raipur. मध्य प्रदेश की डीएसपी नेहा पचीसिया के खिलाफ राज्य के मुख्यमंत्री के सीधे हस्तक्षेप के बाद हुई कड़ी कार्रवाई ने एक बार फिर छत्तीसगढ़ की निलंबित DSP कल्पना वर्मा के मामले को चर्चा में ला दिया है। मध्य प्रदेश में जहां कार्रवाई तेजी से हुई, वहीं छत्तीसगढ़ में डीएसपी कल्पना वर्मा का मामला छह महीने से अधिक समय से लंबित पड़ा है। बताया जा रहा है कि नेहा पचीसिया पर कार्रवाई तो हो गई, लेकिन वे फिलहाल फरार बताई जा रही हैं।
दूसरी ओर छत्तीसगढ़ में निलंबित DSP कल्पना वर्मा को अभी तक न तो आरोप-पत्र दिया गया है और न ही विभागीय जांच के लिए बुलाया गया है। नियमों के अनुसार यह प्रक्रिया छह महीने के भीतर पूरी होनी चाहिए, ताकि आगे एफआईआर दर्ज करने का रास्ता साफ हो सके। लेकिन इस निर्धारित समय-सीमा के बीत जाने के बावजूद अभी तक इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है।

मध्य प्रदेश के डीएसपी नेहा पचीसिया से जुड़े मामले की विस्तृत जानकारी यहां पढ़ें: Neha Pachisia Case Report
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आर्थिक अनियमितता और सूचना लीक करने जैसे संगीन आरोप
यह मामला छत्तीसगढ़ पुलिस विभाग की एक वरिष्ठ महिला अधिकारी से जुड़ा है, जिन पर एक कारोबारी ने गंभीर आर्थिक अनियमितता और सूचना लीक करने जैसे संगीन आरोप लगाए हैं। मामले की गंभीरता को देखते हुए विभागीय स्तर पर जांच भी हुई और उसमें आरोपों की पुष्टि भी हुई, लेकिन इसके बावजूद आगे की कार्रवाई ठप पड़ी हुई है।
DSP कल्पना वर्मा के साथ नजदीकी संबंध रखने वाले कारोबारी दीपक टंडन ने इस पूरे प्रकरण में शिकायतकर्ता की भूमिका निभाई है। उनका आरोप है कि प्रशासन के कुछ वरिष्ठ अधिकारी डीएसपी कल्पना वर्मा को बचाने के प्रयास में जुटे हुए हैं।
शिकायतकर्ता दीपक टंडन का आरोप और मांग
टंडन के अनुसार, इस मामले से जुड़ी फाइल मंत्रालय में अटकी हुई है और अब तक इस मामले की जांच के लिए किसी जांच अधिकारी की नियुक्ति तक नहीं हो सकी है। मामले की स्थिति जानने के लिए दीपक टंडन ने सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत आवेदन भी दायर किया था। हालांकि, उन्हें इस आवेदन पर भी कोई संतोषजनक जानकारी नहीं दी गई।

टंडन की मुख्य मांग है कि डीएसपी कल्पना वर्मा को जल्द से जल्द आरोप-पत्र सौंपकर विभागीय जांच (डिपार्टमेंटल इन्क्वायरी) शुरू की जाए, ताकि इसके बाद एफआईआर दर्ज करने की प्रक्रिया आगे बढ़ सके।
उन्होंने इस संदर्भ में एक सीधा सवाल भी उठाया है कि जब मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री के निर्देश पर एक महिला डीएसपी के खिलाफ कड़ी और त्वरित कार्रवाई हो सकती है, तो छत्तीसगढ़ में इस मामले में अब तक देरी क्यों हो रही है और आखिर भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी पुलिस अधिकारी को कौन बचाने का प्रयास कर रहा है।
आरोपों की पृष्ठभूमि: कारोबारी और DSP कल्पना वर्मा के बीच संबंध
इस पूरे प्रकरण की जड़ में कारोबारी दीपक टंडन और डीएसपी कल्पना वर्मा के बीच का व्यक्तिगत संबंध है। दस्तावेजों के अनुसार दोनों की मुलाकात वर्ष 2021 में हुई थी, जिसके बाद दोनों के बीच नजदीकी संबंध विकसित हुए। यह संबंध आगे चलकर एक कथित प्रेम-प्रसंग में बदल गया, जिसे बाद में टंडन ने अपनी शिकायत का आधार बनाया।

