एनएच-343 का ‘हिसाब-किताब’: गड्ढों वाली सड़क पर लाखों का ‘कथित’ खेल, अफसरों के नाम पर दर्ज रकम ने मचाई खलबली

बलरामपुर-रामानुजगंज इलाके से गुजरने वाला एनएच-343 पिछले काफी समय से अपनी बदहाली को लेकर सुर्खियों में रहा है. गड्ढे, कीचड़ और टूटी सड़क को लेकर स्थानीय लोग पहले भी सवाल उठाते रहे हैं. लेकिन अब इस सड़क से जुड़ा एक नया विवाद सामने आया है, जिसने पूरे मामले की दिशा ही बदल दी है. एक कथित कैश-बुक की तस्वीर और उसके साथ वायरल हुए एक ऑडियो ने इलाके की सियासत और प्रशासनिक हलकों में हलचल मचा दी है. सवाल अब सिर्फ सड़क की गुणवत्ता का नहीं रहा, बल्कि यह भी है कि आखिर कागज पर दर्ज लाखों रुपए का यह हिसाब किस बात का गवाह है.

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एनएच-343 का 'हिसाब-किताब'

एनएच-343 से जुड़े कुल कथित खर्च कागज पर दर्ज साढ़े ग्यारह लाख का ‘खेल’

जो कथित कैश-बुक वायरल हो रही है, उसमें कुल मिलाकर 11 लाख 39 हजार रुपए के खर्च का ब्योरा दर्ज बताया जा रहा है. इतनी बड़ी रकम अपने-आप में चौंकाने वाली है, लेकिन असली झटका तब लगता है जब इस हिसाब में दर्ज नामों पर नजर जाती है. इसमें किसी ठेकेदार, सप्लायर या मजदूर का जिक्र नहीं, बल्कि सीधे-सीधे जेई, एसडीओ, एक्सईएन, एसई, एई, एसडीएम, टीआई और खुद बलरामपुर एसपी के पद के सामने रकम दर्ज दिखाई गई है. यानी जिन पदों पर बैठे लोगों का काम सड़क बनते वक्त निगरानी करना और नियम-कानून का पालन कराना होता है, उन्हीं पदों के आगे कथित तौर पर पैसों का हिसाब लिखा गया है. गनीमत सिर्फ इतनी है कि “कथित” शब्द फिलहाल इस पूरे किस्से को कानूनी तौर पर संभाले हुए है, वरना यह हिसाब किसी थ्रिलर स्क्रिप्ट से कम नहीं लगता.

इन पदों के सामने दर्ज कुल रकम का जोड़ करीब 9 लाख 95 हजार रुपए बैठता है, यानी एनएच-343 से जुड़े कुल कथित खर्च का बड़ा हिस्सा सीधे सरकारी अमले के खाते में जाता हुआ दिख रहा है. बाकी बची रकम मीडिया, फॉरेस्ट पेनाल्टी, अकाउंटेंट और कुछ अन्य मदों में बंटी नजर आ रही है.

तारीख-दर-तारीख हिसाब, जैसे कोई बजट रिपोर्ट हो

फोटो में दिख रहे हिसाब की सबसे दिलचस्प बात इसकी सफाई है — हर एंट्री के आगे तारीख भी दर्ज है, मानो कोई विभागीय ऑडिट रिपोर्ट तैयार की जा रही हो. 13 फरवरी की एंट्री में जेई और एसडीओ, दोनों के नाम के सामने एक-एक लाख रुपए लिखे मिलते हैं. इसके ठीक दस दिन बाद, 23 फरवरी को एक्सईएन के नाम पर एक लाख रुपए और बलरामपुर एसपी के नाम पर 15 हजार रुपए का जिक्र है.

महीने के आखिर की तरफ बढ़ते हुए 27 फरवरी को एसई के नाम एक लाख रुपए दर्ज हैं, तो अगले ही दिन यानी 28 फरवरी को टीआई (रामानुजगंज) के नाम 10 हजार रुपए और फॉरेस्ट डिपार्टमेंट के नाम 25 हजार रुपए की एंट्री दिखती है. यानी महीने भर में लगभग हर बड़े पद तक कथित तौर पर रकम पहुंचती दिख रही है, गोया कोई सिलसिलेवार ‘मासिक भुगतान अनुसूची’ चल रही हो.

