कीमत आसमान पर, फिर भी खेत में मेहनत करने वाला खाली हाथ क्यों?
बाजार में प्याज की कीमत जिस रफ्तार से बढ़ रही है, उसी रफ्तार से यह सवाल भी उठ रहा है कि आखिर इस महंगाई का फायदा जाता किसके पास है। एक तरफ ग्राहक परेशान है, रसोई का बजट बिगड़ रहा है, दूसरी तरफ खेत में दिन-रात मेहनत करने वाला किसान बता रहा है कि उसकी जेब में मुश्किल से 10 रुपए किलो ही बच पाता है। बीच का यह पूरा फासला कहां जाता है, यही इस खबर की असली पड़ताल है।

पहले जानिए किसान की सच्चाई, फिर समझिए बाजार का खेल
भारतीय किसान संघ के संभागीय उपाध्यक्ष भानु प्रताप सिंह ने इस पूरे मामले पर एक ऐसी बात बताई, जो आमतौर पर सुर्खियों में नहीं आती। उनके मुताबिक एक एकड़ जमीन में प्याज उगाने के लिए किसान को करीब 25 से 30 हजार रुपए की लागत झेलनी पड़ती है। यह आंकड़ा भी तब का है जब मौसम पूरी तरह अनुकूल रहे। मौसम बिगड़ने पर यह लागत और बढ़ भी सकती है, क्योंकि डीजल, खाद, बीज, मजदूरी और दवाइयां जैसी तमाम चीजें किसान की जेब पर सीधा असर डालती हैं।
इस पूरी लागत को जोड़ने के बाद जो हिसाब निकलता है, वह चौंकाने वाला है। भानु प्रताप सिंह के अनुसार एक किलो प्याज उगाने में किसान को खेत से ही लगभग 7 से 8 रुपए की लागत आती है। इतनी मेहनत और खर्च के बाद जब किसान अपनी फसल बेचने मंडी पहुंचता है, तो उसे 10 से 15 रुपए किलो तक का ही दाम मिल पाता है। यानी पूरे सीजन की मेहनत के बदले किसान के हाथ मुश्किल से 7 से 8 रुपए प्रति किलो का ही मुनाफा लगता है। ज्यादा से ज्यादा यह मुनाफा 10 रुपए किलो तक ही पहुंच पाता है।
पैसा जाता कहां है?
अब सवाल यह है कि जब बाजार में यही प्याज 60 रुपए किलो के भाव पर बिक रहा है, तो बाकी का पैसा जाता कहां है? इस सवाल का जवाब भी किसान नेता ने बेबाकी से दिया। उनके मुताबिक किसान के पास इतना वक्त ही नहीं होता कि वह खुद मंडी में दुकान लगाकर अपनी उपज बेचे, क्योंकि तब उसके खेत का काम कौन देखेगा। इसी वजह से किसान अपनी पूरी फसल एक साथ मंडी में उतार देता है, और वहां थोक भाव में उसे ज्यादा से ज्यादा 20 से 30 रुपए किलो तक का ही दाम मिल पाता है। यह मौका भी सिर्फ उन्हीं किसानों को मिलता है, जिनके पास फसल को कुछ समय रोककर रखने की सुविधा हो, या जिनके पास कोल्ड स्टोरेज उपलब्ध हो।
किसान के हाथ 10 से 12 रुपए प्रति किलो का ही मुनाफा
छोटे और मझोले किसानों की स्थिति इससे भी ज्यादा मुश्किल है। भानु प्रताप सिंह बताते हैं कि इन किसानों के पास तो अक्सर प्याज बचता ही नहीं, क्योंकि प्याज को लंबे समय तक सही सलामत रखना अपने आप में एक कठिन काम है। यही वजह है कि ज्यादातर किसान अपनी उपज तुरंत बेच देना ही बेहतर समझते हैं। जो किसान इसे कुछ समय रोककर रखते भी हैं, उनका भी कुछ हिस्सा सूखने या खराब होने की वजह से बर्बाद हो जाता है। आखिर में किसान के हाथ 10 से 12 रुपए प्रति किलो का ही मुनाफा लग पाता है।

