दुर्ग/भिलाई। छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले में भिलाई इस्पात संयंत्र यानी BSP से लोहा इतनी सफाई से गायब हुआ कि अब सवाल यह नहीं रहा कि लोहा कहां गया, सवाल यह है कि लोहा चोरी की जांच की मांग करने वाला “नाम” कहां गायब हो गया। सत्ताधारी पार्टी के अपने ही विधायक ने फेसबुक पर पोस्ट डालकर पूरे प्रशासनिक तंत्र को चौंका दिया, मगर पोस्ट में जिन 4 IPS, 3 IAS और 12 नेताओं की भूमिका की जांच मांगी गई, उनका नाम वहीं गायब मिला जहां लोहा भी कभी गायब हुआ था — रिकॉर्ड से। कमाल की बात यह है कि जब लोहा चोरी हो रहा था तब भी किसी ने नहीं देखा, और अब जब नाम बताने की बारी आई तो वह भी नहीं दिखे। यह लोहा चोरी कांड अब सिर्फ लोहा चोरी कांड नहीं, बल्कि “नाम छुपाओ, जांच बताओ” योजना का जीता-जागता नमूना बन चुका है।

लोहा चोरी कांड कहानी नहीं, यह खबर है — लेकिन ट्विस्ट किसी वेब सीरीज़ से कम नहीं
भिलाई इस्पात संयंत्र से कथित लोहा चोरी और स्क्रैप चोरी का मामला पिछले कई महीनों से छत्तीसगढ़ की राजनीति में गरमाया हुआ है। इस बार मामले को नई हवा दी है भाजपा के वैशाली नगर विधायक रिकेश सेन ने, जिन्होंने अपनी ही सरकार के दौर में, अपनी ही पार्टी के करीबी की गिरफ्तारी के बाद, एक ऐसी फेसबुक पोस्ट डाल दी जिसने पूरे प्रशासनिक अमले में हड़कंप मचा दिया। पोस्ट में दावा किया गया कि पिछले करीब 40 वर्षों में BSP से लगभग 10 हजार करोड़ रुपये का लोहा चोरी हो चुका है। अब जरा गणित लगाइए — 40 साल, 10 हजार करोड़, यानी हर साल औसतन 250 करोड़ का लोहा गायब होता रहा और किसी को खबर तक नहीं हुई। यह लोहा चोरी नहीं, यह तो लोहे का “साइलेंट एग्जिट” है, बिना शोर, बिना सुर्खी, बस स्क्रैप बनकर निकलता रहा।
Bhilai Steel Plant की आधिकारिक वेबसाइट
लोहा चोरी की यह रकम इतनी बड़ी है कि सुनकर आम आदमी की आंखें फटी रह जाएं, मगर सिस्टम की आंखें इतने साल बंद कैसे रहीं, यह सवाल किसी ने नहीं पूछा। विधायक रिकेश सेन का यह दावा कि 10 हजार करोड़ का लोहा चोरी हुआ, अपने आप में एक खबर है, लेकिन उससे भी बड़ी खबर यह है कि जिस पार्टी के विधायक यह दावा कर रहे हैं, उसी पार्टी की सरकार राज्य में काबिज है। यानी अपनी ही सरकार के भीतर बैठे अधिकारियों पर सवाल उठाना, वह भी सार्वजनिक मंच फेसबुक से — यह छत्तीसगढ़ की राजनीति में अपने आप में एक अनोखा प्रयोग है।
भास्कर मुदलियार: वह चेहरा जिसने पूरी स्क्रिप्ट बदल दी
इस पूरे लोहा चोरी प्रकरण को नई धार तब मिली जब भाजपा से जुड़े नेता भास्कर मुदलियार उर्फ बाचू को दुर्ग पुलिस ने गिरफ्तार किया। भास्कर मुदलियार पर आरोप है कि वह BSP से निकलने वाले करीब 250 टन लौह स्क्रैप की कथित चोरी और उसकी खरीद-बिक्री में सीधे तौर पर शामिल था। दिलचस्प यह है कि यही भास्कर मुदलियार खुद को विधायक रिकेश सेन का “कट्टर समर्थक” बताता रहा है। शहर के चौक-चौराहों पर विधायक के जन्मदिन की बधाई के बैनर तक लगवाए जाते थे। यानी लोहा चोरी की जड़ें कहीं और नहीं, विधायक जी के अपने ही “फैन क्लब” तक जा पहुंचीं। गिरफ्तारी की खबर आते ही विपक्ष ने सोशल मीडिया पर जमकर राजनीति की और बैनर-पोस्टर रातों-रात हटा दिए गए। मानो लोहा चोरी की तरह ही, समर्थन के सबूत भी “स्क्रैप” कर दिए गए हों।
