोष मृतक को खलनायक बनाने की नौटंकी रची गई, वह भी ऐसे शख्स के खिलाफ जो अपनी सफाई देने के लिए दुनिया में मौजूद ही नहीं था।

क्या यही वह भरोसा है जो पुलिस व्यवस्था से जनता को मिलना चाहिए? हर बार जिम्मेदारी तय करने के लिए पीड़ित परिवार को अदालत की चौखट पर मत्था टेकना जरूरी है? क्या नौटंकी अब जांच प्रक्रिया का बाकायदा हिस्सा बन चुकी है?

नौटंकी बनाम जवाबदेही — यह मुकाबला कब तक चलेगा?

पूरे प्रकरण को अगर करीने से जोड़कर देखा जाए तो एक साफ पैटर्न उभरता है:

पहला — हिरासत में मौत, सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई, शीर्ष अधिकारी को लेकर तीखी टिप्पणी। यहां जिम्मेदारी तय करने की मांग खुद अदालत ने उठाई, महकमे की तरफ से कोई ठोस सार्वजनिक जवाब सामने नहीं आया।

दूसरा — सड़क दुर्घटना, परिवार का मुआवजा दावा, पुलिस/वाहन स्वामी पक्ष की तरफ से मृतक को ही दोषी बताने की नौटंकी, और अधिकरण द्वारा इस नौटंकी को सिरे से खारिज करते हुए वाहन स्वामी पर जिम्मेदारी तय करना।

दोनों में एक ही स्क्रिप्ट दोहराई गई — पहले बचाव की नौटंकी, फिर सबूतों के सामने नौटंकी का फ्लॉप शो, और अंत में अदालत की मुहर। यह पैटर्न साफ बताता है कि जिम्मेदारी लेने की संस्कृति अभी भी विभाग के भीतर से पैदा नहीं हो रही, बल्कि बाहर से — अदालतों के डंडे से — जबरन थोपी जा रही है।

सवाल किसी एक अफसर का नहीं, पूरे तंत्र की नौटंकी का है

यह लेख किसी एक शख्स को निशाना बनाने के लिए नहीं लिखा गया, न ही इसका मकसद किसी अफसर विशेष पर तंज कसना है। सवाल पूरे तंत्र से है, उस तंत्र से, जिसके नाम पर गाड़ियां पंजीकृत होती हैं, जिसके नाम पर आदेश निकलते हैं, और जिसके नाम पर जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। जब शीर्ष स्तर पर जिम्मेदारी लेने की जगह नौटंकी रचने की आदत बन जाए, तो नीचे के थाने-चौकी से ईमानदारी की उम्मीद रखना भी हास्यास्पद लगने लगता है।

पुलिस व्यवस्था में जिम्मेदारी ऊपर से नीचे तक बहने वाली एक धारा है। अगर शीर्ष पर बैठा नेतृत्व ही जिम्मेदारी से बचने की नौटंकी में उलझा रहे, तो जमीनी स्तर के सिपाही या इंस्पेक्टर से जवाबदेही की उम्मीद रखना बेमानी हो जाता है। यही वह जगह है जहां आम जनता का भरोसा टूटता है, और यही वह जगह है जहां हर बार अदालतों को बीच में कूदना पड़ता है।

नौटंकी का रिपोर्ट कार्ड — नंबर किसे मिले?

अगर इस पूरे किस्से को किसी परीक्षा परिणाम की तरह देखें, तो नतीजा साफ है, जिम्मेदारी वाले पेपर में पुलिस महकमा दो बार बैठा, दोनों बार जांच अदालत ने की, और दोनों बार नतीजा एक जैसा निकला। पहली बार सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जिम्मेदारी तय करने में महकमा नाकाम रहा। दूसरी बार अधिकरण ने कहा कि जिम्मेदारी से बचने की नौटंकी सबूतों के सामने टिक नहीं सकी।

क्या यह सिर्फ इत्तेफाक है कि दोनों बार महकमा इसी परीक्षा में फेल हुआ? या यह इस बात का पक्का सबूत है कि जिम्मेदारी को गंभीरता से लेने की बजाय उससे बचने के नए-नए नुस्खे खोजने की आदत पड़ चुकी है?

असली हीरो तो पीड़ित परिवार निकला, महकमा तो बस नौटंकी में उलझा रहा

बैजनाथ कंवर के परिवार ने अपना बेटा खोने के बाद जो संघर्ष किया, वह इस पूरी कहानी का इकलौता ईमानदार हिस्सा है। परिवार ने सबूत जुटाए, गवाह पेश किए, अदालत में डटकर लड़ाई लड़ी, और आखिरकार यह साबित किया कि उनका बेटा दोषी नहीं था। जिम्मेदारी निभाने का यह काम महकमे ने नहीं, बल्कि खुद पीड़ित परिवार ने अपने कंधों पर उठाया।

सवाल यह है कि जिस जिम्मेदारी को निभाने में एक गमजदा परिवार को महीनों अदालत के चक्कर काटने पड़े, वही जिम्मेदारी महकमा खुद अपने स्तर पर पहले क्यों नहीं निभा सका? क्यों नहीं शुरुआत में ही निष्पक्ष जांच करके असली दोषी को सामने लाया गया, बिना किसी निर्दोष मृतक को झूठे कठघरे में खड़ा किए?

आखिरी पर्दा — सवाल वही, जवाब नदारद

इस पूरी नौटंकी से जो सबसे बड़ा सवाल बचता है, वह यही है — क्या छत्तीसगढ़ पुलिस व्यवस्था में जिम्मेदारी लेने की शुरुआत विभाग के भीतर से होगी, या हर बार सिर्फ अदालत के डंडे के बाद ही जिम्मेदारी तय होगी? एक तरफ सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी “पूरी तरह अयोग्य”, दूसरी तरफ अधिकरण का फैसला जिसमें मृतक को दोषी ठहराने की नौटंकी खारिज हुई और 26 लाख 9 हजार 200 रुपये मुआवजा तय किया गया।

दुर्घटना की जिम्मेदारी चालक और वाहन स्वामी पर अदालत ने तय कर दी है, लेकिन असली और बड़ा सवाल कानूनी नहीं, नैतिक और प्रशासनिक है। जिस पुलिस व्यवस्था पर सर्वोच्च अदालत को इतनी कड़ी टिप्पणी करनी पड़ी, उसी व्यवस्था से जुड़े एक और मामले में अदालत को पुलिस पक्ष की नौटंकी सिरे से खारिज करनी पड़ी — तो आखिर जवाब किससे मांगा जाए?

अगर शीर्ष स्तर पर जिम्मेदारी तय नहीं होगी, तो नीचे की पूरी व्यवस्था को जवाबदेह कौन बनाएगा? यह सवाल अब सिर्फ एक कस्टोडियल डेथ या एक सड़क दुर्घटना तक सीमित नहीं रह गया, यह सवाल पूरी पुलिस व्यवस्था की साख और उसकी नीयत से जुड़ गया है। और जब तक यह नौटंकी बंद नहीं होती, तब तक अदालतें भी यही सवाल पूछती रहेंगी और जनता भी यही पूछती रहेगी — आखिर असली जिम्मेदारी लेगा कौन, और यह नौटंकी कब तक चलेगी?

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