सबसे बड़ी और चौंकाने वाली एंट्री 2 मार्च की बताई जा रही है. इस तारीख को जेई, एई और एक्सईएन के नाम के आगे डेढ़-डेढ़ लाख रुपए दर्ज हैं, जबकि अकाउंटेंट के नाम पर 75 हजार रुपए का जिक्र है. यानी एक ही दिन में करीब साढ़े पांच लाख रुपए का हिसाब सिर्फ चार नामों के आगे दर्ज हो गया. इससे एक दिन पहले, यानी 1 मार्च को एसडीएम के नाम 20 हजार रुपए की एंट्री भी नजर आती है.

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सवाल सीधा और सपाट है

इतने व्यवस्थित हिसाब को देखकर सवाल घुमा-फिराकर नहीं, बल्कि सीधा उठता है — अगर यह वाकई संबंधित कंपनी की असली कैश-बुक है, तो सरकारी पदों के नाम पर इतनी रकम आखिर किस मद में दर्ज की गई? यह पैसा किसे सौंपा गया? किसके निर्देश या दबाव में यह भुगतान हुआ माना जा रहा है? और सबसे जरूरी बात — इस तरह के ‘भुगतान’ का हिसाब आखिर किस तर्क या नियम के आधार पर रखा गया, जबकि सरकारी काम में इस तरह की एंट्री की कोई वैधानिक जगह ही नहीं होती?

यह सवाल इसलिए भी अहम है क्योंकि एनएच-343 के निर्माण की निगरानी की जिम्मेदारी जिन पदों पर होती है, कथित हिसाब में ठीक उन्हीं पदों के सामने रकम दर्ज दिखाई गई है. अगर यह महज संयोग है, तो संयोग बहुत सुविधाजनक लगता है.

एनएच-343 के निर्माण में अफसरों के बाद अब मीडिया के नाम पर भी एंट्री

इस कथित कैश-बुक में सिर्फ सरकारी अमला ही नहीं, मीडिया जगत का जिक्र भी मिलता है. इसमें एक तरफ ‘जर्नलिस्ट’ के नाम पर 12 हजार रुपए दर्ज हैं, तो दूसरी तरफ सीधे ‘मीडिया’ के नाम पर 12 हजार 500 रुपए का उल्लेख है. यानी अगर यह हिसाब सही निकलता है, तो सवालों के घेरे में सिर्फ प्रशासनिक अमला नहीं, बल्कि खबर लिखने-दिखाने वाला तंत्र भी आ सकता है — और यही वजह है कि इस मामले पर तटस्थ और तथ्य-आधारित रिपोर्टिंग की जरूरत पहले से कहीं ज्यादा बढ़ जाती है.

इसके अलावा 29 जनवरी की एंट्री में ‘फॉरेस्ट पेनाल्टी’ के नाम पर 1 लाख 19 हजार 500 रुपए और 28 फरवरी को फिर से फॉरेस्ट डिपार्टमेंट के नाम पर 25 हजार रुपए का जिक्र मिलता है. यानी एनएच-343 के निर्माण के दौरान वन विभाग से जुड़ी किसी अनुमति, दंड या अड़चन को दूर करने के लिए भी मोटी रकम खर्च होने का दावा किया जा रहा है.

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भुगतान हुआ या सिर्फ कागजी खानापूर्ति?

अब यहां एक बुनियादी सवाल खड़ा होता है — क्या यह रकम वास्तव में किसी को दी गई, या यह सिर्फ हिसाब-किताब में दर्ज एक कागजी औपचारिकता भर है? अगर भुगतान सच में हुआ, तो वह किस व्यक्ति को मिला और किस काम या ‘सहयोग’ के बदले मिला? जब तक इससे जुड़े बिल, रसीद या भुगतान का कोई वास्तविक दस्तावेजी सबूत सामने नहीं आता, तब तक इस कथित हिसाब की पूरी और सच्ची तस्वीर सामने नहीं आ सकती. फिलहाल जो कुछ भी सामने है, वह एक तस्वीर, कुछ अनुमान और ढेर सारे अनुत्तरित सवाल हैं.

