बिलासपुर/ रायपुर. छत्तीसगढ़ की न्यायपालिका इन दिनों पूरी तरह चौकस मोड में आ गई है। सांसदों और विधायकों जैसे जनप्रतिनिधियों से जुड़े आपराधिक मामलों की सुनवाई अब रफ्तार पकड़ती नजर आ रही है, और इसकी वजह है खुद हाईकोर्ट का सीधा हस्तक्षेप। बिलासपुर स्थित छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने प्रदेश की निचली अदालतों में लंबित जनप्रतिनिधियों से संबंधित प्रकरणों की एक विस्तृत, अपडेटेड और चौंकाने वाली स्टेटस रिपोर्ट जारी की है। इस रिपोर्ट ने साफ कर दिया है कि किसी भी जनप्रतिनिधि को अब कानून से बचने की मोहलत नहीं मिलेगी।

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यह रिपोर्ट सिर्फ कागजी कार्रवाई नहीं है, बल्कि इसे न्याय व्यवस्था की सतर्कता का बड़ा सबूत माना जा रहा है। बिलासपुर, रायपुर, बलौदाबाजार, जांजगीर-चांपा, कबीरधाम और राजनांदगांव – इन छह जिलों की अदालतों में जनप्रतिनिधियों के खिलाफ दर्ज मामलों की मौजूदा स्थिति, सुनवाई का चरण और आगे की न्यायालयीन प्रक्रिया को लेकर पूरी तस्वीर अब सबके सामने आ चुकी है।
आखिर क्यों जरूरी हो गई जनप्रतिनिधियों स्टेटस रिपोर्ट?
सवाल यह उठता है कि आखिर हाईकोर्ट को जनप्रतिनिधियों के मामलों की अलग से निगरानी क्यों करनी पड़ रही है? दरअसल, माननीय सर्वोच्च न्यायालय के स्पष्ट निर्देशों के तहत देशभर में जनप्रतिनिधियों से जुड़े आपराधिक मामलों के त्वरित निपटारे की व्यवस्था लागू की गई है। इसी कड़ी में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट भी लगातार सक्रिय भूमिका निभा रहा है। मकसद साफ है – जनप्रतिनिधि चाहे किसी भी दल या पद से जुड़ा हो, उसके खिलाफ दर्ज मामले फाइलों में दबकर सालों-साल न लटके रहें।
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट – MP/MLA Cases Status Report 2026
MP/MLA Cases List 2026 – छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट
जनप्रतिनिधियों के मामलों में देरी को लेकर लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं। आम जनता के मन में अक्सर यह धारणा बनती है कि सत्ता और रसूख वाले जनप्रतिनिधि अदालती प्रक्रिया को लंबा खींचकर मामलों को ठंडे बस्ते में डलवा देते हैं। इसी धारणा को तोड़ने और न्यायिक पारदर्शिता को मजबूत करने के लिए हाईकोर्ट ने यह कड़ा कदम उठाया है। जनप्रतिनिधियों से जुड़े हर मामले की अब बकायदा मॉनिटरिंग हो रही है और समय-समय पर स्टेटस रिपोर्ट तलब की जा रही है।
रायपुर बना जनप्रतिनिधियों के मामलों का सबसे बड़ा केंद्र
स्टेटस रिपोर्ट के आंकड़े देखकर सबसे पहली बात जो सामने आती है, वह यह कि प्रदेश की राजधानी रायपुर में जनप्रतिनिधियों से जुड़े सबसे ज्यादा आपराधिक प्रकरण लंबित हैं। यहां की विशेष अदालतों में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, मनी लॉन्ड्रिंग और सामान्य आपराधिक धाराओं के तहत दर्ज दर्जनों मामलों की सुनवाई चल रही है।

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रायपुर में एसीबी (एंटी करप्शन ब्यूरो), ईडी (प्रवर्तन निदेशालय) और सीबीआई से जुड़ी विशेष अदालतों में कई हाई-प्रोफाइल जनप्रतिनिधियों के मामले विचाराधीन हैं। प्रिवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट के तहत दर्ज इन प्रकरणों पर पूरे प्रदेश की निगाहें टिकी हुई हैं, क्योंकि इनसे जुड़े फैसले आने वाले समय में प्रदेश की राजनीति की दिशा तय कर सकते हैं।
कवासी लखमा प्रकरण सुर्खियों में
