रायपुर। देशभर में मिसाल के तौर पर पेश किया जाने वाला छत्तीसगढ़ का सार्वजनिक वितरण तंत्र इन दिनों खुद अपनी ही खामियों से जूझता नजर आ रहा है। राजधानी रायपुर सहित प्रदेश के कई जिलों से खबरें आ रही हैं कि अगस्त महीने का आवंटित चावल अब तक राशन दुकानों तक नहीं पहुंच पाया है, जिससे लाखों गरीब और जरूरतमंद परिवारों के सामने त्योहारी सीजन में संकट खड़ा हो गया है।
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राशन दुकानों में ताला, हितग्राही खाली हाथ
स्थानीय स्तर पर मिल रही जानकारी के अनुसार, महीना खत्म होने में अब सिर्फ चंद दिन शेष हैं, लेकिन कई सहकारी समितियों में खाद्यान्न भंडार पूरी तरह खाली पड़ा है। समिति संचालकों का कहना है कि उन्हें डर सता रहा है कि यदि समय रहते चावल की आपूर्ति नहीं हुई तो यह पूरा कोटा “लैप्स” घोषित कर दिया जाएगा, यानी जिन परिवारों का हक बनता था, वे इस महीने के अनाज से पूरी तरह वंचित रह जाएंगे।

रक्षाबंधन और भोजली जैसे स्थानीय पर्व-त्योहारों के नजदीक होने के बावजूद प्रशासनिक मशीनरी में हलचल नहीं दिख रही। दुकानों के बाहर रोजाना कतार लगाकर लौटने वाले लोग बताते हैं कि जिम्मेदार अफसरों तक शिकायत पहुंचाने के बावजूद कोई सुनवाई नहीं हो रही। तंग आकर कई समितियों ने अस्थायी रूप से अपनी दुकानों में ताला जड़ना ही बेहतर समझा, ताकि नाराज हितग्राहियों के गुस्से और बहसबाजी की स्थिति से बचा जा सके।
छत्तीसगढ़ खाद्य, नागरिक आपूर्ति एवं उपभोक्ता संरक्षण विभाग
राजधानी में ही लड़खड़ाई राशन व्यवस्था
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि यह अव्यवस्था सिर्फ दूरदराज के इलाकों तक सीमित नहीं, बल्कि खुद राजधानी रायपुर में भी साफ दिखाई दे रही है। सूत्रों की मानें तो जिस इलाके में सत्ताधारी दल का प्रदेश मुख्यालय स्थित है, उसी क्षेत्र की माना बस्ती-कैंप स्थित राशन दुकान में भी हितग्राहियों के विरोध के बाद ताला लगाने की नौबत आ गई। जब सत्ता के केंद्र से चंद कदमों की दूरी पर स्थित व्यवस्था इस हाल में है, तो सुदूर जिलों की स्थिति का अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है।

बताया जा रहा है कि यह सिर्फ रायपुर तक सीमित मामला नहीं है, बल्कि प्रदेश के कई अन्य जिलों में भी इसी तरह की देरी और लापरवाही के चलते हज़ारों क्विंटल चावल को “लैप्स” की श्रेणी में डालकर खुले बाजार में भेजे जाने की आशंका जताई जा रही है। हालांकि इन आरोपों की सच्चाई की पुष्टि प्रशासनिक जांच के बाद ही हो सकेगी।
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माना कैंप की समिति ने की कलेक्टर से शिकायत
इस पूरे प्रकरण में सबसे ठोस उदाहरण के तौर पर रायपुर के माना कैंप क्षेत्र की “ममता सुलभ वस्तु प्राथमिक सहकारी उपभोक्ता भंडार” समिति का मामला सामने आया है। इस समिति ने जिला कलेक्टर को औपचारिक शिकायत सौंपते हुए बताया कि अगस्त 2026 माह के लिए आवंटित करीब 300 क्विंटल चावल अब तक समिति को नहीं मिल पाया है।
समिति पदाधिकारियों का कहना है कि उन्होंने संबंधित अधिकारियों से बार-बार फोन पर संपर्क किया, कई बार स्वयं कार्यालय जाकर स्थिति से अवगत कराया, लेकिन कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला। प्रभारी अधिकारी से लेकर गोदाम प्रबंधन तक हर स्तर पर समस्या बताई गई, बावजूद इसके अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। समिति ने नागरिक आपूर्ति निगम के इस रवैये पर गहरी नाराजगी और आपत्ति जाहिर की है। छत्तीसगढ़ AePDS आधिकारिक पोर्टल

