पत्रकार सुरक्षा पर सत्ता से सीधा सवाल! 2015 की सिफारिश, कानून अब तक क्यों नहीं?

राष्ट्रीय पत्रकार सुरक्षा कानून

राष्ट्रीय पत्रकार सुरक्षा कानून की मांग पर ABPSS ने PMO में नया आवेदन दिया। संगठन ने 2015 की सिफारिशों पर कार्रवाई और मौजूदा स्थिति मांगी।

नई दिल्ली/मुंबई। देशभर के पत्रकारों की सुरक्षा को लेकर एक बार फिर केंद्र सरकार के सामने बड़ा सवाल खड़ा हुआ है। राष्ट्रीय पत्रकार सुरक्षा कानून की मांग को लेकर अखिल भारतीय पत्रकार सुरक्षा समिति (ABPSS) ने प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) में दोबारा आवेदन देकर केंद्र सरकार से स्पष्ट जवाब मांगा है। संगठन का कहना है कि पत्रकार सुरक्षा को लेकर वर्ष 2015 में रिपोर्ट और केंद्रीय कानून बनाने की सिफारिश का उल्लेख भारतीय प्रेस परिषद (PCI) खुद कर चुकी है।

ऐसे में अब सवाल यह है कि उसके बाद कार्रवाई कितनी आगे बढ़ी?

ABPSS का कहना है कि उसकी मांग सिर्फ पुरानी रिपोर्ट या सिफारिश की जानकारी तक सीमित नहीं है। संगठन जानना चाहता है कि पत्रकारों की सुरक्षा के लिए प्रभावी राष्ट्रीय पत्रकार सुरक्षा कानून बनाने की दिशा में केंद्र सरकार ने अब तक क्या ठोस कदम उठाए हैं।

ABPSS के राष्ट्रीय संगठन महासचिव महफूज़ खान की ओर से उठाए गए इस मुद्दे ने पत्रकार सुरक्षा से जुड़ी पुरानी बहस को एक बार फिर राष्ट्रीय स्तर पर सामने ला दिया है।

राष्ट्रीय पत्रकार सुरक्षा कानून की मांग फिर PMO तक पहुंची

पत्रकारों की सुरक्षा के लिए राष्ट्रीय कानून बनाने की मांग को लेकर ABPSS ने पहले प्रधानमंत्री कार्यालय में आवेदन दिया था। इस आवेदन का Registration No. PMOPG/E/2026/0143964 था, जो 3 अगस्त 2026 को PMO में दर्ज हुआ था।

मामले में भारतीय प्रेस परिषद की ओर से 17 अगस्त 2026 को जवाब दिया गया। PCI के उत्तर में वर्ष 2015 में पत्रकार सुरक्षा के संबंध में रिपोर्ट तैयार किए जाने और केंद्र सरकार को केंद्रीय कानून बनाने की सिफारिश किए जाने का उल्लेख किया गया।

इस जवाब के बाद ABPSS ने सरकार से एक अहम सवाल उठाया। संगठन जानना चाहता है कि जब पत्रकार सुरक्षा कानून की जरूरत पर वर्षों पहले विचार हो चुका था और सिफारिश भी की गई थी, तो उस सिफारिश पर अब तक क्या कार्रवाई हुई?

राष्ट्रीय पत्रकार सुरक्षा कानून : PCI के जवाब से असंतुष्ट ABPSS ने दाखिल की अपील

भारतीय प्रेस परिषद के जवाब को ABPSS ने अपनी मूल मांग का पूरा उत्तर नहीं माना। संगठन के मुताबिक, उसका उद्देश्य केवल यह पता लगाना नहीं था कि पहले कोई रिपोर्ट तैयार हुई थी या नहीं।

असल मांग यह थी कि पूर्व रिपोर्ट और सिफारिशों के आधार पर वर्तमान समय में केंद्र सरकार क्या कार्रवाई कर रही है, इसकी स्पष्ट जानकारी दी जाए।

राष्ट्रीय पत्रकार सुरक्षा कानून :

