वाह रे सरकार! जंगल काटो, कंपनी को सौंपो, और नाम रख दो “विकास”

छत्तीसगढ़ को कभी “हरियर छत्तीसगढ़” कहा जाता था। स्कूल की किताबों में पढ़ाया जाता था, सरकारी पंपलेटों पर छापा जाता था, नेताओं के भाषणों में गर्व से बताया जाता था कि यह वो राज्य है जिसकी शान इसके घने जंगल हैं, इसके वन्यजीव हैं, इसकी नदियां हैं। लेकिन आजकल लगता है जैसे यह नारा बदलकर कुछ और हो गया है—”कटर छत्तीसगढ़”। जिधर देखो उधर आरी चल रही है, जिधर देखो उधर पेड़ गिर रहे हैं, और सरकार है कि मानो किसी शादी में सबसे बड़ा दहेज देने पर तुली हो—बस फर्क इतना है कि दहेज में जमीन, जंगल और जनता की आवाज सब कुछ पैक करके भेजा जा रहा है, और लेने वाला कोई और नहीं, बड़े-बड़े औद्योगिक घराने हैं।

सवाल यह है कि आखिर सरकार को यह “विकास” वाला बुखार इतनी शिद्दत से किस दवा से चढ़ा है? और यह बुखार भी ऐसा कि ठीक तभी उतरता दिखता है जब बात किसी बड़ी कंपनी को जंगल सौंपने की हो।

“विकास” का मतलब अब सिर्फ पेड़ काटना रह गया है क्या?

कभी विकास का मतलब होता था स्कूल खुलना, अस्पताल बनना, सड़कें बिछना, नौकरियां मिलना। अब लगता है सरकार के शब्दकोश में विकास का नया और चमकदार मतलब जुड़ गया है—”जंगल साफ करो, कोयला निकालो, कंपनी को थमाओ, और प्रेस नोट में लिख दो ‘ऐतिहासिक फैसला’।” वाह क्या तरक्की है! जिस राज्य को अपने जंगलों की वजह से पहचान मिली, उसी राज्य की सरकार अब जंगल कम करके “प्रगति” नाप रही है, जैसे कोई डॉक्टर मरीज का वजन घटाकर उसे सेहतमंद बता रहा हो।

हसदेव अरण्य को ही ले लीजिए। इसे छत्तीसगढ़ का “फेफड़ा” कहा जाता है—यानी जिस तरह इंसान बिना फेफड़ों के जिंदा नहीं रह सकता, उसी तरह यह जंगल पूरे प्रदेश की सांसों का सहारा है। लेकिन इसी फेफड़े पर, माफ कीजिएगा, यह कहना ज्यादा सही होगा—इसी फेफड़े में आरी घुसाई जा रही है। परसा ईस्ट और कांता बसन कोयला खदान के लिए यहां हजारों पेड़ पहले ही काटे जा चुके हैं, और खबर है कि आगे ढाई लाख से भी ज्यादा पेड़ कटने वाले हैं। ढाई लाख! यह संख्या सुनकर एक बार को लगता है कि शायद टाइपिंग की गलती है, लेकिन नहीं, यह असली आंकड़ा है। मगर सरकार को इससे कोई खास फर्क नहीं पड़ता—आखिर पेड़ वोट तो देते नहीं।

और सबसे मजेदार बात यह है कि यह सब तब हो रहा है जब पूरा देश ढिंढोरा पीट रहा है कि हम सौर ऊर्जा में आगे बढ़ रहे हैं, पवन ऊर्जा में मिसाल कायम कर रहे हैं, हरित ऊर्जा हमारा भविष्य है। तो फिर भाई साहब, जब सूरज और हवा से बिजली बनानी है, तो नई-नई कोयला खदानें खोदने की इतनी हड़बड़ी किस बात की है? क्या यह “विकास” है, या फिर किसी और की तिजोरी भरने की योजना है, जिसे “विकास” का खूबसूरत चोगा पहनाकर जनता के सामने परोसा जा रहा है, जैसे बासी सब्जी पर ताजा हरी धनिया छिड़ककर पेश कर दी जाए?