कैश-बुक के साथ वायरल ऑडियो ने बढ़ाई गंभीरता

अगर सिर्फ कथित कैश-बुक सामने आती, तो शायद मामला कुछ दिन की चर्चा के बाद ठंडा पड़ जाता. लेकिन इसके साथ वायरल हुए एक ऑडियो ने पूरे प्रकरण को और गंभीर बना दिया है. बताया जा रहा है कि इस ऑडियो में एनएच-343 से जुड़े एक पूर्व कर्मचारी और किसी अज्ञात व्यक्ति के बीच बातचीत रिकॉर्ड है. दावा किया जा रहा है कि इस बातचीत में भुगतान को लेकर हुई परेशानी, श्रम विभाग में की गई शिकायत, और शिकायत दर्ज होने के बाद आंशिक भुगतान होने जैसी बातों का संदर्भ मौजूद है.

यही नहीं, ऑडियो में निर्माण कार्य में इस्तेमाल होने वाली सामग्री और उसके भुगतान को लेकर भी कथित बातचीत होने की चर्चा है. यानी एक तरफ पैसों का हिसाब है, तो दूसरी तरफ पैसों को लेकर हुए विवाद और शिकायत की कहानी है — और दोनों ही सूत्र किसी न किसी रूप में एनएच-343 के निर्माण कार्य से ही जुड़ते नजर आते हैं.

क्या कैश-बुक और ऑडियो के बीच कोई कड़ी है?

कैश-बुक और ऑडियो, दोनों का एक साथ वायरल होना अपने-आप में एक बड़ा सवाल खड़ा करता है, क्या इन दोनों के बीच कोई सीधा संबंध है, या ये दोनों बिल्कुल अलग-अलग घटनाएं हैं जिन्हें महज संयोगवश एक साथ जोड़कर देखा जा रहा है? इस सवाल का जवाब तभी मिल सकता है जब दोनों दस्तावेजों/रिकॉर्डिंग की स्वतंत्र और तकनीकी जांच हो. फिलहाल की स्थिति में इसे सिर्फ ‘दावा’ और ‘प्रतिदावा’ के दायरे में ही रखा जा सकता है.

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पुष्टि अभी बाकी, इसलिए सतर्क भाषा जरूरी

यह ध्यान रखना जरूरी है कि एनएच-343 से जुड़े अब तक न तो वायरल ऑडियो और न ही कथित कैश-बुक की किसी स्वतंत्र एजेंसी या जांच अधिकारी द्वारा पुष्टि की गई है. इसलिए इस हिसाब में दर्ज रकम या ऑडियो में कही गई बातों को सीधे तौर पर भ्रष्टाचार का सबूत करार देना जल्दबाजी होगी. हालांकि, इतना जरूर तय है कि जब सरकारी पदों के सामने लाखों रुपए दर्ज हों, तो यह मामला इतना संवेदनशील और गंभीर बन जाता है कि इसे अनदेखा करना या टाल देना आसान नहीं होगा. यह वह मोड़ है, जहां जांच एजेंसियों की चुप्पी खुद एक सवाल बन जाती है.

एनएच-343 सड़क पर गड्ढे, हिसाब में लाखों — विरोधाभास साफ नजर आता है

इस पूरे विवाद को समझने के लिए एनएच-343 की जमीनी हकीकत पर नजर डालना जरूरी है. बारिश के मौसम के बाद रामानुजगंज-बलरामपुर मार्ग पर जगह-जगह गड्ढे, कीचड़ और उखड़ी हुई सड़क सतह साफ नजर आती है. स्थानीय लोगों को रोजाना इस टूटी सड़क से गुजरना पड़ता है, और निर्माणाधीन हिस्सों में तो वाहनों की रफ्तार लगभग थम-सी जाती है. कई जगह आवागमन इतना मुश्किल हो गया है कि आम राहगीरों के लिए यह रास्ता रोज की परीक्षा बन चुका है.

