परमिट के नाम पर घंटों बिजली गुल! देवनगर सेंटर की बिजली कटौती से त्रस्त सैकड़ों ग्रामीण

सूरजपुर। जिस मेंटेनेंस और लाइन सुधार के नाम पर विद्युत विभाग हर साल लाखों रुपये खर्च करने का दावा करता है, धरातल पर उसकी हकीकत पूरी तरह उलट नजर आ रही है। सूरजपुर जिले के देवनगर विद्युत वितरण केंद्र से जुड़े दर्जनों गांवों में बिजली कटौती अब कोई अपवाद नहीं, बल्कि रोजमर्रा की आदत बन चुकी है। न आंधी का प्रकोप है, न बारिश का कहर, फिर भी दिन में दस से पंद्रह बार लाइन ट्रिप होना और घंटों तक अघोषित बिजली कटौती झेलना यहां के ग्रामीणों की नियति बन गई है।

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जूर, भवराही और कलुआ फीडर से जुड़े क्षेत्रों में बीते कई हफ्तों से बिजली कटौती की समस्या इतनी गंभीर हो चुकी है कि घरेलू उपभोक्ताओं से लेकर छोटे व्यापारियों तक, हर कोई इससे प्रभावित है। सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि जब पूरे क्षेत्र में गणेश चतुर्थी और हरितालिका तीज जैसे बड़े पर्व मनाए जा रहे थे, ठीक उसी दौरान बिजली कटौती ने अपना सबसे विकराल रूप दिखाया। पंडालों में पूजा-अर्चना के बीच अंधेरा छा जाना और घरों में व्रत-त्योहार की तैयारियों के बीच बत्ती गुल हो जाना, इस बार आम बात हो गई थी।

परमिट सिस्टम की खामी बनी बिजली कटौती की असली जड़

इस पूरे मामले में सबसे अहम और नया पहलू वह है जो सीधे विद्युत उपकेंद्र के भीतर की कार्यप्रणाली से जुड़ा है। सब-स्टेशन ग्रुप से मिली जानकारी के अनुसार, जूर, भवराही और कलुआ फीडर में दिनभर सिर्फ परमिट लेने और लाइन चालू करने का सिलसिला चलता रहता है। किसी भी छोटे-मोटे काम के लिए बार-बार परमिट लिया जाता है, और हर परमिट के साथ पूरी लाइन को कुछ समय के लिए बंद करना पड़ता है। कभी दस मिनट के अंतराल में परमिट जारी होता है तो कभी कुछ ही मिनटों में लाइन ट्रिप होने का संदेश आ जाता है। नतीजा यह है कि पूरे दिन में एक घंटे भी उपभोक्ताओं को निर्बाध बिजली आपूर्ति नसीब नहीं होती।

यही परमिट-आधारित कार्यशैली अब बिजली कटौती की सबसे बड़ी वजह बनकर सामने आई है। तकनीकी रूप से देखा जाए तो परमिट लेना एक सामान्य सुरक्षा प्रक्रिया है, जो लाइनमैन और तकनीकी कर्मचारियों की सुरक्षा के लिए जरूरी होती है। लेकिन जब यही प्रक्रिया बिना किसी ठोस योजना और समन्वय के बार-बार दोहराई जाती है, तो यह आम उपभोक्ता के लिए अघोषित बिजली कटौती का पर्याय बन जाती है। ग्रामीणों का कहना है कि विभाग के पास न तो परमिट के समय को व्यवस्थित करने की कोई नीति है और न ही यह सुनिश्चित करने की कोई व्यवस्था कि छोटे-छोटे कार्यों के लिए बार-बार पूरी लाइन बंद न की जाए।

त्योहारों के बीच बिजली कटौती ने बढ़ाई ग्रामीणों की परेशानी

गणेश चतुर्थी और हरितालिका तीज जैसे पर्वों पर जब घरों और सार्वजनिक पंडालों में पूजा-अर्चना का सिलसिला चल रहा था, ठीक उसी वक्त जूर और भवराही फीडर में लगातार बिजली गुल रहने से श्रद्धालुओं को भारी परेशानी झेलनी पड़ी। पंडालों में सजी झांकियां अंधेरे में डूब गईं, लाउडस्पीकर और सजावटी लाइटिंग व्यवस्था ठप हो गई, और घरों में पूजा की तैयारियां बाधित हुईं। उपभोक्ताओं ने तंज कसते हुए कहा कि ऐसा प्रतीत होता है मानो विभाग त्योहारों के समय के लिए विशेष रूप से कटौती की योजना बनाकर रखता है।

