फूड सेफ्टी ऑफिसर की नियुक्ति पर बवाल, 12वीं पास बाबुओं को प्रमोशन का आरोप; योग्यता पर उठे बड़े सवाल

फूड सेफ्टी ऑफिसर की नियुक्ति पर बवाल

फूड सेफ्टी ऑफिसर बनाने के दावे से छत्तीसगढ़ में बवाल है। 12वीं पास कर्मचारियों की कथित पदोन्नति, योग्यता और स्वास्थ्य विभाग के आदेश पर उठे गंभीर सवाल।

रायपुर। छत्तीसगढ़ के स्वास्थ्य महकमे में इन दिनों अजब- गजब खेल चल रहा है, जिसने विभागीय कामकाज से लेकर सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। आम जनता के खाने-पीने की चीजों की जांच और मिलावट पर कार्रवाई करने वाले फूड सेफ्टी ऑफिसर के पद पर कथित तौर पर 12वीं पास कार्यालय सहायकों को पदोन्नति देकर जिम्मेदारी सौंपे जाने की जानकारी सामने आई है। मामला सामने आते ही स्वास्थ्य विभाग के भीतर ही तरह-तरह की चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है। सवाल सीधा है कि जिस पद के लिए तकनीकी और विषय आधारित शैक्षणिक योग्यता जरूरी बताई जाती है, वहां बिना संबंधित डिग्री वाले कर्मचारियों को आखिर किस नियम के तहत जिम्मेदारी दे दी गई? रामगोपाल अग्रवाल के घर ED रेड: शराब घोटाला मामले में दस्तावेजों की जांच

बताया जा रहा है कि स्वास्थ्य सचिव और खाद्य सुरक्षा आयुक्त अमित कटारिया के हस्ताक्षर से करीब सप्ताह भर पहले एक आदेश जारी किया गया। इस आदेश में विभाग के 13 कर्मचारियों को अलग-अलग जिलों में फूड सेफ्टी ऑफिसर के पद की जिम्मेदारी दिए जाने का दावा किया जा रहा है। आदेश सामने आने के बाद विभागीय गलियारों में हलचल मच गई। जानकारों का कहना है कि यदि संबंधित कर्मचारियों के पास पद के लिए जरूरी मूल शैक्षणिक योग्यता नहीं है, तो यह फैसला सामान्य पदोन्नति से कहीं आगे का मामला बन सकता है।

12वीं पास बाबुओं को कैसे मिल गई फूड सेफ्टी ऑफिसर की कुर्सी?

विभागीय सूत्रों के मुताबिक जिन कर्मचारियों को फूड सेफ्टी ऑफिसर बनाया गया है, वे अब तक कार्यालय सहायक के तौर पर काम करते रहे हैं। इनका काम खाद्य सुरक्षा अधिकारियों के साथ मौके पर जाना, सैंपलिंग की प्रक्रिया में सहयोग करना, नमूनों पर लेबल लगाना और संबंधित दस्तावेजों को तैयार करने जैसे सहायक कार्यों से जुड़ा बताया जाता है।

अब सवाल यह है कि सहायक के तौर पर काम करने वाले कर्मचारियों को सीधे फूड सेफ्टी ऑफिसर की जिम्मेदारी देने का आधार क्या बनाया गया? क्या सिर्फ विभागीय अनुभव को योग्यता माना गया? क्या इनके शैक्षणिक प्रमाणपत्रों की जांच हुई? या फिर पदोन्नति के लिए कोई ऐसा विशेष नियम लागू किया गया, जिसकी जानकारी अब तक सार्वजनिक नहीं की गई है?

फूड सेफ्टी ऑफिसर

मामला यहीं खत्म नहीं होता। जानकारी के मुताबिक इन कर्मचारियों में से किसी के पास भी फूड टेक्नोलॉजी, डेयरी टेक्नोलॉजी, बायोटेक्नोलॉजी या संबंधित तकनीकी विषय में वह मूल डिग्री नहीं है, जिसे इस पद की पात्रता से जोड़ा जाता है। अगर यह दावा सही है तो फिर विभाग को यह बताना होगा कि फूड सेफ्टी ऑफिसर जैसे तकनीकी पद के लिए योग्यता की शर्त आखिर किस तरह पूरी मानी गई।