इसी मुद्दे को लेकर संगठन ने 18 अगस्त 2026 को अपील संख्या MOIAB/E/A/26/0000386 प्रस्तुत की। अपील में कहा गया कि पत्रकारों की सुरक्षा से जुड़ी पुरानी सिफारिशों की जानकारी के साथ-साथ उनके बाद हुई कार्रवाई की स्थिति भी बताई जानी चाहिए।

अब ABPSS की मांग है कि सरकार केवल पुरानी रिपोर्ट का हवाला देने के बजाय मौजूदा स्थिति और आगे की कार्ययोजना स्पष्ट करे।

2015 की रिपोर्ट के बाद कानून कहां? उठे सीधे सवाल

भारतीय प्रेस परिषद के जवाब में वर्ष 2015 की पत्रकार सुरक्षा संबंधी रिपोर्ट और केंद्रीय कानून बनाने की सिफारिश का उल्लेख सामने आया है।

इसी बिंदु को आधार बनाकर ABPSS ने केंद्र सरकार के सामने कई सवाल रखे हैं।

रिपोर्ट तैयार हुई तो उसके बाद क्या कार्रवाई हुई?

केंद्रीय कानून बनाने की सिफारिश हुई तो उसका क्या हुआ?

यदि पत्रकार सुरक्षा के लिए कानून की जरूरत महसूस की गई थी तो अब तक कानून क्यों नहीं बना?

क्या राष्ट्रीय पत्रकार सुरक्षा कानून को लेकर कोई प्रस्ताव आज भी विचाराधीन है?

इन सवालों के जवाब अब सरकार से मांगे गए हैं।

PMO में नया आवेदन, अब मांगा गया स्पष्ट जवाब

पुराने आवेदन के बाद ABPSS ने 18 अगस्त 2026 को प्रधानमंत्री कार्यालय में एक नया आवेदन भी प्रस्तुत किया है। इसका Registration No. PMOPG/E/2026/0156778 है और संगठन के अनुसार यह आवेदन उसी दिन PMO में प्राप्त हुआ।

नए आवेदन में केंद्र सरकार से वर्ष 2015 की पत्रकार सुरक्षा संबंधी रिपोर्ट और केंद्रीय कानून बनाने की पूर्व सिफारिशों पर अब तक हुई कार्रवाई की जानकारी मांगी गई है।

साथ ही संगठन ने यह जानना चाहा है कि वर्तमान में राष्ट्रीय पत्रकार सुरक्षा कानून को लेकर कोई प्रस्ताव, नीति, विधायी प्रक्रिया या अन्य कार्रवाई सरकार के स्तर पर विचाराधीन है या नहीं।

इस बार संगठन ने पुराने प्रयासों का उल्लेख भर करने के बजाय उनके परिणाम और मौजूदा स्थिति का स्पष्ट विवरण मांगा है।

पत्रकारों की सुरक्षा पर बड़ा सवाल, लोकतंत्र से भी जुड़ा मुद्दा

जनहित, भ्रष्टाचार, प्रशासनिक अनियमितताओं, सामाजिक समस्याओं और आम जनता की आवाज को सामने लाने में पत्रकारों की अहम भूमिका होती है। इसी काम के दौरान कई पत्रकारों को धमकी, हिंसा, हमले और दूसरे तरह के दबाव का सामना करना पड़ता है।

ABPSS का मानना है कि पत्रकारों की सुरक्षा को केवल पत्रकार संगठनों का विषय मानना उचित नहीं होगा। यह स्वतंत्र पत्रकारिता और लोकतांत्रिक व्यवस्था से जुड़ा व्यापक मुद्दा है।

जब पत्रकार बिना डर के सवाल पूछ सकेगा, तभी जनता की समस्याएं मजबूती से सामने आ सकेंगी। इसी तर्क के साथ संगठन प्रभावी और स्थायी राष्ट्रीय पत्रकार सुरक्षा कानून की मांग कर रहा है।

धमकी और हमलों से सुरक्षा के लिए कानूनी व्यवस्था की मांग

पत्रकारों के सामने आने वाले दबाव और सुरक्षा संबंधी चुनौतियों को देखते हुए ABPSS ने एक मजबूत कानूनी व्यवस्था की जरूरत बताई है।

