नेपाल-तिब्बत सीमा पर आई विनाशकारी बाढ़ और मलबे के सैलाब ने जितनी तबाही मचाई थी, उसकी असली भयावहता अब धीरे-धीरे सामने आ रही है। शुरुआती रिपोर्टों में जहां मरने वालों की संख्या 160 के आसपास बताई गई थी, वहीं ताजा जानकारी के मुताबिक यह आंकड़ा अब कहीं ज्यादा बढ़ चुका है। नेपाल पुलिस के अनुसार कम से कम 353 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 826 लोग अभी भी लापता हैं। कुछ रिपोर्टों में तो मृतकों की संख्या 359 तक बताई गई है, वहीं नेपाल की राष्ट्रीय आपदा जोखिम न्यूनीकरण एवं प्रबंधन प्राधिकरण के अनुसार करीब 910 लोग अब भी लापता हैं। प्याज सावन में रुला रहा, बाजार में 60 पार, पर किसान की जेब में सिर्फ 10 रुपए
यह सिलसिला यहीं नहीं रुकता। तिब्बत के जिरोंग काउंटी में भी हालात गंभीर बने हुए हैं, जहां चीनी अधिकारियों के मुताबिक 558 लोग लापता हैं, जिनमें 260 विदेशी नागरिक शामिल हैं। दोनों ओर के आंकड़ों को मिलाकर देखा जाए तो नेपाल और तिब्बत क्षेत्र में करीब 1500 लोग लापता बताए जा रहे हैं, जिनमें कम से कम 800 विदेशी नागरिक शामिल हैं।

भारतीय नागरिकों की चिंता सबसे ज्यादा
इस आपदा ने भारत की चिंता भी काफी बढ़ा दी है। लापता विदेशी नागरिकों में सबसे बड़ी संख्या भारतीयों की बताई जा रही है। 500 से ज्यादा विदेशी नागरिक अब भी लापता हैं, जिनमें ज्यादातर भारत से हैं, वहीं करीब 65 अमेरिकी नागरिक भी लापता बताए गए हैं। इनमें बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जो कैलाश मानसरोवर यात्रा पर नेपाल के रास्ते आगे बढ़ रहे थे। कैलाश पर्वत हिमालय की एक ऐसी चोटी है जो तिब्बत के दक्षिण-पश्चिमी हिस्से में चीन की नेपाल और भारत से लगती सीमाओं के पास स्थित है, और हिंदू, बौद्ध, जैन तथा तिब्बती बॉन परंपरा में इसे अत्यंत पवित्र माना जाता है।
काठमांडू के अस्पतालों के बाहर लापता लोगों के परिजनों की भीड़ जुटी हुई है, जो अपने प्रियजनों की खबर पाने के लिए बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं। कई परिवार अपने घर के सदस्यों का नाम दर्ज कराने और उनकी तलाश में मदद पाने के लिए अस्पतालों और प्रशासनिक दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं।
कैसे आई इतनी भीषण तबाही
शुरुआत में इस घटना को भूकंप जैसी प्राकृतिक हलचल समझा गया था, लेकिन बाद की जांच में सामने आया कि असली वजह कुछ और थी। अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण एजेंसी के मुताबिक यह आपदा हिमालयी क्षेत्र में एक ग्लेशियर के अचानक टूटने से पैदा हुई, जिसे शुरुआत में गलती से 4.4 तीव्रता के भूकंप के रूप में दर्ज किया गया था। ऊंचाई पर मौजूद बर्फ की यह चट्टान टूटकर नीचे गिरी और भारी मात्रा में पानी, बर्फ, मिट्टी व चट्टानों को साथ लेकर नदी घाटियों में तबाही मचाती हुई बह निकली।