फूड सेफ्टी ऑफिसर के लिए योग्यता पर ही सबसे बड़ा सवाल

फूड सेफ्टी ऑफिसर कोई सामान्य कार्यालयीन पद नहीं है। यह सीधे जनता की थाली और सेहत से जुड़ा तकनीकी पद है। खाद्य पदार्थों की जांच, सैंपलिंग, मिलावट की पड़ताल, दुकानों और प्रतिष्ठानों का निरीक्षण तथा नियमों का उल्लंघन मिलने पर कार्रवाई जैसी जिम्मेदारियां इसी व्यवस्था से जुड़ी होती हैं।

इसी वजह से इस पद के लिए संबंधित विषय की शैक्षणिक योग्यता को अहम माना जाता है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक एमबीबीएस के साथ फूड टेक्नोलॉजी, डेयरी टेक्नोलॉजी, बायोटेक्नोलॉजी और संबंधित विषयों की डिग्री को पात्रता से जोड़ा जाता है। ऐसे में यदि 12वीं पास कर्मचारियों को बिना संबंधित तकनीकी डिग्री के फूड सेफ्टी ऑफिसर बनाया गया है तो यह सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर विभाग ने किस नियम की व्याख्या के आधार पर यह फैसला लिया।

प्रशासनिक मामलों के जानकारों का कहना है कि किसी पद पर पदोन्नति के लिए केवल कर्मचारी का पुराना अनुभव ही पर्याप्त नहीं होता। अगर सेवा नियम में शैक्षणिक योग्यता अनिवार्य है तो उसे पूरा करना भी जरूरी होता है। यही वजह है कि इस मामले में विभागीय आदेश के साथ-साथ संबंधित कर्मचारियों की शैक्षणिक योग्यता और लागू सेवा नियम की जांच की मांग उठ सकती है।

छत्तीसगढ़ खाद्य, नागरिक आपूर्ति एवं उपभोक्ता संरक्षण विभाग

13 कर्मचारियों को अलग-अलग जिलों में जिम्मेदारी

सामने आई जानकारी के मुताबिक कुल 13 कर्मचारियों को फूड सेफ्टी ऑफिसर की जिम्मेदारी दी गई है। इनमें अंजली नायक को सरगुजा से कोरिया, सुमन अग्रवाल को रायगढ़ से सारंगढ़, निधि जायसवाल को कोरिया से मुंगेली और सुमन ठाकुर को बलौदा से कांकेर भेजे जाने की बात सामने आई है।

इसी क्रम में वीणा साहू को सरगुजा से सूरजपुर, दिव्या सिंह राजपूत को दुर्ग से दुर्ग, अर्चना तिवारी को रायपुर से गरियाबंद और निधि यादव को रायपुर से महासमुंद पदस्थ किए जाने का दावा है। इन्द्रजीत सिंह को सरगुजा से सरगुजा, प्रमोद वर्मा को सूरजपुर से दंतेवाड़ा और सरिता मरावी को जांजगीर-चांपा से सक्ती भेजे जाने की जानकारी दी गई है।

भूपेन्द्रनाथ सिंह को राजनांदगांव से मानपुर-मोहला और रुखमणी कंवर को बलौदाबाजार से पेंड्रा-गौरेला भेजे जाने की बात भी सामने आई है। इन कर्मचारियों को पदोन्नति देकर अलग-अलग जिलों में जिम्मेदारी दिए जाने का दावा है।

यानी यह कोई एक जिले या एक कर्मचारी तक सीमित मामला नहीं बताया जा रहा। प्रदेश के कई हिस्सों में इन कर्मचारियों की पदस्थापना की बात सामने आने के बाद सवाल और बड़ा हो गया है। यदि आदेश में इन सभी को फूड सेफ्टी ऑफिसर का पद दिया गया है तो हर कर्मचारी की योग्यता और पदोन्नति का आधार सार्वजनिक करना जरूरी हो जाता है।

फूड सेफ्टी ऑफिसर योग्य डिग्रीधारी युवाओं की मेहनत पर पानी?