अडानी के लिए बिछाया जा रहा है लाल कालीन, जनता के लिए सिर्फ आश्वासन

अब जरा उस नाम की बात कर लें, जो इन तमाम विवादों में बार-बार, बड़ी बेशर्मी से सामने आता रहता है—अडानी समूह। हसदेव अरण्य में जो कोयला खदानें चल रही हैं और जो नई खदानें कतार में लगी हैं, उनका जमीनी संचालन एमडीओ यानी माइन डेवलपर एंड ऑपरेटर के तौर पर अडानी समूह के पास है। कागजों में भले कोयला राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम के नाम आवंटित हो, लेकिन असली खेल तो मैदान में कौन खेल रहा है, यह किसी से छिपा नहीं।

केते एक्सटेंशन कोल ब्लॉक को लेकर जो नई मंजूरी की प्रक्रिया चल रही है, उसमें करीब सात लाख पेड़ों की कटाई की बात सामने आई है। सात लाख पेड़! इतने पेड़ तो शायद किसी पूरे शहर में मुश्किल से हों। लेकिन सरकारी फाइलों को इससे कोई परहेज नहीं—फाइलें आगे बढ़नी हैं, बैठकें होनी हैं, और आखिर में मुहर लगनी है। मानो पेड़ नहीं, कागज के टुकड़े काटे जा रहे हों।

अब सवाल यह उठता है—क्या यह सिर्फ इत्तेफाक है कि जब भी किसी बड़े कोल ब्लॉक की बात आती है, तो घूम-फिरकर मामला उसी एक कंपनी के इर्द-गिर्द आकर टिक जाता है? क्या यह सिर्फ संयोग है, या फिर यह कोई सोची-समझी, बाकायदा प्लान की गई व्यवस्था है, जिसमें सरकार महज एक “सुविधा केंद्र” बनकर रह गई है, जिसका काम सिर्फ स्टाम्प लगाना और सलामी ठोकना भर रह गया है?

पूर्व मंत्री टीएस सिंहदेव ने भी इस पर खुलकर सवाल उठाए और आरोप लगाया कि नई खदान की मंजूरी का असली मकसद जनहित और पर्यावरण की अनदेखी करके एक निजी कंपनी को फायदा पहुंचाना है। जब खुद सत्ता के गलियारों में रह चुके लोग ऐसे सवाल उठाएं, तो आम आदमी के मन में शक होना कोई अपराध नहीं, बल्कि समझदारी है।

रामगढ़ पहाड़ में दरारें, और सरकार की आंखों पर पट्टी

हसदेव क्षेत्र में जो नई खदान प्रस्तावित है, वह सरगुजा के ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व वाले रामगढ़ पहाड़ से बिल्कुल सटी हुई है। यह वही पहाड़ है जिसका जिक्र पुरानी लोक-कथाओं और ग्रंथों तक में मिलता है, जो सदियों से यहां की सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा रहा है। लेकिन पहले से चल रही कोयला परियोजनाओं की वजह से इस पहाड़ में दरारें आने और चट्टानों के टूटने की घटनाएं सामने आ चुकी हैं। सोचिए, जब मौजूदा खनन से ही पहाड़ दरक रहा है, तो नई खदान की मंजूरी के बाद इस ऐतिहासिक धरोहर का क्या हश्र होगा? शायद अगली पीढ़ी को रामगढ़ पहाड़ सिर्फ पुरानी तस्वीरों और किताबों में ही देखने को मिले।

लेकिन सरकार को इससे कोई खास सरोकार नजर नहीं आता। फाइलों में मंजूरी की मुहर लगनी है, समितियां बैठनी हैं, बैठकों के मिनट्स लिखे जाने हैं—और इस पूरी औपचारिक प्रक्रिया के बीच वह पहाड़, वो जंगल, वो नदियां, और वो लोग कहीं गुम हो जाते हैं, जिनके लिए यह सब कुछ असल मायने रखता है। मानो कोई डॉक्टर मरीज की फाइल तो पढ़ रहा हो, लेकिन मरीज की तरफ देखने की जहमत ही न उठाए।

जब जनता कहे “नहीं चाहिए”, तब भी जबरदस्ती क्यों?