दीपक टंडन ने पुलिस महानिदेशक को एक लिखित शिकायत सौंपी थी, जिसमें उन्होंने कई गंभीर आरोप लगाए। उनका पहला आरोप यह है कि डीएसपी कल्पना वर्मा ने उनका भावनात्मक शोषण करते हुए उनसे लगभग दो करोड़ रुपये की राशि ऑनलाइन माध्यम से अपने खाते में स्थानांतरित करवाई। इसके अतिरिक्त, उन्होंने आरोप लगाया कि डीएसपी वर्मा ने उपहार के रूप में एक हीरे की अंगूठी, सोने की एक चेन और लगभग 22 लाख रुपये मूल्य की एक गाड़ी भी उनसे प्राप्त की।
शिकायत में एक और महत्वपूर्ण आरोप शामिल है, जिसके अनुसार डीएसपी कल्पना वर्मा ने दीपक टंडन से एक होटल परियोजना में लगभग 30 लाख रुपये का निवेश करवाया। यह होटल कथित तौर पर डीएसपी वर्मा के भाई के नाम पर पंजीकृत है। आरोप के मुताबिक इस निवेश की राशि सीधे डीएसपी के पिता हेमंत वर्मा के बैंक खाते में स्थानांतरित की गई थी। शिकायत में यह भी बताया गया है कि बाद में डीएसपी कल्पना वर्मा ने इस होटल को किराए पर दे दिया, जिससे उन्हें अतिरिक्त आय होने लगी।
नक्सल मूवमेंट संबंधी जानकारी लीक करने का गंभीर आरोप
आर्थिक अनियमितताओं के आरोपों के अलावा, दीपक टंडन ने डीएसपी कल्पना वर्मा पर एक अत्यंत गंभीर और संवेदनशील आरोप भी लगाया है। उनका कहना है कि डीएसपी वर्मा ने नक्सल मूवमेंट से संबंधित गोपनीय जानकारी लीक की। इस आरोप के समर्थन में टंडन ने वाट्सएप चैट के स्क्रीनशॉट के रूप में सबूत भी प्रस्तुत किए हैं।
यह आरोप इसलिए विशेष रूप से गंभीर माना जा रहा है क्योंकि नक्सल विरोधी अभियानों से जुड़ी गोपनीय सूचना का लीक होना पुलिस बल की सुरक्षा और अभियानों की सफलता के लिए सीधा खतरा माना जाता है। टंडन के अनुसार, इस तरह की संवेदनशील जानकारी के लीक होने से मैदान में तैनात जवानों की जान को खतरा हो सकता है और इसी वजह से अतीत में कई बार जवानों की शहादत भी हुई है। टंडन का कहना है कि यह पुलिस नियमावली का सीधा और गंभीर उल्लंघन है, फिर भी इस विशिष्ट आरोप की अलग से कोई जांच अभी तक शुरू नहीं हो पाई है।
टंडन ने अपनी शिकायत में यह मांग भी उठाई है कि डीएसपी कल्पना वर्मा के पास मौजूद उनकी संपत्तियां — जिसमें 22 लाख रुपये मूल्य की कार, हीरे की अंगूठी, सोने की चेन और होटल में किया गया निवेश शामिल है — उन्हें जल्द से जल्द वापस लौटाई जाएं।
आईजी अमरेश मिश्रा की जांच और रिपोर्ट का ब्योरा
दीपक टंडन की शिकायत मिलने के बाद पुलिस महानिदेशक ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए वरिष्ठ पुलिस अधिकारी आईजी अमरेश मिश्रा को इसकी जांच सौंपी थी। आईजी मिश्रा ने इस मामले की विस्तृत जांच की और निर्धारित समय के भीतर अपनी रिपोर्ट तैयार की।
जनवरी 2026 में आईजी अमरेश मिश्रा ने अपनी जांच रिपोर्ट मंत्रालय को सौंपी। यह रिपोर्ट कुल 1482 पृष्ठों की थी, जो इस बात को दर्शाती है कि जांच में विस्तृत दस्तावेजीकरण और साक्ष्य संकलन किया गया। रिपोर्ट में डीएसपी कल्पना वर्मा के खिलाफ लगाए गए आरोपों को प्रथम दृष्टया सही पाया गया। इसके साथ ही रिपोर्ट में उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई किए जाने की स्पष्ट अनुशंसा भी की गई।

DSP कल्पना वर्मा को उनके पद से निलंबित कर दिया गया। यह पहला औपचारिक कदम था जो प्रशासन की ओर से उठाया गया। हालांकि, नियमानुसार निलंबन के बाद अगला चरण यह होता है कि संबंधित अधिकारी को छह महीने के भीतर आरोप-पत्र सौंपा जाए और औपचारिक विभागीय जांच के लिए बुलाया जाए। यह प्रक्रिया इसलिए महत्वपूर्ण मानी जाती है क्योंकि इसके पूरा होने के बाद ही आपराधिक मामले में एफआईआर दर्ज करने का रास्ता खुलता है।