अब जरा इस तस्वीर को कथित कैश-बुक की उस दूसरी तस्वीर के साथ रखकर देखिए, जिसमें 11 लाख 39 हजार रुपए के खर्च का हिसाब दर्ज है. एक तरफ सड़क बदहाल है, गड्ढों से अटी पड़ी है, दूसरी तरफ कागज पर लाखों रुपए ‘खर्च’ होने का दावा है. यह विरोधाभास ही इस पूरे मामले को इतना ज्वलंत बना देता है. सवाल लाजिमी है, अगर पैसा वाकई खर्च हुआ, तो सड़क पर गया कहां? और अगर सड़क पर नहीं गया, तो फिर गया कहां?

वाइब्रेटर की जगह लकड़ी? गुणवत्ता पर भी सवाल

एनएच-343 से जुड़े कुछ अन्य कथित वीडियो और दावों में निर्माण की गुणवत्ता पर भी गंभीर सवाल उठाए गए हैं. दावा किया जा रहा है कि नाली निर्माण के दौरान कंक्रीट को ठीक से बैठाने के लिए जिस वाइब्रेटर मशीन का इस्तेमाल होना चाहिए था, उसकी जगह लकड़ी के टुकड़े से काम चलाया गया. इसके अलावा सीमेंट और अन्य निर्माण सामग्री की गुणवत्ता को लेकर भी वायरल ऑडियो में कथित तौर पर चर्चा होने की बात कही जा रही है.

अगर यह दावे सही साबित होते हैं, तो सवाल सिर्फ निर्माण कंपनी तक सीमित नहीं रहेगा. सवाल यह भी उठेगा कि जिन अधिकारियों की जिम्मेदारी मौके पर जाकर काम की गुणवत्ता जांचना और उसे प्रमाणित करना था, वे उस वक्त क्या देख रहे थे? क्या निगरानी सिर्फ कागजों तक सीमित रह गई, या मौके पर मौजूद अफसरों ने जानबूझकर आंखें मूंद लीं? यही वह बिंदु है जहां ‘निगरानी’ शब्द अपना मजाक खुद बना लेता है, जब निगरानी करने वाले ही कथित तौर पर हिसाब-किताब का हिस्सा बन जाएं, तो निगरानी किससे कराई जाए?

खुलना चाहिए साढ़े ग्यारह लाख का यह ‘राज’

फिलहाल एनएच-343 से जुड़ी तीन तस्वीरें एक साथ सामने खड़ी हैं — पहली, बदहाल और गड्ढों से भरी सड़क; दूसरी, निर्माण की गुणवत्ता पर उठते सवाल; और तीसरी, 11 लाख 39 हजार रुपए की वह कथित कैश-बुक जिसमें अफसरों और विभागों के नाम दर्ज हैं. इन तीनों तस्वीरों को जोड़कर देखने पर एक ही सवाल बार-बार उभरता है — आखिर सच क्या है?

जांच में सबसे पहले यह स्पष्ट होना जरूरी है कि यह कथित कैश-बुक असली है या नहीं, और अगर असली है तो जेई, एसडीओ, एक्सईएन, एसई, एई, एसडीएम, टीआई और एसपी जैसे पदों के सामने दर्ज रकम आखिर किसे, कब और किस वजह से दी गई. यह भी देखना होगा कि इन कथित भुगतानों से जुड़ा कोई बिल या रसीद मौजूद है या नहीं, और क्या संबंधित अधिकारियों को इस पूरे हिसाब-किताब की भनक तक थी. साथ ही वायरल ऑडियो में हो रही बातचीत का इस कथित हिसाब से कोई प्रत्यक्ष या परोक्ष संबंध है या नहीं, यह भी जांच का अहम हिस्सा होना चाहिए.

सवाल सिर्फ एनएच-343 सड़क का नहीं, पूरे सिस्टम का है

एनएच-343 पर पहले सिर्फ गड्ढे नजर आते थे, अब कथित कैश-बुक ने हिसाब-किताब में भी ‘गड्ढा’ ढूंढने का मौका दे दिया है. यह मामला अब सिर्फ एक सड़क की गुणवत्ता या एक कंपनी के कामकाज तक सीमित नहीं रह गया है. यह सवाल पूरे उस सिस्टम पर है, जहां एक तरफ निर्माण की गुणवत्ता को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं, और दूसरी तरफ जिम्मेदार अधिकारियों व विभागों के नाम के आगे लाखों रुपए का कथित हिसाब दर्ज दिखाई दे रहा है.