रायपुर की विशेष अदालत में सबसे चर्चित मामला विधायक कवासी लखमा से जुड़ा हुआ है। इनके खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम और मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े गंभीर आरोप दर्ज हैं, जिनकी सुनवाई विशेष अदालत में प्रक्रियाधीन है। यह मामला इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्योंकि इसमें जांच एजेंसियों की सक्रियता लगातार बनी हुई है और हाईकोर्ट की निगरानी के चलते अब इसमें कोई भी अनावश्यक देरी होने की गुंजाइश कम होती जा रही है।
इसके अलावा देवेंद्र सिंह यादव और चंद्रदेव प्रसाद राय सहित कई अन्य जनप्रतिनिधियों से जुड़े प्रकरण भी रायपुर की अलग-अलग अदालतों में दर्ज हैं और अलग-अलग चरणों में विचाराधीन हैं। इन तमाम मामलों को लेकर हाईकोर्ट की सख्ती साफ झलक रही है, क्योंकि जनप्रतिनिधियों से जुड़ा हर मामला अब निगरानी सूची में शामिल कर लिया गया है।
न्यायधानी बिलासपुर में विधायक अटल श्रीवास्तव का मामला तेज गति से आगे
छत्तीसगढ़ की न्यायधानी बिलासपुर भी जनप्रतिनिधियों से जुड़े मामलों को लेकर चर्चा में है। यहां मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट यानी सीजेएम की अदालत में कोटा से विधायक अटल श्रीवास्तव से संबंधित आपराधिक मामला प्रक्रियाधीन है।

यह मामला अपराध क्रमांक 541/2026 के तहत दर्ज किया गया है। इसमें भारतीय न्याय संहिता यानी बीएनएस की धारा 190, 191(2), 192 और 126(2) के तहत कार्रवाई चल रही है। रिपोर्ट के मुताबिक अदालत में इस मामले से जुड़ी जरूरी न्यायिक प्रक्रियाएं काफी तेजी से आगे बढ़ रही हैं, जिससे यह संकेत मिलता है कि जनप्रतिनिधि होने के बावजूद किसी को भी विशेष रियायत नहीं दी जा रही है।
बिलासपुर की इस अदालत में हो रही तेज कार्रवाई को कानूनी हलकों में एक सकारात्मक संकेत के तौर पर देखा जा रहा है। जनप्रतिनिधियों से जुड़े मामलों में जिस तरह की तेजी अपेक्षित होती है, उसी दिशा में यह मामला आगे बढ़ता दिख रहा है।
जनप्रतिनिधियों के कारनामों से बलौदाबाजार, जांजगीर-चांपा और कबीरधाम में भी हलचल तेज
सिर्फ रायपुर और बिलासपुर ही नहीं, बल्कि प्रदेश के अन्य जिलों की निचली अदालतों में भी जनप्रतिनिधियों के खिलाफ दर्ज मामलों में सुनवाई अलग-अलग चरणों पर जारी है।
बलौदाबाजार में कई नेताओं के मामले लंबित
बलौदाबाजार जिले की तृतीय अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश यानी एडीजे कोर्ट और सीजेएम कोर्ट में कई जनप्रतिनिधियों के मामले लंबित बताए जा रहे हैं। इनमें तत्कालीन विधायक किशोर नवरंग, वर्तमान विधायक देवेंद्र यादव और पूर्व विधायक प्रमोद शर्मा सहित अन्य नेताओं के प्रकरण शामिल हैं। यह सभी मामले फिलहाल अलग-अलग चरणों में हैं और हाईकोर्ट की निगरानी सूची में दर्ज हैं।
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जांजगीर-चांपा में अभियोजन साक्ष्य के चरण में पहुंचे मामले
जांजगीर-चांपा जिला अदालत में दर्ज जनप्रतिनिधियों से जुड़े कई प्रकरण अब अभियोजन पक्ष के साक्ष्य यानी प्रॉसिक्यूशन एविडेंस के महत्वपूर्ण चरण में पहुंच चुके हैं। कानूनी विशेषज्ञों के मुताबिक यह चरण किसी भी मामले के लिए काफी अहम होता है, क्योंकि इसी के आधार पर आगे का फैसला तय होता है। यह प्रगति इस बात का संकेत है कि जनप्रतिनिधियों से जुड़े मामलों में अब वाकई रफ्तार आ रही है।
कबीरधाम में धरना-प्रदर्शन से जुड़े मामले
कबीरधाम जिले की सीजेएम कोर्ट में जनप्रतिनिधियों के खिलाफ दर्ज मामले मुख्य रूप से धरना-प्रदर्शन, आंदोलन और शासकीय कार्य में बाधा पहुंचाने जैसे आरोपों से जुड़े हुए हैं। यह मामले भी वर्तमान में विचाराधीन हैं और इन पर भी हाईकोर्ट की पैनी नजर बनी हुई है।
राजनांदगांव में पूर्व सांसद मधुसूदन यादव के मामलों पर क्यों लगी रोक?
