वंदे मातरम् की ‘आधी’ राजनीति: कांग्रेस ने दो पद गाए, बीजेपी ने पूरा सियासी राग छेड़ दिया!

वंदे मातरम् विवाद: कांग्रेस के 2 पद पर BJP का बड़ा सियासी हमला

न्यू दिल्ली. देश में जब भी चुनावी मौसम करवट लेने लगता है, तभी कोई न कोई ऐसा मुद्दा अचानक हवा में तैर जाता है, जिसकी न किसी को उम्मीद होती है, न जरूरत। इस बार बारी आई वंदे मातरम् की। कांग्रेस कार्य समिति यानी CWC ने अपने कार्यक्रमों में राष्ट्रीय गीत के सिर्फ पहले दो पद गाने का फैसला क्या लिया, बीजेपी खेमे में मानो दिवाली से पहले ही पटाखे फूटने लगे। अब पूरा देश यह तमाशा देख रहा है कि दो पंक्तियों के गीत पर इतना बड़ा घमासान कैसे मच सकता है।

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सच कहा जाए तो यह पूरा प्रकरण किसी मसालेदार सियासी सीरियल से कम नहीं है, जिसमें हर एपिसोड में नया ट्विस्ट है, हर सीन में नया डायलॉग है, और हर किरदार अपने-अपने वोट बैंक के हिसाब से स्क्रिप्ट बदल रहा है। सवाल यह नहीं है कि गीत के कितने पद गाए जाएं, सवाल यह है कि इस गीत के बहाने कौन किसकी सियासी जमीन खिसकाने में लगा है।

वंदे मातरम् की 'आधी' राजनीति

जब वंदे मातरम् की दो पंक्तियों ने मचा दी पूरे देश में हलचल

गौर करने वाली बात यह है कि कांग्रेस ने जो फैसला लिया, वह कोई नई खोज नहीं थी। यह वही परंपरा है जो 1937 से चली आ रही है, जब गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर की सलाह पर सर्वसम्मति से यह तय किया गया था कि राष्ट्रीय गीत के पहले दो पद ही सार्वजनिक कार्यक्रमों में गाए जाएंगे, ताकि हर समुदाय इसे सहजता से अपना सके। लेकिन जैसे ही यह फैसला दोबारा सामने आया, बीजेपी को मानो लॉटरी लग गई। तुरंत राष्ट्रवाद का चोला पहनकर मैदान में कूद पड़ी और कांग्रेस को तुष्टिकरण के कठघरे में खड़ा करने की मुहिम छेड़ दी।

अब जरा सोचिए, जिस परंपरा को खुद देश के महानतम कवि ने आशीर्वाद दिया हो, उसे 90 साल बाद अचानक ‘देशद्रोह’ की श्रेणी में डालने की कोशिश कितनी हास्यास्पद लगती है। मगर सियासत में तर्क कम, टाइमिंग ज्यादा मायने रखती है, और बीजेपी ने इस टाइमिंग को भुनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

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केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कांग्रेस के इस फैसले को तुष्टिकरण की राजनीति करार दिया। उनकी दलील थी कि राष्ट्रगीत को आधा-अधूरा गाना राष्ट्र के प्रति सम्मान में कमी दर्शाता है। दूसरी ओर केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा ने तो इतिहास के पन्ने पलटते हुए 1937 के कांग्रेस प्रस्ताव तक का जिक्र कर डाला और आरोप लगाया कि राष्ट्रीय गीत को दो हिस्सों में बांटने वाले इसी फैसले ने देश में दो-राष्ट्र सिद्धांत की नींव रखी थी।

वंदे मातरम् पर बीजेपी का चौतरफा हमला: गृह मंत्री से लेकर सांसद तक

अब यहीं पर बीजेपी की सियासी चाल और इतिहास की समझ पर सवाल उठने लगते हैं। एक गीत के दो पद गाने और देश के बंटवारे के बीच सीधा रिश्ता जोड़ देना, वह भी दशकों बाद, यह दिखाता है कि जब असली मुद्दे कमजोर पड़ने लगें, तो इतिहास से जुड़े भावनात्मक तार छेड़ना कितना आसान हथियार बन जाता है।