यह पहली बार नहीं है जब पर्व-त्योहार के दौरान बिजली कटौती ने ग्रामीणों की खुशियों पर पानी फेरा हो, लेकिन इस बार समस्या की तीव्रता और अवधि पहले से कहीं अधिक रही। स्थानीय निवासियों का कहना है कि पर्व के दिनों में विशेष निगरानी और निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करने के बजाय विभाग का रवैया पूरी तरह उदासीन बना रहा।

दिनभर में चार घंटे से लेकर पूरे दिन तक बिजली कटौती

देवनगर वितरण केंद्र से जुड़े क्षेत्रों में बिजली कटौती की अवधि किसी निश्चित पैटर्न का पालन नहीं करती, यही वजह है कि उपभोक्ता किसी भी तरह की योजना नहीं बना पाते। कभी दिनभर में चार घंटे बिजली गायब रहती है, तो कभी पूरे दिन के लिए ही आपूर्ति ठप कर दी जाती है। इस अनियमितता ने ग्रामीणों की दिनचर्या को पूरी तरह अस्त-व्यस्त कर दिया है। न तो वे यह तय कर पाते हैं कि कब पानी की मोटर चलाकर टंकी भरें, न ही यह अनुमान लगा पाते हैं कि कब बच्चों की ऑनलाइन पढ़ाई सुचारू रूप से हो पाएगी।

बिजली कटौती के इस अनियमित पैटर्न ने छोटे किसानों को भी प्रभावित किया है, जो सिंचाई के लिए विद्युत मोटर पंपों पर निर्भर हैं। खेतों की सिंचाई का समय तय न हो पाने से फसलों को भी नुकसान पहुंचने की आशंका जताई जा रही है। इसके अलावा घरों में उपयोग होने वाले फ्रिज, कूलर और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरण भी बार-बार की ट्रिपिंग के कारण खराब होने की कगार पर पहुंच गए हैं।

शिकायत करने पर भी नहीं मिलता जवाब, बिजली कटौती पर खानापूर्ति

बार-बार बत्ती गुल होने पर जब उपभोक्ता संबंधित कनिष्ठ यंत्री (जेई) या कार्यालय से संपर्क करने की कोशिश करते हैं, तो अक्सर फोन उठाया ही नहीं जाता। यदि किसी तरह संपर्क हो भी जाए, तो जवाब में सिर्फ इतना कहा जाता है कि “लाइनमैन को भेजा है, देख रहे हैं।” इस तरह की खानापूर्ति वाली प्रतिक्रिया से उपभोक्ताओं में गहरा आक्रोश है। उनका कहना है कि जब समस्या की जड़ तक पहुंचने और उसका स्थायी समाधान निकालने की बजाय सिर्फ टालमटोल वाला रवैया अपनाया जाएगा, तो बिजली कटौती की समस्या कभी खत्म नहीं होगी।

ग्रामीणों का यह भी आरोप है कि शिकायत दर्ज कराने के बाद भी उसकी कोई लिखित रसीद या ट्रैकिंग व्यवस्था नहीं होती, जिससे यह पता ही नहीं चल पाता कि शिकायत पर कोई कार्रवाई हुई भी या नहीं। पारदर्शिता की इस कमी ने विभाग और उपभोक्ताओं के बीच भरोसे की खाई को और गहरा कर दिया है।

मेंटेनेंस बजट खर्च होने के बावजूद बिजली कटौती बरकरार

सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब हर साल मेंटेनेंस और लाइन सुधार के नाम पर लाखों रुपये खर्च किए जाने का दावा किया जाता है, तो फिर बिजली कटौती की समस्या इतनी गंभीर क्यों बनी हुई है। जमीनी स्तर पर न तो जर्जर तारों को बदला गया दिखता है, न ही ट्रांसफार्मरों की क्षमता में कोई सुधार नजर आता है। ग्रामीणों का कहना है कि मेंटेनेंस के नाम पर होने वाला खर्च सिर्फ कागजों तक सीमित रह जाता है, जबकि जमीनी हकीकत जस की तस बनी रहती है।