लेकिन दस्तावेजों के अनुसार, निलंबन के छह महीने से अधिक समय बीत जाने के बावजूद न तो डीएसपी कल्पना वर्मा को आरोप-पत्र सौंपा गया है और न ही उन्हें विभागीय जांच के लिए औपचारिक रूप से बुलाया गया है। इस देरी के कारण एफआईआर दर्ज करने की प्रक्रिया भी आगे नहीं बढ़ पाई है।
सूचना के अधिकार आवेदन और प्रशासनिक चुप्पी
अपनी शिकायत पर हो रही कार्रवाई की स्थिति जानने के लिए दीपक टंडन ने सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत आधिकारिक आवेदन दायर किया था। इस आवेदन के माध्यम से उन्होंने यह जानने का प्रयास किया कि आईजी की जांच रिपोर्ट मिलने के बाद मंत्रालय स्तर पर मामले में क्या प्रगति हुई है, आरोप-पत्र कब सौंपा जाएगा, और जांच अधिकारी की नियुक्ति कब तक होगी।
हालांकि टंडन के अनुसार, इस आरटीआई आवेदन के जरिए भी उन्हें अपेक्षित जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई। इससे यह संकेत मिलता है कि मामले से जुड़ी फाइल पर आगे की कार्रवाई को लेकर प्रशासनिक स्तर पर स्पष्टता या पारदर्शिता की कमी है।
DSP कल्पना वर्मा तबादले की कोशिश से जुड़ी जानकारी
सूत्रों के हवाले से यह भी सामने आया है कि प्रशासन के कुछ वरिष्ठ अधिकारी DSP कल्पना वर्मा को इस मामले में राहत दिलाने के प्रयास में सक्रिय हैं। सूत्रों के अनुसार, इन अधिकारियों की कोशिश है कि किसी तरह डीएसपी वर्मा का निलंबन समाप्त कर दिया जाए और उनका तबादला करा दिया जाए। यदि ऐसा होता है, तो इसका सीधा अर्थ यह होगा कि जिस मामले में जांच रिपोर्ट में आरोप सही पाए गए थे, उसमें आगे कोई ठोस कार्रवाई होने के बजाय संबंधित अधिकारी को नई पोस्टिंग पर भेज दिया जाएगा।
मध्य प्रदेश के मामले से तुलना
इस पूरे प्रकरण को समझने के लिए मध्य प्रदेश में हुई घटना का उल्लेख जरूरी है, जो इस मामले के दोबारा चर्चा में आने की सीधी वजह बनी। मध्य प्रदेश में भी एक महिला पुलिस अधिकारी पर भ्रष्टाचार से जुड़े गंभीर आरोप लगे थे। इस मामले में राज्य के मुख्यमंत्री ने स्वयं संज्ञान लिया और उनके निर्देश पर संबंधित महिला डीएसपी नेहा पचीसिया के खिलाफ त्वरित और कड़ी कार्रवाई की गई। हालांकि रिपोर्ट के अनुसार, कार्रवाई के बावजूद डीएसपी नेहा पचीसिया अभी भी फरार बताई जा रही हैं।
इस तुलनात्मक संदर्भ के आधार पर ही शिकायतकर्ता दीपक टंडन ने यह सवाल उठाया है कि जब एक राज्य में मुख्यमंत्री स्तर से हस्तक्षेप कर मामले में तेजी लाई जा सकती है, तो दूसरे राज्य में समान प्रकृति के आरोपों वाले मामले में इतनी देरी क्यों हो रही है।
DSP कल्पना वर्मा का पक्ष
इस पूरे मामले पर डीएसपी कल्पना वर्मा का पक्ष जानने के लिए उनसे संपर्क करने का प्रयास किया गया। वे इस विषय पर बात करने के लिए उपलब्ध नहीं हो सकीं, जिसके चलते उनकी ओर से इन आरोपों पर अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
मामले की वर्तमान स्थिति
DSP कल्पना वर्मा को आर्थिक अनियमितता और नक्सल संबंधी जानकारी लीक करने के आरोपों में विभागीय जांच के बाद निलंबित किया जा चुका है। जांच रिपोर्ट में आरोपों को प्रथम दृष्टया सही पाया गया है, लेकिन निलंबन के छह महीने से अधिक समय बीत जाने के बाद भी आरोप-पत्र देने और औपचारिक जांच के लिए बुलाने जैसी अगली प्रक्रियात्मक कार्रवाई नहीं हो सकी है। इस देरी के कारण एफआईआर दर्ज करने का रास्ता भी अभी तक नहीं खुल पाया है। शिकायतकर्ता दीपक टंडन लगातार इस मामले में तेजी लाने की मांग कर रहे हैं और उन्होंने अपनी संपत्तियां वापस दिलाए जाने की भी अपील की है। वहीं सूत्रों के अनुसार प्रशासनिक स्तर पर डीएसपी वर्मा के तबादले की कोशिशें भी जारी बताई जा रही हैं।