अल जजीरा की एक रिपोर्ट के मुताबिक बुधवार सुबह करीब साढ़े आठ बजे नेपाल-तिब्बत सीमा से लगे पहाड़ी इलाकों में यह फ्लैश फ्लड और मडस्लाइड आया। सबसे हैरान करने वाली बात यह रही कि जिस वक्त यह आपदा आई, उस समय उस इलाके में बारिश भी नहीं हो रही थी, जिसकी वजह से स्थानीय प्रशासन और लोग इसके लिए बिल्कुल भी तैयार नहीं थे। यही वजह है कि इतनी बड़ी संख्या में लोग इसकी चपेट में आ गए।

नेपाल के रसुवा जिले में सबसे ज्यादा तबाही
आपदा का सबसे भीषण असर नेपाल के रसुवा जिले में देखने को मिला है, जो सीधे तिब्बत की सीमा से सटा हुआ है। इस इलाके में सड़कें, पुल, बिजली परियोजनाएं और पूरी की पूरी बस्तियां मलबे में तब्दील हो गईं। न्यूवाकोट जिले में भी भारी नुकसान की खबरें आई हैं, जहां बुलडोजर और अन्य भारी मशीनों की मदद से मलबा हटाने का काम लगातार जारी है।
त्रिशूली नदी, जो इस पूरे इलाके की मुख्य जलधारा है, अब भी उफान पर बह रही है। इसका पानी मिट्टी और मलबे की वजह से पूरी तरह काला पड़ चुका है। नदी पर बने कई पुल पानी के तेज बहाव की वजह से पूरी तरह मुड़ चुके हैं या टूट चुके हैं, जिससे प्रभावित इलाकों तक पहुंचना और भी मुश्किल हो गया है।
राहत एजेंसियों का कहना: 30 हजार से ज्यादा परिवार प्रभावित
इस आपदा का दायरा कितना बड़ा है, इसका अंदाजा राहत संगठनों के आकलन से लगाया जा सकता है। एक अंतरराष्ट्रीय राहत संस्था के मुताबिक इस आपदा से 30,000 से ज्यादा परिवारों के प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है। संयुक्त राष्ट्र की खाद्य एजेंसी से जुड़े एक अधिकारी ने बताया कि राहत दल मलबे में दबे लोगों को निकालने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन पहाड़ी इलाके में सड़कें पूरी तरह बह जाने की वजह से यह काम बेहद चुनौतीपूर्ण साबित हो रहा है। हेलीकॉप्टरों के जरिए राहत सामग्री पहुंचाने और लोगों को निकालने का काम नेपाल सरकार द्वारा किया जा रहा है।
तिब्बत में भी हालात नाजुक, चीन के शीर्ष अधिकारी पहुंचे मौके पर
सीमा के दूसरी तरफ तिब्बत के जिरोंग काउंटी में भी हालात बेहद नाजुक बने हुए हैं। शुरुआती दौर में वहां तीन लोगों की मौत और दो लोगों के बचाए जाने की पुष्टि हुई थी, लेकिन लापता लोगों की संख्या को देखते हुए स्थानीय अधिकारियों ने बड़े पैमाने पर जनहानि की आशंका जताई है। इस घटना की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि चीन के दूसरे सबसे बड़े अधिकारी माने जाने वाले प्रीमियर ली छ्यांग खुद जिरोंग काउंटी पहुंचे, जहां नेपाल सीमा से लगे एक व्यापारिक क्रॉसिंग पर मडस्लाइड की वजह से सैकड़ों लोग लापता हैं। चीन में इतने बड़े अधिकारियों का आपदा स्थल तक खुद पहुंचना बहुत कम देखने को मिलता है, और इससे यह भी पता चलता है कि चीनी सरकार इस घटना को कितनी गंभीरता से ले रही है।

नेपाल-भारत-चीन का साझा राहत अभियान