यह स्थिति तब है जब जूर, भवराही और कलुआ जैसे फीडर पहले से ही तकनीकी खामियों से जूझ रहे हैं। बार-बार ट्रिपिंग की समस्या यह संकेत देती है कि इन फीडरों की लोड क्षमता, तारों की गुणवत्ता और ट्रांसफार्मरों की स्थिति की गंभीरता से समीक्षा नहीं की गई है। बिना ठोस तकनीकी ऑडिट के सिर्फ बजट खर्च कर देने भर से बिजली कटौती जैसी समस्याओं का समाधान संभव नहीं है।

महंगे उपकरण हो रहे खराब, पेयजल आपूर्ति भी प्रभावित

बार-बार की ट्रिपिंग और अघोषित बिजली कटौती का सबसे सीधा असर घरों में लगे महंगे इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों पर पड़ रहा है। बिना किसी पूर्व सूचना के अचानक बिजली आने-जाने से वोल्टेज में उतार-चढ़ाव होता है, जिससे फ्रिज, टीवी, कूलर और पंखे जैसे उपकरण खराब हो रहे हैं। कई ग्रामीणों ने बताया कि बीते कुछ महीनों में उन्हें उपकरण मरम्मत पर अतिरिक्त खर्च उठाना पड़ा है, जो सीधे तौर पर विभाग की लापरवाही का नतीजा है।

इसके अलावा बिजली कटौती का असर पेयजल आपूर्ति पर भी पड़ रहा है। ग्रामीण इलाकों में जलापूर्ति के लिए लगे मोटर पंप बिजली पर निर्भर हैं। जब घंटों बिजली गायब रहती है, तो पानी की टंकियां खाली रह जाती हैं और लोगों को पानी के लिए भी जूझना पड़ता है। गर्मी के मौसम में यह समस्या और विकराल रूप ले लेती है, जब पानी की जरूरत सबसे ज्यादा होती है।

छोटे व्यापार पर भी पड़ी बिजली कटौती की मार

देवनगर वितरण केंद्र से जुड़े गांवों में छोटे व्यापारी भी बिजली कटौती से बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। आटा चक्की, वेल्डिंग की दुकानें, मोबाइल रिपेयरिंग सेंटर, और अन्य छोटे प्रतिष्ठान जो बिजली पर निर्भर हैं, उन्हें रोजाना घंटों काम-धंधा बंद रखना पड़ रहा है। इससे उनकी आमदनी पर सीधा असर पड़ा है। कई दुकानदारों ने बताया कि ग्राहक आते हैं, लेकिन बिजली न होने के कारण उन्हें काम किए बिना ही लौटना पड़ता है।

छोटे व्यापारियों का कहना है कि यदि बिजली कटौती का यही सिलसिला जारी रहा, तो उनके सामने आर्थिक संकट खड़ा हो सकता है। कुछ व्यापारियों ने वैकल्पिक इंतजाम के तौर पर जनरेटर या इन्वर्टर का सहारा लेना शुरू कर दिया है, लेकिन इसमें होने वाला अतिरिक्त खर्च उनकी जेब पर भारी पड़ रहा है।

तकनीकी नजरिए से समझें बार-बार ट्रिपिंग की वजह

बिजली विभाग से जुड़े जानकारों के अनुसार बार-बार ट्रिपिंग की समस्या आमतौर पर कुछ प्रमुख वजहों से होती है: ओवरलोडेड फीडर, जर्जर या पुराने तार, ढीले जोड़, और ट्रांसफार्मरों की क्षमता से अधिक लोड। यदि किसी फीडर पर तय क्षमता से अधिक उपभोक्ता जोड़ दिए जाएं और उसी अनुपात में तकनीकी उन्नयन न किया जाए, तो लाइन का बार-बार ट्रिप होना स्वाभाविक परिणाम है। इसके अलावा नियमित निगरानी और समय पर मरम्मत की कमी भी बिजली कटौती की समस्या को और बढ़ा देती है।

देवनगर वितरण केंद्र के मामले में भी यही स्थिति नजर आती है। जूर, भवराही और कलुआ फीडर में लगातार परमिट और ट्रिपिंग का सिलसिला यह दर्शाता है कि इन लाइनों पर तकनीकी दबाव काफी अधिक है। बिना विस्तृत लोड सर्वे और तकनीकी ऑडिट के इस समस्या का स्थायी समाधान निकाल पाना मुश्किल है। जब तक जड़ की समस्या को नहीं पहचाना जाएगा, तब तक बिजली कटौती का यह सिलसिला यूं ही जारी रहने की आशंका है।