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भाजपा ने भी इस पूरे प्रकरण में देर न करते हुए भास्कर मुदलियार को पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से छह वर्ष के लिए बाहर का रास्ता दिखा दिया। यानी लोहा चोरी में नाम आते ही पार्टी ने “सफाई” कर दी, मगर सवाल वही रहा — जिस नेटवर्क की बात हो रही है, क्या वह सिर्फ एक व्यक्ति तक सीमित है, या इसकी जड़ें उन 4 IPS, 3 IAS और 12 नेताओं तक फैली हैं जिनके नाम अब तक पर्दे के पीछे हैं?
10 हजार करोड़ की लोहा चोरी, मगर सवालों की चोरी उससे भी बड़ी
विधायक रिकेश सेन की फेसबुक पोस्ट ने जो सबसे बड़ा सवाल खड़ा किया, वह है — 10 हजार करोड़ के इस लोहा चोरी के दावे का आधार आखिर है क्या? क्या यह आंकड़ा किसी सरकारी रिपोर्ट पर आधारित है, किसी ऑडिट पर आधारित है, या फिर यह सिर्फ अनुमान है जो सोशल मीडिया पर “वायरल” होने के लिए गढ़ा गया? अगर विधायक के पास इतने ठोस आंकड़े हैं, तो सवाल यह भी है कि यह जानकारी अब तक जांच एजेंसियों तक पहुंचाई गई या नहीं। अगर पहुंचाई गई, तो जांच एजेंसियां चुप क्यों हैं। अगर नहीं पहुंचाई गई, तो फिर फेसबुक पोस्ट डालने की जल्दी किस बात की थी?

यह लोहा चोरी कांड अब सिर्फ लोहा चोरी कांड नहीं रह गया, यह “सवालों की चोरी” का कांड बन चुका है। हर जवाब की जगह एक नया सवाल खड़ा हो जाता है, और हर सवाल की जगह एक नई चुप्पी। विधायक ने दावा तो बड़ा किया, मगर दस्तावेज सार्वजनिक करने में उतनी ही “सावधानी” बरती जितनी सावधानी शायद उन अधिकारियों ने स्क्रैप के वजन-रिकॉर्ड बनाने में बरती होगी।
4 IPS, 3 IAS और 12 नेता — नाम गायब, शक बरकरार
विधायक की पोस्ट में सबसे ज्यादा हलचल जिस हिस्से ने मचाई, वह है 4 IPS अधिकारियों, 3 IAS अधिकारियों और 12 नेताओं की भूमिका की जांच की मांग। यह सुनकर पहली प्रतिक्रिया यही आती है कि आखिर इतने बड़े प्रशासनिक अमले पर शक जताने के लिए विधायक के पास कौन सी “गुप्त फाइल” है। मगर जैसे ही नाम पूछने की बारी आती है, जवाब में सन्नाटा मिलता है। न कोई नाम, न कोई लिस्ट, न कोई दस्तावेज सार्वजनिक — बस एक इशारा, कि “कहीं न कहीं गड़बड़ है”।
यह अंदाज़ बिल्कुल वैसा ही है जैसे कोई कहे “मुझे पता है चोर कौन है” और जब पूछा जाए “कौन?”, तो जवाब मिले “बताऊंगा नहीं, बस जांच करा दो”। सवाल यह है कि क्या यह जांच की मांग है या फिर सिर्फ एक राजनीतिक संदेश देने की कोशिश, जिसमें अधिकारियों को अप्रत्यक्ष रूप से चेतावनी दी जा रही है कि “मुझे सब पता है, संभल जाओ”। यही वजह है कि 4 IPS, 3 IAS और 12 नेताओं का यह जिक्र अब चर्चा का सबसे बड़ा केंद्र बन गया है — नाम गायब हैं, मगर शक की सुई पूरे सिस्टम की तरफ घूम चुकी है।