सितंबर के कोटे को लेकर नई उलझन
शिकायत में एक और गंभीर पहलू उठाया गया है। समिति के अनुसार, अगस्त का पुराना बकाया चावल आवंटित किए बिना ही अब सितंबर 2026 महीने के कोटे के आवंटन की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। सवाल यह उठता है कि सितंबर का अनाज अगस्त महीने में कैसे बांटा जाएगा, जबकि इसे लेकर अब तक कोई स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी नहीं हुए हैं।
समिति ने आशंका जताई है कि यदि सितंबर का चावल गलती से अगस्त के हिसाब में बांट दिया गया, तो आगामी महीने में करीब 600 राशन कार्डधारी परिवार अपने हक के अनाज से वंचित हो सकते हैं। इस भ्रम की स्थिति के लिए शिकायत में सीधे तौर पर जिला प्रशासन की जवाबदेही तय करने और जिम्मेदारी कलेक्टर पर डालने की मांग की गई है, साथ ही नागरिक आपूर्ति निगम की भूमिका की भी विस्तृत जांच की मांग उठाई गई है।
आंकड़ों में समझें राशन समस्या की गहराई
अकेले माना कैंप इलाके की एक राशन दुकान में जब 300 क्विंटल चावल की कमी सामने आ रही है, तो सवाल स्वाभाविक रूप से उठता है कि राजधानी रायपुर की करीब 450 उचित मूल्य दुकानों और पूरे प्रदेश की 14 हज़ार से अधिक राशन दुकानों की व्यवस्था वास्तव में किस स्थिति में चल रही होगी। यही आंकड़े अब इस पूरे मसले की गंभीरता को उजागर कर रहे हैं और आने वाले दिनों में और भी शिकायतें सामने आने की आशंका जताई जा रही है।
जिम्मेदारी को लेकर अलग-अलग दावे
स्थानीय स्तर पर कुछ समिति पदाधिकारी और स्थानीय लोग इस पूरी गड़बड़ी के पीछे प्रशासनिक ढांचे में अनुभवहीन अधिकारियों की तैनाती को मुख्य वजह मानते हैं। उनका कहना है कि जिन हाथों में इतनी बड़ी और संवेदनशील व्यवस्था की जिम्मेदारी सौंपी गई है, वे इसके सुचारू संचालन के लिए पर्याप्त अनुभवी नहीं हैं।

वहीं दूसरी ओर, कुछ लोगों का यह भी दावा है कि जानबूझकर मौजूदा सरकार को बदनाम करने की मंशा से इस मुद्दे को हवा दी जा रही है। कुछ पदाधिकारियों ने आरोप लगाया कि इस पूरे प्रकरण में खाद्यान्न कारोबार से जुड़े कुछ तत्वों की भी भूमिका हो सकती है, जो अव्यवस्था का फायदा उठाकर अनाज को बाजार में भेजने की कोशिश में हों। हालांकि, यह सभी दावे अभी अपुष्ट हैं और इनकी सत्यता जांच का विषय है।
त्योहारी सीजन में बढ़ी मुश्किलें
गौरतलब है कि यह पूरा विवाद ऐसे समय पर सामने आया है जब प्रदेश में रक्षाबंधन और भोजली जैसे पारंपरिक त्योहार नजदीक हैं। ऐसे मौकों पर आमतौर पर घरों में विशेष पकवान बनाने और मेहमाननवाजी के लिए अनाज की जरूरत बढ़ जाती है। ऐसे में चावल की अनुपलब्धता ने खासतौर पर उन परिवारों की चिंता बढ़ा दी है जो रोज कमाकर रोज खाने वाले तबके से आते हैं, और जिनके लिए PDS व्यवस्था अब तक एक भरोसेमंद सहारा रही है।

निम्न आय वर्ग के अनेक परिवार बीते कई दिनों से राशन दुकानों के चक्कर काट रहे हैं, लेकिन खाली हाथ लौटने को मजबूर हैं। इनमें से कई लोगों ने खुलेआम प्रशासनिक व्यवस्था और सिस्टम की कार्यप्रणाली पर नाराजगी जताई है।
अवकाश के दिन दब गई शिकायतें
इस पूरे प्रकरण पर जब मीडिया की ओर से प्रशासनिक प्रतिक्रिया लेने का प्रयास किया गया, तो पता चला कि जिस दिन यह मामला तूल पकड़ रहा था, उसी दिन “ईद-ए-मिलाद-उन-नबी” का सार्वजनिक अवकाश होने के कारण संबंधित वरिष्ठ अधिकारी अवकाश पर थे। इस वजह से फिलहाल शासन-प्रशासन की ओर से इस पूरे विवाद पर कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण या बयान सामने नहीं आ पाया है।
उच्चस्तरीय जांच की मांग
पीड़ित समितियों और प्रभावित हितग्राहियों की मुख्य मांग यह है कि पूरे मामले की निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच कराई जाए, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि आखिर चावल आपूर्ति में देरी की असली वजह प्रशासनिक लापरवाही है, तकनीकी अड़चन है, या फिर इसके पीछे कोई और वजह छिपी है। साथ ही, अगस्त और सितंबर महीने के आवंटन में हुई उलझन को लेकर स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करने की भी मांग की जा रही है, ताकि आने वाले महीनों में हितग्राही अपने हक के अनाज से वंचित न रहें।
फिलहाल पूरे मामले पर सरकारी महकमे की चुप्पी बनी हुई है, लेकिन जिस तरह राजधानी से लेकर दूरदराज के जिलों तक शिकायतें सामने आ रही हैं, उससे साफ है कि छत्तीसगढ़ के सराहे गए PDS मॉडल की असल जमीनी हकीकत को लेकर आने वाले दिनों में और भी खुलासे हो सकते हैं। प्रशासन की जांच रिपोर्ट ही यह तय करेगी कि यह चूक तकनीकी थी, प्रबंधकीय थी, या इसके पीछे कोई गहरी लापरवाही छिपी हुई थी।

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