रायपुर/बिलासपुर। छत्तीसगढ़ में लंबे समय से चलाई जा रही बाल विवाह के खिलाफ मुहिम को अब वैश्विक स्तर पर पहचान मिल गई है। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 27 नवंबर के दिन को ‘बाल विवाह, कम उम्र और जबरन विवाह के उन्मूलन के लिए अंतरराष्ट्रीय दिवस’ के रूप में मान्यता दे दी है। यह फैसला भारत सहित दुनिया भर में बाल विवाह के खिलाफ चल रहे प्रयासों के लिए एक बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है। खास बात यह है कि इसी तारीख को वर्ष 2024 में भारत सरकार ने ‘बाल विवाह मुक्त भारत’ नाम से एक व्यापक अभियान शुरू किया था, जिसका सीधा असर अब छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में भी साफ नजर आने लगा है।
छत्तीसगढ़ में तीन साल में रुके हजारों बाल विवाह
राज्य में बाल विवाह के खिलाफ चलाई जा रही मुहिम के आंकड़े इस बात की गवाही देते हैं कि जमीनी स्तर पर काम कितनी गंभीरता से किया जा रहा है। पिछले तीन वर्षों के दौरान छत्तीसगढ़ में करीब 8,414 बाल विवाह रुकवाए जाने का दावा किया गया है। यह आंकड़ा दर्शाता है कि प्रदेश में सामाजिक जागरूकता के साथ-साथ प्रशासनिक हस्तक्षेप भी काफी सक्रिय रहा है। बाल विवाह रोकने के इस काम में सामाजिक संगठन ‘जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन’ यानी जेआरसी की भूमिका को अहम माना जा रहा है, जो राज्य के सभी 33 जिलों में आठ अलग-अलग सहयोगी संस्थाओं के साथ मिलकर इस दिशा में काम कर रही है।
जेआरसी ने अपने अभियान में केवल सामाजिक संगठनों तक ही सीमित न रहते हुए इसे व्यापक स्तर पर फैलाने की कोशिश की है। इस मुहिम से स्कूलों, पंचायतों, पुलिस विभाग, धर्मगुरुओं और जनप्रतिनिधियों को भी जोड़ा गया है, ताकि समाज के हर वर्ग तक बाल विवाह के दुष्परिणामों की जानकारी पहुंच सके। माना जा रहा है कि इसी सामूहिक प्रयास का नतीजा है कि छत्तीसगढ़ में बाल विवाह के आंकड़ों में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है।
एनएफएचएस के आंकड़ों में दिखा सुधार, फिर भी राष्ट्रीय औसत से पीछे राज्य
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस) के आंकड़े भी छत्तीसगढ़ में इस दिशा में हो रहे सुधार की पुष्टि करते हैं। एनएफएचएस-5 (2019-21) के सर्वे के दौरान राज्य में 18 वर्ष की आयु से पहले विवाह करने वाली लड़कियों का प्रतिशत 12.1 था। वहीं ताजा एनएफएचएस-6 (2023-24) के सर्वेक्षण में यह आंकड़ा घटकर 10.1 प्रतिशत रह गया है, जो निश्चित रूप से एक सकारात्मक संकेत है। हालांकि, राष्ट्रीय स्तर की तुलना में देखा जाए तो अभी भी काफी अंतर मौजूद है, क्योंकि पूरे देश में बाल विवाह की औसत दर 20.1 प्रतिशत के आसपास बताई गई है। इसका मतलब है कि छत्तीसगढ़ इस मामले में राष्ट्रीय औसत से बेहतर स्थिति में है, लेकिन अभी भी लक्ष्य तक पहुंचने के लिए काफी काम बाकी है।
भारत सरकार ने इस दिशा में एक स्पष्ट रोडमैप तैयार किया है। सरकार का लक्ष्य है कि वर्ष 2026 तक देशभर में बाल विवाह की दर को घटाकर 10 प्रतिशत तक लाया जाए, जबकि 2030 तक इसे पूरी तरह समाप्त करने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय किया गया है। ऐसे में छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में हो रही प्रगति इस राष्ट्रीय लक्ष्य को हासिल करने में मददगार साबित हो सकती है।
भारत की पहल को मिली संयुक्त राष्ट्र की मंजूरी
बाल विवाह के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय दिवस घोषित करने का विचार सबसे पहले जेआरसी के संस्थापक भुवन ऋभु द्वारा प्रस्तावित किया गया था। इस प्रस्ताव को मार्च 2026 में संयुक्त राष्ट्र के समक्ष औपचारिक रूप से रखा गया। इसके बाद सिएरा लियोन ने आगे बढ़कर भारत सहित कुल 67 देशों के समर्थन के साथ यह प्रस्ताव संयुक्त राष्ट्र महासभा में प्रस्तुत किया। लंबे विचार-विमर्श के बाद आखिरकार 4 सितंबर को इस प्रस्ताव को मंजूरी मिल गई, जिसके बाद 27 नवंबर का दिन आधिकारिक रूप से बाल विवाह के उन्मूलन के लिए अंतरराष्ट्रीय दिवस के तौर पर मनाया जाएगा।

इस मंजूरी को भारत की कूटनीतिक और सामाजिक पहल की एक बड़ी सफलता के रूप में देखा जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे न केवल भारत बल्कि दुनिया के अन्य विकासशील देशों में भी बाल विवाह के खिलाफ चलाए जा रहे अभियानों को नई गति मिलेगी।