100 वाहन, रातों-रात कटे, और RTO की नींद नहीं टूटी
विधायक रिकेश सेन ने अपनी पोस्ट में यह भी दावा किया कि इस कथित लोहा चोरी में 100 से अधिक वाहनों का इस्तेमाल हुआ, और इनमें से कई वाहनों को रातों-रात काटकर कबाड़ में बदल दिया गया ताकि सबूत मिट जाएं। अब जरा सोचिए, 100 से ज्यादा वाहन, वह भी रातों-रात कटते रहें, और यह किसी को खबर तक न हो — यह भी अपने आप में एक “रिकॉर्ड” है। जिस शहर में रात 11 बजे के बाद सड़क पर तेज बाइक चलाने वाले को पुलिस पकड़ लेती है, उसी शहर में रातों-रात दर्जनों वाहन कटते रहे और RTO का रिकॉर्ड शांत बना रहा।
विधायक ने इन वाहनों और उनसे जुड़े ट्रांसपोर्टरों की RTO रिकॉर्ड के जरिए जांच की मांग की है। सवाल यह है कि अगर वाहन असल में इस्तेमाल हुए, तो उनका रजिस्ट्रेशन, उनका मालिकाना हक, उनका आना-जाना — यह सब कहीं न कहीं दर्ज तो होगा ही। फिर जांच में देरी क्यों? क्या यह सिर्फ इसलिए कि जांच जितनी देर से शुरू होगी, सबूत उतने ही ज्यादा “स्क्रैप” हो चुके होंगे?
ट्रांसपोर्ट यूनियन की वसूली और रसमड़ा फैक्ट्री का राज
पोस्ट में एक और गंभीर आरोप लगाया गया है — एक ट्रांसपोर्ट यूनियन पर हर महीने लाखों रुपये की कथित वसूली का आरोप। यानी सिर्फ लोहा चोरी नहीं, बल्कि इस पूरे नेटवर्क में एक व्यवस्थित “वसूली मॉडल” भी काम कर रहा था, ऐसा दावा किया गया है। इसके अलावा रसमड़ा में स्थित एक फैक्ट्री का जिक्र करते हुए यह आशंका जताई गई कि वहां कथित चोरी का लोहा खपाया जाता रहा।
दिलचस्प यह है कि एक अलग रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि कथित तौर पर चोरी हुआ लोहा एक फैक्ट्री से बरामद भी हुआ था, मगर फैक्ट्री मालिक पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। यानी माल भी मिला, ठिकाना भी मिला, फिर भी कार्रवाई गायब रही। यह वही पैटर्न है जो पूरे मामले में बार-बार दोहराया जा रहा है — सबूत मिलते हैं, दावे होते हैं, मगर नतीजा सिफर बना रहता है।
CISF की निगरानी, स्क्रैप का वजन और सवालों का पहाड़
विधायक ने BSP से बाहर निकलने वाले स्क्रैप के वजन और उसके रिकॉर्ड को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि अगर स्क्रैप की निगरानी और वजन की प्रक्रिया वाकई व्यवस्थित थी, तो इतने बड़े पैमाने पर लोहा चोरी संभव ही कैसे हुई। यह सवाल पूरी तरह वाजिब है — आखिर एक संवेदनशील सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम से इतनी बड़ी मात्रा में स्क्रैप बाहर जाता रहा और सुरक्षा एजेंसी CISF की निगरानी व्यवस्था पर कोई सवाल नहीं उठा, यह अपने आप में हैरान करने वाला है।