इस फैसले का दूसरा पहलू उन युवाओं से जुड़ा है, जिन्होंने फूड सेफ्टी ऑफिसर बनने के लिए संबंधित तकनीकी डिग्रियां हासिल की हैं। फूड टेक्नोलॉजी, बायोटेक्नोलॉजी, डेयरी टेक्नोलॉजी और अन्य संबंधित विषयों में पढ़ाई करने वाले छात्र सरकारी नौकरी की उम्मीद में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं।

छत्तीसगढ़ में भी फूड सेफ्टी ऑफिसर के पदों पर सीधी भर्ती के लिए व्यापमं के जरिए परीक्षा आयोजित किए जाने की बात सामने आती रही है। ऐसे में यदि विभागीय स्तर पर ही पदोन्नति के जरिए पद भर दिए जाते हैं और उसमें निर्धारित तकनीकी योग्यता का पालन नहीं होता, तो प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहे युवाओं के बीच नाराजगी बढ़ना स्वाभाविक है।

एक तरफ छात्र वर्षों तक पढ़ाई करते हैं, डिग्री हासिल करते हैं और भर्ती परीक्षा के लिए दिन-रात मेहनत करते हैं। दूसरी तरफ अगर उसी पद पर बिना संबंधित डिग्री वाले कर्मचारियों को विभागीय पदोन्नति के जरिए बैठा दिया जाए तो सवाल सिर्फ एक आदेश का नहीं रह जाता, बल्कि पूरी भर्ती व्यवस्था की विश्वसनीयता पर उठने लगता है।

नियम बदले या नियमों की अलग व्याख्या हुई?

इस पूरे मामले में सबसे अहम सवाल यही है कि क्या सरकार या स्वास्थ्य विभाग ने फूड सेफ्टी ऑफिसर पद के लिए लागू नियमों में कोई बदलाव किया है। अगर बदलाव हुआ है तो उसका शासनादेश क्या है? उसकी तारीख क्या है? और क्या यह बदलाव सभी कर्मचारियों पर समान रूप से लागू है?

यदि ऐसा कोई संशोधन नहीं हुआ है तो फिर विभागीय पदोन्नति में किस नियम का इस्तेमाल किया गया? क्या विभागीय चयन समिति ने कर्मचारियों की पात्रता पर विचार किया? क्या किसी सक्षम प्राधिकारी ने उनकी तकनीकी योग्यता को लेकर आपत्ति दर्ज की थी?

इन सवालों के जवाब मिलने के बाद ही पूरे मामले की असली तस्वीर सामने आएगी।

स्वास्थ्य सचिव अमित कटारिया के आदेश पर निगाह

इस पूरे विवाद के केंद्र में स्वास्थ्य सचिव और खाद्य सुरक्षा आयुक्त अमित कटारिया का नाम भी सामने आ रहा है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक कथित आदेश पर उनके हस्ताक्षर हैं। यही वजह है कि अब विभागीय स्तर पर यह जानने की कोशिश की जा रही है कि आदेश किस प्रक्रिया के तहत तैयार हुआ और इसे जारी करने से पहले कर्मचारियों की पात्रता की जांच किस स्तर पर की गई।

फूड सेफ्टी ऑफिसर : स्वास्थ्य सचिव और खाद्य सुरक्षा आयुक्त अमित कटारिया

किसी अधिकारी के हस्ताक्षर मात्र से किसी आरोप को सही नहीं माना जा सकता। मगर जब किसी संवेदनशील तकनीकी पद पर नियुक्ति को लेकर सवाल उठते हैं, तब आदेश जारी करने वाली व्यवस्था से जवाब मांगना स्वाभाविक है। अगर विभाग के पास नियमों के मुताबिक पदोन्नति का स्पष्ट आधार है तो उसे सामने रखकर विवाद खत्म किया जा सकता है।

वहीं अगर आदेश में तकनीकी योग्यता से जुड़ी शर्तों को दरकिनार किया गया है तो फिर मामले की समीक्षा की जरूरत पड़ सकती है।

फूड सेफ्टी ऑफिसर का काम इतना अहम क्यों?

खाद्य सुरक्षा की पूरी व्यवस्था आम आदमी की सेहत से जुड़ी है। बाजार में बिकने वाली मिठाई, दूध, तेल, मसाले, पैकेज्ड खाद्य सामग्री या अन्य उत्पादों की गुणवत्ता पर नजर रखना इसी तंत्र का हिस्सा है। कहीं मिलावट की शिकायत मिलती है तो नमूना लिया जाता है। नमूने को जांच के लिए भेजा जाता है। रिपोर्ट के आधार पर आगे कार्रवाई की जाती है।

फूड सेफ्टी ऑफिसर

कई मामलों में यही कार्रवाई आगे चलकर अदालत तक पहुंचती है। ऐसे में सैंपल लेने की प्रक्रिया से लेकर दस्तावेज तैयार करने तक हर कदम महत्वपूर्ण होता है। तकनीकी गलती होने पर पूरा केस कमजोर पड़ सकता है।

यही कारण है कि फूड सेफ्टी ऑफिसर के पद पर काम करने वाले व्यक्ति से तकनीकी समझ और नियमों की जानकारी की उम्मीद की जाती है। अगर इस पद पर नियुक्ति में ही योग्यता को लेकर सवाल उठ जाएं तो आगे की कार्रवाई की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठना तय है।

FSSAI की आधिकारिक वेबसाइट

पहले सहायक, अब सीधे फूड सेफ्टी ऑफिसर ?

