किस्त नहीं भरी तो क्या गाड़ी छीन लेंगे? जान लीजिए अपना हक़

पटना हाईकोर्ट के एक बड़े फैसले ने लाखों कर्जदारों को दी राहत, अब मनमानी नहीं चलेगी

आजकल गाड़ी-मोटरसाइकिल, ट्रैक्टर, ऑटो, टेम्पो सब कुछ लोन पर मिल जाता है। किस्त भरते-भरते ही ज्यादातर परिवारों की गाड़ी चलती है। बैंक वाले भी खुश रहते हैं जब तक किस्त समय पर आती रहती है। लेकिन जिंदगी में उतार-चढ़ाव आते ही रहते हैं, कभी नौकरी छूट जाए, कभी घर में कोई बीमार पड़ जाए, कभी खेती में नुकसान हो जाए, कभी धंधा मंदा पड़ जाए, तो एक-दो किस्त रुक ही जाती है। और यहीं से शुरू होती है असली परेशानी।

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रात-बिरात कुछ अनजान लोग आ धमकते हैं। खुद को “रिकवरी एजेंट” बताते हैं, धमकाते हैं, गाली-गलौज करते हैं, और देखते ही देखते गाड़ी उठाकर ले जाते हैं। कई बार तो बात मारपीट तक पहुंच जाती है। घर की औरतें-बच्चे डर के मारे कांपने लगते हैं। और सबसे बड़ी बात, ज्यादातर लोग यह सोचकर चुप रह जाते हैं कि “किस्त नहीं भरी तो हमारी ही गलती है, अब कुछ नहीं कर सकते, जो हो गया सो हो गया।”

भाइयों-बहनों, अब यह सोच बदलनी पड़ेगी। कानून आपके साथ है, बस आपको अपना हक़ पता होना चाहिए।

आखिर हुआ क्या था पटना में

पटना हाईकोर्ट में कई लोगों ने मिलकर याचिका डाली थी। सबकी कहानी एक जैसी थी गाड़ी लोन पर ली, दो-चार किस्त रुक गई, और फिर बिना कोई सूचना दिए, बिना कोई कागज दिखाए, फाइनेंस कंपनी के एजेंट जबरन गाड़ी उठा ले गए। किसी को रात में रोका गया, किसी के घर के सामने से गाड़ी उठाई गई, किसी के साथ धक्का-मुक्की भी हुई। इन सब लोगों का कहना था कि यह सरासर गलत है, गाड़ी उनकी रोज़ी-रोटी का सहारा थी, और उसे इस तरह छीन लेने से उनका परिवार भूखा मरने की नौबत आ गई।

हाईकोर्ट ने इन सारी शिकायतों को गंभीरता से सुना और एक बहुत बड़ा फैसला सुनाया, जो अब पूरे बिहार ही नहीं, पूरे देश के लिए एक मिसाल बन गया है।

कोर्ट ने क्या कहा — साफ-साफ सुन लीजिए

पटना हाईकोर्ट ने कहा कि किस्त न भर पाना कोई अपराध नहीं है। यह सिर्फ एक आर्थिक मजबूरी है। और इस मजबूरी का फायदा उठाकर कोई भी एजेंट किसी की गाड़ी जबरन नहीं उठा सकता। कोर्ट ने यहां तक कहा कि ऐसा करना किसी इंसान की रोज़ी-रोटी छीनने जैसा है, और यह सीधे-सीधे उसके “जीने के हक़” पर हमला है, जो हमारे संविधान में हर नागरिक को मिला हुआ है।

कोर्ट ने बैंकों और फाइनेंस कंपनियों को कड़ी फटकार लगाई और कहा कि कर्ज वसूली के नाम पर कोई भी गुंडागर्दी बर्दाश्त नहीं की जाएगी। अब आगे से जो भी होगा, वो इस तरह होगा:

  • अगर कोई रिकवरी एजेंट किसी की गाड़ी जबरन उठाता है, तो उस बैंक या फाइनेंस कंपनी के खिलाफ FIR दर्ज होगी
  • पुलिस को साफ निर्देश दिया गया है कि वो खुद ऐसे मामलों में कार्रवाई करे, शिकायत का इंतजार भी न करे
  • ऐसा करने वाली कंपनी पर 50 हज़ार रुपये तक जुर्माना लगेगा

यानी अब सिर्फ वो एजेंट नहीं जो गाड़ी उठाने आया, बल्कि पूरी कंपनी मुसीबत में फंसेगी। यह बात बहुत मायने रखती है, क्योंकि अब तक कंपनियां यह कहकर बच निकलती थीं कि “हमने तो एजेंसी को ठेका दिया था, हमारी क्या गलती।” अब ऐसा नहीं चलेगा।

तो क्या बैंक कभी गाड़ी ले ही नहीं सकता?