विधायक ने CISF की निगरानी व्यवस्था और प्लांट से जुड़े अधिकारियों की भूमिका की जांच की मांग भी की है। मगर यहां भी वही पुरानी कहानी दोहराई जा रही है — मांग बड़ी है, दावे बड़े हैं, मगर नाम, दस्तावेज और ठोस सबूत सार्वजनिक करने में उतनी ही “कंजूसी” बरती जा रही है।
लोहा चोरी कांड दिल्ली तक पहुंचा, DGP से लेकर अमित शाह तक चिट्ठियों का दौर
यह लोहा चोरी कांड सिर्फ स्थानीय स्तर तक सीमित नहीं रहा। विधायक रिकेश सेन ने इससे पहले भी इस मुद्दे को लेकर पत्र लिखे थे, और खबरों के अनुसार 20 जुलाई को भेजी गई उनकी शिकायत पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने संज्ञान लेते हुए मामला इस्पात मंत्रालय को भेज दिया। यानी एक विधायक की चिट्ठी, राज्य के गलियारों से होते हुए सीधे दिल्ली दरबार तक जा पहुंची। अब ताज़ा पोस्ट में विधायक ने सीधे DGP को पत्र लिखकर जांच की मांग दोहराई है।
इससे पहले विधानसभा में भी यह मुद्दा गूंज चुका है, जहां विधायक ने 10 हजार करोड़ रुपये से अधिक के लोहे की चोरी का दावा करते हुए पूरे मामले की निष्पक्ष CBI जांच कराने की मांग को लेकर अशासकीय संकल्प तक लाया गया। यानी यह मामला राज्य पुलिस से लेकर केंद्रीय एजेंसियों तक, और स्थानीय राजनीति से लेकर दिल्ली की गलियारों तक, हर जगह गूंज चुका है। मगर हर जगह नतीजा एक ही — जांच “चल रही है”, नाम अब भी “गायब” हैं।
अपनी ही सरकार में अपनों पर सवाल — यह कैसी राजनीति?
सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि यह पूरा मामला किसी विपक्षी नेता की मुहिम नहीं, बल्कि खुद सत्ताधारी दल के विधायक की पहल पर आगे बढ़ रहा है। रिकेश सेन खुद भाजपा के विधायक हैं, और जिस सरकार की पार्टी से वह जुड़े हैं, उसी सरकार के दायरे में आने वाले अधिकारियों — IPS, IAS — की भूमिका पर सवाल उठा रहे हैं। यह स्थिति अपने आप में राजनीतिक रूप से बेहद दिलचस्प है, क्योंकि आम तौर पर सत्ताधारी दल के नेता अपनी ही सरकार के भीतर बैठे अधिकारियों पर सार्वजनिक रूप से सवाल उठाने से बचते हैं। मगर यहां तस्वीर उलट है।
क्या यह विधायक की ईमानदार पहल है, या फिर यह किसी आंतरिक राजनीतिक खींचतान का हिस्सा है, जिसमें एक धड़ा दूसरे धड़े को घेरने के लिए लोहा चोरी के मुद्दे को हथियार बना रहा है — यह सवाल भी अब राजनीतिक गलियारों में तैरने लगा है। पहले भी विधायक रिकेश सेन का यह बयान चर्चा में रहा था कि लोहा चोरी जैसे गंभीर अपराध में शामिल किसी भी व्यक्ति पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए, चाहे वह किसी भी पार्टी या पद से जुड़ा हो, कानून सबके लिए बराबर है। अब देखना यह है कि यह “बराबरी का कानून” सिर्फ भाषणों में रहता है, या असल में उन नामों तक भी पहुंचता है जो अब तक पर्दे के पीछे सुरक्षित हैं।
जांच एजेंसियों की चुप्पी — क्या यह भी लोहे की तरह “गायब” है?