यह भी एक तरह की व्यंग्यात्मक विडंबना ही है कि जिस सड़क पर सफर करना आम आदमी के लिए चुनौती बना हुआ है, उसी सड़क के ‘हिसाब-किताब’ में करोड़पतियों जैसी सफाई नजर आ रही है — पाई-पाई का हिसाब दर्ज है, बस सड़क पर सुकून की एक इंच जगह दर्ज नहीं है.

स्थानीय स्तर पर सन्नाटा, सोशल मीडिया पर तूफान

जमीनी स्तर की बात करें तो एनएच-343 से सटे बलरामपुर-रामानुजगंज इलाके में इस मुद्दे को लेकर लोगों के बीच खुसर-फुसर तो खूब है, लेकिन खुलकर बोलने वाले कम ही नजर आते हैं. सड़क पर रोज सफर करने वाले राहगीर निजी बातचीत में गड्ढों को कोसते जरूर हैं, मगर कैश-बुक और ऑडियो जैसे संवेदनशील मुद्दे पर कैमरे के सामने आकर बयान देने से ज्यादातर लोग बचते नजर आते हैं. इसके उलट सोशल मीडिया पर यह मामला किसी तूफान की तरह फैला है. कैश-बुक की तस्वीर और ऑडियो के स्क्रीनशॉट अलग-अलग समूहों में तेजी से शेयर हो रहे हैं, और हर मंच पर एक ही तरह के सवाल दोहराए जा रहे हैं — क्या यह सच है, और अगर सच है तो कार्रवाई कब होगी?

यह फर्क अपने-आप में बताता है कि जमीनी स्तर पर किसी न किसी वजह से खुलकर बोलने का माहौल अब भी सहज नहीं बन पाया है, जबकि डिजिटल दुनिया में यह मुद्दा अपनी पूरी तल्खी के साथ मौजूद है. जाहिर है, जब मामला सीधे प्रशासनिक अमले से जुड़ा हो, तो स्थानीय स्तर पर सतर्कता बरतना कोई अनोखी बात नहीं मानी जा सकती.

कानूनी नजरिए से देखें तो एनएच-343 से जुड़े मामला कितना गंभीर?

अगर विशुद्ध कानूनी नजरिए से एनएच-343 से जुड़े इस पूरे प्रकरण को परखा जाए, तो कथित कैश-बुक में जिस तरह की एंट्री सामने आई हैं, वे कम से कम तीन अलग-अलग दिशाओं में जांच की मांग करती हैं. पहला पहलू है भ्रष्टाचार निवारण से जुड़े कानून का, जिसके तहत यह देखा जाना जरूरी होगा कि क्या वाकई किसी सरकारी पदाधिकारी ने अपने पद का दुरुपयोग करते हुए किसी निजी कंपनी से रकम प्राप्त की. दूसरा पहलू दस्तावेज या साक्ष्य से छेड़छाड़ का है.

अगर यह कैश-बुक असली नहीं निकलती, तो यह भी अपने-आप में एक गंभीर अपराध की श्रेणी में आ सकता है, क्योंकि किसी निर्दोष अधिकारी की छवि को नुकसान पहुंचाना भी उतना ही गंभीर विषय है जितना असली भ्रष्टाचार. तीसरा पहलू वायरल ऑडियो की प्रामाणिकता से जुड़ा है, जिसकी फॉरेंसिक जांच के बिना उसमें कही गई बातों को अदालत में या किसी भी आधिकारिक कार्यवाही में सीधे साक्ष्य के तौर पर स्वीकार करना मुश्किल होगा.

