दुर्ग। छत्तीसगढ़ के हेमचंद यादव विश्वविद्यालय में इन दिनों प्रशासनिक हलचल चरम पर है। एक एफआईआर ने पूरे विश्वविद्यालय के वित्तीय ढांचे को हिला कर रख दिया है। सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि हेमचंद यादव विश्वविद्यालय की कार्यपरिषद को आनन-फानन में बैठक बुलाकर कुलसचिव को वित्तीय जिम्मेदारियों से बेदखल करना पड़ा? आइए, हेमचंद यादव विश्वविद्यालय के इस पूरे घटनाक्रम को सिलसिलेवार समझते हैं। छत्तीसगढ़ डिजिटल अखाड़े में भूपेश बघेल का जलवा! फॉलोअर्स की रेस में कांग्रेस के बाकी दिग्गज कहां हैं पीछे?

आखिर हुआ क्या था हेमचंद यादव विश्वविद्यालय में?
हेमचंद यादव विश्वविद्यालय के कुलसचिव भूपेंद्र कुमार कुलदीप पर एक गंभीर आरोप लगा है। विश्वविद्यालय की ही एक अर्धकुशल दैनिक वेतनभोगी महिला कर्मचारी शुभांगी मराठे ने शिकायत दर्ज कराई कि कुलसचिव उनसे अपने घर पर खाना बनवाने जैसे घरेलू काम करवाते रहे। सवाल यह उठता है कि क्या एक विश्वविद्यालय के इतने बड़े ओहदे पर बैठा अधिकारी अपने दायित्वों से आगे बढ़कर एक कर्मचारी का इस तरह इस्तेमाल कर सकता है? शिकायत में यह भी कहा गया कि महिला कर्मचारी की सैलरी में से एक तय हिस्सा छोड़कर बाकी रकम हर महीने ऑनलाइन ट्रांसफर के जरिए कुलसचिव के बेटे के बैंक खाते में भेजी जाती रही।
हेमचंद यादव विवि प्रशासन ने इस शिकायत को गंभीरता से लेते हुए जांच समिति गठित की। जांच में बैंक और यूपीआई रिकॉर्ड खंगाले गए, जिसमें सामने आया कि फरवरी 2025 से जुलाई 2026 के बीच महिला कर्मचारी के वेतन खाते से करीब 1 लाख 49 हजार 384 रुपये आरोपी के बेटे के खाते में स्थानांतरित हुए। यह आंकड़ा ही अपने आप में कई सवाल खड़े करता है — आखिर इतनी बड़ी रकम महीने-दर-महीने कैसे और क्यों ट्रांसफर होती रही, और इतने लंबे समय तक इस पर किसी की नजर क्यों नहीं पड़ी?
एफआईआर से लेकर गिरफ्तारी तक, हेमचंद यादव विश्वविद्यालय में मचा हड़कंप
जांच रिपोर्ट में तथ्यों की पुष्टि होने के बाद मोहन नगर थाने में 3 अगस्त 2026 को भारतीय न्याय संहिता की धारा 316(4) के तहत कुलसचिव के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई। पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार भी किया, हालांकि थाने से ही उन्हें जमानत मिल गई। यह घटनाक्रम हेमचंद यादव विश्वविद्यालय के लिए किसी झटके से कम नहीं था, क्योंकि विश्वविद्यालय के इतिहास में इतने बड़े ओहदे पर बैठे किसी अधिकारी के खिलाफ इस तरह की एफआईआर पहली बार दर्ज हुई। हेमचंद यादव विश्वविद्यालय की आधिकारिक वेबसाइट
हालांकि यह ध्यान रखना जरूरी है कि यह मामला अभी आरोप और जांच के दायरे में ही है। नियमानुसार जब तक अदालत में दोष सिद्ध नहीं हो जाता, किसी भी आरोपी को दोषी नहीं माना जा सकता। लेकिन सवाल यह है कि क्या हेमचंद यादव विश्वविद्यालय प्रशासन इतने गंभीर आरोपों के बावजूद कुलसचिव को वित्तीय अधिकार सौंपे रखने का जोखिम उठा सकता था?
कार्यपरिषद की बैठक में क्या हुआ हेमचंद यादव विश्वविद्यालय में?
एफआईआर दर्ज होने के बाद हेमचंद यादव विश्वविद्यालय की कार्यपरिषद ने तत्काल इस मुद्दे पर मंथन शुरू किया। हाल ही में हुई बैठक में जब कुलसचिव से जुड़ा एजेंडा चर्चा में आया, तो खुद कुलसचिव को बैठक कक्ष से बाहर जाना पड़ा। यह दृश्य अपने आप में इस बात की गवाही देता है कि मामला कितना संवेदनशील हो चुका था। इसके बाद सदस्यों ने लिखित सहमति देते हुए कुलसचिव को वित्तीय कामकाज से अलग करने के फैसले को मंजूरी दी।
इस फैसले के बाद विश्वविद्यालय में अधिष्ठाता छात्र कल्याण डॉ. नीलू श्रीवास्तव को आगे की वित्तीय प्रक्रिया के लिए प्रभारी सचिव नियुक्त किया गया। अब आगामी आदेश तक विश्वविद्यालय के सभी वित्तीय प्रपत्रों और बैंकिंग लेनदेन पर वित्त अधिकारी के साथ द्वितीय हस्ताक्षरकर्ता के रूप में डॉ. श्रीवास्तव ही जिम्मेदारी संभालेंगी। यानी अब हेमचंद यादव विश्वविद्यालय में कुलसचिव के हस्ताक्षर से कोई भी वित्तीय लेनदेन नहीं हो सकेगा — यह एक बड़ा और सख्त प्रशासनिक संदेश माना जा रहा है।
आखिर क्यों जरूरी हो गया यह फैसला?
