रायपुर की सर्दियां इस बार सिर्फ मौसम की वजह से नहीं, बल्कि विधानसभा में गूंजने वाली एक बहस की वजह से भी चर्चा में रहेंगी। छत्तीसगढ़ सरकार ने साफ कर दिया है कि समान नागरिक संहिता यानी यूनिफॉर्म सिविल कोड (यूसीसी) अब सिर्फ फाइलों का विषय नहीं रहेगा, बल्कि आगामी शीतकालीन सत्र में यह विधानसभा के पटल पर विधेयक के रूप में पेश किया जाएगा। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने इसकी पुष्टि करते हुए कहा है कि सरकार इस दिशा में ठोस कदम उठा चुकी है, और अब यह प्रक्रिया अंतिम चरण की ओर बढ़ रही है।

जिन लोगों को लगता था कि यूसीसी सिर्फ चुनावी नारा है, उनके लिए यह खबर थोड़ी चौंकाने वाली हो सकती है, क्योंकि इस बार बात सिर्फ बयानों तक सीमित नहीं रही — एक पूरी समिति गठित हो चुकी है, बैठकें शुरू हो चुकी हैं, और अब सिर्फ कैलेंडर की तारीखों का इंतज़ार बाकी है।
रायपुर के कन्वेंशन हॉल में जुटी 200 आवाज़ें
गुरुवार, 27 अगस्त को राजधानी रायपुर के न्यू सर्किट हाउस स्थित कन्वेंशन हॉल में एक अहम बैठक हुई, जिसे राज्य स्तरीय परिचयात्मक बैठक का नाम दिया गया। इसमें करीब 200 प्रबुद्ध नागरिकों, जनप्रतिनिधियों और कानून के जानकारों को बुलाया गया। मकसद साफ था — यूसीसी के मसौदे पर सीधे जनता और विशेषज्ञों से राय लेना, ताकि जब विधेयक विधानसभा में पहुंचे तो वह सिर्फ सरकारी फाइल न लगे, बल्कि उसमें ज़मीनी आवाज़ों की झलक भी दिखे।
यह तरीका अपने आप में दिलचस्प है। आमतौर पर बड़े कानून पहले बनते हैं, फिर उन पर प्रतिक्रिया आती है। यहां सरकार ने उल्टा रास्ता चुना है — पहले सुनो, फिर लिखो। सवाल यह है कि क्या यह सचमुच लोकतांत्रिक प्रक्रिया है, या फिर विरोध की धार कुंद करने की एक सोची-समझी रणनीति? इसका जवाब आने वाले महीनों में मिलेगा, जब मसौदा सार्वजनिक होगा और तुलना की जाएगी कि बैठकों में जो सुझाव आए, उनमें से कितने वाकई शामिल हुए और कितने सिर्फ रिकॉर्ड में दर्ज होकर रह गए।

पांच सदस्यों की छत्तीसगढ़ यूसीसी समिति, जिसकी अगुवाई कर रही हैं पूर्व न्यायाधीश
सरकार ने यूसीसी का मसौदा तैयार करने के लिए पांच सदस्यीय उच्चस्तरीय समिति बनाई है। इसकी अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट की पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति रंजना प्रकाश देसाई कर रही हैं। समिति में शत्रुघ्न सिंह, एमके राउत, मोहन पवार और ज्योति रानी सिंह को सदस्य बनाया गया है।
दिलचस्प बात यह है कि उत्तराखंड में भी यूसीसी लागू करने से पहले जिस समिति ने मसौदा तैयार किया था, उसकी अगुवाई भी जस्टिस देसाई ही कर रही थीं। यानी छत्तीसगढ़ ने अनुभव को प्राथमिकता दी है, ताकि पहिया फिर से न बनाना पड़े। यह रणनीति काम की भी है और जोखिम भरी भी — काम की इसलिए, क्योंकि एक बार आजमाया हुआ मॉडल तेज़ी से लागू हो सकता है; जोखिम भरी इसलिए, क्योंकि हर राज्य की सामाजिक बनावट अलग होती है, और उत्तराखंड में जो फॉर्मूला चला, ज़रूरी नहीं कि वह छत्तीसगढ़ के आदिवासी बहुल इलाकों में भी उतनी ही आसानी से फिट बैठे।