यही वजह है कि विशेषज्ञ अक्सर ऐसे मामलों में एक ही सलाह देते हैं — दस्तावेज और ऑडियो, दोनों की स्वतंत्र फॉरेंसिक जांच पहले हो, नतीजे बाद में निकाले जाएं. जल्दबाजी में लगाया गया कोई भी आरोप, चाहे वह कितना भी वाजिब क्यों न लगे, अगर बाद में गलत साबित होता है, तो वह पूरे मामले की विश्वसनीयता को कमजोर कर देता है.

सड़क ठेकों में गड़बड़ी की यह कोई पहली कहानी नहीं

अगर देश भर में सड़क निर्माण से जुड़े कामकाज पर नजर डालें, तो अधिकारियों की मिलीभगत, घटिया सामग्री के इस्तेमाल और भुगतान में गड़बड़ी जैसे आरोप समय-समय पर अलग-अलग राज्यों से सामने आते रहे हैं. कहीं ठेकेदार पर घटिया डामर इस्तेमाल करने का आरोप लगता है, तो कहीं निगरानी अधिकारियों पर आंखें मूंदने का. एनएच-343 से जुड़ा यह ताजा प्रकरण भी उसी लंबी फेहरिस्त में एक और नाम जोड़ता नजर आ रहा है, बस फर्क इतना है कि इस बार सिर्फ आरोप नहीं, बल्कि एक कथित दस्तावेज और एक कथित ऑडियो रिकॉर्डिंग भी सामने है, जिसने मामले को महज बयानबाजी से आगे बढ़ाकर सबूत आधारित बहस की तरफ धकेल दिया है.

यह पैटर्न बताता है कि सड़क निर्माण से जुड़ी निगरानी व्यवस्था में कहीं न कहीं एक संरचनात्मक कमजोरी बनी हुई है, जिसका फायदा उठाने की कोशिश बार-बार होती दिख जाती है. जब तक निगरानी करने वाला अमला खुद निगरानी के दायरे से बाहर महसूस करता रहेगा, तब तक इस तरह के मामलों का सामने आना कोई असामान्य बात नहीं रह जाएगी.

एनएच-343 जैसे सरकारी निर्माण कार्यों में पारदर्शिता की कमी ने कैसे बढ़ाया भरोसे का संकट

गौर करने वाली बात यह भी है कि एनएच-343 जैसे सरकारी निर्माण कार्यों में भुगतान, गुणवत्ता जांच और निगरानी रिपोर्ट जैसी जानकारियां आमतौर पर आम जनता की पहुंच से दूर ही रहती हैं. जब तक कोई कैश-बुक या ऑडियो जैसी चीज लीक होकर वायरल न हो जाए, आम आदमी को यह पता ही नहीं चल पाता कि उसकी सड़क पर खर्च हुए पैसों का हिसाब कैसा रहा. यही अपारदर्शिता भरोसे के संकट को जन्म देती है — और जब भरोसा एक बार टूटता है, तो चाहे कितनी भी सफाई दी जाए, शक की सुई आसानी से नहीं हटती.

एनएच-343 के मामले में भी यही हो रहा है. भले ही अभी तक कुछ भी अधिकारिक तौर पर साबित नहीं हुआ है, लेकिन जनता के मन में एक धारणा बन चुकी है कि ‘जहां धुआं है, वहां कहीं न कहीं आग जरूर होगी.’ यह धारणा तभी टूट सकती है जब जांच एजेंसियां तेजी से, पारदर्शी ढंग से और बिना किसी दबाव के अपनी कार्रवाई पूरी करें और नतीजे सार्वजनिक करें.

प्रशासन की चुप्पी भी बन रही चर्चा का विषय

एनएच-343 से जुड़े इतने बड़े दावों और वायरल हो रहे दस्तावेज-ऑडियो के बावजूद अब तक प्रशासनिक स्तर पर किसी ठोस बयान या औपचारिक जांच के आदेश की जानकारी सार्वजनिक तौर पर सामने नहीं आई है. यह चुप्पी खुद एक तरह की खबर बन गई है. आम जनता के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब मामला इतना संवेदनशील है और खुद पुलिस अधीक्षक जैसे बड़े पद का जिक्र इसमें शामिल है, तो जांच शुरू होने में देरी क्यों हो रही है?