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब विधायक खुद इतने गंभीर आरोप लगा रहे हैं, इतनी बड़ी रकम का दावा कर रहे हैं, तो जांच एजेंसियां इतनी शांत क्यों हैं। क्या जांच एजेंसियां विधायक के दावों को गंभीरता से ले रही हैं, या फिर यह सिर्फ एक और फेसबुक पोस्ट मानकर अनदेखा किया जा रहा है? क्या जांच एजेंसियां विधायक से भी पूछताछ करेंगी कि उन्हें यह जानकारी मिली कहां से, या फिर सिर्फ गिरफ्तार हो चुके भास्कर मुदलियार तक ही जांच सीमित रह जाएगी?
यह सवाल इसलिए भी अहम है क्योंकि अगर विधायक के पास वाकई 4 IPS, 3 IAS और 12 नेताओं की भूमिका से जुड़े ठोस सबूत हैं, तो यह जानकारी छुपाना अपने आप में एक गंभीर मामला है। और अगर नहीं हैं, तो फिर इतने गंभीर आरोप सार्वजनिक मंच पर लगाना भी उतना ही गंभीर सवाल खड़ा करता है। दोनों ही स्थितियों में सवाल विधायक की मंशा पर भी उठता है और सिस्टम की गंभीरता पर भी।
तंज में लिपटा सच — लोहा हल्का, आरोप भारी
इस पूरे प्रकरण को अगर एक लाइन में समेटा जाए, तो कहा जा सकता है — लोहा जितना भारी होता है, उससे कहीं ज्यादा भारी इस मामले में लगे आरोप हैं, मगर उतने ही हल्के हैं इस पर हुई कार्रवाई के कदम। 10 हजार करोड़ की चोरी, 100 से ज्यादा वाहन, 4 IPS, 3 IAS, 12 नेता, ट्रांसपोर्ट यूनियन की वसूली, रसमड़ा की फैक्ट्री, CISF की निगरानी — इतने बड़े-बड़े आंकड़े और आरोप सुनकर लगता है मानो यह किसी बड़े घोटाले की पटकथा है, मगर अंत में हाथ सिर्फ एक गिरफ्तारी और एक फेसबुक पोस्ट लगती है।
सिस्टम की खूबी देखिए — जब चोरी हो रही थी, तब चुप्पी थी। जब गिरफ्तारी हुई, तब पोस्ट आई। जब पोस्ट आई, तब सवाल उठे। और जब सवाल उठे, तब जवाब की जगह फिर से चुप्पी आ गई। यह चक्र इतनी सफाई से चल रहा है कि लगता है जैसे लोहा चोरी की तरह ही, जवाबदेही भी किसी ने काटकर स्क्रैप में बदल दी हो।
लोहा चोरी कांड की जांच होगी या सिर्फ जांच की “जांच”?
फिलहाल पूरे मामले पर निगाहें टिकी हैं कि क्या जांच एजेंसियां विधायक के दावों को गंभीरता से लेते हुए उन 4 IPS, 3 IAS और 12 नेताओं के नाम सामने लाएंगी, या फिर यह मामला भी पुराने मामलों की तरह “जांच जारी है” के बयान में सिमटकर रह जाएगा। भास्कर मुदलियार की गिरफ्तारी के बाद जो सवाल उठे हैं, वे सिर्फ एक व्यक्ति तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की कार्यप्रणाली पर सवाल हैं।
यह लोहा चोरी कांड अब सिर्फ BSP का मामला नहीं रह गया, यह इस बात की परीक्षा बन गया है कि क्या सत्ताधारी दल का अपना विधायक जिस “बराबरी के कानून” की बात करता है, वह वाकई अमल में आता है, या फिर यह सिर्फ एक और मामला बनकर रह जाएगा जिसमें लोहा भी गायब रहेगा और नाम भी गायब रहेंगे। जनता की निगाहें अब इंतज़ार में हैं कि आखिर कब वे नाम सामने आते हैं जिनकी वजह से यह पूरा “लोहा चोरी” कांड अब “नाम चोरी” कांड में तब्दील हो चुका है।

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