देशभर में साढ़े पांच लाख से ज्यादा बाल विवाह रुके
जेआरसी की ओर से जारी आंकड़ों के अनुसार, केवल छत्तीसगढ़ ही नहीं बल्कि पूरे देश में पिछले तीन वर्षों के दौरान 5 लाख 50 हजार से भी अधिक बाल विवाह रोके जाने का दावा किया गया है। यह आंकड़ा इस बात को दर्शाता है कि संगठन का यह अभियान कितने बड़े पैमाने पर चलाया जा रहा है। वर्तमान में जेआरसी देश के 782 जिलों में सक्रिय रूप से बाल विवाह के खिलाफ काम कर रहा है, जो इसे भारत के सबसे व्यापक सामाजिक अभियानों में से एक बनाता है।
संगठन का दावा है कि इस अभियान की सफलता का मुख्य कारण जमीनी स्तर पर काम करने वाले कार्यकर्ताओं, स्थानीय प्रशासन और समुदाय के लोगों के बीच बेहतर तालमेल है। स्कूलों और पंचायतों के माध्यम से बच्चों और अभिभावकों दोनों को जागरूक करने की रणनीति को भी काफी कारगर बताया जा रहा है।
25 करोड़ से अधिक लोगों ने ली थी शपथ
जेआरसी के संस्थापक भुवन ऋभु के अनुसार, 27 नवंबर 2024 के दिन देशभर में 25 करोड़ से भी ज्यादा लोगों ने बाल विवाह के खिलाफ न सिर्फ आवाज उठाई, बल्कि सार्वजनिक रूप से शपथ भी ली थी। यह अपने आप में एक रिकॉर्ड माना जा रहा है, जिसने भारत के इस सामाजिक आंदोलन को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने में अहम भूमिका निभाई। ऋभु का यह भी कहना है कि भारत से शुरू हुआ यह अभियान अब सीमाओं को पार करते हुए दुनिया के 99 से अधिक देशों तक अपनी पहुंच बना चुका है।
इसी क्रम में दिसंबर 2024 में पड़ोसी देश नेपाल में भी भारत से प्रेरणा लेते हुए ‘बाल विवाह मुक्त नेपाल’ नाम से एक समानांतर अभियान की शुरुआत की गई थी। इससे यह स्पष्ट होता है कि भारत की यह पहल सिर्फ घरेलू स्तर तक सीमित न रहकर क्षेत्रीय और वैश्विक स्तर पर भी प्रभाव डाल रही है।
100 दिन के विशेष अभियान से मिली नई गति
बाल विवाह के खिलाफ इस मुहिम को और तेज करने के उद्देश्य से जेआरसी ने दिसंबर 2025 से मार्च 2026 तक एक विशेष 100 दिन का अभियान भी संचालित किया था। इस विशेष पहल के तहत संगठन ने दुनिया के 100 देशों और करीब एक लाख स्कूलों तक पहुंचने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया था। इस अभियान के जरिए युवाओं और छात्रों को खासतौर पर लक्षित किया गया, ताकि आने वाली पीढ़ी बाल विवाह जैसी सामाजिक कुरीति के खिलाफ शुरुआत से ही जागरूक रहे।
संयुक्त राष्ट्र – बाल विवाह उन्मूलन दिवस
United Nations – International Day for the Elimination of Child, Early and Forced Marriage
संयुक्त राष्ट्र – International Days की पूरी सूची
United Nations – International Days
संयुक्त राष्ट्र – बालिकाओं के अधिकार और बाल विवाह
UN – International Day of the Girl Child
सामाजिक बदलाव की दिशा में बड़ा कदम
विशेषज्ञों का मानना है कि बाल विवाह जैसी सामाजिक समस्या को केवल कानूनी सख्ती से पूरी तरह खत्म नहीं किया जा सकता, बल्कि इसके लिए समाज की मानसिकता में बदलाव लाना भी उतना ही जरूरी है। छत्तीसगढ़ में चलाए जा रहे इस अभियान में स्कूल, पंचायत, पुलिस और धार्मिक नेताओं को साथ जोड़ने की रणनीति को इसी सोच का हिस्सा माना जा रहा है। जानकारों का कहना है कि जब समाज के अलग-अलग तबकों से जुड़े लोग एक साझा उद्देश्य के लिए काम करते हैं, तभी बाल विवाह जैसी गहरी जड़ें जमा चुकी सामाजिक बुराई को जड़ से खत्म किया जा सकता है।
संयुक्त राष्ट्र की मंजूरी के बाद अब उम्मीद जताई जा रही है कि छत्तीसगढ़ सहित पूरे देश में बाल विवाह के खिलाफ चल रहे अभियानों को नई ऊर्जा और संसाधन दोनों मिलेंगे। सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि यह अंतरराष्ट्रीय पहचान न केवल भारत के प्रयासों को सम्मानित करती है, बल्कि आने वाले वर्षों में बाल विवाह मुक्त भारत के सपने को साकार करने की दिशा में भी एक मील का पत्थर साबित होगी। अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या भारत अपने तय लक्ष्य के अनुसार 2026 तक बाल विवाह की दर को 10 प्रतिशत तक ला पाता है, और 2030 तक इसे पूरी तरह समाप्त करने के संकल्प को पूरा कर पाता है या नहीं।

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