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समिति का काम सिर्फ मसौदा लिखना नहीं है। इसे राज्य में यूसीसी लागू करने की संभावनाओं का बारीकी से अध्ययन करना है, जिसमें विवाह, तलाक, भरण-पोषण, उत्तराधिकार और दत्तक ग्रहण जैसे मौजूदा कानूनों की समीक्षा शामिल है। इसके साथ ही समिति को यह भी देखना है कि किसी भी समुदाय के हितों की अनदेखी न हो।
सभी वर्गों से बातचीत का वादा, पर परीक्षा असली संवाद में
राज्य सरकार का दावा है कि मसौदा तैयार करने से पहले समाज के हर वर्ग की राय ली जाएगी। धार्मिक, सामाजिक और विधिक संगठनों के प्रतिनिधियों से चरणबद्ध तरीके से संवाद करने की बात कही गई है। सुनने में यह वाक्य जितना आश्वस्त करने वाला लगता है, व्यवहार में उतना ही चुनौतीपूर्ण साबित होता है, क्योंकि “सभी वर्गों की राय” शब्द बड़ा है, लेकिन इसका दायरा कितना बड़ा रखा जाएगा, यह अभी तय नहीं है।
आदिवासी समुदायों की रीति-रिवाज़ आधारित परंपराएं, अल्पसंख्यक समुदायों के पर्सनल लॉ, और आधुनिक शहरी जीवनशैली से जुड़ी अपेक्षाएं — इन तीनों को एक साथ संतुलित करना किसी भी समिति के लिए आसान काम नहीं। छत्तीसगढ़ में आदिवासी आबादी की बड़ी उपस्थिति को देखते हुए यह सवाल और गहरा हो जाता है कि क्या प्रस्तावित संहिता में परंपरागत आदिवासी रीति-रिवाजों को छूट दी जाएगी, जैसा उत्तराखंड मॉडल में अनुसूचित जनजातियों के लिए किया गया था, या फिर एक समान ढांचा सबके लिए लागू होगा।
छत्तीसगढ़ यूसीसी का मकसद क्या है, सरकार के शब्दों में
सरकार के मुताबिक समान नागरिक संहिता का उद्देश्य धर्म, जाति या पंथ की सीमाओं से ऊपर उठकर विवाह, तलाक, भरण-पोषण, उत्तराधिकार, गोद लेने और लिव-इन संबंधों जैसे व्यक्तिगत मामलों में एक समान कानूनी ढांचा तैयार करना है। इसका सीधा तर्क यह दिया जाता है कि इससे महिलाओं और पुरुषों को समान अधिकार मिलेंगे, और अलग-अलग पर्सनल लॉ की वजह से पैदा होने वाली जटिलताएं और भेदभाव खत्म होंगे।

यह तर्क सुनने में जितना सीधा-सादा लगता है, बहस उतनी ही पुरानी और उलझी हुई है। संविधान का अनुच्छेद 44, जो राज्य को नीति-निर्देशक तत्व के तौर पर समान नागरिक संहिता की दिशा में प्रयास करने को कहता है, दशकों से चर्चा और टकराव दोनों का केंद्र रहा है। एक पक्ष इसे लैंगिक समानता और राष्ट्रीय एकता की दिशा में ज़रूरी कदम मानता है, तो दूसरा पक्ष इसे धार्मिक और सांस्कृतिक विविधता पर हस्तक्षेप के तौर पर देखता है। छत्तीसगढ़ सरकार ने अनुच्छेद 44 को ही आधार बनाकर समिति का गठन किया है, यानी संवैधानिक तर्क पहले से तैयार रखा गया है।
देश में पहले से कहां-कहां लागू है यूसीसी
छत्तीसगढ़ अगर यह कदम उठाता है, तो वह इस राह पर चलने वाला अकेला राज्य नहीं होगा।
- उत्तराखंड देश का पहला राज्य है जहां यूसीसी औपचारिक रूप से लागू हो चुकी है। उत्तराखंड समान नागरिक संहिता (UCC)
- गुजरात ने मार्च 2026 में यूसीसी विधेयक पारित किया।
- असम ने मई 2026 में इसी दिशा में कदम बढ़ाया।