संगठन के मुताबिक, भ्रष्टाचार, प्रशासनिक गड़बड़ी और जनहित से जुड़े मामलों की रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों को कई बार दबाव का सामना करना पड़ता है। ऐसे माहौल में पत्रकारों को अपने काम के दौरान सुरक्षा का भरोसा मिलना जरूरी है।

ABPSS का कहना है कि राष्ट्रीय पत्रकार सुरक्षा कानून किसी राजनीतिक दल या सरकार के खिलाफ अभियान नहीं है। उद्देश्य केवल पत्रकारों को सुरक्षित माहौल देना और स्वतंत्र एवं निर्भीक पत्रकारिता के लिए प्रभावी कानूनी व्यवस्था तैयार करना है।

अब पुरानी रिपोर्ट नहीं, कार्रवाई का हिसाब चाहता संगठन

ABPSS की मौजूदा पहल का मुख्य मुद्दा यही है कि सिर्फ पुरानी रिपोर्ट और सिफारिश का उल्लेख पर्याप्त नहीं है।

संगठन केंद्र सरकार से जानना चाहता है कि वर्ष 2015 की रिपोर्ट के बाद क्या कदम उठाए गए। क्या कोई ड्राफ्ट तैयार किया गया? क्या किसी मंत्रालय को प्रस्ताव भेजा गया? क्या विधायी स्तर पर प्रक्रिया शुरू हुई? क्या पत्रकार संगठनों से चर्चा की गई?

इन सवालों के जवाब संगठन ने सरकार से मांगे हैं। ABPSS के मुताबिक, अब जरूरत रिपोर्ट के उल्लेख से आगे बढ़कर उसके परिणाम और भविष्य की ठोस कार्ययोजना सामने रखने की है।

पत्रकार संगठनों से परामर्श की भी मांग

प्रस्तावित राष्ट्रीय पत्रकार सुरक्षा कानून के प्रारूप और कानूनी व्यवस्था पर पत्रकार संगठनों, पत्रकार प्रतिनिधियों तथा दूसरे संबंधित पक्षों से चर्चा की मांग भी की गई है।

संगठन का मानना है कि कानून तैयार करते समय जमीन पर काम करने वाले पत्रकारों की वास्तविक समस्याओं और सुरक्षा संबंधी जरूरतों को समझना जरूरी होगा।

इसीलिए संगठन ने संबंधित हितधारकों के साथ परामर्श की प्रक्रिया शुरू करने पर विचार करने का अनुरोध किया है।

महफूज़ खान बोले- किसी सरकार के विरोध में नहीं है मांग

ABPSS के राष्ट्रीय संगठन महासचिव महफूज़ खान ने कहा कि संगठन की मांग किसी सरकार, मंत्रालय या संस्था के विरोध में नहीं है।

उनके मुताबिक, उद्देश्य देशभर के पत्रकारों को सुरक्षित माहौल उपलब्ध कराना और स्वतंत्र एवं निर्भीक पत्रकारिता के लिए स्थायी कानूनी व्यवस्था सुनिश्चित करना है।

राष्ट्रीय पत्रकार सुरक्षा कानून : महफूज़ खान

महफूज़ खान ने पत्रकारों को लोकतंत्र का महत्वपूर्ण प्रहरी बताते हुए कहा कि जनहित और जनता की आवाज को सामने लाने के दौरान सुरक्षा से जुड़ी चुनौतियों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

राष्ट्रीय पत्रकार सुरक्षा कानून : केंद्र सरकार से तथ्यात्मक जवाब की मांग

संगठन ने केंद्र सरकार से पत्रकार सुरक्षा से जुड़ी पूर्व सिफारिशों पर हुई कार्रवाई की स्थिति स्पष्ट करने की मांग की है।

इसके अलावा वर्तमान समय में राष्ट्रीय पत्रकार सुरक्षा कानून को लेकर चल रही किसी भी प्रस्तावित या विचाराधीन प्रक्रिया की जानकारी देने को कहा गया है। ABPSS चाहता है कि जवाब सामान्य जानकारी तक सीमित न रहे। संगठन के अनुसार, सरकार को अब तक की कार्रवाई और आगे की संभावित कार्ययोजना दोनों के बारे में स्पष्ट एवं तथ्यात्मक जानकारी देनी चाहिए।

यानी सवाल अब केवल कानून की जरूरत का नहीं है। मुद्दा यह है कि जरूरत पर पहले ही चर्चा हो चुकी है तो अब ठोस कदम कब उठेंगे?

