कोचिंग कल्चर ने स्कूल की पढ़ाई पर बढ़ाया दबाव। जानिए सीमित सीटों की दौड़, शहर-गांव की खाई, बढ़ते खर्च और छात्रों की मानसिक परेशानी की पूरी कहानी।
रायपुर. कोचिंग कल्चर अब भारत की स्कूली पढ़ाई का एक बड़ा हिस्सा बनता जा रहा है। स्कूल में पढ़ाई पूरी होने के बाद भी छात्रों का दिन खत्म नहीं होता। कई छात्र स्कूल से निकलकर सीधे कोचिंग सेंटर पहुंचते हैं और घंटों तक टेस्ट, प्रश्न-पत्र और प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करते हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या स्कूल अब पढ़ाई की सबसे अहम जगह नहीं रह गए हैं?
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शिक्षा मंत्रालय के 2025 के एक व्यापक सर्वे के अनुसार देशभर में करीब 27 फीसदी छात्र निजी कोचिंग का सहारा ले रहे हैं। यह आंकड़ा बताता है कि कोचिंग कल्चर किस तेजी से छात्रों की पढ़ाई और उनके रोजमर्रा के जीवन का हिस्सा बन रहा है।
इसके पीछे सबसे बड़ी वजह प्रतियोगी परीक्षाओं में सीटों की कमी है। लाखों छात्र IIT, NIT, NEET और UPSC जैसी परीक्षाओं में शामिल होते हैं, लेकिन सीटों की संख्या काफी कम रहती है। इसी वजह से छात्रों और उनके माता-पिता के बीच यह सोच बढ़ती जा रही है कि स्कूल की पढ़ाई के साथ कोचिंग जरूरी है।
लेकिन इस दौड़ का असर सिर्फ परीक्षा के नंबर तक सीमित नहीं है। इसका असर स्कूल की पढ़ाई, परिवार के खर्च, गांव और शहर के बीच अंतर और छात्रों के मानसिक दबाव पर भी दिखाई दे रहा है।
कोचिंग कल्चर : लाखों छात्र, लेकिन सीटें बहुत कम
भारत में कोचिंग कल्चर बढ़ने की सबसे बड़ी वजह प्रतियोगी परीक्षाओं में सीटों और छात्रों की संख्या के बीच बड़ा अंतर है।
2024 में करीब 12 लाख छात्रों ने IIT और NIT की कुल मिलाकर सिर्फ 17,385 IIT और 6,500 NIT सीटों के लिए दावेदारी की। यानी सीटों की तुलना में दावेदारों की संख्या कई गुना ज्यादा रही।
मेडिकल की पढ़ाई में भी स्थिति आसान नहीं है। करीब 23 लाख NEET-UG अभ्यर्थियों ने केवल 1,08,940 MBBS सीटों के लिए परीक्षा दी। इतने बड़े मुकाबले में हर छात्र दूसरे से आगे निकलने की कोशिश करता है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा में भी हर साल करीब 5.5 से 6 लाख उम्मीदवार प्रीलिम्स में शामिल होते हैं। इसके बाद अंतिम रूप से चुने जाने वालों की संख्या कुछ सौ तक ही सीमित रहती है।
जब लाखों छात्र कुछ हजार या कुछ सौ सीटों के लिए मुकाबला करते हैं तो तैयारी का दबाव बढ़ना स्वाभाविक है। यहीं से कोचिंग कल्चर को बढ़ावा मिलता है। परिवारों को लगता है कि केवल स्कूल की पढ़ाई से प्रतियोगी परीक्षा में आगे निकलना मुश्किल हो सकता है।
स्कूल के बाद शुरू होती है दूसरी पढ़ाई
आज कई छात्रों की दिनचर्या दो हिस्सों में बंट गई है। सुबह स्कूल और उसके बाद कोचिंग। कई छात्र दोपहर से शाम तक कोचिंग सेंटर में रहते हैं और फिर घर पहुंचकर होमवर्क या टेस्ट की तैयारी करते हैं।

खासकर JEE और NEET की तैयारी वाले शहरों में यह तरीका ज्यादा दिखाई देता है। कई जगह स्कूल का समय भी छात्रों की कोचिंग के समय को ध्यान में रखकर तय होने लगा है।
छात्रों का दिन अक्सर कुछ इस तरह गुजरता है—
- सुबह स्कूल में पढ़ाई और हाजिरी।
- स्कूल के बाद कोचिंग सेंटर।
- कोचिंग में टेस्ट और सवालों की तैयारी।
- शाम को घर या हॉस्टल में दोबारा पढ़ाई।
- अगले दिन फिर वही स्कूल और कोचिंग का सिलसिला।
इस पूरे चक्र में खेल, आराम, परिवार और दूसरी गतिविधियों के लिए समय कम होता जाता है।
यही कोचिंग कल्चर का सबसे बड़ा असर है। पढ़ाई का मतलब धीरे-धीरे सिर्फ परीक्षा और नंबर तक सीमित होने लगता है।
क्या स्कूल सिर्फ हाजिरी की जगह बन रहे हैं?