अब बात करते हैं राजनांदगांव जिले की, जहां का मामला बाकी जिलों से थोड़ा अलग और दिलचस्प है। यहां जिला न्यायालय की विशेष अदालत में पूर्व सांसद मधुसूदन यादव और उनके सहयोगियों के खिलाफ सीजीपीडीआई एक्ट के तहत छह अलग-अलग प्रकरण दर्ज हैं।
लेकिन इन मामलों में फिलहाल निचली अदालत में सुनवाई पर रोक यानी स्टे लगा हुआ है। रिपोर्ट के अनुसार यह मामला सर्वोच्च न्यायालय में लंबित होने के चलते हाईकोर्ट के पूर्व में जारी दिशा-निर्देशों के तहत यह स्थगन प्रभावी बना हुआ है। जाहिर है, जब तक सुप्रीम कोर्ट में इस मामले पर कोई स्पष्ट फैसला नहीं आता, तब तक राजनांदगांव की निचली अदालत में इन जनप्रतिनिधि से जुड़े प्रकरणों की सुनवाई शुरू नहीं हो पाएगी।
यह स्थिति दिखाती है कि हर जनप्रतिनिधि से जुड़ा मामला एक जैसी गति से आगे नहीं बढ़ता। कहीं प्रक्रिया तेज है तो कहीं ऊंची अदालत के आदेशों की वजह से मामला ठहरा हुआ है। बावजूद इसके, हाईकोर्ट की निगरानी यह सुनिश्चित कर रही है कि कोई भी मामला बिना वजह लंबित न रहे। सांसद भोजराज नाग ने नींबू काटकर रोकी बारिश! अब जनता मांग रही शक्कर और सिलेंडर वाला नींबू!
हाईकोर्ट की सख्त निगरानी से क्या बदलाव आएगा?
अब बड़ा सवाल यह है कि आखिर हाईकोर्ट की इस सख्त निगरानी का असल में क्या असर पड़ेगा? माननीय उच्चतम न्यायालय के निर्देशों के तहत देशभर में जनप्रतिनिधियों के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामलों को जल्द से जल्द निपटाने के लिए विशेष निगरानी व्यवस्था लागू की गई है। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट द्वारा समय-समय पर जारी की जा रही इस तरह की अपडेटेड रिपोर्ट से न्यायिक प्रक्रिया में पारदर्शिता आती है और जिला अदालतों में मामलों के निपटारे में तेजी आती है।
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट
High Court of Chhattisgarh
जब किसी भी जनप्रतिनिधि के मामले की स्थिति सार्वजनिक रूप से सामने आती है, तो इससे संबंधित अदालतों पर भी एक स्वाभाविक जिम्मेदारी का दबाव बनता है। यही वजह है कि इस तरह की स्टेटस रिपोर्ट को न्यायिक जवाबदेही और पारदर्शिता की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।
जनप्रतिनिधि बनाम आम नागरिक – कानून की नजर में कोई फर्क नहीं
इस पूरी रिपोर्ट से एक बात बिल्कुल साफ हो जाती है कि चाहे कोई सांसद हो, विधायक हो, पूर्व विधायक हो या पूर्व सांसद – कानून की नजर में हर जनप्रतिनिधि बराबर है। भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम हो, मनी लॉन्ड्रिंग का मामला हो, धरना-प्रदर्शन से जुड़ी धाराएं हों या शासकीय कार्य में बाधा डालने के आरोप – हर जनप्रतिनिधि को अदालती प्रक्रिया से गुजरना ही होगा।
बिलासपुर, रायपुर, बलौदाबाजार, जांजगीर-चांपा, कबीरधाम और राजनांदगांव – इन छह जिलों की अदालतों से मिली जानकारी यह दर्शाती है कि जनप्रतिनिधियों से जुड़े मामलों में अब देरी की गुंजाइश लगातार कम होती जा रही है। जनप्रतिनिधियों को लेकर बनी यह सख्ती आम जनता के भरोसे को भी मजबूत करने वाली मानी जा रही है।
जनप्रतिनिधियों के मामलों पर टिकी रहेंगी सबकी निगाहें
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की इस स्टेटस रिपोर्ट के बाद यह तय माना जा रहा है कि आने वाले समय में जनप्रतिनिधियों से जुड़े मामलों की सुनवाई में और तेजी देखने को मिलेगी। जिन जनप्रतिनिधियों के मामले अभी शुरुआती चरण में हैं, उनकी सुनवाई भी जल्द आगे बढ़ने की उम्मीद जताई जा रही है, वहीं जिन मामलों में साक्ष्य का चरण पूरा होने वाला है, वहां जल्द फैसला आने की संभावना बन रही है।
राजनांदगांव जैसे मामलों में जहां ऊंची अदालत के आदेश की वजह से रोक लगी हुई है, वहां भी सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद स्थिति स्पष्ट होने की उम्मीद है। कुल मिलाकर, छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की यह पहल जनप्रतिनिधियों से जुड़े आपराधिक मामलों को लेकर एक नई मिसाल कायम करती नजर आ रही है, जहां न तो पद देखा जा रहा है और न ही रसूख – सिर्फ कानून और प्रक्रिया को प्राथमिकता दी जा रही है।
यह साफ है कि जनप्रतिनिधियों से जुड़े मामलों में अब लीपापोती की गुंजाइश खत्म होती जा रही है और छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की यह सक्रियता आने वाले समय में एक नजीर बन सकती है, जिसका अनुसरण अन्य राज्यों की अदालतें भी कर सकती हैं।

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