विभागीय सूत्रों की मानें तो जिन कर्मचारियों को अब फूड सेफ्टी ऑफिसर बनाया गया है, वे पहले खाद्य सुरक्षा अधिकारियों के साथ सहायक की भूमिका निभाते थे। मौके पर जाकर सैंपलिंग में सहयोग करना, नमूनों पर लेबल लगाना और दस्तावेजों से जुड़े काम करना उनकी जिम्मेदारी बताई जाती है।

सहायक की भूमिका निभाने और तकनीकी अधिकारी की जिम्मेदारी संभालने के बीच बड़ा अंतर है। यही वजह है कि विभागीय कर्मचारियों के बीच भी यह चर्चा है कि आखिर अनुभव के किस आधार पर इन कर्मचारियों को सीधे अधिकारी की जिम्मेदारी सौंप दी गई।

अगर विभाग का तर्क है कि लंबे अनुभव के कारण इन्हें पदोन्नति दी गई, तो उस अनुभव की वैधानिक मान्यता भी स्पष्ट करनी होगी। क्या सेवा नियम में ऐसा प्रावधान है? अगर है तो वह आदेश में कहां दर्ज है? इन सवालों का जवाब सामने आना बाकी है।

एफएसएसएआई के नियमों का हवाला

इस मामले में एफएसएसएआई यानी भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण के नियमों का भी हवाला दिया जा रहा है। विभागीय जानकारों का कहना है कि खाद्य सुरक्षा व्यवस्था में तकनीकी योग्यता को लेकर नियम काफी स्पष्ट हैं।

बताया जा रहा है कि संबंधित विषय की मूल योग्यता के बिना फूड सेफ्टी ऑफिसर के तौर पर काम करने पर कई तरह की तकनीकी और कानूनी दिक्कतें सामने आ सकती हैं। खासकर सैंपलिंग और उससे जुड़ी कानूनी कार्रवाई में अधिकारी की पात्रता अहम हो सकती है।

हालांकि इस दावे की अंतिम पुष्टि संबंधित नियमों और नियुक्ति आदेश की जांच के बाद ही होगी। यही वजह है कि अब विभाग को यह बताना चाहिए कि नियुक्त किए गए सभी कर्मचारियों ने किस योग्यता के आधार पर पद की पात्रता हासिल की।

स्वास्थ्य विभाग में पहले से उठते रहे हैं सवाल

स्वास्थ्य विभाग पहले से ही कई तरह की चुनौतियों से जूझता रहा है। सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों की कमी, दवाओं की उपलब्धता, जांच सुविधाओं और विभागीय सप्लाई जैसे मुद्दे समय-समय पर सामने आते रहे हैं।

 फूड सेफ्टी ऑफिसर : स्वास्थ्य विभाग

ऐसे माहौल में खाद्य सुरक्षा विभाग से जुड़ा यह मामला सामने आने के बाद सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठना स्वाभाविक है। जनता को उम्मीद रहती है कि जिस विभाग का काम उसकी सेहत से जुड़ा है, वहां हर नियुक्ति नियम और योग्यता के आधार पर होगी।

फूड सेफ्टी ऑफिसर की जिम्मेदारी तो और भी संवेदनशील है, क्योंकि एक गलत फैसला कई लोगों की सेहत पर असर डाल सकता है। मिलावटी खाद्य पदार्थों पर कार्रवाई कमजोर हुई तो इसका फायदा सीधे मिलावटखोरों को मिल सकता है।

भ्रष्टाचार के आरोपों के बीच नया विवाद

स्रोत सामग्री में स्वास्थ्य सचिव अमित कटारिया पर भ्रष्टाचार से जुड़े कई गंभीर आरोपों का भी उल्लेख किया गया है। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि इस रिपोर्ट के लिए उपलब्ध सामग्री से नहीं हुई है। ऐसे में उन्हें प्रमाणित तथ्य के रूप में पेश करना उचित नहीं होगा।