स्कूल का काम सिर्फ किताब पूरी कराना नहीं है। स्कूल में बच्चों को पढ़ाई के साथ खेल, कला, बातचीत, टीम में काम करने और अपनी रुचि समझने का मौका भी मिलता है।
लेकिन जब छात्र का पूरा ध्यान प्रतियोगी परीक्षा पर होता है तो ये चीजें पीछे छूट सकती हैं।
कई छात्रों के लिए स्कूल की पढ़ाई जरूरी तो होती है, लेकिन असली तैयारी उन्हें कोचिंग सेंटर में लगती है। प्रश्न-बैंक, टेस्ट सीरीज और बार-बार होने वाली परीक्षाओं पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है।
इससे स्कूली पढ़ाई और प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी के बीच अंतर बढ़ता जाता है।
हालांकि हर स्कूल और हर छात्र की स्थिति एक जैसी नहीं है। लेकिन बढ़ता कोचिंग कल्चर इस बात पर जरूर सवाल खड़ा करता है कि क्या हमारी स्कूली शिक्षा छात्रों को प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए पर्याप्त तैयारी दे पा रही है?
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शहर के छात्रों को ज्यादा सुविधा, गांव के छात्रों के सामने मुश्किल
कोचिंग कल्चर का असर शहर और गांव में एक जैसा नहीं है।
शिक्षा मंत्रालय के सर्वे के मुताबिक शहरी इलाकों में करीब 30.7 फीसदी छात्र कोचिंग लेते हैं, जबकि ग्रामीण इलाकों में यह आंकड़ा 25.5 फीसदी है।
खर्च में भी बड़ा अंतर दिखाई देता है। शहरी परिवार हर बच्चे पर सालाना औसतन करीब 3,988 रुपये कोचिंग पर खर्च करते हैं। ग्रामीण परिवारों का औसत खर्च करीब 1,793 रुपये है।
उच्च-माध्यमिक स्तर पर शहरी परिवारों का कोचिंग खर्च करीब 9,950 रुपये सालाना तक पहुंच जाता है।
लेकिन असली खर्च कई बार इससे ज्यादा होता है। गांव या छोटे शहर में अच्छी कोचिंग नहीं मिलने पर छात्र को दूसरे शहर जाना पड़ सकता है। वहां रहने के लिए कमरा या हॉस्टल, खाना, आने-जाने का खर्च और कोचिंग फीस अलग होती है।
यानी एक छात्र की तैयारी परिवार के लिए बड़ा आर्थिक बोझ बन सकती है।
कोटा और दिल्ली जाने की मजबूरी
गांव और छोटे शहरों के कई छात्र बेहतर तैयारी के लिए बड़े शहरों का रुख करते हैं। कोटा और दिल्ली जैसे शहर प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी के बड़े केंद्र माने जाते हैं।
माता-पिता को उम्मीद रहती है कि बड़े शहर में बेहतर शिक्षक और पढ़ाई का माहौल मिलेगा। लेकिन इसके साथ कई दूसरी परेशानियां भी आती हैं।
कम उम्र में घर से दूर रहना, लगातार पढ़ाई करना, टेस्ट में नंबर की चिंता और दूसरे छात्रों से आगे निकलने का दबाव कई बच्चों के लिए मुश्किल हो सकता है।
ऐसे में कोचिंग कल्चर सिर्फ पढ़ाई तक सीमित नहीं रहता। इसका असर परिवार की कमाई, बच्चों की दिनचर्या और उनके जीवन पर भी पड़ता है। कोचिंग सेंटरों के लिए शिक्षा मंत्रालय की गाइडलाइन
कोचिंग कल्चर का बाजार भी लगातार बढ़ रहा है
छात्रों की बढ़ती जरूरत ने कोचिंग कल्चर को एक बड़े कारोबार में बदल दिया है।
IMARC Group के एक अनुमान के अनुसार भारत का कोचिंग इंस्टीट्यूट बाजार 2025 में करीब 7.2 अरब डॉलर का था। अनुमान है कि 2034 तक यह बढ़कर करीब 17.8 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है।
ऑनलाइन कोचिंग का बाजार भी तेजी से बढ़ रहा है। 2025 में ऑनलाइन कोचिंग का हिस्सा करीब 51 करोड़ डॉलर था। 2034 तक इसके करीब 2 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है।
ऑनलाइन पढ़ाई ने गांव और छोटे शहरों के छात्रों के लिए एक नया रास्ता जरूर खोला है। अब उन्हें हर विषय के लिए बड़े शहर जाने की जरूरत नहीं पड़ती। लेकिन इंटरनेट, मोबाइल, फीस और घर में पढ़ाई का सही माहौल हर छात्र को आसानी से नहीं मिल पाता।
इसलिए ऑनलाइन सुविधा आने के बाद भी शहर और गांव के बीच का अंतर पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है।
कोचिंग कल्चर : छात्रों पर बढ़ता पढ़ाई का दबाव
कोचिंग कल्चर का सबसे गंभीर असर छात्रों के मानसिक दबाव पर पड़ रहा है।
लगातार टेस्ट, रैंक, नंबर और माता-पिता की उम्मीदें छात्रों पर दबाव बढ़ा सकती हैं। कई छात्र एक परीक्षा या टेस्ट में कम नंबर आने को अपनी बड़ी असफलता मानने लगते हैं।
कोटा में सामने आए मामले इस चिंता को और गंभीर बनाते हैं। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार 2024 में कोटा में 17 कोचिंग छात्रों ने आत्महत्या की, जबकि 2023 में यह संख्या 26 थी।
ये आंकड़े बताने के लिए काफी हैं कि परीक्षा की तैयारी के दौरान बच्चों के मानसिक दबाव को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
इसी वजह से प्रशासन को कोटा में छात्रों की सुरक्षा के लिए कई कदम उठाने पड़े। छात्रावासों के कमरों में एंटी-सुसाइड डिवाइस लगाने जैसे कदम भी उठाए गए। नर्सिंग मान्यता पर सवालों की बौछार! INC की भूमिका फिर कठघरे में
हालांकि किसी एक वजह से किसी छात्र की परेशानी को समझना सही नहीं होगा। हर मामले की अपनी अलग स्थिति होती है। लेकिन लगातार पढ़ाई का दबाव, परीक्षा का डर और भविष्य को लेकर चिंता छात्रों के लिए मुश्किल जरूर बढ़ा सकती है।
क्या कोचिंग लेना गलत है?