यहां एक बात समझनी जरूरी है, कोर्ट ने यह नहीं कहा कि बैंक कभी कुछ नहीं कर सकता। बैंक का पैसा वापस लेने का हक़ है, लेकिन इसके लिए एक कायदा-कानून है, उसे मानना पड़ेगा। चोरी-छिपे या धमकाकर नहीं, नियम से।

इसके लिए एक कानून है जिसे सरफेसी एक्ट कहते हैं, जो साल 2002 में संसद ने बनाया था। इसमें साफ-साफ लिखा है:

पहले बैंक को कर्जदार को 60 दिन का लिखित नोटिस भेजना जरूरी है। इस नोटिस में साफ-साफ बताना होगा कि कितना पैसा बकाया है, कब से बकाया है, और अगर इतने दिन में पैसा नहीं आया तो आगे क्या कार्रवाई होगी। अगर 60 दिन बीत जाने के बाद भी कर्जदार पैसा नहीं भर पाता, तभी बैंक कानूनी तरीके से गाड़ी या संपत्ति पर कब्जा लेने की कार्रवाई शुरू कर सकता है — और वो भी उचित प्रक्रिया अपनाकर, सार्वजनिक सूचना देकर।

एक और जरूरी बात, अगर गाड़ी नीलाम हो भी जाए, तो उससे जो पैसा बचता है, कर्ज काटने के बाद, वो कर्जदार को वापस मिलना चाहिए। यह उसका हक़ है।

तो सीधी सी बात है, सीधे रात के अंधेरे में घर के बाहर से, या सड़क पर रोककर, धमकाकर गाड़ी उठा ले जाना — ये पूरी तरह गैरकानूनी है। ऐसा कोई कर ही नहीं सकता, चाहे कर्ज कितना भी बकाया क्यों न हो।

RBI का भी नियम है, ये भी जान लीजिए

भारतीय रिजर्व बैंक यानी RBI ने भी बैंकों और फाइनेंस कंपनियों के लिए साफ नियम बना रखे हैं, जिनका पालन करना उनके लिए जरूरी है:

  • एजेंट किसी कर्जदार से सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे के बीच ही संपर्क कर सकता है — इससे पहले या बाद में घर जाकर परेशान करना गलत है
  • एजेंट को शालीनता से बात करनी होगी। गाली-गलौज, धमकी देना, सबके सामने बेइज्जत करना — ये सब सख्त मना है
  • हर एजेंट के पास पहचान पत्र होना चाहिए, और उसकी पूरी लिस्ट बैंक की शाखा में उपलब्ध होनी चाहिए — यानी आप बैंक जाकर चेक कर सकते हैं कि जो आदमी आपके घर आया वो सच में उस कंपनी का अधिकृत एजेंट है या कोई ठग
  • और सबसे जरूरी बात, अगर एजेंट कोई गलत काम करता है, तो जिम्मेदारी सीधे बैंक या फाइनेंस कंपनी की होगी, अकेले एजेंट पर टाला नहीं जा सकता

एक उदाहरण से समझिए

मान लीजिए, रामू नाम का एक ऑटो चालक है। उसने लोन लेकर ऑटो खरीदा और उसी से घर चलाता है। अचानक उसके पिताजी बीमार पड़ जाते हैं, अस्पताल का खर्च आता है, और दो-तीन महीने की किस्त रुक जाती है। एक रात अचानक चार लोग आते हैं, खुद को रिकवरी एजेंट बताते हैं, बिना कोई कागज दिखाए रामू का ऑटो उठाकर ले जाते हैं। न कोई नोटिस, न कोई सूचना।

अब रामू के पास कमाने का कोई जरिया नहीं बचा। घर में फाके की नौबत आ गई। अगर रामू को अपने हक़ की जानकारी हो, तो वो तुरंत थाने जाकर FIR करा सकता है, बैंक के खिलाफ शिकायत दर्ज करा सकता है, और अपनी गाड़ी वापस पाने की लड़ाई लड़ सकता है। यही जागरूकता आज हर उस इंसान तक पहुंचनी चाहिए जिसने लोन लेकर गाड़ी खरीदी है।