जब उनसे पूछा गया कि फिर इस महंगाई का असली फायदा किसे मिलता है, तो उन्होंने सीधा जवाब दिया कि जिनके पास न खुद का खेत है, न हल है और न बैल हैं, यानी बिचौलिए, व्यापारी, आढ़तिए, ट्रेडर्स और स्टॉकिस्ट ही इसका पूरा लाभ उठाते हैं। उनके मुताबिक किसान के साथ यही होता आया है, चाहे बाजार में प्याज की कीमत कितनी भी ऊपर क्यों न चली जाए।
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अब बात बाजार की: 15 से सीधे 60 पर पहुंचा प्याज
किसान की इस मजबूरी को समझने के बाद अब बाजार का हाल भी जान लीजिए, जहां प्याज ने रॉकेट जैसी रफ्तार पकड़ ली है। शहडोल की सब्जी मंडी में सामान खरीदने पहुंचीं शीतल गुप्ता का कहना है कि इन दिनों लगभग हर सब्जी महंगी हुई है, लेकिन प्याज के दाम में जो उछाल आया है, वह हैरान करने वाला है। उनके अनुसार कुछ दिन पहले तक प्याज 40 से 45 रुपए किलो के भाव पर मिल रहा था, लेकिन अचानक यह बढ़कर 60 रुपए किलो तक जा पहुंचा। शीतल गुप्ता का कहना है कि इस अचानक हुई बढ़ोतरी ने उनके घर का पूरा रसोई बजट बिगाड़ दिया है।
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रेलवे सब्जी मंडी में खरीदारी करने पहुंचे बृजेश सिरमौर ने भी यही परेशानी बताई। उनके मुताबिक कुछ समय पहले तक प्याज 15 से 25 रुपए किलो के आसपास बिकता था। बीते एक महीने में यह धीरे-धीरे बढ़कर 30 से 40 रुपए तक पहुंचा, और अब अचानक यह 60 रुपए किलो के पार निकल गया है। बृजेश सिरमौर के मुताबिक यह हालात भविष्य के लिए ठीक संकेत नहीं दे रहे। उनका कहना है कि जब सावन में ही प्याज इतना महंगा हो चुका है, तो आने वाले समय में यह 100 रुपए किलो तक भी पहुंच सकता है।
छोटे ठेले वालों का भी बिगड़ा हिसाब
प्याज की महंगाई का असर सिर्फ घरेलू रसोई तक सीमित नहीं है। शहडोल की चौपाटी पर चाट, फुल्की और चाउमीन बेचने वाले राजा गुप्ता ने बताया कि प्याज के दाम तेजी से बढ़ने की वजह से उनके व्यवसाय पर भी सीधा असर पड़ रहा है। उनके मुताबिक हर डिश में प्याज जरूरी है, यहां तक कि पानी-पूड़ी में भी ग्राहक प्याज मांगते हैं। उनका कहना है कि दाम चाहे जितने भी बढ़ जाएं, प्याज की जरूरत तो पड़ेगी ही, इसलिए किसी तरह इस बढ़ी हुई लागत को मैनेज करना उनकी मजबूरी बन गई है।

थोक बाजार का हाल भी जानिए
शहडोल में सालों से आलू-प्याज का व्यापार कर रहे उपेंद्र कुशवाहा के मुताबिक प्याज के दाम में लगातार तेजी बनी हुई है। उनका कहना है कि सावन में ही खुले बाजार में प्याज 60 रुपए किलो तक पहुंच चुका है, तो सितंबर-अक्टूबर तक यह 100 रुपए किलो को भी पार कर सकता है। हालांकि उन्हें उम्मीद है कि नई फसल आने के बाद दामों में कुछ राहत मिल सकती है, लेकिन यह पूरी तरह इस पर निर्भर करेगा कि इस बार बरसात में प्याज की पैदावार कैसी रहती है। उन्होंने यह भी बताया कि बाजार में जितनी मांग है, उतनी आपूर्ति नहीं हो पा रही, और यही कीमतों में उछाल की मुख्य वजह है।