यह सबसे बड़ा, सबसे तीखा और सबसे शर्मनाक सवाल है। जब हसदेव क्षेत्र के गांव-गांव में लोग अपने जंगल को बचाने के लिए सड़कों पर उतर आए, पुलिस के सामने डटकर खड़े हो गए, तब भी पेड़ों की कटाई नहीं रुकी। ग्रामीणों ने बार-बार, बुलंद आवाज में कहा कि उन्हें कोयला खदान नहीं चाहिए, उन्हें अपना जंगल चाहिए, अपनी जमीन चाहिए, अपनी परंपरागत आजीविका चाहिए। लेकिन सैकड़ों पुलिसकर्मियों की मौजूदगी में पेड़ों की कटाई का काम बदस्तूर जारी रहा, जैसे लोकतंत्र में जनता की “ना” सिर्फ औपचारिकता भर रह गई हो, जिसे सुनकर अनसुना करना ही असली प्रशासनिक कौशल माना जाता हो।

सवाल यह है कि जब जमीन के असली हकदार, यानी वहां पीढ़ियों से रहने वाले आदिवासी और ग्रामीण, खुद उद्योग नहीं चाहते, तो फिर सरकार किसके कहने पर, किसके फायदे के लिए यह सब करवा रही है? क्या लोकतंत्र में यह सामान्य बात है कि जनता “ना” कहे और सरकार फिर भी “हां” कहलवाने के लिए पुलिस बल का सहारा ले? क्या विकास वही है जो जनता की इच्छा के खिलाफ जाकर, उनके घर-द्वार, उनके देवी-देवता, उनके जंगल को उजाड़कर जबरन थोपा जाए? यह सवाल हर उस व्यक्ति को अपने आप से जरूर पूछना चाहिए, जो टीवी पर बैठकर बड़े-बड़े “विकास” के नारे सुनता है और तालियां बजाता है।

छोटे स्तर पर भी वही खेल, बस पर्दा अलग

अब सिर्फ बड़ी कंपनियों और बड़े कोल ब्लॉक की बात नहीं, छोटे स्तर पर भी हालात कुछ कम शर्मनाक नहीं हैं। कांकेर जिले के कोरर वन क्षेत्र की कच्छ डोंगरी में वनाधिकार पट्टे की उम्मीद में सैकड़ों हरे-भरे और इमारती पेड़ों की कटाई कर दी गई—यानी जिस कानून का मकसद आदिवासियों को उनकी जमीन का हक दिलाना था, उसी कानून की आड़ में जंगल साफ करने का नया धंधा शुरू हो गया। वाह, क्या तरकीब निकाली गई है!

बलरामपुर के शंकरगढ़ वन परिक्षेत्र में बेलकोना गांव से हजारों बेशकीमती पेड़ों की अवैध कटाई सामने आई और धीरे-धीरे वन भूमि पर कब्जा होता चला गया। सूरजपुर के केतका सर्किल में साल के पुराने पेड़ों की कटाई की तस्वीरें सामने आईं, जहां जंगल के भीतर ही लकड़ी को चीरकर तैयार किया जा रहा था—यानी अब चोरी करने वालों को जंगल से बाहर लकड़ी ले जाने की जहमत भी नहीं उठानी, फैक्ट्री जंगल के अंदर ही लगा ली गई है, इतनी “सुविधा” तो खुद विभाग ने भी शायद ही किसी योजना में दी हो। धमतरी के मोहंदी परिक्षेत्र में तो हद ही हो गई—खुद वन विभाग के डिप्टी रेंजर पर ही हजारों पेड़ों की अवैध कटाई करवाने का आरोप लगा। जिस चौकीदार को जंगल बचाने के लिए बिठाया गया था, वही चौकीदार बगीचे में सेंध लगा बैठा।

यह पूरा सिलसिला बताता है कि समस्या सिर्फ बड़े कोल ब्लॉक या बड़ी कंपनियों तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे तंत्र में ऊपर से नीचे तक एक ढीलापन, एक चुप्पी और एक मिलीभगत घर कर चुकी है। जब जंगल बचाने की जिम्मेदारी जिन कंधों पर है, वही कंधे कटाई में शामिल पाए जाएं, तो आम आदमी आखिर किस पर भरोसा करे? शायद अब जंगल बचाने के लिए जंगल के भगवान से ही गुहार लगानी पड़े, क्योंकि इंसानी तंत्र तो नाकाम साबित हो चुका लगता है।

पर्यावरण प्रदूषित हो रहा है, इसकी कीमत आखिर चुकाएगा कौन?

