कोरबा/रायपुर। छत्तीसगढ़ में बारिश ने इस बार अपने सारे पुराने रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। मौसम विभाग ने प्रदेश के आधा दर्जन जिलों में ऑरेंज और येलो अलर्ट जारी किया है, तो वहीं राज्य सरकार भी हालात को लेकर सतर्क बताई जा रही है। इसी बीच काले हीरे यानी कोयले की धरती कहे जाने वाले कोरबा से एक चौंकाने वाली खबर सामने आई है। यहां एक अहम सड़क मार्ग पर लैंडस्लाइड यानी भूस्खलन की घटना सामने आई है, जिसने पूरे इलाके की चिंता बढ़ा दी है। हेमचंद यादव विश्वविद्यालय में हड़कंप: कुलसचिव के हाथ से फिसला वित्तीय अधिकार, एफआईआर के बाद उठा बड़ा कदम
कोरबा में अचानक क्यों हुआ लैंडस्लाइड?
कोरबा जिले में जो हुआ, वह सुनने में भले ही अजीब लगे, लेकिन यह सच है। पहाड़ी इलाकों में होने वाला लैंडस्लाइड अब मैदानी कोरबा में भी देखने को मिल रहा है। भारी बारिश के बीच सर्वमंगला से कांबेरी जाने वाले मुख्य मार्ग पर अचानक लैंडस्लाइड हो गया। इस घटना में बड़ी मात्रा में मलबा, मिट्टी और पत्थरों के टुकड़े सड़क पर आ गिरे। सिर्फ मलबा ही नहीं, बल्कि सड़कों पर पानी का सैलाब भी बहने लगा, जिससे राहगीरों की मुश्किलें बढ़ गईं। मौसम विभाग
स्थानीय लोगों का कहना है कि जिन सड़कों पर पहले बारिश का पानी आसानी से बह जाता था, अब वहां पानी रुकने लगा है और सड़कें तालाब जैसी नजर आने लगी हैं। बस, कार और अन्य वाहन इस मलबे और पानी में फंसते नजर आए, जो आमतौर पर पहाड़ी इलाकों में ही देखने को मिलता है।
कोरबा के दादर नाला में स्कॉर्पियो फंसी, 3 लोगों का हुआ रेस्क्यू
इस पूरे घटनाक्रम के बीच एक और डरावना नजारा दादर नाला इलाके में देखने को मिला। यहां उफनते नाले के बीच एक स्कॉर्पियो वाहन लापरवाही से आगे बढ़ता रहा। स्थानीय ग्रामीणों ने वाहन चालक को रोकने और चेतावनी देने की पूरी कोशिश की, लेकिन चालक ने उनकी बात नहीं मानी। नतीजा वही हुआ जिसका डर था — स्कॉर्पियो उफनते नाले में बहने लगी।

गनीमत रही कि मौके पर मौजूद ग्रामीणों ने तुरंत हिम्मत दिखाते हुए ड्राइवर समेत गाड़ी में सवार तीनों लोगों को सुरक्षित बाहर निकाल लिया। ग्रामीणों का दावा है कि वाहन चालक नशे की हालत में था। इस पूरी घटना का वीडियो अब सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है और लोग इस लापरवाही पर सवाल उठा रहे हैं।
गांव-गांव जलभराव, निचली बस्तियों पर मंडराया खतरा
कोरबा जिले के कई छोटे-बड़े गांव और कस्बे इस समय जलभराव की समस्या से जूझ रहे हैं। लगातार हो रही बारिश की वजह से जगह-जगह गड्ढे बन गए हैं, जो अब निचली बस्तियों के लिए खतरे की घंटी बजा रहे हैं। प्रभावित लोगों का कहना है कि पहले कभी इतना पानी नहीं भरता था, लेकिन अब हालात बदल गए हैं।

सोशल मीडिया और अखबारों में वायरल हो रही तस्वीरों और वीडियो ने लोगों के बीच हलचल मचा दी है। कई लोगों को तो पहली नजर में यकीन ही नहीं हुआ कि यह नजारा हिमाचल या उत्तराखंड की पहाड़ी वादियों का नहीं, बल्कि कोयले की खदानों के लिए मशहूर छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले का है।
पिछले दो हफ्तों से लगातार बारिश, टूटे पुराने रिकॉर्ड
छत्तीसगढ़ में पिछले दो हफ्तों से बारिश का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। कभी रुक-रुक कर तो कभी मूसलाधार बारिश हो रही है। इस बारिश ने कई जिलों में पिछले सालों के रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। मौसम विभाग के अलर्ट के बाद SDRF और NDRF समेत तमाम राहत एजेंसियां भी सतर्क हो गई हैं।
कोरबा जिले में लगातार हो रही बारिश की वजह से पहाड़ी और ढलान वाले इलाकों में मिट्टी खिसकने का खतरा बढ़ गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर बारिश का यह दौर आगे भी जारी रहा, तो ऐसे संवेदनशील इलाकों में और ज्यादा सतर्कता बरतने की जरूरत होगी।
कोयले की धरती कोरबा का बड़ा दर्जा
कोरबा जिले की पहचान देशभर में कोयले की राजधानी के तौर पर होती है। जितनी खदानें कोरबा जिले में संचालित हैं, उतनी देश के किसी भी अन्य जिले में नहीं हैं। अकेले कोरबा जिले से कोल इंडिया लिमिटेड को करीब 20 फीसदी कोयला मिलता है। यह अपने आप में एक बड़ा कीर्तिमान माना जाता है। लेकिन अब लैंडस्लाइड जैसी घटनाएं सामने आने के बाद यह सवाल उठने लगा है कि कहीं यह कीर्तिमान आने वाले समय में मुसीबत का सबब तो नहीं बन जाएगा।