शहडोल के ही थोक व्यापारी लखन पांडे के मुताबिक फिलहाल थोक बाजार में प्याज 48 रुपए किलो के भाव पर बिक रहा है, जिसकी वजह से खुदरा बाजार में यह 60 रुपए किलो तक पहुंच गया है। उनके अनुसार आने वाले समय में दाम कितने और बढ़ेंगे, यह कहना अभी मुश्किल है, लेकिन इतना तय है कि दाम घटने के बजाय आगे और बढ़ने की आशंका ज्यादा है।
दाम बढ़ने की असली वजह क्या है
अब सवाल उठता है कि आखिर प्याज इतना महंगा क्यों हो रहा है। इसका जवाब देते हुए थोक व्यापारी लखन पांडे ने बताया कि प्याज अब किसानों के हाथ से निकलकर पूरी तरह व्यापारियों और स्टॉकिस्टों के पास पहुंच चुका है, और यही इसके महंगा होने की सबसे बड़ी वजह है। उनके मुताबिक पिछले सीजन में स्टॉकिस्टों ने प्याज नहीं खरीदा था, इसलिए उस समय दाम काबू में रहे। लेकिन इस बार स्टॉकिस्टों ने बड़े पैमाने पर प्याज की खरीदारी की है, जिससे बाजार में माल जानबूझकर रोक दिया गया है। जब माल इस तरह रोका जाता है, तो दाम बढ़ना तय हो जाता है, और आगे भी दाम बढ़ने की पूरी आशंका है।
व्यापारी उपेंद्र कुशवाहा एक और वजह बताते हैं। उनके मुताबिक अभी नई फसल बाजार में आई ही नहीं है, और सबकी उम्मीदें इसी पर टिकी हैं। अगर खरीफ सीजन की नई फसल अच्छी रहती है, तो इससे दामों पर लगाम लग सकती है। फिलहाल पुरानी फसल का स्टॉक खत्म हो रहा है और नई फसल का इंतजार बना हुआ है।
देश भर में प्याज की सप्लाई कैसे चलती है
भारत में प्याज की आपूर्ति व्यवस्था को समझना भी जरूरी है। मार्च-अप्रैल में तैयार होने वाली फसल को रबी सीजन की फसल कहा जाता है, और यही देश की सबसे बड़ी स्टोरेज फसल मानी जाती है। यह फसल कई महीनों तक, मोटे तौर पर अक्टूबर तक, बाजार की जरूरत पूरी करती है। जैसे-जैसे कोल्ड स्टोरेज में रखा गया स्टॉक खत्म होता जाता है, बाजार अगली आने वाली फसल पर निर्भर होने लगता है।
इस बीच कर्नाटक, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश से आने वाली खरीफ प्याज की थोड़ी-बहुत आपूर्ति अक्टूबर में मुख्य खरीफ फसल आने से पहले की कमी को पूरा करती है। लेकिन इस बार का साल थोड़ा मुश्किल भरा साबित हो रहा है, क्योंकि स्टोर किया गया पुराना स्टॉक तेजी से खत्म हो रहा है और उसकी गुणवत्ता पर भी असर पड़ा है। बताया जा रहा है कि मार्च-अप्रैल में महाराष्ट्र में हुई बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि ने सीजन की आखिरी फसल को नुकसान पहुंचाया, जिसका असर स्टोर किए गए स्टॉक पर भी पड़ा। यानी इस बार बाजार में प्याज की मात्रा और गुणवत्ता, दोनों पर ही दबाव बना हुआ है।
मानसून की चाल ने भी बिगाड़ा समीकरण
व्यापारी उपेंद्र कुशवाहा के मुताबिक कीमतों में असली राहत तभी मिलेगी जब खरीफ सीजन की नई फसल बाजार में आ जाएगी, लेकिन अभी इसमें देरी हो रही है। उनके अनुसार इस बार मानसून की बेरुखी भी दाम बढ़ने की एक बड़ी वजह बनी है। मानसून के देरी से आने और फिर कुछ जगहों पर अचानक तेज बारिश होने का असर सीधे सप्लाई चेन पर पड़ा है, जो मौजूदा महंगाई की एक बड़ी वजह बनकर सामने आया है।