जंगल सिर्फ लकड़ी का जखीरा नहीं होते, यह बात शायद सरकार की फाइलों में लिखी ही नहीं होती। जंगल बारिश लाते हैं, हवा को साफ रखते हैं, जमीन का कटाव रोकते हैं, वन्यजीवों को घर देते हैं, और आदिवासी समुदायों की पूरी जीवनशैली इन्हीं जंगलों के इर्द-गिर्द बुनी होती है। जब कोयला खदानों के लिए लाखों पेड़ काटे जाते हैं, तो सिर्फ हरियाली नहीं मिटती, पूरा पारिस्थितिकी तंत्र बिगड़ जाता है। खनन से निकलने वाली धूल, प्रदूषित पानी, और भारी मशीनों की गड़गड़ाहट से आसपास के गांवों की हवा और पानी दोनों जहरीले होते जाते हैं।

लेकिन इस भारी-भरकम नुकसान की भरपाई आखिर कौन करता है? कंपनियां मुनाफा कमाकर आगे बढ़ जाती हैं, अधिकारी तबादला लेकर किसी दूसरे जिले में “पदोन्नति” पा जाते हैं, नेता अगले चुनाव की रणनीति बनाने में जुट जाते हैं—और पीछे रह जाते हैं वही ग्रामीण, जिनके कुएं सूख जाते हैं, जिनकी फसलें बर्बाद हो जाती हैं, और जिनके बच्चे धूल भरी, प्रदूषित हवा में सांस लेने को मजबूर होते हैं। क्या यही वह “विकास” है जिसका सुनहरा सपना बार-बार दिखाया जाता है? अगर हां, तो यह सपना किसके लिए सुनहरा है, यह पूछना बनता है।

समितियां बनती हैं, जांच होती है, और नतीजा वही “ढाक के तीन पात”

जब भी कोई बड़ा विवाद सामने आता है, एक बंधा-बंधाया, लगभग रटा-रटाया पैटर्न देखने को मिलता है—पहले विरोध होता है, फिर मीडिया में खबरें छपती हैं, फिर कोई जांच समिति बना दी जाती है, कभी एनजीटी हस्तक्षेप करता है, कभी सरकार बड़े-बड़े आश्वासन देती है। हसदेव मामले में भी नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने अवैध कटाई की शिकायत पर सात सदस्यीय संयुक्त समिति गठित करने का निर्देश दिया था। लेकिन इसके बावजूद कटाई का काम रुका नहीं, नई मंजूरियां मिलती रहीं, और विवाद वहीं का वहीं बना रहा, जैसे कोई फिल्म बार-बार रिपीट टेलिकास्ट हो रही हो, बस किरदार और मौसम बदल जाते हैं, कहानी वही रहती है।

यह पैटर्न साफ बताता है कि जांच समितियां और सरकारी आश्वासन अब सिर्फ जनता को थोड़ी देर के लिए शांत करने का, गुस्से को ठंडा करने का एक औपचारिक हथियार बनकर रह गए हैं। असली फैसले कहीं और, किसी और ऊंचे स्तर पर लिए जाते हैं, जहां न जनता की आवाज पहुंचती है, न पर्यावरण की चिंता का कोई खास वजन रह जाता है।

“सस्टेनेबल डेवलपमेंट” का नारा, और उसकी असली सच्चाई

आजकल एक और शब्द बड़ा फैशन में है—”सस्टेनेबल डेवलपमेंट”, यानी टिकाऊ विकास। हर सरकारी भाषण, हर नीति दस्तावेज, हर विज्ञापन में यह शब्द जरूर टपकता है। लेकिन जमीन पर उतरकर देखिए तो यह शब्द भी बस एक फैशनेबल जुमला बनकर रह गया लगता है। जिस विकास में लाखों पेड़ कट जाएं, पहाड़ों में दरारें आ जाएं, कुएं सूख जाएं, और स्थानीय लोगों को अपनी ही जमीन से बेदखल होना पड़े—उसे “टिकाऊ” कैसे कहा जा सकता है? शायद “टिकाऊ” शब्द का मतलब भी अब बदल गया है—मतलब सिर्फ यह कि कंपनी का मुनाफा टिकाऊ रहे, बाकी सब कुछ, चाहे जंगल हो या जनता, बेशक बिखर जाए।