बेशक, किसी भी जांच एजेंसी के लिए यह जरूरी होता है कि वह जल्दबाजी में बयान देने के बजाय पहले तथ्यों को परखे. लेकिन जब मामला सार्वजनिक तौर पर इतना वायरल हो चुका हो, तो कम से कम इतना भरोसा दिलाना जरूरी हो जाता है कि मामले को गंभीरता से लिया जा रहा है. वरना चुप्पी को अक्सर लीपापोती से जोड़कर देखा जाने लगता है, भले ही हकीकत में ऐसा न हो.

एनएच-343 मामले में आगे क्या? जांच से जुड़े जरूरी कदम

अब सवाल यह है कि एनएच-343 मामले में आगे की राह क्या होनी चाहिए. सबसे पहला और जरूरी कदम यही होगा कि कथित कैश-बुक की मूल कॉपी बरामद कर उसकी फॉरेंसिक जांच कराई जाए, ताकि यह साफ हो सके कि यह दस्तावेज असली है या किसी साजिश के तहत तैयार किया गया है. इसके साथ ही वायरल ऑडियो की भी तकनीकी जांच जरूरी है, ताकि आवाज की पहचान और बातचीत के संदर्भ की पुष्टि हो सके.

इसके अलावा जिन अधिकारियों के नाम इस कथित हिसाब में सामने आए हैं, उनसे भी स्पष्टीकरण मांगा जाना चाहिए, ताकि उनका पक्ष भी रिकॉर्ड पर आ सके, आखिर निष्पक्ष जांच का मतलब सिर्फ आरोप सुनना नहीं, बल्कि सफाई सुनना भी होता है. साथ ही निर्माण कार्य में इस्तेमाल हुई सामग्री, वाइब्रेटर की जगह लकड़ी के इस्तेमाल जैसे दावों की तकनीकी जांच के लिए किसी स्वतंत्र इंजीनियरिंग टीम की मदद ली जानी चाहिए, ताकि गुणवत्ता से जुड़े सवालों का वैज्ञानिक आधार पर जवाब मिल सके.

सिर्फ कार्रवाई की खानापूर्ति नहीं

आखिर में सबसे बड़ी उम्मीद आम जनता की यही है कि यह मामला महज कुछ दिनों की सुर्खी बनकर गुम न हो जाए. एनएच-343 पर सफर करने वाले हजारों लोगों के लिए यह सिर्फ एक वायरल खबर नहीं, बल्कि रोजमर्रा की परेशानी से जुड़ा सवाल है. अगर सच में करोड़ों की लागत से बनी सड़क पर गड्ढे बरकरार हैं और कागजों पर लाखों के भुगतान का हिसाब है, तो यह सीधे-सीधे जनता के टैक्स के पैसे और उसकी सुरक्षा से जुड़ा मसला बन जाता है.

‘फॉरेस्ट पेनाल्टी’ वाला हिस्सा भी कम दिलचस्प नहीं

एनएच-343 से जुड़ी कथित कैश-बुक में दर्ज एंट्रियों में ‘फॉरेस्ट पेनाल्टी’ का जिक्र अपने-आप में एक अलग तरह की कहानी की तरफ इशारा करता है. आमतौर पर वन विभाग से जुड़ी पेनाल्टी तब लगाई जाती है जब किसी निर्माण कार्य में वन भूमि, पेड़ों की कटाई या पर्यावरणीय नियमों का उल्लंघन सामने आता है. अगर 29 जनवरी की एंट्री में दर्ज 1 लाख 19 हजार 500 रुपए वाकई किसी पेनाल्टी के एवज में चुकाए गए, तो यह भी अपने-आप में जांच का विषय बन जाता है, आखिर वह कौन-सा उल्लंघन था, जिसके चलते इतनी बड़ी पेनाल्टी की नौबत आई? क्या इसका कोई आधिकारिक रिकॉर्ड वन विभाग के पास मौजूद है, या यह भी सिर्फ कागजी हिसाब भर है?