फिर भी इन आरोपों की पृष्ठभूमि में फूड सेफ्टी ऑफिसर की कथित पदोन्नति का मामला सामने आने से विभागीय पारदर्शिता पर चर्चा तेज होना स्वाभाविक है। अगर सरकार के पास इस आदेश को सही ठहराने के लिए नियम और दस्तावेज मौजूद हैं तो उन्हें सामने लाने में कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए।

क्या सरकार करेगी आदेश की समीक्षा?

अब निगाह सरकार के अगले कदम पर है। क्या स्वास्थ्य विभाग इस आदेश की समीक्षा करेगा? क्या पदोन्नत किए गए कर्मचारियों की शैक्षणिक योग्यता दोबारा जांची जाएगी? क्या विभाग यह स्पष्ट करेगा कि फूड सेफ्टी ऑफिसर पद के लिए कौन-सा नियम लागू किया गया?

फूड सेफ्टी ऑफिसर की नियुक्ति को सामान्य

इन सवालों का जवाब फिलहाल सामने नहीं आया है। लेकिन मामला जिस तरह चर्चा में आया है, उसके बाद सरकार की चुप्पी भी कई सवालों को जन्म दे सकती है।

यदि आदेश पूरी तरह नियमसम्मत है तो सरकार को दस्तावेज के साथ स्थिति साफ करनी चाहिए। दूसरी ओर, अगर नियमों में किसी तरह की गड़बड़ी सामने आती है तो उसे सुधारने की जिम्मेदारी भी सरकार की ही होगी।

जनता पूछ रही है—खाने की जांच कौन करेगा?

सबसे बड़ा सवाल आम जनता का है। बाजार में बिकने वाले खाद्य पदार्थों की जांच करने वाला अधिकारी खुद निर्धारित योग्यता रखता है या नहीं, यह जानना जनता का अधिकार है।

अगर किसी दुकान से लिए गए सैंपल पर कार्रवाई होती है तो व्यापारी अदालत में उस कार्रवाई को चुनौती दे सकता है। ऐसे में अधिकारी की पात्रता और सैंपलिंग प्रक्रिया भी महत्वपूर्ण हो सकती है।

यही वजह है कि फूड सेफ्टी ऑफिसर की नियुक्ति को सामान्य तबादले या पदोन्नति का मामला मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इसमें सीधे खाद्य सुरक्षा और सार्वजनिक स्वास्थ्य का सवाल जुड़ा है।

फूड सेफ्टी ऑफिसर

सवालों के घेरे में पूरी प्रक्रिया

मामले में अब सिर्फ कर्मचारियों की योग्यता ही नहीं, बल्कि पूरी पदोन्नति प्रक्रिया पर सवाल उठ रहे हैं।क्या इस पदोन्नति के लिए विभागीय समिति का गठन किया गया था? वरिष्ठ अधिकारियों ने फाइल की बारीकी से जांच की थी या नहीं? इस मामले में विधि विभाग की राय ली गई थी? वित्त विभाग अथवा सामान्य प्रशासन विभाग से जरूरी अनुमति ली गई थी? सबसे अहम बात, क्या संबंधित पद के भर्ती नियमों का परीक्षण करने के बाद यह फैसला लिया गया?

इन सभी सवालों के जवाब दस्तावेजों में होने चाहिए। अगर प्रक्रिया पूरी तरह नियमों के तहत हुई है तो विवाद अपने आप खत्म हो सकता है।

मगर यदि नियमों की अनदेखी हुई है तो यह सिर्फ प्रशासनिक गलती नहीं, बल्कि एक ऐसा फैसला बन सकता है जिस पर आगे कानूनी आपत्ति भी उठ सकती है।

योग्य उम्मीदवारों को क्या मिलेगा जवाब?