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इतना ही नहीं, केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह और सांसद दिनेश शर्मा ने तो कांग्रेस की तुलना सीधे मुस्लिम लीग और जिन्ना की सोच से कर डाली। अब यह तुलना सुनकर आम जनता के मन में बस एक ही सवाल उठता है – क्या किसी पुरानी परंपरा को दोहराने भर से कोई पार्टी इतिहास के सबसे विवादित किरदारों की कतार में खड़ी हो जाती है? अगर हां, तो फिर हर उस संस्था, संगठन और सरकार पर भी यही तर्क लागू होना चाहिए, जिसने पिछले सात दशकों में इसी परंपरा को आगे बढ़ाया।

वंदे मातरम् : कानून का सहारा और 150वीं वर्षगांठ का दांव

बीजेपी सरकार ने हाल ही में राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम अधिनियम में संशोधन कर वंदे मातरम् को जन-गण-मन के बराबर कानूनी दर्जा दे दिया है। इसके साथ ही सरकार इस गीत की 150वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में एक बड़ा देशव्यापी अभियान भी चला रही है। टाइमिंग देखिए – ठीक उसी दौर में जब यह अभियान चरम पर है, कांग्रेस का दो पद वाला पुराना फैसला सामने आता है और बीजेपी के हाथ मानो तैयार हथियार लग जाता है।

वंदे मातरम् की 150वीं वर्षगांठ – संस्कृति मंत्रालय

अब सवाल यह उठता है कि क्या यह सिर्फ इत्तेफाक है या फिर सोची-समझी रणनीति का हिस्सा, जहां एक तरफ कानूनी दर्जा बढ़ाकर मुद्दे को गंभीर बनाया गया और दूसरी तरफ विपक्ष के किसी भी पुराने फैसले को तत्काल राष्ट्रवाद बनाम तुष्टिकरण की बहस में तब्दील कर दिया गया। सियासत में टाइमिंग कभी इत्तेफाक नहीं होती, यह कहावत यहां एकदम सटीक बैठती है।

कांग्रेस की सफाई: ‘हम कुछ नया नहीं कर रहे, बस पुरानी परंपरा निभा रहे हैं’

कांग्रेस के पास भी अपना तर्क तैयार था। पार्टी महासचिव के.सी. वेणुगोपाल ने सफाई देते हुए कहा कि यह कोई नया फैसला नहीं, बल्कि 90 साल पुरानी ऐतिहासिक परंपरा है, जिसे गुरुदेव टैगोर की सलाह पर अपनाया गया था ताकि सभी समुदाय इस गीत से खुद को जोड़ सकें।

वन्दे मातरम पर कांग्रेस की सफाई

लेकिन यहां दिलचस्प बात यह है कि कांग्रेस अपनी सफाई में जितनी ऐतिहासिक गहराई दिखा रही है, उतनी ही राजनीतिक असुरक्षा भी झलक रही है। अगर पार्टी को अपने फैसले पर इतना ही भरोसा है, तो बार-बार सफाई देने की नौबत क्यों आ रही है? यह रक्षात्मक रुख खुद बताता है कि कांग्रेस भी कहीं न कहीं बीजेपी के नैरेटिव से घबराई हुई है। एक तरफ पार्टी परंपरा का हवाला देकर अपनी वैचारिक जमीन बचाने की कोशिश कर रही है, तो दूसरी तरफ यह डर भी सता रहा है कि कहीं यह मुद्दा उसकी छवि पर स्थायी दाग न छोड़ दे।