हेमचंद यादव विश्वविद्यालय की कार्यपरिषद के संकल्प में साफ लिखा गया है कि कुलसचिव के खिलाफ एफआईआर दर्ज होने के बाद विश्वविद्यालय के वित्तीय हित, प्रशासनिक निष्पक्षता और कामकाज की निरंतरता बनाए रखने के मद्देनजर यह व्यवस्था जरूरी हो गई थी। यह निर्णय छत्तीसगढ़ विश्वविद्यालय अधिनियम, 1973 की संबंधित धाराओं और विवि में लागू वित्तीय नियमों के दायरे में लिया गया है।
गौर करने वाली बात यह भी है कि विश्वविद्यालय प्रशासन ने इस फैसले की औपचारिक सूचना उच्च शिक्षा विभाग के आयुक्त को भी भेजी है, ताकि इस प्रशासनिक कदम पर आगे की प्रक्रिया के लिए स्पष्ट मार्गदर्शन मिल सके। यानी विश्वविद्यालय प्रशासन खुद भी यह सुनिश्चित करना चाहता है कि उठाया गया कदम पूरी तरह नियम-सम्मत हो।
दस्तावेजों से छेड़छाड़ की आशंका ने क्यों बढ़ाई चिंता?
हेमचंद यादव विश्वविद्यालय प्रशासन ने आयुक्त को भेजे पत्र में एक और अहम बात का जिक्र किया है — कुलसचिव के खिलाफ विवि की निधि में अनियमितता का मामला जांच के दायरे में है। ऐसी स्थिति में भुगतान, बैंकिंग लेनदेन, वेतन वितरण, क्रय प्रक्रिया और अभिलेखों की सुरक्षा जैसी जिम्मेदारियां उन्हीं के पास बने रहना संस्थागत दृष्टि से उचित नहीं माना गया।
पत्र में यह चिंता भी साफ तौर पर जताई गई कि जांच के दौरान विश्वविद्यालय के अभिलेखों से छेड़छाड़ की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। सवाल यह है — क्या यह आशंका सिर्फ एहतियात भर थी, या इसके पीछे कोई ठोस वजह भी थी? फिलहाल विश्वविद्यालय प्रशासन ने इसे “एहतियातन कदम” बताते हुए मामले को सुलझाने की दिशा में आगे बढ़ने का रुख अपनाया है।
आयुक्त से मार्गदर्शन मांगने की नौबत क्यों आई?
3 अगस्त को एफआईआर दर्ज होने के तुरंत बाद हेमचंद यादव विश्वविद्यालय प्रशासन ने उच्च शिक्षा संचालनालय के आयुक्त को पत्र लिखकर स्पष्ट मार्गदर्शन मांगा था। इस पत्र में यह भी बताया गया कि कुलसचिव जमानत पर होने के बावजूद वित्तीय देयकों, नस्तियों और आधिकारिक प्रपत्रों पर हस्ताक्षर करना जारी रखे हुए थे।
यह बात हेमचंद यादव विश्वविद्यालय प्रशासन के लिए एक बड़ी असहज स्थिति बन गई थी — एक तरफ एफआईआर दर्ज है, दूसरी तरफ रोजमर्रा के वित्तीय कामकाज पर उन्हीं के हस्ताक्षर चल रहे थे। ऐसी स्थिति में नियमों के तहत उनकी भूमिका को लेकर स्पष्टता जरूरी हो गई थी, जिसके बाद यह प्रशासनिक बदलाव किया गया।
किस-किस पर पड़ेगा इस फैसले का असर?
हेमचंद यादव विश्वविद्यालय के इस फैसले का असर कई स्तरों पर देखने को मिलेगा:
- विश्वविद्यालय की दैनिक वित्तीय प्रक्रियाओं — भुगतान, वेतन वितरण, बैंकिंग लेनदेन — पर अस्थायी रूप से नई व्यवस्था लागू होगी।
- अधिष्ठाता छात्र कल्याण डॉ. नीलू श्रीवास्तव को अपनी मौजूदा जिम्मेदारियों के साथ-साथ अतिरिक्त वित्तीय भार भी संभालना होगा।
- कुलसचिव प्रशासनिक पद पर बने रह सकते हैं, लेकिन हेमचंद यादव विश्वविद्यालय में उनकी भूमिका फिलहाल वित्तीय मामलों तक सीमित कर दी गई है।
आगे क्या होगा हेमचंद यादव विश्वविद्यालय में?
यह नई व्यवस्था “आगामी आदेश तक” लागू रहेगी, यानी जांच और कानूनी प्रक्रिया की प्रगति के आधार पर आगे बदलाव संभव है। मामले में विवेचना अभी जारी है और अंतिम स्थिति पूरी तरह अदालत की कार्यवाही पर निर्भर करेगी। तब तक हेमचंद यादव विश्वविद्यालय प्रशासन ने अपने संस्थागत हितों की रक्षा के लिए यह ठोस कदम उठाया है, ताकि जांच प्रभावित न हो और कामकाज सुचारू रूप से चलता रहे।
कुल मिलाकर, विश्वविद्यालय के इस पूरे मामले ने यह सवाल जरूर खड़ा कर दिया है कि क्या शैक्षणिक संस्थानों में प्रशासनिक जवाबदेही को लेकर और सख्त निगरानी तंत्र की जरूरत है। जब तक जांच पूरी नहीं होती और अदालत का फैसला नहीं आता, तब तक यह कहना जल्दबाजी होगी कि आखिर सच क्या है — लेकिन हेमचंद यादव विश्वविद्यालय प्रशासन ने जिस तेजी से यह कदम उठाया है, वह जरूर बताता है कि संस्थान अपनी साख को लेकर कितना सजग है।

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