थोक व्यापारी लखन पांडे ने बताया कि शहडोल क्षेत्र में भी अमरहा, भमरहा और ब्यौहारी जैसी जगहों पर प्याज की अच्छी खेती होती है, लेकिन फिलहाल यहां से भी स्टॉक खत्म हो चुका है। उन्होंने बताया कि मध्य प्रदेश में परंपरागत रूप से ठंड के मौसम में प्याज की खेती ज्यादा होती है, लेकिन अब बरसात के मौसम यानी खरीफ सीजन में भी प्याज उगाने का चलन तेजी से बढ़ रहा है, ताकि अक्टूबर-नवंबर के त्योहारी सीजन में होने वाली कमी को पूरा किया जा सके।
मध्य प्रदेश का प्याज उत्पादन में दूसरा स्थान
इस पूरे मामले में मध्य प्रदेश की भूमिका को समझना भी जरूरी है। भारतीय किसान संघ के भानु प्रताप सिंह के मुताबिक मध्य प्रदेश भारत का दूसरा सबसे बड़ा प्याज उत्पादक राज्य है, और देश के कुल प्याज उत्पादन में इसकी हिस्सेदारी करीब 14 से 15 प्रतिशत तक है। राज्य में रबी और खरीफ, दोनों सीजन में प्याज की भरपूर पैदावार होती है। देश में सबसे ज्यादा प्याज उत्पादन महाराष्ट्र में होता है, उसके बाद दूसरे नंबर पर मध्य प्रदेश, तीसरे पर कर्नाटक और चौथे स्थान पर गुजरात आता है।
शाजापुर बना है प्याज का सबसे बड़ा हब
मध्य प्रदेश में प्याज उत्पादन का सबसे बड़ा केंद्र मालवा और निमाड़ इलाका है, जहां से राज्य के कुल उत्पादन का बड़ा हिस्सा आता है। शाजापुर जिला तो प्याज उत्पादन के मामले में पूरे प्रदेश में पहले नंबर पर है, इसीलिए इसे ‘ओनियन हब’ भी कहा जाता है। इसके अलावा इंदौर और उज्जैन जिलों में भी बड़े स्तर पर प्याज उगाया जाता है। धार, देवास और राजगढ़ के किसान रबी और खरीफ, दोनों सीजन में प्याज की खेती करते हैं। खंडवा और खरगोन यानी पश्चिम निमाड़ का प्याज अपनी खास गुणवत्ता और स्वाद के लिए जाना जाता है।

बड़वानी जिले में भी प्याज की खेती का रकबा लगातार बढ़ रहा है। बुंदेलखंड इलाके में सागर जिला प्याज उत्पादन में सबसे आगे है। रतलाम और मंदसौर के किसान मसाला फसलों के साथ-साथ बड़े पैमाने पर प्याज भी उगाते हैं। सतना और रीवा में स्थानीय जरूरत और आसपास की मंडियों की मांग पूरी करने के लिए प्याज उगाया जाता है।
कुल मिलाकर तस्वीर यह है
सावन के महीने में प्याज के दाम में आई इस तेजी ने आम आदमी की रसोई का बजट पूरी तरह बिगाड़ दिया है। घरेलू ग्राहकों से लेकर सड़क किनारे ठेला लगाने वाले छोटे कारोबारियों तक, हर कोई इस महंगाई से जूझ रहा है। व्यापारियों के मुताबिक स्टॉकिस्टों की बड़े पैमाने पर खरीदारी, नई फसल के आने में देरी, बेरुखी भरा मानसून और महाराष्ट्र में हुई बेमौसम बारिश, इन सभी वजहों ने मिलकर मौजूदा हालात बनाए हैं।
लेकिन इस पूरी महंगाई की सबसे बड़ी हकीकत यह है कि बाजार में भले ही प्याज 60 रुपए किलो तक बिक रहा हो, खेत में मेहनत करने वाले किसान के हाथ मुश्किल से 10 से 12 रुपए प्रति किलो का ही मुनाफा आ पाता है। बढ़ी हुई कीमत का बड़ा हिस्सा बिचौलियों, आढ़तियों और स्टॉकिस्टों की जेब में चला जाता है। अब सबकी निगाहें खरीफ सीजन की नई फसल पर टिकी हैं, और उसी पर तय होगा कि आम उपभोक्ताओं को इस महंगाई से कब और कितनी राहत मिल पाती है।

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