इसी तरह 28 फरवरी को दोबारा फॉरेस्ट डिपार्टमेंट के नाम पर 25 हजार रुपए की एंट्री यह संकेत देती है कि निर्माण कार्य के दौरान वन विभाग से जुड़ा कोई न कोई मसला बार-बार सामने आता रहा होगा. अगर यह रकम वास्तव में आधिकारिक पेनाल्टी के तौर पर सरकारी खजाने में जमा हुई है, तो इसका रिकॉर्ड निकालना कोई मुश्किल काम नहीं होना चाहिए. लेकिन अगर यह रकम सीधे किसी व्यक्ति विशेष को दी गई, तो यह मामला पेनाल्टी की आड़ में लेन-देन की तरफ इशारा करता है, जो कि पूरी तरह अलग और ज्यादा गंभीर श्रेणी का मुद्दा होगा.

मीडिया की भूमिका पर भी उठता सवाल, संतुलन जरूरी

यह सही है कि एनएच-343 से जुड़ी इस कथित कैश-बुक में ‘जर्नलिस्ट’ और ‘मीडिया’ के नाम पर भी रकम दर्ज दिखाई गई है, लेकिन इसे लेकर एक बात साफ समझनी जरूरी है — किसी एक कथित सूची में नाम आ जाने भर से यह साबित नहीं हो जाता कि पूरा मीडिया जगत ही किसी गड़बड़ी में शामिल है. पत्रकारिता का मूल काम सवाल पूछना और तथ्यों को सामने लाना है, न कि किसी दस्तावेज को बिना जांचे-परखे सही या गलत ठहरा देना.

यही वजह है कि जिम्मेदार पत्रकारिता की मांग यह होती है कि इस तरह के मामलों में जल्दबाजी में निष्कर्ष निकालने के बजाय तथ्यों और दस्तावेजों के सत्यापन पर जोर दिया जाए. अगर वाकई किसी पत्रकार या मीडिया प्रतिष्ठान का इस कथित लेन-देन से कोई वास्तविक संबंध पाया जाता है, तो वह भी जांच के दायरे में आना चाहिए — क्योंकि निष्पक्षता का सिद्धांत सबके लिए बराबर लागू होना चाहिए, चाहे वह प्रशासनिक अमला हो या मीडिया जगत.

जनप्रतिनिधियों की चुप्पी भी बनी सवाल

एनएच-343 जैसे बड़े राष्ट्रीय राजमार्ग से जुड़े इतने गंभीर आरोपों के बावजूद अब तक क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों की तरफ से भी कोई स्पष्ट और सार्वजनिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है. सड़क जनता से जुड़ा सीधा मुद्दा है, और जब उसी सड़क के निर्माण को लेकर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लग रहे हों, तो जनप्रतिनिधियों से यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि वे इस पर खुलकर अपनी बात रखें और प्रशासन से जवाबदेही तय करने की मांग करें.

फिलहाल इस मोर्चे पर भी खामोशी ही दिख रही है, जो इस पूरे प्रकरण को और उलझा हुआ बना देती है. जनता के बीच यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या यह चुप्पी सिर्फ इंतजार की रणनीति है, या फिर कहीं न कहीं असहजता की वजह से अपनाई जा रही है.

अंत में सवाल वहीं का वहीं

फिलहाल वायरल ऑडियो और कथित कैश-बुक, दोनों की स्वतंत्र और आधिकारिक पुष्टि होना अभी बाकी है. लेकिन इतना तय है कि मामला अब उस स्तर पर पहुंच चुका है, जहां सिर्फ खानापूर्ति वाली जांच से बात नहीं बनेगी. जरूरत इस बात की है कि यह पता लगाया जाए कि 11 लाख 39 हजार रुपए की इस कथित कहानी में सच्चाई का हिस्सा कितना है, और आखिर इस ‘हिसाब’ के पीछे छिपा असली खेल क्या है. जब तक जांच पूरी तरह पारदर्शी ढंग से सामने नहीं आती, तब तक एनएच-343 सिर्फ एक सड़क नहीं, बल्कि सवालों का एक लंबा-चौड़ा, बिना पक्की सतह वाला रास्ता बना रहेगा — जिस पर हर मोड़ पर एक नया गड्ढा और एक नया सवाल इंतजार कर रहा है.

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