असली खेल वोट बैंक का, बाकी सब बहाना है

अब जरा पर्दे के पीछे झांकते हैं। यह पूरा विवाद सिर्फ राष्ट्रगान या राष्ट्रगीत के सम्मान का मामला नहीं, बल्कि वोट बैंक की शतरंज का एक और मोहरा है। कांग्रेस की नजर अपने उस पारंपरिक अल्पसंख्यक और वंचित वोट बैंक पर टिकी है, जो पिछले कुछ वर्षों में क्षेत्रीय दलों की तरफ खिसक चुका है। पार्टी को उम्मीद है कि 1937 वाले पुराने और समावेशी रुख को दोहराकर वह उस खोए हुए जनाधार को फिर से अपने पाले में ला सकती है।

दूसरी तरफ बीजेपी के लिए यह मौका राष्ट्रवाद के नाम पर अपने कोर हिंदू वोटर को और मजबूती से गोलबंद करने का है। जब भी चुनावी माहौल गरमाता है, राष्ट्रवाद बनाम तुष्टिकरण की बहस छेड़ना बीजेपी की आजमाई हुई रणनीति रही है। इतिहास गवाह है, अस्सी के दशक का शाह बानो मामला हो या इसके बाद के कई प्रकरण, बीजेपी ने हर बार ऐसे भावनात्मक मुद्दों को अपने पक्ष में भुनाया है। अब वंदे मातरम् उसी लिस्ट में नया नाम बनकर जुड़ गया है।

यानी सीधी भाषा में कहें तो न कांग्रेस को गीत के दो पदों से कोई खास फर्क पड़ रहा है, न बीजेपी को छह पदों से। असली मकसद है वोटर के दिलो-दिमाग में अपनी-अपनी छवि मजबूत करना, चाहे इसके लिए 90 साल पुराने इतिहास को खंगालना पड़े या फिर पुराने विवादों को नए सिरे से जिंदा करना पड़े।

राहुल गांधी की दोहरी रणनीति: जातिगत जनगणना और वैचारिक अडिगता

इस पूरे विवाद में राहुल गांधी की भूमिका भी गौर करने लायक है। एक तरफ वे जातिगत जनगणना की मांग उठाकर एससी, एसटी और ओबीसी वर्गों को अपने पाले में लाने की कोशिश में जुटे हैं, तो दूसरी तरफ वंदे मातरम् के मुद्दे पर 1937 के रुख पर अडिग रहकर यह संदेश देना चाहते हैं कि पार्टी अपने धर्मनिरपेक्ष सिद्धांतों से एक इंच भी पीछे नहीं हटेगी।

राहुल गांधी की दोहरी रणनीति

यह दोहरी रणनीति अपने आप में दिलचस्प है। एक तरफ सामाजिक न्याय का कार्ड, दूसरी तरफ वैचारिक अडिगता का कार्ड – दोनों को साथ साधने की कोशिश में कांग्रेस खुद को एक ऐसे चौराहे पर खड़ा पाती है, जहां हर रास्ता किसी न किसी वोट बैंक की तरफ तो जाता है, लेकिन कोई भी रास्ता पूरी तरह सुरक्षित नहीं दिखता।

तो क्या कांग्रेस बीजेपी के जाल में फंस गई?

अब असली सवाल क्या कांग्रेस बीजेपी के राष्ट्रवाद बनाम तुष्टिकरण के चक्रव्यूह में उलझ गई है, या फिर उसने जानबूझकर यह जोखिम उठाया है? इसका जवाब शायद दोनों तरफ थोड़ा-थोड़ा है।

एक तरफ यह सच है कि कांग्रेस को इस बात का बखूबी अंदाजा रहा होगा कि उसका यह फैसला बीजेपी को हमला बोलने का मौका जरूर देगा। इसके बावजूद पार्टी ने यह रास्ता चुना, जिससे यह भी संकेत मिलता है कि यह कोई अनजाने में हुई गलती नहीं, बल्कि सोच-समझकर उठाया गया कदम है। दूसरी तरफ यह भी उतना ही सच है कि बीजेपी ने जिस तेजी और आक्रामकता से इस मुद्दे को लपका, उसने कांग्रेस को बचाव की मुद्रा में जरूर धकेल दिया।

यानी न तो यह पूरी तरह कांग्रेस की सोची-समझी चाल कही जा सकती है, न ही यह सिर्फ बीजेपी के जाल में फंसने की कहानी। यह उससे कहीं ज्यादा एक ऐसा सियासी दांव है, जिसमें दोनों पक्ष अपने-अपने फायदे के हिसाब से मुद्दे को तोड़-मरोड़ रहे हैं।

आम जनता के लिए असली सवाल कहां गुम हो गया?