- गोवा में आज़ादी से पहले से ही गोवा सिविल कोड (मूल रूप से पुर्तगाली सिविल कोड, 1867) लागू है, जो 1961 में गोवा के भारत में विलय के बाद भी जारी रहा। हालांकि इसमें कुछ समुदायों के लिए विशेष छूटें हैं, इसलिए इसे पूर्ण आधुनिक यूसीसी नहीं माना जाता।
यानी अगर छत्तीसगढ़ यह विधेयक पास कराता है, तो वह यूसीसी लागू करने वाला देश का चौथा राज्य बन सकता है — गोवा को अगर ऐतिहासिक अपवाद मान लिया जाए, तो पांचवां। राजनीतिक गलियारों में इसे काफी अहम माना जा रहा है, क्योंकि यह संकेत देता है कि कई भाजपा शासित राज्य समान नागरिक संहिता को एक साझा नीति के तौर पर आगे बढ़ा रहे हैं।
समर्थन और सवाल — दोनों तरफ की दलीलें
जो लोग यूसीसी के पक्ष में हैं, उनकी दलील सीधी है — एक देश में नागरिक कानूनों की इतनी विविधता क्यों हो कि एक ही मामले में अलग-अलग धर्मों के लोगों को अलग-अलग न्याय मिले? उनका कहना है कि इससे खासकर महिलाओं को फायदा होगा, क्योंकि पर्सनल लॉ की कई परंपराओं में उन्हें संपत्ति, तलाक और उत्तराधिकार के मामलों में पुरुषों जितने अधिकार नहीं मिलते।
दूसरी तरफ, आलोचकों का कहना है कि भारत जैसे विविधताओं से भरे देश में एक जैसा कानून सबके लिए थोपना व्यावहारिक नहीं है। उनकी चिंता यह है कि अल्पसंख्यक समुदायों और आदिवासी समाजों की सदियों पुरानी परंपराओं को एक झटके में बदलना सामाजिक तनाव पैदा कर सकता है। कुछ विशेषज्ञ यह भी सवाल उठाते हैं कि क्या यह प्रक्रिया वाकई “सभी वर्गों की सहमति” से चल रही है, या फिर परामर्श सिर्फ औपचारिकता निभाने के लिए किया जा रहा है।
सच यह है कि दोनों पक्षों के तर्कों में दम है, और यही वजह है कि यूसीसी दशकों से लागू होने के बावजूद हर बार एक नई बहस को जन्म देता है। छत्तीसगढ़ में भी यह बहस अलग नहीं होगी — बल्कि आदिवासी बहुल राज्य होने की वजह से यहां यह बहस और तीखी हो सकती है।
अब आगे क्या होगा?
छत्तीसगढ़ यूसीसी समिति को अपनी रिपोर्ट राज्य सरकार को सौंपनी है, जिसमें यूसीसी का प्रस्तावित मसौदा और ज़रूरी विधायी-प्रशासनिक सुझाव शामिल होंगे। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय पहले ही कह चुके हैं कि सरकार व्यापक अध्ययन और सभी पक्षों से विचार-विमर्श के बाद ही आगे की प्रक्रिया तय करेगी। यानी अभी जो तारीख शीतकालीन सत्र की बताई जा रही है, वह अंतिम है या संकेतात्मक, यह पूरी तरह समिति की रफ्तार और परामर्श प्रक्रिया की गहराई पर निर्भर करेगा।
एक बात तय है — छत्तीसगढ़ की यह पहल सिर्फ राज्य की सीमाओं तक सीमित नहीं रहने वाली। जिस तरह गुजरात और असम के बाद अब छत्तीसगढ़ इस कतार में शामिल हो रहा है, उससे यह सवाल राष्ट्रीय स्तर पर फिर सुर्खियों में आ गया है कि क्या आने वाले वर्षों में देश के और राज्य भी इसी राह पर चलेंगे, या फिर यह सिलसिला यहीं थम जाएगा।
जो भी हो, इतना तय है कि रायपुर के कन्वेंशन हॉल में हुई वह बैठक अब सिर्फ एक औपचारिक कार्यक्रम नहीं रह गई — वह उस बहस की शुरुआत बन चुकी है, जिसका असर आने वाले महीनों में विधानसभा से लेकर हर घर की चर्चा तक पहुंचेगा।

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