प्रदेश में हजारों युवा सरकारी नौकरी की तैयारी करते हैं। तकनीकी पदों के लिए संबंधित डिग्री हासिल करने में परिवारों का पैसा और छात्रों के कई साल खर्च होते हैं। फूड सेफ्टी ऑफिसर बनने की तैयारी करने वाले उम्मीदवारों के लिए भी यही स्थिति है।

ऐसे युवाओं का सवाल है कि जब सरकारी भर्ती में संबंधित डिग्री मांगी जाती है तो विभागीय पदोन्नति में उसका क्या महत्व है? अगर नियम अलग-अलग हैं तो सरकार को इसकी स्पष्ट जानकारी सार्वजनिक करनी चाहिए।

युवाओं के बीच यह संदेश नहीं जाना चाहिए कि तकनीकी डिग्री और प्रतियोगी परीक्षा की मेहनत से ज्यादा महत्व विभागीय पहुंच या पुराने अनुभव का है। सरकारी नौकरी की व्यवस्था में पारदर्शिता का भरोसा बनाए रखना जरूरी है।

अब दस्तावेज खोलेंगे राज

फिलहाल पूरे विवाद की सबसे अहम कड़ी कथित पदोन्नति आदेश है। आदेश की मूल प्रति, सेवा नियम, संबंधित कर्मचारियों की शैक्षणिक योग्यता और विभागीय चयन प्रक्रिया सामने आने के बाद ही यह तय किया जा सकेगा कि मामला नियमों के मुताबिक है या नहीं।

यदि सभी दस्तावेज नियमों के अनुसार हैं तो स्वास्थ्य विभाग के पास अपनी स्थिति स्पष्ट करने का मजबूत आधार होगा। अगर दस्तावेजों में विरोधाभास मिलता है तो फिर सवाल और गंभीर हो जाएंगे।

फूड सेफ्टी जैसे संवेदनशील पद पर नियुक्ति को लेकर पारदर्शिता इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि यहां किसी कागजी गलती का असर केवल विभागीय रिकॉर्ड तक सीमित नहीं रहता।

सरकार के सामने सीधी चुनौती

अब सरकार के सामने दो रास्ते हैं। पहला, पूरे मामले की तथ्यात्मक जांच कराकर स्थिति जनता के सामने रखना। दूसरा, आदेश और नियमों की जानकारी सार्वजनिक कर उठ रहे सवालों का जवाब देना।

फूड सेफ्टी ऑफिसर पद पर नियुक्ति को लेकर अगर कोई भ्रम है तो उसे जल्द दूर किया जाना चाहिए। जनता की सेहत से जुड़े विभाग में भ्रम की स्थिति लंबे समय तक बनी रहना ठीक नहीं माना जा सकता।

वहीं योग्य उम्मीदवारों की शिकायतों को भी गंभीरता से सुनना होगा। अगर उन्हें लगता है कि भर्ती या पदोन्नति नियमों का उल्लंघन हुआ है तो सरकार को उनके सवालों का जवाब देना चाहिए।

जांच के बाद ही तस्वीर होगी साफ

फिलहाल सामने आई जानकारी के आधार पर फूड सेफ्टी ऑफिसर पद पर 13 कर्मचारियों को पदोन्नति दिए जाने और उनकी शैक्षणिक योग्यता को लेकर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं। स्वास्थ्य विभाग के आदेश की वास्तविक स्थिति, कर्मचारियों की डिग्री और लागू सेवा नियमों की जांच के बाद ही यह साफ होगा कि आरोपों में कितनी सच्चाई है।

एक बात जरूर तय है कि खाद्य सुरक्षा जैसे संवेदनशील क्षेत्र में नियमों और योग्यता को लेकर किसी भी तरह की अस्पष्टता नहीं होनी चाहिए। सरकार अगर इस मामले में दस्तावेज सार्वजनिक कर देती है तो कई सवालों के जवाब खुद-ब-खुद मिल जाएंगे।

अब देखना यह है कि स्वास्थ्य विभाग इस कथित आदेश पर क्या सफाई देता है और क्या सरकार फूड सेफ्टी ऑफिसर की नियुक्ति प्रक्रिया की दोबारा समीक्षा करती है। फिलहाल तो विभागीय गलियारों से लेकर योग्य उम्मीदवारों तक एक ही सवाल गूंज रहा है—तकनीकी पद की तय योग्यता आखिर गई कहां?

फूड सेफ्टी ऑफिसर

12वीं पास को फूड सेफ्टी ऑफिसर बनाने पर बवाल, उठे सवाल

छत्तीसगढ़ में 12वीं पास कर्मचारियों को फूड सेफ्टी ऑफिसर बनाने के दावे से बवाल है। योग्यता, प्रमोशन नियम और स्वास्थ्य विभाग के आदेश पर उठे सवाल।

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