अब जरा सोचिए, महंगाई की मार झेल रहा आम आदमी, बेरोजगारी से जूझता युवा, और खेतों में मेहनत कर रहा किसान – इन सबका इस पूरे विवाद से क्या लेना-देना है? न तो गीत के दो पद गाने से किसी की जेब भरेगी, न छह पद गाने से किसी की नौकरी लगेगी। लेकिन सियासत का यही तो खेल है – जब असली मुद्दों पर जवाब देना मुश्किल हो जाए, तो भावनात्मक और प्रतीकात्मक मुद्दों को आगे कर दो, ताकि जनता का ध्यान बंटा रहे।

यह कोई नई बात नहीं है। हर चुनावी मौसम में कोई न कोई ऐसा प्रतीकात्मक मुद्दा उठाया जाता है, जो अखबारों की सुर्खियां तो बटोर लेता है, लेकिन जमीनी हकीकत पर उसका कोई असर नहीं पड़ता। वंदे मातरम् का यह विवाद भी उसी परंपरा की एक और कड़ी है।

इतिहास बनाम राजनीति: कौन सही, कौन गलत?

निष्पक्ष होकर देखा जाए, तो इतिहास के तथ्य कांग्रेस के पक्ष में मजबूती से खड़े नजर आते हैं। 1937 का फैसला वाकई सामाजिक समरसता को ध्यान में रखकर लिया गया था, और इसमें खुद रवींद्रनाथ टैगोर जैसे राष्ट्रीय विचारक की सहमति शामिल थी। इसे सीधे तौर पर देशद्रोह या तुष्टिकरण से जोड़ना ऐतिहासिक तथ्यों के साथ अन्याय है।

लेकिन दूसरी तरफ यह भी उतना ही सच है कि राजनीति में तथ्यों से ज्यादा नैरेटिव मायने रखता है। बीजेपी को इस बात की अच्छी तरह समझ है कि आम जनता को बारीक ऐतिहासिक तथ्यों में उलझाने के बजाय भावनात्मक नारों में उलझाना कहीं ज्यादा आसान और असरदार है। यही वजह है कि तथ्यात्मक रूप से कमजोर होने के बावजूद यह नैरेटिव सोशल मीडिया से लेकर चुनावी सभाओं तक तेजी से फैल रहा है।

दोनों पार्टियों का दोहरा चरित्र

तटस्थ नजर से देखा जाए, तो इस पूरे विवाद में दोनों प्रमुख पार्टियां अपने-अपने दोहरे चरित्र का प्रदर्शन कर रही हैं। बीजेपी जिस राष्ट्रवाद का झंडा बुलंद कर रही है, वही पार्टी जरूरत पड़ने पर क्षेत्रीय और जातीय समीकरणों को भी उतनी ही तेजी से भुनाती रही है। वहीं कांग्रेस जिस धर्मनिरपेक्षता और समावेशिता की दुहाई दे रही है, वही पार्टी सत्ता में रहते हुए कई मौकों पर नरम हिंदुत्व का सहारा भी लेती रही है।

यानी दोनों पार्टियां अपनी सुविधा के हिसाब से विचारधारा का चोला बदलती रहती हैं। जब वोट बैंक साधना हो तो धर्मनिरपेक्षता याद आती है, और जब बहुसंख्यक वोटर को लुभाना हो तो राष्ट्रवाद का नारा बुलंद हो जाता है। जनता बस मूकदर्शक बनी यह तमाशा देखती रह जाती है।

