रायपुर। सरकारी दफ्तरों में एक कहावत मशहूर है “जिसकी लाठी उसकी भैंस।” छत्तीसगढ़ के उच्चशिक्षा विभाग ने इस कहावत को एक कदम आगे बढ़ाते हुए नया मुहावरा गढ़ दिया है “जिसकी सेटिंग, उसकी ग्रांट।” प्रदेश के निजी कॉलेजों को उच्च शिक्षा विभाग द्वारा सरकारी अनुदान बांटने के इस खेल में जो तस्वीर सामने आई है, उसे देखकर लगता है मानो कोई लॉटरी सिस्टम चल रहा हो, जिसमें टिकट सिर्फ तीन लोगों के हाथ में है और बाकी सब लाइन में खड़े होकर मुंह ताक रहे हैं। सूत्रों की मानें तो इस पूरे खेल में आधा पैसा यानी सीधा 50% हिस्सा “कमीशन” के नाम पर किसी की जेब गरम कर रहा है।
तीन के तीन “लकी विनर”, बाकी दर्जनों फाइलें धूल फांक रहीं
प्रदेश में करीब 25 से 50 निजी कॉलेज ऐसे हैं जो दशकों से अपने दम पर पढ़ाई करा रहे हैं, बच्चों का भविष्य गढ़ रहे हैं — लेकिन शिक्षा विभाग के खजाने से इन्हें फूटी कौड़ी तक नसीब नहीं। और दूसरी तरफ सिर्फ तीन कॉलेज हैं, जिन पर उच्च शिक्षा विभाग की ऐसी बरसात हो रही है मानो ये सरकार के “गोद लिए हुए बच्चे” हों। हर तीन साल में पक्का, नियमित, बिना किसी झंझट का ग्रांट। नाम भी नोट कर लीजिए:
- गुरुकुल महाविद्यालय, रायपुर
- अग्रसेन कॉलेज, कोरबा
- पी.जी. डागा कॉलेज, रायपुर
अब सवाल यह है कि आखिर इन्हीं तीन के सिर पर उच्चशिक्षा विभाग का हाथ क्यों है? क्या बाकी कॉलेजों ने कोई पाप किया है, या फिर यहां सिर्फ “पहुंच” काम कर रही है? छत्तीसगढ़ वित्त विभाग — अनुदान मांग दस्तावेज
कागजी घुमाव में छिपा उच्च शिक्षा विभाग असली खेल
उच्चशिक्षा विभाग के पास इस भेदभाव को जायज ठहराने के लिए तैयार जवाबों की पूरी लिस्ट है। कभी यूजीसी की धारा 2(f) और 12(B) का हवाला दिया जाता है, कभी अदालत के पुराने आदेश गिनाए जाते हैं, तो कभी अल्पसंख्यक और महिला शिक्षा को बढ़ावा देने का “पुण्य कार्य” बताया जाता है। उच्च शिक्षा विभाग के इन्हीं तकनीकी दांव-पेचों की आड़ में विशेष बजट पास होता है और ब्लॉक ग्रांट सीधे इन चुनिंदा कॉलेजों की तिजोरी में पहुंच जाता है। लेकिन जब नियमों की चादर के नीचे इतनी सफाई से खेल खेला जाए, तो शक होना लाजमी है — और यहीं से शुरू होती है 50% कमीशनखोरी की चर्चा, जो अब गलियारों से निकलकर सुर्खियां बन चुकी है।
शान से चलने वाले दुर्गा और सीएमडी कॉलेज अब “भिखारी” की कतार में
अगर आपको लगता है कि सिर्फ छोटे-मोटे कॉलेज ही इस भेदभाव के शिकार हैं, तो जरा ठहरिए। रायपुर का शानदार दुर्गा कॉलेज और बिलासपुर का प्रतिष्ठित सीएमडी कॉलेज — जो कभी मध्य प्रदेश के जमाने से अपनी साख बनाए हुए थे — आज उच्च शिक्षा विभाग की बेरुखी का सबसे बड़ा उदाहरण बन गए हैं। और इसकी वजह है उच्च शिक्षा विभाग की एक खतरनाक चाल, जिसे “जीरो पोस्ट पॉलिसी” का शानदार नाम दिया गया है। मतलब साफ है — जैसे ही कोई सीनियर प्रोफेसर रिटायर होता है, शिक्षा विभाग उस पद को भरने की बजाय उसे हमेशा के लिए ताला लगा देती है। नतीजा? पक्के शिक्षकों की जगह अब अतिथि शिक्षक और “जनभागीदारी” यानी आम जनता के चंदे पर कॉलेज चल रहे हैं। जिस कॉलेज की कभी तूती बोलती थी, वो आज शिक्षा विभाग के दरवाजों पर दर-दर की ठोकरें खा रहा है।
और सबसे दिलचस्प बात — कहा जा रहा है कि यह कोई गलती नहीं, बल्कि उच्च शिक्षा विभाग की सोची-समझी रणनीति है। विभाग चाहता है कि ये पुराने, नामी कॉलेज धीरे-धीरे पूरी तरह सेल्फ-फाइनेंस मोड में चले जाएं, ताकि उच्च शिक्षा विभाग को वेतन और रखरखाव के नाम पर एक फूटी कौड़ी भी न देनी पड़े। यानी पहले गला घोंटो, फिर कहो कि खुद के दम पर जियो!
बाकी कॉलेजों की तो कोई सुनवाई ही नहीं
प्रदेश के बचे-खुचे 25 से 50 निजी कॉलेजों का हाल तो और भी बुरा है। शिक्षा विभाग ने बरसों पहले ही नए कॉलेजों को “शत-प्रतिशत अनुदान” की सूची में शामिल करना बंद कर दिया। उच्च शिक्षा विभाग का पूरा ध्यान नए सरकारी कॉलेज खोलने और उनके उद्घाटन में फीता काटने पर लगा है, जबकि शिक्षा विभाग की तरफ से निजी संस्थानों के बजट में हर साल कैंची चलती जा रही है। मानो इनका वजूद ही सरकार की प्राथमिकता सूची से गायब हो चुका हो।
आखिर सवाल यही है — किसकी जेब भर रही है उच्च शिक्षा विभाग की “व्यवस्था”?
बिना किसी साफ, बराबरी वाली और पारदर्शी नीति के जिस तरह उच्चशिक्षा विभाग में ग्रांट का बंटवारा हो रहा है, उसने पूरी व्यवस्था की चूलें हिला दी हैं। तीन कॉलेजों की तिजोरी हर साल भर रही है, तो वहीं दर्जनों नामी और पुराने संस्थान अपने अस्तित्व की जंग लड़ रहे हैं। सवाल सिर्फ ग्रांट का नहीं, बल्कि शिक्षा विभाग के उस पूरे सिस्टम का है जो “नियमों” की चादर ओढ़कर मनमानी करता नजर आ रहा है। अब देखने वाली बात यह होगी कि क्या उच्चशिक्षा विभाग के इस पूरे मामले की कभी निष्पक्ष जांच होगी, कोई जवाबदेही तय होगी — या फिर उच्चशिक्षा विभाग का यह “50% वाला खेल” यूं ही चलता रहेगा, और शिक्षा के मंदिर यूं ही सरकारी दरवाजों पर दस्तक देते रह जाएंगे।

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