जानकारी के मुताबिक, अकेले कोरबा जिले में 11 पावर प्लांट स्थापित हैं, जिनकी कुल क्षमता करीब 7 हजार मेगावाट बिजली उत्पादन की है। ये प्लांट न सिर्फ छत्तीसगढ़ की करीब 400 मेगावाट प्रतिदिन की बिजली जरूरत पूरी करते हैं, बल्कि मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, तेलंगाना और गुजरात जैसे कई राज्यों को भी बिजली आपूर्ति करते हैं।
पर्यावरण असंतुलन को लेकर उठने लगे सवाल
पर्यावरण से जुड़े जानकार अब लैंडस्लाइड जैसी घटनाओं को इलाके में लंबे समय से चल रहे बदलावों से जोड़कर देख रहे हैं। बताया जाता है कि कोरबा जिले में 1960 के दशक से ही कोयले का बड़े स्तर पर उत्खनन शुरू हो गया था, और अब इसके असर धीरे-धीरे सामने आने लगे हैं।

कोरबा जिले में चार बड़े कोयला क्षेत्र हैं — दीपका, गेवरा, कोरबा और कुसमुंडा। इन क्षेत्रों के अंतर्गत एक दर्जन से ज्यादा खदानें आती हैं। दीपका, गेवरा और कुसमुंडा जैसी खदानें सिर्फ एसईसीएल ही नहीं, बल्कि देश की सबसे बड़ी खदानों में गिनी जाती हैं। यहीं से देश की ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर कोयले की आपूर्ति की जाती है।
जीएसआई के एक सर्वे के मुताबिक, कोरबा कोल फील्ड्स में करीब 11 हजार 828.98 मीट्रिक टन कोयला रिजर्व स्टॉक में मौजूद बताया जाता है। इसके बावजूद खदानों के विस्तार की प्रक्रिया लगातार जारी है, जिसे कई जानकार प्रकृति के असंतुलन से जोड़कर देख रहे हैं।
प्रदूषण और पेड़ों की कटाई ने बढ़ाई मुश्किल
स्थानीय लोगों का कहना है कि खदानों के लगातार विस्तार से इलाके की हरियाली को भारी नुकसान पहुंचा है। कोयले की धूल के बीच सांस लेना यहां की एक बड़ी आबादी की मजबूरी बन गई है। पावर प्लांटों से निकलने वाली राख ने भी जल, जंगल और जमीन को काफी नुकसान पहुंचाया बताया जाता है।

छत्तीसगढ़ में सरगुजा संभाग से लेकर कोरबा तक कोयला खदानों के विस्तार के लिए बड़ी संख्या में पेड़ों की कटाई हुई है, जिसे स्थानीय मौसम चक्र में बदलाव की एक वजह माना जा रहा है। इलाके के लोगों का कहना है कि विकास की इस दौड़ में सबसे ज्यादा असर आम आबादी और मजदूरों पर पड़ा है।
अब आगे क्या?
फिलहाल कोरबा में बारिश और लैंडस्लाइड की स्थिति ने प्रशासन और आम लोगों दोनों की चिंता बढ़ा दी है। मौसम विभाग की चेतावनी और लगातार हो रही बारिश को देखते हुए राहत एजेंसियां सतर्क हैं। स्थानीय प्रशासन से लोग यह मांग कर रहे हैं कि संवेदनशील इलाकों की तुरंत पहचान कर वहां एहतियाती कदम उठाए जाएं, ताकि आगे किसी बड़े हादसे से बचा जा सके।
बहरहाल, कोरबा की सड़कों पर उमड़ा पानी और अचानक हुआ भूस्खलन इस बात का संकेत जरूर देते हैं कि लगातार बदल रहे मौसम और प्रकृति में हो रहे बदलावों को अब हल्के में लेना ठीक नहीं होगा। आने वाले दिनों में बारिश का यह दौर किस करवट बैठेगा, यह देखने वाली बात होगी।

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