सोशल मीडिया पर मचा घमासान

इस पूरे विवाद ने सोशल मीडिया पर भी जबरदस्त हलचल मचा दी है। एक तरफ बीजेपी समर्थक कांग्रेस को राष्ट्रविरोधी करार देने में जुटे हैं, तो दूसरी तरफ कांग्रेस समर्थक इतिहास के पन्ने खंगालकर बीजेपी नेताओं की पुरानी बयानबाजी और कथित दोहरे मापदंडों को उजागर करने में लगे हैं। हैशटैग वॉर से लेकर मीम्स की बौछार तक, हर मंच पर यह मुद्दा छाया हुआ है।

मजे की बात यह है कि इस डिजिटल जंग में असली मुद्दा कहीं पीछे छूट गया है और अब यह पूरी बहस सिर्फ “कौन ज्यादा देशभक्त है” के इर्द-गिर्द सिमट गई है। न कोई गीत के इतिहास पर गंभीरता से बात कर रहा है, न कोई इसके सामाजिक महत्व पर चर्चा कर रहा है। बस एक-दूसरे पर कीचड़ उछालने की होड़ मची हुई है।

विशेषज्ञों की राय: प्रतीकात्मक राजनीति का नया अध्याय

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद आने वाले चुनावों से पहले प्रतीकात्मक राजनीति के एक नए अध्याय की शुरुआत भर है। जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आएंगे, ऐसे और भी भावनात्मक मुद्दे सतह पर आते रहेंगे, जिनका सीधा संबंध रोजी-रोटी, शिक्षा, स्वास्थ्य या रोजगार जैसे बुनियादी सवालों से नहीं होगा, लेकिन जो चुनावी माहौल को गरमाने में जरूर कामयाब होंगे।

विश्लेषकों का यह भी कहना है कि दोनों पार्टियां इस तरह के मुद्दों का इस्तेमाल एक-दूसरे की कमजोरियों को छिपाने के लिए भी करती हैं। जब आर्थिक मोर्चे पर घेरने की स्थिति कमजोर पड़ती है, तो सांस्कृतिक और राष्ट्रवादी मुद्दों की आड़ ली जाती है। यह कोई नई रणनीति नहीं, बल्कि भारतीय राजनीति का एक पुराना और आजमाया हुआ नुस्खा है।

वंदे मातरम् : गीत एक, राग अनेक

आखिर में बात सीधी और साफ है – वंदे मातरम् एक ऐसा राष्ट्रीय गीत है, जिसने आजादी की लड़ाई में करोड़ों देशवासियों के दिलों में जोश भरा था। यह गीत किसी पार्टी विशेष की बपौती नहीं, बल्कि पूरे देश की साझी विरासत है। लेकिन अफसोस की बात यह है कि आज इसी गीत को सियासी हथियार बनाकर एक-दूसरे पर वार करने का जरिया बना दिया गया है।

न कांग्रेस का दो पद गाने का फैसला किसी राष्ट्रद्रोह की श्रेणी में आता है, न बीजेपी का छह पद गाने पर जोर देना किसी परम राष्ट्रभक्ति का प्रमाणपत्र है। यह पूरा विवाद सिर्फ और सिर्फ आगामी चुनावों से पहले अपने-अपने वोट बैंक को साधने और भावनात्मक मुद्दों के सहारे असली सवालों से जनता का ध्यान भटकाने की कवायद भर है।

अब देखना यह दिलचस्प होगा कि यह सियासी राग आने वाले दिनों में और कितना ऊंचा उठता है, और क्या जनता इस बार भी इस भावनात्मक नैरेटिव में उलझती है या फिर रोजी-रोटी, महंगाई और रोजगार जैसे असली मुद्दों पर सवाल पूछने की हिम्मत दिखाती है। फिलहाल तो इतना तय है – गीत वही है, बस राग बदलते रहते हैं, और हर राग के पीछे छिपा है एक ही सुर – सत्ता की चाबी।

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