अगर आपके साथ ऐसा हो जाए तो तुरंत क्या करें

  1. सबसे पहले शांत रहिए, बहस या झगड़ा मत कीजिए — लेकिन डरिए भी मत
  2. जितनी जल्दी हो सके नजदीकी थाने जाइए और FIR लिखवाइए — पुलिस को FIR लिखने से मना करने का हक़ नहीं है
  3. जो लोग गाड़ी लेने आए थे, उनका नाम, चेहरा, गाड़ी का नंबर, अगर हो सके तो फोटो-वीडियो बना लीजिए
  4. आस-पास खड़े लोगों को गवाह बना लीजिए, उनका नाम-नंबर नोट कर लीजिए
  5. जिस बैंक या फाइनेंस कंपनी से लोन लिया था, उसकी शाखा में जाकर लिखित शिकायत दीजिए, और शिकायत की रसीद जरूर लीजिए
  6. RBI के बैंकिंग लोकपाल के पास भी ऑनलाइन शिकायत कर सकते हैं, यह बिल्कुल मुफ्त है
  7. गांव-शहर में मौजूद लीगल एड सेंटर (विधिक सेवा प्राधिकरण) से मुफ्त कानूनी सलाह ले सकते हैं
  8. जरूरत पड़े तो कोर्ट में भी याचिका डाल सकते हैं, वहां भी राहत मिल सकती है

लोगों में फैली गलतफहमियां — जरा ध्यान से पढ़िए

समाज में इस विषय को लेकर बहुत सी गलतफहमियां फैली हुई हैं, और इन्हीं गलतफहमियों का फायदा उठाकर कुछ लोग गरीब-गुरबों को डराते हैं। आइए इन्हें एक-एक करके साफ करते हैं:

गलतफहमी: “एजेंट कभी भी, कहीं भी गाड़ी उठा सकते हैं।”
सच्चाई: बिल्कुल गलत। बिना नोटिस के, बिना सही प्रक्रिया अपनाए कोई गाड़ी नहीं उठा सकता।

गलतफहमी: “एजेंट पुलिस जैसे ही होते हैं, उनका विरोध करना अपराध है।”
सच्चाई: गलत। रिकवरी एजेंट कोई सरकारी अधिकारी नहीं होते। उन्हें जबरदस्ती वसूली करने का कोई कानूनी हक़ नहीं है।

गलतफहमी: “किस्त न भरी तो जेल हो जाएगी।”
सच्चाई: गलत। यह एक दीवानी (सिविल) मामला है, अपराध नहीं। हां, अगर कोई जानबूझकर धोखाधड़ी करे या चेक बाउंस जैसा कुछ हो, तो वो अलग मामला है, उसके लिए अलग कानून है।

गलतफहमी: “एक बार गाड़ी जब्त हो गई तो अब कुछ नहीं हो सकता।”
सच्चाई: गलत। अगर सही प्रक्रिया नहीं अपनाई गई, तो कोर्ट के आदेश से गाड़ी वापस भी मिल सकती है और हर्जाना भी।

समस्या सिर्फ बिहार की नहीं

यह मामला सिर्फ पटना या बिहार तक सीमित है। देश के लगभग हर राज्य से ऐसी खबरें आती रहती हैं — शादी के दिन गाड़ी उठा ले गए, अस्पताल के बाहर से उठा ले गए, सड़क पर रोककर मारपीट कर दी। शहरों से ज्यादा गांव और छोटे कस्बों में यह समस्या गंभीर है, क्योंकि वहां लोगों को कानून की जानकारी कम होती है और वो जल्दी डर जाते हैं। इसलिए पटना हाईकोर्ट के इस फैसले को सिर्फ एक स्थानीय खबर मानकर मत भूल जाइए — यह पूरे देश के हर उस परिवार के काम की बात है जिसने कभी लोन पर गाड़ी ली हो।

जानकारी सबको बताइए

कानून की जानकारी न होना ही सबसे बड़ी कमजोरी है। इसी का फायदा उठाकर गरीब, अनपढ़ और डरे हुए लोगों को धमकाया जाता है। इसलिए यह जरूरी है कि यह खबर, यह जानकारी हर गांव, हर मोहल्ले, हर घर तक पहुंचे। अपने पड़ोसी को बताइए, अपने रिश्तेदार को बताइए, जो भी लोन पर गाड़ी चलाता है उसे यह जरूर बताइए कि अगर कभी ऐसी नौबत आए तो घबराना नहीं है, चुप नहीं बैठना है — सीधे थाने जाना है, शिकायत करनी है।

आखिर में एक बात

लोन लेना कोई गुनाह नहीं है। किस्त रुक जाना भी हर बार जानबूझकर नहीं होता, कई बार मजबूरी होती है। अगर कभी किस्त भरने में दिक्कत आए, तो सबसे अच्छा तरीका है कि समय रहते बैंक जाकर बात कीजिए, किस्त आगे बढ़वाने का अनुरोध कीजिए। लेकिन अगर कोई एजेंट धमकाकर, जबरदस्ती करके आपकी मेहनत की कमाई की गाड़ी छीनने आए — तो चुप मत बैठिए। अब कानून खुलकर आपके साथ खड़ा है, पटना हाईकोर्ट ने यह साबित कर दिया है। अपना हक़ जानिए, दूसरों को भी बताइए — यही सबसे बड़ी जागरूकता है।

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