इस भीषण आपदा के बाद भारत की ओर से नेपाल को तुरंत राहत सामग्री भेजी गई है। दोनों देशों की एजेंसियां आपसी तालमेल के साथ बचाव कार्य को अंजाम दे रही हैं। नेपाल, भारत और चीन, तीनों ही तरफ से बचाव दलों को इलाके में उतारा गया है, जिनमें सैनिकों के साथ-साथ ड्रोन और खोजी कुत्तों की मदद भी ली जा रही है। बावजूद इसके, ऊंचे पहाड़ी इलाके, नदियों का बढ़ा हुआ जलस्तर, टूटी हुई सड़कें और गहरे जमे मलबे की वजह से राहत दलों को कई जगहों तक पहुंचने में भारी दिक्कतें आ रही हैं। तिब्बत की तरफ भी गहरे जमे तलछट और मलबे की वजह से चीनी बचाव दलों को सीमावर्ती इलाके तक पहुंचने में देरी हो रही है।
पर्यटन विभाग का भी बड़ा आंकड़ा सामने आया
नेपाल के संस्कृति एवं पर्यटन मंत्रालय की तरफ से भी इस मामले में एक अहम जानकारी सामने आई है। मंत्रालय के मुताबिक करीब 579 पर्यटक इस आपदा के बाद से लापता हैं, जिनमें 400 से ज्यादा विदेशी नागरिक शामिल हैं। यह आंकड़ा इस बात की पुष्टि करता है कि सैलाब की चपेट में सामान्य स्थानीय निवासियों के अलावा बड़ी संख्या में तीर्थयात्री और पर्यटक भी आए हैं, जो इस क्षेत्र से होकर कैलाश मानसरोवर या अन्य पर्यटन स्थलों की यात्रा पर निकले थे।
मानसून के मौसम में और खतरे की आशंका
राहत और बचाव अभियान के बीच एक और चिंता की बात सामने आई है। मानसून का मौसम अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है, और आगे भी इस इलाके में तेज बारिश की आशंका जताई जा रही है। ऐसे में विशेषज्ञों का कहना है कि पहले से कमजोर पड़ चुकी जमीन और मलबे से भरी नदी घाटियों में किसी भी वक्त दूसरी आपदा आने का खतरा बना हुआ है। इसी वजह से बचाव दल राहत कार्य के साथ-साथ आसपास के इलाकों में रह रहे लोगों को सुरक्षित स्थानों पर ले जाने की कोशिश भी कर रहे हैं।

स्थानीय लोगों की आपबीती दहला देने वाली
इस इलाके में रहने वाले लोगों ने जिस मंजर को अपनी आंखों के सामने देखा, वह किसी को भी सिहरा देने वाला है। एक स्थानीय निवासी ने बताया कि पानी की विशाल दीवार जिस तरह से घाटी में नीचे की ओर बढ़ी, उससे बचने का लोगों को कोई मौका ही नहीं मिला। घरों और लोगों को मिट्टी और मलबे के नीचे दबते हुए देखना उनके लिए बेहद डरावना अनुभव रहा। तिब्बत की तरफ से जारी सर्विलांस फुटेज में भी मिट्टी और मलबे की एक बड़ी दीवार को इमारतों पर टूटते और सड़कों को लीलते हुए देखा जा सकता है, जबकि लोग जान बचाकर भागते नजर आते हैं।
आखिर हिमालयी क्षेत्र में क्यों बढ़ रहा है ऐसी आपदाओं का खतरा
यह घटना एक बार फिर इस बात की तरफ इशारा करती है कि हिमालयी क्षेत्र जलवायु परिवर्तन के असर से किस कदर प्रभावित हो रहा है। ऊंचाई पर जमी ग्लेशियर और बर्फ की चट्टानें अब पहले की तुलना में कहीं ज्यादा अस्थिर होती जा रही हैं। तापमान में हो रही बढ़ोतरी की वजह से इन क्षेत्रों में बर्फ पिघलने और टूटने की घटनाएं आम होती जा रही हैं, जिससे अचानक इस तरह के जलप्रलय का खतरा लगातार बना रहता है। पहाड़ी और नदी किनारे बसे इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए यह खतरा कहीं ज्यादा गंभीर होता जा रहा है, क्योंकि इन इलाकों में न तो हमेशा समय पर चेतावनी तंत्र मौजूद होता है और न ही आपदा की स्थिति में तुरंत बचकर निकलने के पर्याप्त रास्ते होते हैं।