कार्रवाई नहीं हुई तो लोकतांत्रिक तरीके से अभियान

ABPSS ने यह भी स्पष्ट किया है कि अपेक्षित स्तर पर ठोस कार्रवाई नहीं होने की स्थिति में संगठन संविधान और कानून के दायरे में शांतिपूर्ण एवं लोकतांत्रिक तरीके से अपनी मांग आगे बढ़ाएगा।

इसके तहत जनजागरूकता अभियान, प्रतिनिधिमंडल, धरना और अन्य वैधानिक कार्यक्रम आयोजित किए जाने की बात कही गई है।

संगठन ने कहा है कि पत्रकार सुरक्षा कानून की मांग को लोकतांत्रिक तरीके से लगातार उठाया जाएगा।

राष्ट्रीय पत्रकार सुरक्षा कानून : अब PMO के जवाब पर टिकी नजर

पत्रकार संघ ने एक तरफ PCI के जवाब के बाद अपील दाखिल की है और दूसरी ओर प्रधानमंत्री कार्यालय में नया आवेदन भी प्रस्तुत किया है।

इन दोनों कदमों के बाद अब निगाहें केंद्र सरकार की प्रतिक्रिया पर हैं।

मुख्य सवाल यही है कि वर्ष 2015 की रिपोर्ट और सिफारिशों पर अब तक क्या कार्रवाई हुई। साथ ही यह भी स्पष्ट करना होगा कि वर्तमान में पत्रकार सुरक्षा से जुड़ा कोई विधायी प्रस्ताव या नीति प्रक्रिया चल रही है या नहीं।

सरकार की ओर से मिलने वाला जवाब इस पूरे मुद्दे की आगे की दिशा तय कर सकता है।

सवाल सिर्फ पत्रकारों का नहीं, लोकतंत्र का भी

राष्ट्रीय पत्रकार सुरक्षा कानून को लेकर ABPSS ने केंद्र सरकार के सामने एक बार फिर अपनी मांग मजबूती से रखी है। संगठन का कहना है कि वर्ष 2015 में पत्रकार सुरक्षा पर रिपोर्ट और केंद्रीय कानून बनाने की सिफारिश का उल्लेख स्वयं PCI के जवाब में किया गया है।

ऐसे में अब सवाल यह है कि उन सिफारिशों के बाद क्या कार्रवाई हुई और वर्तमान में कानून बनाने की दिशा में सरकार की स्थिति क्या है।

3 अगस्त का पहला आवेदन, 17 अगस्त को PCI का जवाब, 18 अगस्त को अपील और उसी दिन PMO में नया आवेदन—इन लगातार कदमों के जरिए ABPSS ने पत्रकार सुरक्षा के मुद्दे को फिर राष्ट्रीय बहस में ला दिया है।

अब तीन बड़े सवाल सरकार के सामने हैं राष्ट्रीय पत्रकार सुरक्षा कानून का प्रस्ताव आखिर कहां तक पहुंचा है? विधायी प्रक्रिया शुरू करने की तैयारी है या नहीं? और कानून का प्रारूप तैयार करते समय पत्रकार संगठनों से कब और कैसे चर्चा होगी? और सबसे बड़ा सवाल—पत्रकारों की सुरक्षा के लिए राष्ट्रीय कानून कब बनेगा?

यही वे सवाल हैं जिनका स्पष्ट जवाब अब ABPSS केंद्र सरकार से मांग रहा है।

Press Council of India
Prime Minister’s Office
Ministry of Information and Broadcasting

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