यह भी गौर करने वाली बात है कि जिस “पर्यावरण मंजूरी” की प्रक्रिया को इतना भरोसेमंद बताया जाता है, वह प्रक्रिया आखिर किसके लिए भरोसेमंद है—जंगल के लिए, जनता के लिए, या फिर उस कंपनी के लिए जिसे मंजूरी चाहिए होती है? जिस तरह से समितियां बैठकें करती हैं, दस्तावेज तैयार होते हैं, और चंद महीनों में ही हजारों हेक्टेयर वन भूमि डायवर्जन को हरी झंडी मिल जाती है, उससे तो यही लगता है कि यह प्रक्रिया भी बस एक औपचारिकता भर रह गई है—एक ऐसी परीक्षा, जिसका नतीजा पहले से ही तय होता है, बस उत्तर पुस्तिका बाद में भरी जाती है।

“रोजगार” का सब्जबाग और उसकी हकीकत

अक्सर यह दलील दी जाती है कि कोयला खदानों से इलाके में रोजगार आएगा, विकास होगा, लोग खुशहाल होंगे। यह सुनने में बड़ा लुभावना लगता है, ठीक वैसे ही जैसे किसी मदारी का तमाशा। लेकिन असलियत में जिन गांवों में यह खदानें खुलती हैं, वहां के स्थानीय लोग खुद बताते हैं कि उन्हें बड़ी-बड़ी मशीनों को चलाने वाली नौकरियां नहीं मिलतीं, बल्कि उनकी खेती की जमीन जरूर चली जाती है, उनका जंगल जरूर उजड़ जाता है। असली फायदा किसे मिलता है, यह किसी से छिपा नहीं—बड़ी कंपनियां, बड़े ठेकेदार, और वो अधिकारी जिनकी पोस्टिंग इन इलाकों में “मलाईदार” मानी जाती है।

सवाल जो हर छत्तीसगढ़िया को पूछना चाहिए

आखिर सरकार इतनी “मेहरबान” किस पर है—अपनी जनता पर, या फिर उन कंपनियों पर जिन्हें फाइलों में सिर्फ हस्ताक्षर भर चाहिए होते हैं? जब स्थानीय लोग खुद उद्योग नहीं चाहते, जब पर्यावरण को साफ नुकसान दिख रहा है, जब ऐतिहासिक धरोहरें खतरे में हैं, तब भी फैसले आखिर किसके इशारे पर लिए जा रहे हैं?

क्या यह महज संयोग है कि जितनी भी बड़ी वन भूमि डायवर्सन की फाइलें आगे बढ़ती हैं, उनमें से ज्यादातर का रास्ता घूम-फिरकर किसी न किसी बड़े औद्योगिक घराने तक जाकर ही खत्म होता है? क्या यह महज संयोग है कि छोटे स्तर पर अवैध कटाई करने वालों पर कभी-कभार, दिखावे भर की कार्रवाई हो भी जाती है, लेकिन बड़े स्तर पर वन भूमि डायवर्जन की मंजूरियां बिना किसी बड़ी रुकावट के, मानो रेड कारपेट बिछाकर, मिलती चली जाती हैं?

छत्तीसगढ़ की पहचान उसके घने जंगलों, उसकी कल-कल बहती नदियों, उसके आदिवासी समुदायों की सादगी से रही है। अगर यही पहचान मिट गई, अगर “हरियर छत्तीसगढ़” सिर्फ किताबों और पुराने नारों में सिमटकर रह गया, तो फिर “विकास” के नाम पर आखिर बचेगा क्या? कोयले की खदानें, धूल भरी हवा, सूखे कुएं, दरकते पहाड़, और वो सवाल जो आने वाली पीढ़ियां अपने बुजुर्गों से जरूर पूछेंगी—”जब हमारे जंगल कट रहे थे, तब सरकार कहां थी, और वो आखिर किसके साथ खड़ी थी?”

शायद उस दिन जवाब देने के लिए बुजुर्ग तो होंगे, लेकिन जंगल शायद ही बचे हों। यही वह सवाल है, जो आज उठाना जरूरी है, क्योंकि कल तक इसका जवाब सुनने के लिए भी शायद कोई हरा-भरा गवाह न बचे।

फिर भी, हर बार जब कोई नया कोल ब्लॉक मंजूर होता है, हर बार जब कोई नई फाइल आगे बढ़ती है, सरकार यही कहती नजर आती है—”यह जनहित में है, यह विकास के लिए जरूरी है।” और जनता बस इतना ही पूछती रह जाती है—किसका जनहित, और किसका विकास?