यह कहना सही नहीं होगा कि कोचिंग लेना ही गलत है। कई छात्रों के लिए कोचिंग मददगार साबित होती है। कठिन विषय समझने, ज्यादा सवाल हल करने और प्रतियोगी परीक्षा का तरीका समझने में अतिरिक्त पढ़ाई काम आती है।
समस्या तब पैदा होती है जब कोचिंग कल्चर स्कूल की पढ़ाई पर हावी हो जाता है।
अगर छात्र सुबह से रात तक सिर्फ पढ़ाई और टेस्ट में लगा रहे तो आराम, खेल और परिवार के लिए समय कम हो जाता है। इससे पढ़ाई का दबाव बढ़ सकता है।
इसलिए जरूरत कोचिंग बंद करने की नहीं, बल्कि स्कूल और कोचिंग के बीच सही संतुलन बनाने की है।
स्कूलों को मजबूत करना होगा
अगर स्कूलों में ही प्रतियोगी परीक्षाओं की बुनियादी तैयारी बेहतर हो जाए तो छात्रों को हर विषय के लिए अलग कोचिंग पर निर्भर रहने की जरूरत कम हो सकती है।
स्कूलों में अच्छे शिक्षक, विषय की सही समझ, सवाल हल करने की आदत और नियमित अभ्यास पर ज्यादा ध्यान देना होगा।
सिर्फ किताब पढ़ाकर परीक्षा करा देना काफी नहीं है। छात्रों को यह भी समझाना जरूरी है कि किसी सवाल का जवाब कैसे खोजा जाए और किसी विषय को समझकर कैसे पढ़ा जाए।
इसके साथ गांव और छोटे शहरों के स्कूलों में भी बेहतर शिक्षक और पढ़ाई की सुविधाएं पहुंचानी होंगी। तभी कोचिंग कल्चर से पैदा हुई शहर और गांव की दूरी कम हो सकती है।
आगे की राह क्या है?
भारत के सामने चुनौती साफ है। एक तरफ लाखों छात्र सीमित सीटों के लिए प्रतियोगी परीक्षाओं में उतर रहे हैं। दूसरी तरफ कोचिंग कल्चर तेजी से बढ़ रहा है।
माता-पिता अपने बच्चों को बेहतर भविष्य देना चाहते हैं। छात्र भी पीछे नहीं रहना चाहते। ऐसे में कोचिंग का सहारा लेना स्वाभाविक है। लेकिन यह भी जरूरी है कि तैयारी की यह दौड़ बच्चों के जीवन पर भारी न पड़े।
सरकार को प्रतियोगी परीक्षाओं में अवसर और सीटों को लेकर लगातार काम करना होगा। स्कूलों की पढ़ाई को मजबूत करना होगा। गांव और छोटे शहरों के छात्रों को बेहतर सुविधाएं देनी होंगी। वहीं माता-पिता को भी बच्चों पर सिर्फ नंबर और रैंक का दबाव डालने से बचना होगा।
कोचिंग कल्चर को पूरी तरह खत्म करना न संभव है और न शायद जरूरी। जरूरत इस बात की है कि कोचिंग स्कूल की जगह न ले और प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी बच्चों के पूरे जीवन पर हावी न हो।
आखिर शिक्षा का मकसद सिर्फ अच्छी रैंक हासिल करना नहीं है। एक बच्चे को बेहतर इंसान, जिम्मेदार नागरिक और अपने पैरों पर खड़ा होने लायक बनाना भी उतना ही जरूरी है।
अगर स्कूल मजबूत होंगे, गांव और शहर के छात्रों को बराबर मौका मिलेगा और बच्चों पर जरूरत से ज्यादा दबाव नहीं होगा, तभी भारत की पढ़ाई व्यवस्था सही दिशा में आगे बढ़ सकेगी।
