छत्तीसगढ़ : अयोग्य कुर्सी से महादेव सट्टा तक, सत्ता के गलियारों में कई सवाल

छत्तीसगढ़ की अयोग्य कुर्सी से महादेव सट्टा के पर्दे तक

सुशांत गौतम की नजर – खास रिपोर्ट…

रायपुर. प्रदेश में इन दिनों कुर्सियों का एक अलग ही तमाशा चल रहा है। जनाब, यहां हर कुर्सी की अपनी एक कहानी है, हर मुलाजिम की अपनी एक मोहलत है और हर फाइल की अपनी एक उम्र है। छत्तीसगढ़ के सिस्टम में जो चीज सबसे ज्यादा मजबूत दिखती है, वो है कुर्सी पर बैठने वालों का सब्र। बाकी सब कुछ हिल सकता है, मगर कुर्सी अपनी जगह कायम रहती है। आइए, छत्तीसगढ़ के इसी कुर्सी-किस्से को जरा तफ्सील से समझते हैं। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट CCTV मामला: गौरेला थाने की फुटेज नहीं मिली, 550 थानों पर सख्त निर्देश

नाकाबिल कुर्सी का किस्सा

छत्तीसगढ़ के सबसे बड़े मामलों में से एक सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई में सामने आया, जहां जज साहब ने साफ-साफ कह दिया कि छत्तीसगढ़ के डीजीपी साहब पूरी तरह नाकाबिल हैं। जनाब, यह कोई मामूली फिकरा नहीं था। यह छत्तीसगढ़ के पूरे पुलिस महकमे की कार्यक्षमता पर अदालत की एक तगड़ी टिप्पणी थी, वो भी उस मामले में जहां हिरासत में मौत जैसा संगीन इल्जाम था। मामला इतना गंभीर निकला कि छत्तीसगढ़ सरकार की अपनी जांच पर भरोसा ही नहीं किया गया और सीबीआई को तफ्तीश सौंपनी पड़ी।

छत्तीसगढ़ की अयोग्य कुर्सी

अब जरा सोचिए, जिस महकमे के मुखिया पर खुद सुप्रीम कोर्ट सवाल उठा चुका हो, उसी मामले की जांच सीबीआई कर रही हो, तो क्या उसी अफसर को कुर्सी पर बिठाए रखकर छत्तीसगढ़ में निष्पक्ष जांच की उम्मीद रखी जा सकती है? और यह सवाल सिर्फ डीजीपी तक ही क्यों सीमित रहे जनाब? छत्तीसगढ़ के डीजी जेल भी इसी मामले में अदालत के सामने जवाबदेह पक्ष हैं। पुलिस हिरासत से लेकर जेल प्रशासन तक की पूरी कड़ी में जब सुप्रीम कोर्ट को खुद जवाब मांगना पड़ा, तो फिर जवाबदेही सिर्फ छोटे मुलाजिमों पर डालकर कैसे बात खत्म मानी जा सकती है? जल संसाधन विभाग का वायरल मैसेज: अधिकारियों में क्यों मचा हड़कंप?

छत्तीसगढ़ के इस मामले में एक बात साफ है कुर्सी से हटाना कोई सजा नहीं होता, मगर निष्पक्ष तफ्तीश के लिए कुर्सी से फासला बनाना जरूरी होता है। जब सुप्रीम कोर्ट खुद छत्तीसगढ़ के पुलिस नेतृत्व की काबिलियत पर उंगली उठा चुका हो, तो कुर्सी पर बने रहने की दलील अब सरकार को देनी है, तफ्तीश को नहीं।

छत्तीसगढ़ में कप्तान साहब की मोहलत वाली कुर्सी

न्यायधानी में इन दिनों एक अजीब सा नजारा है। छत्तीसगढ़ में अपराध के आंकड़े ऊपर जा रहे हैं, हाईकोर्ट सवाल पर सवाल पूछ रहा है और पुलिस की तफ्तीश का तरीका भी अदालत की निगाह से बच नहीं पा रहा। मगर इन सबके बीच एक कुर्सी ऐसी है, जिस पर मौसम का कोई असर ही नहीं पड़ता। पिछले साल हाईकोर्ट के सामने जनवरी से जुलाई तक के आंकड़े रखे गए थे 120 चाकूबाजी के वाकये, 7 मौतें और 122 लोग जख्मी। तब सवाल छत्तीसगढ़ में चाकुओं की खुलेआम बिक्री और अपराध पर लगाम को लेकर था।