आंकड़े भी कम शर्मनाक नहीं, बस उन्हें पढ़ने की फुर्सत किसी को नहीं

अगर आंकड़ों की बात करें तो तस्वीर और भी साफ हो जाती है। खुद सरकारी आंकड़े बताते हैं कि बस्तर संभाग के जिलों में पिछले कुछ वर्षों में जंगलों में अवैध पेड़ कटाई के दर्जनों प्रकरण शिकायतों और अन्य संसाधनों के जरिए वन विभाग के संज्ञान में आए हैं। अब जरा सोचिए—यह तो सिर्फ वो मामले हैं जो “संज्ञान में आए”, यानी जिनकी शिकायत हुई, जिनकी रिपोर्ट बनी, जिनकी फाइल खुली। असल में जंगल के भीतर कितनी आरियां रोज चलती हैं, कितने पेड़ बिना किसी की नजर पड़े गिरा दिए जाते हैं, इसका हिसाब शायद खुद विभाग के पास भी नहीं होगा। यह वैसा ही है जैसे कोई कहे कि “चोरी सिर्फ उतनी ही हुई है जितनी FIR दर्ज हुई है”, जबकि हकीकत में असली संख्या का अंदाजा लगाना भी मुश्किल हो।

विधानसभा में जब इस मुद्दे पर सवाल उठा, तब जाकर सरकार को यह आंकड़े साझा करने पड़े। यानी अगर किसी जनप्रतिनिधि ने सवाल न पूछा होता, तो शायद यह आंकड़े भी कभी सामने न आते, फाइलों में दबे-दबे धूल फांकते रहते। यह भी एक किस्म की “पारदर्शिता” है—जब तक पूछा न जाए, तब तक बताया नहीं जाता; और जब पूछ भी लिया जाए, तो जवाब इतना घुमा-फिराकर दिया जाता है कि असली सच्चाई कहीं बीच में ही खो जाए।

कोरबा में सागौन की तस्करी, और “कार्रवाई” का तमाशा

कोरबा जिले में तो हद ही हो गई—रात के अंधेरे में सागौन के लट्ठे लेकर जाती एक गाड़ी पकड़ी गई, वन अपराध का प्रकरण दर्ज हुआ, और अगले दिन अखबारों में बड़ी-बड़ी तस्वीरें छपीं कि “वन विभाग सतर्क, तस्करी नाकाम”। वाह भाई वाह, क्या बहादुरी दिखाई गई! एक पिकअप गाड़ी पकड़ ली, और मान लिया कि पूरे इलाके की तस्करी रुक गई। मगर यह कोई नहीं पूछता कि आखिर रात के अंधेरे में जंगल के भीतर आरी लेकर घुसने की हिम्मत लोग जुटाते ही क्यों हैं? क्या वजह है कि जंगल की रखवाली इतनी कमजोर पड़ गई है कि तस्कर बेखौफ होकर लट्ठे ढोते फिरें?

असल सवाल यह है कि जब एक पिकअप गाड़ी पकड़ी जाती है, तो उसे “बड़ी कार्रवाई” बताकर प्रचारित किया जाता है, लेकिन जब हजारों हेक्टेयर जंगल बड़ी कंपनियों के नाम कानूनी तरीके से साफ कर दिया जाता है, तो उसे “विकास परियोजना” कहा जाता है। यानी चोरी छोटी हो तो अपराध, और चोरी बड़ी हो तो नीति—यह कैसा न्याय है?