ग्रामीणों की मांग: जांच हो, जवाबदेही तय हो

परेशान ग्रामीणों ने उच्चाधिकारियों से स्पष्ट मांग की है कि देवनगर वितरण केंद्र अंतर्गत भवराही और जूर फीडर की तकनीकी खामियों की गहन जांच कराई जाए। उनका कहना है कि सिर्फ मौखिक आश्वासन देने या लाइनमैन भेजने भर से समस्या का समाधान नहीं होगा, बल्कि इसके लिए ठोस तकनीकी हस्तक्षेप जरूरी है। ग्रामीणों की प्रमुख मांगें इस प्रकार हैं:

  • अघोषित बिजली कटौती पर तत्काल रोक लगाई जाए और किसी भी नियोजित कटौती की पूर्व सूचना उपभोक्ताओं को दी जाए।
  • जूर, भवराही और कलुआ फीडर की तकनीकी क्षमता और लोड की विस्तृत समीक्षा कराई जाए।
  • मेंटेनेंस के नाम पर खर्च किए जा रहे बजट का सार्वजनिक ब्योरा जारी किया जाए, ताकि पारदर्शिता सुनिश्चित हो सके।
  • शिकायत निवारण के लिए एक प्रभावी और जवाबदेह तंत्र स्थापित किया जाए, जिसमें हर शिकायत की ट्रैकिंग संभव हो।
  • जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों की जवाबदेही तय की जाए, ताकि लापरवाही बरतने वालों पर कार्रवाई हो सके।

बिजली कटौती से निपटने के लिए जरूरी है दीर्घकालिक योजना

विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी क्षेत्र में बार-बार होने वाली बिजली कटौती को रोकने के लिए अल्पकालिक उपायों से ज्यादा दीर्घकालिक योजना की जरूरत होती है। इसमें फीडर विभाजन, ट्रांसफार्मर क्षमता वृद्धि, पुराने जर्जर तारों का समय पर प्रतिस्थापन, और नियमित तकनीकी निगरानी जैसे कदम शामिल हैं। इसके साथ ही परमिट प्रणाली को भी व्यवस्थित करने की जरूरत है, ताकि छोटे-छोटे कार्यों के लिए बार-बार पूरी लाइन बंद करने की बजाय योजनाबद्ध तरीके से काम पूरा किया जा सके।

देवनगर वितरण केंद्र के मामले में यदि विभाग वास्तव में बिजली कटौती की समस्या को गंभीरता से लेना चाहता है, तो उसे सबसे पहले फीडर-वार डेटा का विश्लेषण करना होगा। यह समझना होगा कि किस समय, किस वजह से और कितनी देर के लिए लाइन बंद की जा रही है। इस डेटा के आधार पर ही कोई ठोस कार्ययोजना बनाई जा सकती है, जो वास्तव में ग्रामीणों को राहत दे सके।

कागजों पर मेंटेनेंस, जमीन पर बिजली कटौती की मार

सूरजपुर जिले के देवनगर वितरण केंद्र से जुड़े गांवों की कहानी यह साफ बताती है कि सरकारी दावों और जमीनी हकीकत के बीच कितना बड़ा फासला है। एक तरफ मेंटेनेंस और लाइन सुधार के नाम पर लाखों रुपये खर्च होने का दावा किया जा रहा है, तो दूसरी तरफ ग्रामीणों को दिन में दस से पंद्रह बार ट्रिपिंग और घंटों की अघोषित बिजली कटौती झेलनी पड़ रही है। त्योहारों के दौरान भी राहत न मिलना यह दर्शाता है कि विभाग की प्राथमिकताओं में उपभोक्ताओं की सुविधा शायद सबसे नीचे है।

जब तक जूर, भवराही और कलुआ फीडर की तकनीकी खामियों की गहन जांच नहीं होती और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय नहीं की जाती, तब तक बिजली कटौती की यह समस्या यूं ही बनी रहने की आशंका है। ग्रामीणों की मांग सीधी और स्पष्ट है—उन्हें सिर्फ आश्वासन नहीं, बल्कि निर्बाध और भरोसेमंद बिजली आपूर्ति चाहिए।

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