अब एनडीपीएस के एक मामले में अदालत ने जांच के तरीके पर ही उंगली उठा दी। जिस मुलाजिम ने देहाती नालिश दर्ज की, वही जांच अफसर बना और वही चार्जशीट भी दाखिल कर बैठा। यह कैसे हुआ जनाब? डीजीपी साहब से शपथपत्र मांगना पड़ गया। मतलब छत्तीसगढ़ की इस न्यायधानी में अदालत की दस्तक एक बार नहीं, बार-बार सुनाई दे रही है। फूड सेफ्टी ऑफिसर की नियुक्ति पर बवाल, 12वीं पास बाबुओं को प्रमोशन का आरोप; योग्यता पर उठे बड़े सवाल

इसी बीच एक और कप्तान साहब की कुर्सी पर सवाल है, जो छत्तीसगढ़ में सरकार बनने के बाद से जमे हुए हैं। पिछली तबादला फेहरिस्त में उनका नाम भी चर्चा में आया था, मगर छह महीने की मोहलत मिल गई और मामला टल गया। अब फिर नई फेहरिस्त की आहट सुनाई दे रही है। यही वो साहब हैं, जिनकी मोहलत का किस्सा अब छत्तीसगढ़ के पुलिस महकमे में जुबान पर है। लगता है तबादला फेहरिस्त बनने से पहले साहब से पूछा जाता होगा और कितना वक्त चाहिए जनाब?

कप्तान साहब का हिसाब-किताब भी निराला है। अपराध के आंकड़े बढ़ते रहें, हाईकोर्ट टिप्पणी करता रहे, मगर साहब की कुर्सी अभी मोहलत के दायरे में महफूज है। साहब की इस मोहलत से जुड़ी पुरानी बातें भी छत्तीसगढ़ के गलियारों में फिर लौट आई हैं बलौदा बाजार में जमीन-जायदाद में लगाई गई रकम से लेकर हर छह महीने में कोई न कोई अधूरा काम पूरा करने की बात। इसमें कितनी सच्चाई है और कितना हिसाब-किताब, यह तो साहब ही जानें। मगर हर बार मोहलत मिल जाना अपने आप में एक अलग कहानी जरूर बन जाता है। जब छत्तीसगढ़ की न्यायधानी में हाईकोर्ट लगातार पुलिसिंग का हिसाब मांग रहा हो, तब कप्तान साहब की कुर्सी का हिसाब आखिर कौन मांगेगा अपराध के आंकड़े, अदालत की टिप्पणियां या फिर कुर्सी पर बिताए गए बरस?

छत्तीसगढ़ जल संसाधन महकमे की अधूरी सफाई

छत्तीसगढ़ के जल संसाधन विभाग में सफाई अभियान चला तो लगा कि काफी पुराना कूड़ा-कचरा बाहर हो गया होगा। मगर सरकारी महकमों में सफाई की एक पुरानी दिक्कत है झाड़ू चल भी जाए, तब भी कुछ कोने ऐसे बच जाते हैं, जहां धूल नहीं बल्कि पुरानी आदत जमी होती है। संजय भागवत साहब के जाने के बाद अब मुख्यालय में नजरें कुछ और संविदा वाले चेहरों पर टिक गई हैं। इदरीश खान साहब करीब दो बरस से संविदा पर हैं, प्रसून शर्मा साहब करीब पांच बरस से संविदा पर टिके हैं और एसई प्रशासन की कुर्सी भी अभी तक संविदा व्यवस्था से पूरी तरह आजाद नहीं हो पाई। उधर चौहान साहब वित्त नियंत्रक की भूमिका संभाले हुए हैं।

मतलब छत्तीसगढ़ के इस महकमे में संविदा का अध्याय अभी बंद नहीं हुआ, बस किरदार बदल गए हैं। दिलचस्प बात यह है कि इस महकमे में ठेकेदार लॉबी के असर को लेकर पहले भी सवाल उठते रहे हैं। ऐसे में यह जानना कोई गुनाह नहीं कि इन कुर्सियों तक पहुंचने वाले फोन कॉल आखिर कहां-कहां से आते हैं और किन-किन लोगों से कितनी बार बातचीत होती है। अगर छत्तीसगढ़ के इस महकमे को सचमुच अपनी सफाई पर यकीन है, तो संबंधित अफसरों के आधिकारिक कॉल रिकॉर्ड और फैसलों की टाइमलाइन का मिलान भी करा लिया जाए। दूध का दूध और संविदा का संविदा हो जाएगा।

क्योंकि सवाल किसी एक मुलाजिम के संविदा पर होने का नहीं है। सवाल यह है कि छत्तीसगढ़ के जिस महकमे में हजारों करोड़ के काम होते हैं, वहां फैसले लेने वाली कुर्सियों के इर्द-गिर्द कितने पुराने रिश्ते अब भी नए नामों के साथ बरकरार हैं। कचरा बाहर निकालना तो आसान है साहब, मुश्किल यह देखना है कि झाड़ू लगने के बाद भी कोने में कुछ बोरे आखिर क्यों बचे रह गए।

छत्तीसगढ़ में डर और भरोसे के बीच की सियासत

बीते दिनों छत्तीसगढ़ के एक विधायक साहब से मुलाकात हुई। सियासत में आने से पहले कलाकार रहे हैं, इसलिए आत्मविश्वास और पेशकश दोनों में कोई कमी नहीं। बात शुरू हुई तो पूरा मैदानी हिसाब-किताब सामने रख दिया गया कितने दौरे किए, कितने लोगों से मुलाकात हुई, कहां पकड़ मजबूत है, कहां समीकरण अपने पक्ष में बैठते हैं। आंकड़े इतने ज्यादा कि लगा जनाब चुनाव नहीं, कोई बड़ी परीक्षा की तैयारी चल रही है। नतीजा भी उनके हिसाब से लगभग तय ही समझिए।

तिरंगा यात्रा का जिक्र आया तो बताया गया कि लोगों के चेहरे और हाव-भाव देखकर ही पता चल जाता है कि कौन कितने फीसद साथ खड़ा है। हम सुनते रहे और मन ही मन सोचते रहे कि छत्तीसगढ़ की सियासत में अब सर्वे कराने की जरूरत ही क्या है, चेहरे पढ़कर ही आंकड़े निकाले जा सकते हैं। हमने जमीन से मिल रहे कुछ अलग तरह के इशारे भी बताए, मगर साहब का आत्मविश्वास अपनी जगह टस से मस नहीं हुआ।

फिर बात अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई पर आ गई, जिस पर गांव वालों का विरोध हुआ, पुलिस से टकराव हुआ और मामला एफआईआर तक जा पहुंचा। मामला विधानसभा तक पहुंचा और विरोधी दल को भी एक मुद्दा हाथ लग गया। साहब का आकलन था कि इससे छत्तीसगढ़ की सियासी जमीन पर कोई खास फर्क नहीं पड़ा। यहीं जरा चटखारा लेने वाली बात है। दिल कहता है जमीन मजबूत है, दिमाग कहता है एक सर्वे और करा लो साहब। अगर आंकड़े ही इम्तिहान लेने लगें तो शायद बड़ी से बड़ी परीक्षा भी निकल जाए। मगर अफसोस, यह चुनाव है भाई साहब यहां प्रश्नपत्र तो जनता बनाती है और नतीजा उंगली पर ही दिखाई देता है।

बरसों पुरानी फाइल ने उड़ाई नींद

छत्तीसगढ़ में कल सुबह 2003 की पीएससी वाली पुरानी फाइल फिर सुर्खियों में आ गई। खबर छपी कि ईओडब्ल्यू जल्द ही चालान पेश कर सकती है और पंद्रह से ज्यादा अफसर जांच के दायरे में हैं। यह खबर बाहर आते ही उन अफसरों में हड़कंप मच गया, जो कभी इसी परीक्षा में बैठे थे। इधर इन अफसरों ने पहले आपस में वीडियो कॉल की और अब मुखिया समेत प्रमुख सचिव से मिलने की बात भी सामने आ रही है। यह डर है या डराने की कोई खबर, यह तो पता नहीं, मगर छत्तीसगढ़ के इन मुलाजिमों की नींद जरूर उड़ी हुई है।

महादेव ऐप/सट्टा मामले से जुड़ी ED की जानकारी:Enforcement Directorate (ED)

छत्तीसगढ़ सरकार की आधिकारिक वेबसाइट:Chhattisgarh Government

सुप्रीम कोर्ट की आधिकारिक वेबसाइट:Supreme Court of India

छत्तीसगढ़ की 2003 वाली इस परीक्षा में गड़बड़ी

हमने इस मामले में एसीबी चीफ साहब से बात की। उनका साफ कहना था कि तफ्तीश पहले से चल रही है, उनसे किसी ने कोई बयान नहीं लिया और फिलहाल इस मामले में सिर्फ दो मुल्जिम हैं, दोनों का ताल्लुक उस वक्त के परीक्षा नियंत्रक से है। मतलब खबर में तो पंद्रह नाम गिनाए जा रहे हैं और जांच एजेंसी के मुखिया की जानकारी में सिर्फ दो। छत्तीसगढ़ की 2003 वाली इस परीक्षा में गड़बड़ी का मामला कोई नया नहीं है। उस वक्त के परीक्षा नियंत्रक के खिलाफ 2007 में विभागीय कार्रवाई का रिकॉर्ड भी मौजूद है। पीएससी के पुराने मामलों में यह भी सामने आ चुका है कि परीक्षा में गड़बड़ी और आयोग अध्यक्ष की निजी आपराधिक जिम्मेदारी हमेशा एक ही बात नहीं होती।

अशोक दरबारी वाले मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बाद में उन्हें दोषी नहीं माना था। तो सवाल सीधा है जनाब फाइल सचमुच खुली है या किसी ने पुरानी फाइल की धूल झाड़कर छत्तीसगढ़ में डर का माहौल बना दिया है? क्योंकि फिलहाल तफ्तीश जारी है, सुप्रीम कोर्ट में मामला लंबित है और जांच एजेंसी के मुताबिक मुल्जिम सिर्फ दो ही हैं। बाकी पंद्रह कौन हैं, चालान कब आएगा और किसके खिलाफ आएगा, यह तो तफ्तीश ही बताएगी। फिलहाल इतना जरूर है कि तेईस बरस पुरानी परीक्षा के परीक्षार्थी आज अफसर बन चुके हैं, और कल की खबर ने छत्तीसगढ़ के उन्हीं अफसरों की नींद उड़ा दी है।

महादेव सिंडिकेट से उठने वाला पर्दा

छत्तीसगढ़ में महादेव की कहानी को अब तक जितना समझा और जाना गया, असली कहानी उससे कहीं ज्यादा गहरी निकली। यह खेल सिर्फ सट्टे का नहीं था, इसके पीछे एक पूरा सिंडिकेट काम कर रहा था, जो पर्दे के पीछे से इस पूरे खेल को सहारा दे रहा था। अब उसी गिरोह से पर्दा उठने का वक्त आ गया है। दुबई की चमक-दमक से निकलकर ओमान की धरती से आई एक खबर ने पूरी कहानी को नया मोड़ दे दिया है। किंगपिन सौरभ चंद्राकर ने ओमान में भारतीय जांच एजेंसियों के साथ सहयोग करने की इच्छा जताई है। बदले में उसे और उसके घरवालों को हिफाजत चाहिए।

वह अपने नेटवर्क, उससे फायदा उठाने वालों और छत्तीसगढ़ से जुड़े नेताओं-अफसरों के चेहरों से पर्दा हटाने को तैयार बताया जा रहा है। साथ ही भारत लाए जाने पर सुरक्षित हिरासत, पूछताछ के दौरान अदालती निगरानी और अपना बयान खुद अदालत के सामने दर्ज कराने जैसी शर्तें भी उसने रख दी हैं। छत्तीसगढ़ की महादेव कहानी में पहली बार ऐसा लग रहा है कि जिसे पकड़ने के लिए एजेंसियां दरवाजे खटखटा रही थीं, वही अब खुद दरवाजा खोलकर पूरी अलमारी दिखाने को राजी बैठा है। बस एक ही शर्त है पहले हिफाजत।

इस शर्त का मतलब भी जरा समझिए जनाब। अगर खतरा सिर्फ कानून से होता तो अदालत का डर काफी था। यहां डर उन लोगों से बताया जा रहा है, जो कभी इसी नेटवर्क की छतरी के नीचे बैठे थे। सीबीआई पहले ही छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री से लेकर कई अफसरों और चार आईपीएस अफसरों के यहां छापेमारी कर चुकी है। मतलब जांच की आंच सत्ता और सिस्टम के कई दरवाजों तक पहुंच चुकी है। इधर विपक्ष की नींद पहले से ही उड़ी हुई है और सत्ता पक्ष के माननीय भी बेचैन नजर आ रहे हैं। क्योंकि इस कहानी में कुछ किरदार सामने आ चुके हैं तो कई अभी भी पर्दे के पीछे छिपे बैठे हैं।

एक शेखचिल्ली जैसा किरदार, एक हमेशा मस्ती में रहने वाले साहब, और एक मुनीम, जिसे यह मालूम है कि किस खाते में कितनी रकम आई और किस रास्ते से बाहर गई। इन सबके बीच एक ऐसा किरदार भी है, जो मंच पर तो कभी नहीं आया, मगर सत्ता की कहानी में उसका रिश्ता बेहद करीबी बताया जाता है। इतना करीबी कि एक सफर में लगाई गई खासी रकम ने भाई साहब की सियासत को छत्तीसगढ़ की सीमा से निकालकर सीधे केंद्र की चौखट तक पहुंचा दिया। एक बात और जो खाते जांच के दौरान फ्रीज किए गए थे, उनमें रकम अब भी बची है या नहीं, यह भी तफ्तीश का एक अहम बिंदु बन सकता है।

उधर चंद्राकर की कहानी में एक और परत भी सामने आई है फर्जी इंडोनेशियाई पासपोर्ट, बदली हुई पहचान और ओमान में चल रही अपनी अलग कानूनी कार्रवाई। भारतीय एजेंसियां प्रत्यर्पण का रास्ता तलाश रही हैं और भारत-ओमान प्रत्यर्पण संधि के तहत मामला आगे बढ़ रहा है। अब सवाल यह है कि महादेव की अगली किस्त में सिर्फ सट्टेबाजों के ही नाम सामने आएंगे, या उन चेहरों के भी, जो सट्टे की मेज पर तो कभी बैठे नहीं, मगर मेज चलती रहे इसकी कीमत जरूर वसूलते रहे?

अगर चंद्राकर बोल पड़ता है, तो यह सिर्फ एक मुल्जिम का बयान भर नहीं होगा। यह छत्तीसगढ़ के उन तमाम लोगों के लिए खतरे की घंटी होगी, जिन्होंने सोचा था कि रकम इधर-उधर घूम जाएगी, सरकार बदल जाएगी, फाइल पुरानी पड़ जाएगी और साथ में कहानी भी दब जाएगी। क्योंकि रकम भले ही बैंक से निकल जाए, मगर कहानी कभी-कभी खाते से नहीं बल्कि किसी आदमी के मुंह से निकले बयान से खुलती है। और इस बार डर बस यही है कि जिसे अब तक कहानी का सिर्फ एक मामूली किरदार समझा जा रहा था, कहीं वही पूरी पटकथा अपने साथ लेकर न बैठा हो।

आखिर में छत्तीसगढ़ की कुर्सियों से एक सवाल

छत्तीसगढ़ के इन तमाम किस्सों को अगर एक साथ रखकर देखा जाए, तो एक ही बात बार-बार सामने आती है यहां कुर्सियां बड़ी मजबूत हैं, बस जवाबदेही जरा कमजोर पड़ जाती है। कभी डीजीपी की कुर्सी पर सवाल, कभी कप्तान साहब की मोहलत, कभी संविदा वाले चेहरों का बदलता खेल, कभी सियासी आत्मविश्वास और कभी बरसों पुरानी फाइल का अचानक जाग उठना छत्तीसगढ़ में यह सिलसिला नया नहीं है, बस हर बार किरदार और मौसम बदल जाता है। छत्तीसगढ़ की जनता बस इतना ही पूछना चाहती है कि आखिर कुर्सी पर बैठने वालों का हिसाब कब लिया जाएगा, और यह हिसाब कौन लेगा अदालत, जांच एजेंसी या फिर खुद छत्तीसगढ़ की जनता?

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