जब विरोध करने वालों को ही “बाधा” बता दिया जाए

एक और दिलचस्प बात यह है कि जब भी स्थानीय ग्रामीण, आदिवासी संगठन या सामाजिक कार्यकर्ता जंगल कटाई के खिलाफ आवाज उठाते हैं, तो कई बार उन्हीं पर “विकास विरोधी” होने का ठप्पा लगा दिया जाता है। मानो अपने घर, अपनी जमीन, अपने पुरखों के जंगल को बचाने की मांग करना कोई अपराध हो। जो लोग सदियों से इन जंगलों के साथ जीते आए हैं, जिनकी रोजी-रोटी, जिनकी संस्कृति, जिनकी पहचान ही जंगल से जुड़ी है, जब वही लोग अपने हक की बात करें, तो उन्हें “अड़चन डालने वाला” बता दिया जाता है, और जो कंपनियां बाहर से आकर जंगल उजाड़ने पहुंचती हैं, उन्हें “निवेशक” कहकर सम्मानित किया जाता है। यह कैसी विडंबना है!

तो फिर सवाल वही घूम-फिरकर आ खड़ा होता है

तो कुल मिलाकर तस्वीर यह बनती है—एक तरफ जंगल कट रहे हैं, दूसरी तरफ कंपनियों को मंजूरियां मिल रही हैं। एक तरफ ग्रामीण सड़कों पर विरोध कर रहे हैं, दूसरी तरफ पुलिस बल तैनात होकर कटाई करवा रही है। एक तरफ पहाड़ों में दरारें पड़ रही हैं, दूसरी तरफ नई खदानों को मंजूरी की तैयारी चल रही है। एक तरफ जांच समितियां बन रही हैं, दूसरी तरफ जमीन पर कटाई का काम बदस्तूर जारी है।

इस पूरी तस्वीर को देखकर बस एक ही सवाल जेहन में उठता है—आखिर सरकार किसके साथ खड़ी है? जिस जनता ने उसे वोट देकर सत्ता में बिठाया, या उन कंपनियों के साथ, जो चुनाव के बाद अचानक इतनी “जरूरी” और “प्राथमिकता” वाली हो जाती हैं कि उनके लिए जंगल, पहाड़, नदी, और आदिवासियों की जिंदगी तक दांव पर लगा दी जाती है?

छत्तीसगढ़ की हरियाली सिर्फ एक भौगोलिक विशेषता नहीं, यह यहां के लोगों की आत्मा है। इसे बचाना किसी एक व्यक्ति, किसी एक संगठन का नहीं, बल्कि पूरे प्रदेश का साझा सवाल होना चाहिए। वरना वह दिन दूर नहीं जब “हरियर छत्तीसगढ़” सिर्फ एक पुराना, धुंधला नारा बनकर रह जाएगा, और उसकी जगह ले लेगा कोयले की कालिख से पुता हुआ, धूल में लिपटा हुआ एक बंजर मंजर।

आखिर में, एक आखिरी तंज

अगर कभी सरकार से पूछा जाए कि आखिर यह सब क्यों हो रहा है, तो जवाब कुछ इस अंदाज में मिलता है—”यह राष्ट्रहित में है, यह ऊर्जा सुरक्षा के लिए जरूरी है, यह रोजगार पैदा करेगा, यह छत्तीसगढ़ को आगे ले जाएगा।” सुनने में यह सारे जवाब बड़े प्रभावशाली लगते हैं, बिल्कुल किसी चमकते हुए विज्ञापन की तरह। लेकिन जब यही सवाल किसी हसदेव के ग्रामीण से, किसी बलरामपुर के आदिवासी से, किसी सूरजपुर के किसान से पूछा जाए, तो जवाब बिल्कुल अलग मिलता है—”हमें न रोजगार चाहिए जो हमारी जमीन छीनकर दिया जाए, न वो विकास चाहिए जो हमारे जंगल की चिता पर खड़ा हो।”

शायद यही वह फासला है, जिसे न कोई समिति पाट सकती है, न कोई प्रेस नोट, न कोई सरकारी आश्वासन। यह फासला तभी पटेगा, जब सरकार यह समझेगी कि विकास का मतलब सिर्फ मशीनों की गड़गड़ाहट और कोयले की ढुलाई नहीं, बल्कि उस जंगल में बसे लोगों की मुस्कुराहट भी है, जो आज हर रोज एक नई आरी की आवाज सुनकर सहम जाते हैं। तब तक के लिए, यह सवाल यूं ही हवा में तैरता रहेगा—आखिर सरकार इतनी मेहरबान किस पर है, जनता पर, या जंगल कुतरने वालों पर?

One thought on “वाह रे सरकार! जंगल काटो, कंपनी को सौंपो, और नाम रख दो “विकास””

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *