छत्तीसगढ़ का इतिहास जानिए 10 अनसुने सच के साथ। पढ़ें वीर नारायण सिंह, गुंडाधुर, भूमकाल आंदोलन और आजादी के संघर्ष की पूरी कहानी।
रायपुर। छत्तीसगढ़ का इतिहास इसी अनसुनी कहानी का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह वह धरती है, जहां वीर नारायण सिंह ने अकाल के बीच भूखे लोगों के लिए आवाज उठाई। यही वह क्षेत्र है, जहां बस्तर में गुंडाधुर के नेतृत्व में 1910 का भूमकाल आंदोलन अंग्रेजी सत्ता के लिए बड़ी चुनौती बना। इसके अलावा जंगल, जमीन और स्थानीय अधिकारों को लेकर भी कई संघर्ष हुए।
प्रेस की आजादी: भारत 157वें स्थान पर, जानिए पूरी सच्चाई
इसलिए स्वतंत्रता दिवस पर सिर्फ दिल्ली के लाल किले की तस्वीर देखना पूरी कहानी नहीं है। इस कहानी का एक हिस्सा रायपुर में है। दूसरा सोनाखान में है। तीसरा बस्तर के जंगलों में है। चौथा उन गांवों में है, जहां अंग्रेजी शासन के खिलाफ धीरे-धीरे विरोध की आवाज मजबूत होती गई।
छत्तीसगढ़ का इतिहास: आजादी से पहले का दौर
आज जिस प्रदेश को हम छत्तीसगढ़ के नाम से जानते हैं, उसका इतिहास काफी पुराना है। सरकारी इतिहास विवरण के अनुसार इस क्षेत्र को प्राचीन समय में दक्षिण कोसल के नाम से जाना जाता था। बाद में रतनपुर के हैहयवंशी कलचुरियों का प्रभाव यहां रहा। छत्तीसगढ़ नाम को 36 गढ़ों की परंपरा से भी जोड़ा जाता है।
छत्तीसगढ़ का आधिकारिक इतिहास
छत्तीसगढ़ राज्य युवा आयोग — इतिहास
उस दौर में अंग्रेज यहां शासन करने नहीं आए थे। स्थानीय राजवंशों और शासकों का अपना प्रभाव था। समय के साथ राजनीतिक परिस्थितियां बदलीं और मराठा सत्ता का प्रभाव भी इस क्षेत्र में बढ़ा।
फिर 19वीं शताब्दी आई। इसी दौर में इस क्षेत्र की कहानी एक नए मोड़ पर पहुंची।
छत्तीसगढ़ का इतिहास और अंग्रेजी शासन
छत्तीसगढ़ का इतिहास केवल राजाओं और प्रशासनिक बदलावों तक सीमित नहीं है।
ब्रिटिश सत्ता धीरे-धीरे भारत के अलग-अलग हिस्सों में अपना प्रभाव बढ़ा रही थी। छत्तीसगढ़ क्षेत्र भी इससे अछूता नहीं रहा। ब्रिटिश प्रशासन का प्रभाव बढ़ने के साथ राजस्व व्यवस्था और प्रशासनिक ढांचे में बदलाव शुरू हुए।
कागज पर यह बदलाव प्रशासनिक दिखाई देते थे। लेकिन गांव के आम आदमी के लिए तस्वीर अलग थी। जमीन पर नए नियम आए। जंगल के इस्तेमाल को लेकर पाबंदियां बढ़ीं। राजस्व व्यवस्था का दबाव बढ़ा। स्थानीय लोगों और प्रशासन के बीच दूरी भी बढ़ने लगी।
यहीं से असंतोष की जमीन तैयार हुई।
छत्तीसगढ़ का प्रशासनिक और ऐतिहासिक विवरण
छत्तीसगढ़ शासन — राज्य का ऐतिहासिक विवरण

1854 के बाद बढ़ा ब्रिटिश प्रभाव
सरकारी स्रोतों के अनुसार छत्तीसगढ़ में ब्रिटिश प्रशासन का प्रभाव 1854 के बाद प्रत्यक्ष रूप से मजबूत हुआ। इसी दौर में क्षेत्र की प्रशासनिक व्यवस्था को अंग्रेजी शासन के अनुसार व्यवस्थित किया गया। हालांकि पूरा क्षेत्र एक ही तरीके से संचालित नहीं होता था।
कुछ हिस्सों में ब्रिटिश प्रशासन सीधे काम करता था। दूसरी ओर कई रियासतें मौजूद थीं। वहां स्थानीय शासक बने रहे, लेकिन ब्रिटिश राजनीतिक प्रभाव कायम रहा।
इसलिए उस दौर को केवल अंग्रेज अधिकारियों के सीधे शासन के रूप में समझना पूरी तस्वीर नहीं होगी। उस समय प्रशासनिक और रियासती व्यवस्था साथ-साथ चल रही थी।
जंगल और जमीन बने संघर्ष की वजह
छत्तीसगढ़ का इतिहास जंगल और आदिवासी समाज से गहराई से जुड़ा है। यहां जंगल सिर्फ पेड़ों का समूह नहीं था। वह भोजन, रोजगार, पशुओं के चारे और पारंपरिक जीवन का आधार था।
जब वन क्षेत्र से जुड़े नियम बदले, तो स्थानीय जीवन पर इसका सीधा असर पड़ा। लोगों की रोजमर्रा की जरूरतें प्रभावित हुईं। परिणामस्वरूप कई क्षेत्रों में प्रशासन के खिलाफ नाराजगी बढ़ती गई।
कहीं विरोध हुआ। कहीं स्थानीय नेतृत्व सामने आया। कुछ जगहों पर यह विरोध बड़े आंदोलनों में बदल गया।
छत्तीसगढ़ का इतिहास: वीर नारायण सिंह का संघर्ष
छत्तीसगढ़ का इतिहास वीर नारायण सिंह के बलिदान के बिना अधूरा माना जाएगा। वे सोनाखान के जमींदार थे और 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
भारत सरकार के आजादी का अमृत महोत्सव पोर्टल के अनुसार उन्हें छत्तीसगढ़ का पहला शहीद स्वतंत्रता सेनानी माना जाता है।
उनकी कहानी केवल अंग्रेजों से संघर्ष की नहीं है। इसकी शुरुआत अकाल और भूख से होती है।

वीर नारायण सिंह का स्वतंत्रता संग्राम
भारत सरकार — वीर नारायण सिंह
छत्तीसगढ़ का इतिहास: सोनाखान में उठी बगावत
साल 1856 में सोनाखान क्षेत्र में अकाल जैसी स्थिति बनी। लोगों के सामने भोजन का गंभीर संकट था। दूसरी ओर व्यापारियों के पास अनाज मौजूद था।
सरकारी डिजिटल जिला रिपॉजिटरी के अनुसार वीर नारायण सिंह ने एक व्यापारी के गोदाम में रखा अनाज लोगों में बांट दिया। इसके बाद व्यापारी की शिकायत पर उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।
अंग्रेजी प्रशासन की नजर में यह कानून तोड़ने की घटना थी। लेकिन भूखे लोगों के लिए यह मदद थी। इसी घटना के बाद वीर नारायण सिंह और ब्रिटिश प्रशासन के बीच टकराव खुलकर सामने आया।
जेल से बाहर आए वीर नारायण सिंह
गिरफ्तारी के बाद वीर नारायण सिंह को रायपुर जेल में बंद किया गया। फिर 1857 में देश के कई हिस्सों में अंग्रेजी शासन के खिलाफ विद्रोह शुरू हुआ।
इसी माहौल में वीर नारायण सिंह जेल से बाहर निकलने में सफल हुए। इसके बाद वे सोनाखान पहुंचे और अपने समर्थकों को संगठित किया।
भारत सरकार के रिकॉर्ड के अनुसार उनके साथ करीब 500 लोगों की सेना थी।
अब अंग्रेजों के सामने सिर्फ एक गिरफ्तार व्यक्ति नहीं था। उनके सामने संगठित प्रतिरोध खड़ा हो चुका था।
सोनाखान में अंग्रेजों से टकराव
ब्रिटिश प्रशासन ने इस चुनौती को गंभीरता से लिया। सैनिक कार्रवाई की तैयारी हुई। ब्रिटिश अधिकारी स्मिथ के नेतृत्व में सेना सोनाखान की ओर भेजी गई।
इसके बाद संघर्ष हुआ। ब्रिटिश सेना ने दबाव बढ़ाया। आखिरकार वीर नारायण सिंह को गिरफ्तार कर लिया गया और रायपुर लाया गया।
इसके बाद वह दिन आया, जिसे छत्तीसगढ़ के इतिहास में आज भी शहादत के दिन के रूप में याद किया जाता है।

10 दिसंबर 1857 को हुई शहादत
10 दिसंबर 1857 को रायपुर के जयस्तंभ चौक में वीर नारायण सिंह को फांसी दी गई। भारत सरकार के आजादी का अमृत महोत्सव पोर्टल में इस घटना का उल्लेख मिलता है।
फांसी के साथ अंग्रेजी प्रशासन ने शायद यह मान लिया होगा कि विरोध की आवाज खत्म हो गई। लेकिन इतिहास में कुछ कहानियां मौत के बाद खत्म नहीं होतीं। वे आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बन जाती हैं।
वीर नारायण सिंह की कहानी भी ऐसी ही रही।
जयस्तंभ चौक बना इतिहास का गवाह
आज रायपुर का जयस्तंभ चौक शहर की पहचान का हिस्सा है। यहां हर दिन हजारों लोग आते-जाते हैं। बाजार चलता है और शहर अपनी रफ्तार से आगे बढ़ता है।
लेकिन इसी स्थान का एक दूसरा चेहरा भी है। यही वह जगह है, जहां 1857 में वीर नारायण सिंह ने अपने प्राण दिए थे।
इसलिए जयस्तंभ चौक सिर्फ एक चौराहा नहीं है। यह छत्तीसगढ़ के स्वतंत्रता संघर्ष की महत्वपूर्ण स्मृति भी है।
छत्तीसगढ़ का इतिहास और बस्तर का भूमकाल आंदोलन
छत्तीसगढ़ के दक्षिणी हिस्से बस्तर में भी अंग्रेजी शासन के खिलाफ असंतोष बढ़ता गया। घने जंगल, स्थानीय परंपराएं और आदिवासी समाज की अपनी व्यवस्था इस क्षेत्र की पहचान रही।
जब प्रशासनिक हस्तक्षेप और वन संबंधी नियमों का प्रभाव बढ़ा, तो लोगों की नाराजगी भी बढ़ी।
फिर 1910 में बस्तर में बड़ा आंदोलन खड़ा हुआ।
इसे इतिहास में भूमकाल आंदोलन के नाम से जाना जाता है। छत्तीसगढ़ का इतिहास बताता है कि बस्तर में आदिवासी समाज ने अंग्रेजी सत्ता का किस तरह विरोध किया।”
छत्तीसगढ़ का इतिहास: गुंडाधुर की वीरगाथा
भूमकाल आंदोलन से सबसे प्रमुख रूप से जुड़ा नाम गुंडाधुर का है। भारत सरकार के अनुसार 1910 में उन्होंने बस्तर के आदिवासियों को विदेशी शासन के खिलाफ संघर्ष में नेतृत्व दिया।
आंदोलन कई क्षेत्रों तक पहुंचा। ब्रिटिश अधिकारियों और उनके सहयोगियों को चुनौती दी गई।
यह आंदोलन केवल एक स्थान तक सीमित नहीं था। इसके पीछे स्थानीय समाज की कई चिंताएं थीं।
भूमकाल आंदोलन की असली वजह
भूमकाल आंदोलन छत्तीसगढ़ का इतिहास का ऐसा अध्याय है, जिसे आज भी सम्मान के साथ याद किया जाता है। भूमकाल को सिर्फ अंग्रेजों के खिलाफ एक विद्रोह कहना पूरी तस्वीर नहीं है। इसके पीछे जंगल और जमीन से जुड़े सवाल भी थे।
स्थानीय लोगों की पारंपरिक व्यवस्था पर प्रशासनिक हस्तक्षेप बढ़ रहा था। वन कानूनों और राजस्व व्यवस्था का असर भी दिखाई दे रहा था।
ऐसे माहौल में विरोध बढ़ा। गुंडाधुर ने इस असंतोष को संगठित रूप देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
गुंडाधुर और भूमकाल आंदोलन
भारत सरकार — शहीद गुंडाधुर
अंग्रेजों ने दबाया भूमकाल आंदोलन
ब्रिटिश प्रशासन ने आंदोलन को दबाने के लिए सैन्य कार्रवाई की। भारत सरकार के रिकॉर्ड में बस्तर में आंदोलन को नियंत्रित करने के लिए ब्रिटिश सेना के इस्तेमाल का उल्लेख मिलता है।
आखिरकार आंदोलन को दबा दिया गया। हालांकि गुंडाधुर अंग्रेजों की गिरफ्त में नहीं आए।
यही कारण है कि उनका नाम बस्तर की सामूहिक स्मृति में आज भी सम्मान के साथ लिया जाता है।
नेतानार में आज भी जिंदा है गुंडाधुर की याद
गुंडाधुर की जन्मभूमि नेतानार आज भी ऐतिहासिक महत्व रखती है। भारत सरकार ने 2026 में नेतानार में शहीद वीर गुंडाधुर सेवा डेरा जन सुविधा केंद्र का उद्घाटन किया। इस अवसर पर 1910 के भूमकाल आंदोलन और गुंडाधुर की भूमिका का भी उल्लेख किया गया।
100 साल से ज्यादा समय गुजरने के बावजूद गुंडाधुर की कहानी आज भी लोगों के बीच मौजूद है। यही इतिहास की ताकत है।
स्वतंत्रता संघर्ष में महिलाओं की भूमिका
आजादी की लड़ाई को केवल पुरुषों की कहानी समझना सही नहीं होगा। छत्तीसगढ़ और आसपास के आदिवासी क्षेत्रों में महिलाओं ने भी प्रतिरोध में भूमिका निभाई।
भारत सरकार की सामग्री में रानी चो-रिस से जुड़े 1878 के संघर्ष का उल्लेख मिलता है। इसे महिला नेतृत्व वाले शुरुआती विरोध आंदोलनों में गिना जाता है।
इससे पता चलता है कि अंग्रेजी शासन के खिलाफ विरोध समाज के अलग-अलग वर्गों में मौजूद था।
जंगल के अधिकार बने बड़ा मुद्दा
छत्तीसगढ़ के आदिवासी समाज के लिए जंगल जीवन का आधार रहा है। इसलिए वन कानूनों का असर सीधे लोगों के जीवन पर पड़ा।
लकड़ी, चारा, वन उपज और रोजमर्रा की जरूरतों के लिए जंगल पर निर्भर समुदायों को नए नियमों का सामना करना पड़ा।
इसके परिणामस्वरूप प्रशासन और स्थानीय समाज के बीच तनाव बढ़ा।
बाद में यही सवाल जंगल सत्याग्रह जैसे आंदोलनों से भी जुड़े।
जंगल सत्याग्रह ने बदला आंदोलन का तरीका
छत्तीसगढ़ का इतिहास जंगल और जमीन से जुड़े आंदोलनों की भी कहानी है। समय के साथ स्वतंत्रता आंदोलन की शैली बदली। शुरुआती दौर में स्थानीय विद्रोह और सशस्त्र संघर्ष दिखाई देते थे। बाद में सत्याग्रह और अहिंसक आंदोलन का प्रभाव बढ़ा।
महात्मा गांधी के नेतृत्व में राष्ट्रीय आंदोलन का विस्तार हुआ। छत्तीसगढ़ में भी इसका असर पड़ा।
भारत सरकार की सामग्री में जंगल सत्याग्रह और झंडा सत्याग्रह को स्वतंत्रता आंदोलन में आदिवासी समुदायों की भागीदारी के उदाहरण के रूप में दर्ज किया गया है।
तिरंगा बना संघर्ष की पहचान
आज तिरंगा सम्मान और स्वतंत्रता का प्रतीक है। लेकिन अंग्रेजी शासन के दौरान राष्ट्रीय झंडा विरोध और आत्मसम्मान की पहचान भी था।
जब लोग तिरंगा लेकर सड़कों पर निकलते थे, तो उसका संदेश स्पष्ट होता था। लोग अपनी पहचान और अधिकार चाहते थे।
इसीलिए झंडा सत्याग्रह केवल झंडे का आंदोलन नहीं था। उसके पीछे स्वतंत्रता की व्यापक भावना थी।
रायपुर का पुलिस परेड ग्राउंड भी है गवाह
रायपुर का पुलिस परेड ग्राउंड भी स्वतंत्रता संघर्ष की घटनाओं से जुड़ा रहा है। भारत सरकार के डिजिटल जिला रिपॉजिटरी के अनुसार ब्रिटिश काल में यह क्षेत्र सैनिक छावनी के रूप में इस्तेमाल होता था।
18 जनवरी 1858 को हनुमान सिंह और उनके साथियों ने अंग्रेजी अधिकारियों के खिलाफ विद्रोह किया। इसके बाद कई घंटे तक संघर्ष चला।
इस घटना से पता चलता है कि 1857-58 का विद्रोह केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं था।
हनुमान सिंह ने भी अंग्रेजों को दी चुनौती
वीर नारायण सिंह की शहादत के बाद भी अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ असंतोष बना रहा। हनुमान सिंह के नेतृत्व में 1858 का विद्रोह इसका उदाहरण है।
उन्होंने अपने साथियों के साथ अंग्रेजी अधिकारियों को चुनौती दी। संघर्ष कई घंटे तक चला।
इस घटना ने रायपुर क्षेत्र में मौजूद असंतोष को सामने ला दिया।
सरगुजा में भी उठी विरोध की आवाज
छत्तीसगढ़ का उत्तरी हिस्सा भी संघर्ष से अछूता नहीं रहा। सरगुजा से जुड़े स्वतंत्रता संघर्ष के कई प्रसंग सरकारी रिकॉर्ड में मिलते हैं।
कल्याण सिंह से जुड़ी कहानी इसका एक उदाहरण है। ब्रिटिश अधिकारियों ने उदयपुर के शासक कल्याण सिंह और उनके भाइयों के खिलाफ कार्रवाई की। इसके बाद अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ संघर्ष हुआ।
इससे साफ होता है कि प्रतिरोध केवल बस्तर या रायपुर तक सीमित नहीं था।
कोरबा के इतवार सिंह की कहानी
आजादी की लड़ाई में कई ऐसे नाम हैं, जिनकी चर्चा कम होती है। इतवार सिंह खुर्सेंगा भी उन्हीं में से एक थे।
भारत सरकार के डिजिटल जिला रिपॉजिटरी के अनुसार वे कोरबा क्षेत्र से जुड़े स्वतंत्रता सेनानी थे। वे स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल हुए और जंगल सत्याग्रह में भी हिस्सा लिया।
ऐसी कहानियां बताती हैं कि स्वतंत्रता आंदोलन बड़े शहरों तक सीमित नहीं था। गांवों और दूरस्थ इलाकों के सामान्य लोग भी इसमें शामिल हुए।
आंदोलन शहर से गांव तक पहुंचा
स्वतंत्रता आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत उसका व्यापक होना था। किसान जुड़े। आदिवासी समाज जुड़ा। महिलाएं जुड़ीं। युवा जुड़े।
कहीं सत्याग्रह हुआ। कहीं जुलूस निकला। कहीं वन कानून का विरोध हुआ। कहीं तिरंगा फहराने पर गिरफ्तारी हुई।
इस तरह आजादी की मांग धीरे-धीरे समाज के हर हिस्से तक पहुंचती गई।
1942 के बाद संघर्ष निर्णायक दौर में पहुंचा
भारत छोड़ो आंदोलन के समय अंग्रेजी शासन के खिलाफ देशभर में माहौल बेहद मजबूत हो चुका था। अब सवाल सिर्फ स्थानीय अधिकारों का नहीं था।
देश स्वतंत्रता चाहता था।
छत्तीसगढ़ में भी राष्ट्रीय आंदोलन की गतिविधियों का असर दिखाई दिया। लोगों की राजनीतिक चेतना बढ़ रही थी।
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद ब्रिटेन की स्थिति कमजोर हुई। आखिरकार 1947 में भारत की स्वतंत्रता का रास्ता साफ हुआ।
छत्तीसगढ़ का इतिहास: 15 अगस्त 1947 के बाद
आजादी के बाद भी छत्तीसगढ़ का इतिहास एक नए राजनीतिक दौर में प्रवेश कर गया।
15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ। लाखों लोगों के लिए यह सपना सच होने जैसा था।
लेकिन उस समय अलग छत्तीसगढ़ राज्य अस्तित्व में नहीं आया था। यह क्षेत्र अलग-अलग प्रशासनिक और रियासती व्यवस्थाओं का हिस्सा था।
आने वाले वर्षों में क्षेत्रीय पहचान का सवाल मजबूत हुआ।
अलग छत्तीसगढ़ राज्य की मांग
आजादी के बाद लड़ाई का स्वरूप बदल गया। अब अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष नहीं था। सवाल था कि क्या छत्तीसगढ़ को अपनी अलग प्रशासनिक पहचान मिलनी चाहिए?
सरकारी इतिहास विवरण के अनुसार अलग राज्य की मांग की जड़ें 20वीं शताब्दी की शुरुआत तक जाती हैं। बाद के दशकों में यह मांग राजनीतिक रूप से मजबूत होती गई।
1990 के दशक में अलग राज्य की मांग ने व्यापक राजनीतिक समर्थन हासिल किया।
मध्य प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम, 2000
छत्तीसगढ़ सरकार — Madhya Pradesh Reorganisation Act 2000
छत्तीसगढ़ का इतिहास: 1 नवंबर 2000 की नई पहचान
1 नवंबर 2000 को राज्य गठन के साथ छत्तीसगढ़ का इतिहास एक नए अध्याय में पहुंचा। अगस्त 2000 में मध्य प्रदेश पुनर्गठन विधेयक को संसद से मंजूरी मिली। यह एक लंबे राजनीतिक और सामाजिक सफर का परिणाम था।
इस तरह 1857 के स्वतंत्रता संघर्ष से लेकर 2000 के राज्य गठन तक छत्तीसगढ़ ने लंबी ऐतिहासिक यात्रा तय की।
छत्तीसगढ़ राज्य गठन की आधिकारिक जानकारी
छत्तीसगढ़ शासन — प्रारंभिक जानकारी
इतिहास सिर्फ तारीखों का नाम नहीं
इतिहास में तारीखें महत्वपूर्ण होती हैं। लेकिन तारीखों के पीछे छिपे लोगों को समझना उससे भी ज्यादा जरूरी है।
1856 सिर्फ एक साल नहीं था। उसके पीछे अकाल और भूख थी।
1857 सिर्फ एक विद्रोह नहीं था। उसके पीछे स्वतंत्रता की इच्छा थी।
1910 सिर्फ एक तारीख नहीं थी। उसके पीछे बस्तर के आदिवासी समाज की नाराजगी थी।
1947 सिर्फ सत्ता परिवर्तन नहीं था। उसके पीछे लंबे संघर्ष का परिणाम था।
2000 सिर्फ राज्य गठन की तारीख नहीं थी। उसके पीछे क्षेत्रीय पहचान का लंबा आंदोलन था।
यही छत्तीसगढ़ का इतिहास है।
आज की पीढ़ी को क्या सीखना चाहिए?
आजादी का अर्थ केवल अंग्रेजों का भारत से जाना नहीं है। इसका अर्थ अधिकार, सम्मान और अपनी आवाज रखने की आजादी भी है।
वीर नारायण सिंह की कहानी हमें बताती है कि भूखे लोगों के लिए आवाज उठाना भी संघर्ष था। गुंडाधुर की कहानी बताती है कि अपनी जमीन और संस्कृति की रक्षा के लिए समाज एकजुट हो सकता है।
इसलिए स्वतंत्रता दिवस केवल उत्सव नहीं है। यह आत्ममंथन का अवसर भी है।
तिरंगे में छिपी है संघर्ष की कहानी
आज जब तिरंगा हवा में लहराता है, तो उसके साथ अनगिनत कहानियां भी लहराती हैं।
उनमें छत्तीसगढ़ का इतिहास भी शामिल है। सोनाखान की कहानी है। रायपुर की कहानी है। बस्तर की कहानी है। जंगलों की कहानी है। किसानों की कहानी है। आदिवासी समाज की कहानी है। महिलाओं के संघर्ष की कहानी है।
वीर नारायण सिंह ने भूखे लोगों के लिए आवाज उठाई और 1857 में शहादत दी। गुंडाधुर ने 1910 में बस्तर के आदिवासी समाज को अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ संगठित किया।
फिर 1947 में देश आजाद हुआ। इसके बाद अलग छत्तीसगढ़ की मांग ने लंबा सफर तय किया और 1 नवंबर 2000 को नया राज्य अस्तित्व में आया।
इसलिए स्वतंत्रता दिवस पर सिर्फ तिरंगा फहराना ही काफी नहीं है। उन लोगों को याद करना भी जरूरी है, जिनके संघर्ष से आज हमें स्वतंत्र देश में सांस लेने का अधिकार मिला।
आज का छत्तीसगढ़ उन संघर्षों की विरासत है। और यही इस धरती के इतिहास की सबसे बड़ी ताकत है।