ऐसी आपदा में जान बचाने के लिए क्या करें
इस तरह की भीषण प्राकृतिक आपदा के समय सही जानकारी और सतर्कता किसी की भी जान बचाने में सबसे बड़ी भूमिका निभाती है। अगर आप किसी नदी, पहाड़ी या निचले इलाके में रहते हैं, तो अचानक बाढ़ या फ्लैश फ्लड की स्थिति में सबसे पहला काम है नदी, नाले, पुल और निचले इलाकों से तुरंत दूरी बना लेना। अगर प्रशासन की तरफ से किसी सुरक्षित स्थान या ऊंचाई वाले इलाके में जाने का निर्देश मिलता है, तो उसका बिना देरी किए पालन करना चाहिए।
बहते हुए पानी को कभी भी पैदल या वाहन से पार करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए, क्योंकि पानी की गहराई और उसके बहाव की ताकत का सही अंदाजा लगा पाना लगभग नामुमकिन होता है। ऐसे मौकों पर मोबाइल फोन को हमेशा चार्ज रखना चाहिए, ताकि जरूरत पड़ने पर एसएमएस या अन्य उपलब्ध साधनों से परिवार और प्रशासन से संपर्क बनाए रखा जा सके। अफवाहों पर भरोसा करने के बजाय सिर्फ आधिकारिक चेतावनियों और भरोसेमंद समाचार स्रोतों से ही जानकारी लेनी चाहिए। देश की राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन एजेंसी भी हमेशा यही सलाह देती है कि आपदा के समय शांत रहें, अफवाहों से बचें और मोबाइल फोन को आपातकालीन संपर्क के लिए तैयार रखें।
अगर घर में पानी तेजी से घुसने लगे, तो सबसे पहले बिजली के उपकरणों से दूर हो जाना चाहिए और तुरंत किसी ऊंचे व सुरक्षित स्थान की तरफ बढ़ना चाहिए। ऐसी स्थिति में जरूरी दवाइयां, पीने का पानी, सूखा भोजन, टॉर्च, पावर बैंक, पहचान पत्र और मोबाइल फोन जैसी जरूरी चीजें हमेशा अपने पास रखनी चाहिए। बच्चों, बुजुर्गों और बीमार लोगों को सबसे पहले सुरक्षित स्थान पर पहुंचाने की प्राथमिकता देनी चाहिए।
एक बेहद जरूरी बात यह भी है कि बाढ़ का पानी उतरता हुआ दिखाई देने पर भी तुरंत नदी, नाले या टूटे हुए पुल की तरफ नहीं जाना चाहिए। ऐसी स्थिति में कभी भी दोबारा तेज बहाव आ सकता है, और मलबे में छिपे गड्ढे, टूटे तार या अन्य खतरे किसी की भी जान के लिए जानलेवा साबित हो सकते हैं।
आगे क्या, अभी भी जारी है तलाश
नेपाल और तिब्बत, दोनों तरफ राहत और बचाव अभियान लगातार जारी है, लेकिन जिस पैमाने पर तबाही हुई है, उसे देखते हुए मृतकों और लापता लोगों की संख्या में आगे भी बदलाव की पूरी आशंका जताई जा रही है। कई इलाकों में अभी तक बचाव दल पहुंच भी नहीं पाए हैं, जिसकी वजह से असल नुकसान का पूरा आकलन होना अभी बाकी है। भारतीय और नेपाली एजेंसियां लगातार लापता भारतीय नागरिकों का पता लगाने और उन्हें सुरक्षित निकालने के प्रयासों में जुटी हुई हैं।
यह त्रासदी एक बार फिर इस बात की याद दिलाती है कि पहाड़ी और नदी किनारे बसे इलाकों में प्राकृतिक आपदा के समय समय पर मिलने वाली चेतावनी, सुरक्षित स्थान की सही जानकारी और प्रशासन के निर्देशों का पालन ही किसी की जान बचाने में सबसे अहम भूमिका निभाता है।
