बलरामपुर. कलेक्टर साहब के सख्त निर्देश के बाद राजस्व और स्वास्थ्य विभाग ने जिस तरह ताबड़तोड़ कार्यवाही शुरू की, उससे एक बात तो एकदम साफ हो गई प्रशासन की नाक के नीचे ही झोलाछाप डॉक्टरों का धंधा बड़े आराम से फल-फूल रहा था, और किसी को कानोंकान खबर तक नहीं थी। जनाब, यह कोई छोटा-मोटा मामला नहीं था। साल दर साल यह धंधा चुपचाप जड़ें जमाता रहा, दुकानें सजती रहीं, बोर्ड टंगते रहे और किसी ने पलटकर पूछने की जहमत तक नहीं उठाई कि आखिर इन क्लिनिकों के पास डिग्री है भी या सिर्फ हिम्मत।
3 साल के मासूम की मौत के बाद झोलाछाप डॉक्टर हिरासत में, घर पर दबिश
हालिया दिनों में हुई इस कार्यवाही की जितनी तारीफ की जाए, कम है। प्रशासन ने आखिरकार आंखें खोलीं और मैदान में उतरा, तो सामने वही तस्वीर आई, जिसका अंदेशा शायद पहले से सबको था, मगर कोई बोलने को तैयार नहीं था।
उम्मीद यही है कि यह मुहिम बस एक-दो दिन की खानापूर्ति बनकर न रह जाए, बल्कि आगे भी इसी रफ्तार से चलती रहे। क्योंकि जनाब, यहां का चलन कुछ ऐसा रहा है कि कार्यवाही का बुखार दो-चार दिन चढ़ता है, फिर सब कुछ फिर उसी पुरानी रफ्तार पर लौट आता है। कैमरे हट जाते हैं, अखबार की सुर्खियां बदल जाती हैं और झोलाछाप डॉक्टर अपनी दुकान किसी दूसरी गली में खोल लेते हैं।
मगर सबसे बड़ा सवाल यहीं से शुरू होता है। जिस विभाग का काम इन अवैध क्लिनिकों पर लगाम कसना है, वहां नर्सिंग एक्ट का जिम्मा संभालने वाले अफसर भी मौजूद हैं। यह कोई खाली पद नहीं है साहब, बाकायदा एक जिम्मेदार अफसर तैनात है, जिसका काम ही यही देखना है कि कोई बिना डिग्री के मरीजों की जान से खिलवाड़ न करे। मगर उनका अता-पता ही नहीं मिलता। Indian Medical Register
साहब कब दफ्तर आते हैं, कब निकल जाते हैं, और कब उनके दर्शन नसीब होंगे, यह किसी को नहीं मालूम। दफ्तर के बाबू भी कंधे उचकाकर टाल देते हैं, फोन घंटी बजाकर थक जाता है और जवाब में सिर्फ खामोशी मिलती है। साहब भी क्या शय हैं मशाल्लाह, उनका तो जवाब ही नहीं।
बीएमओ साहब, जिनके पास दायित्व ज्यादा और फुर्सत कम
नर्सिंग एक्ट के नियम-कायदे लागू कराने की जिम्मेदारी डॉक्टर अनुज टोप्पो साहब के कंधों पर है। मगर साहब भी ऐसी शख्सियत निकले, जिनके पास काम का बोझ जरा ज्यादा ही है। जिला टीकाकरण की जिम्मेदारी उनके पास, टीबी नियंत्रण का अतिरिक्त दायित्व भी उनके पास, और बचे-खुचे वक्त में बलरामपुर ब्लॉक के बीएमओ का पद भी उन्हीं के पास। मतलब एक अकेला अफसर, इतने सारे मोर्चे और हर मोर्चे पर बराबर की जवाबदेही। जनाब, यह तो वही बात हुई कि एक आदमी को शादी का बैंड बजाना भी है, बारात का इंतजाम भी करना है और साथ में दूल्हे का मेकअप भी। किसी एक काम में अगर कसर रह जाए तो हैरानी किस बात की।
अब जरा गौर कीजिए नर्सिंग एक्ट का पूरा अख्तियार भी बीएमओ साहब के ही हाथ में है। तो सवाल लाजमी है कि उन्हीं के ब्लॉक में चल रहे झोलाछाप डॉक्टरों के अवैध क्लिनिकों पर आखिर कार्यवाही क्यों नहीं हुई? क्या साहब को इसकी खबर ही नहीं थी, या फिर खबर होकर भी अनदेखी कर दी गई? दोनों ही सूरतों में सवाल विभाग की कार्यशैली पर उठता है। अगर खबर नहीं थी, तो यह निगरानी तंत्र की नाकामी है। और अगर खबर थी, तो फिर बात कुछ और ही गहरी हो जाती है।
छापेमारी के दौरान यह भी खुलासा हुआ कि इन अवैध क्लिनिक वालों ने बाकायदा अपनी खुद की डिस्पेंसरी तक खोल रखी थी, जहां ब्रांडेड दवाइयां मियाद खत्म हुई हालत में मिलीं। जरा सोचिए जनाब, एक तरफ तो डिग्री ही नहीं और दूसरी तरफ एक्सपायर्ड दवाइयां मरीजों को थमाई जा रही थीं। यह तो सीधे-सीधे जान से खिलवाड़ है, कोई मामूली गड़बड़ी नहीं।
सवाल यह है कि इतना हौसला इन झोलाछाप डॉक्टरों में आया तो आया कहां से? इतनी हिम्मत तो असली एमबीबीएस डॉक्टर भी नहीं जुटा पाते, जो बरसों की पढ़ाई और मेहनत के बाद क्लिनिक खोलते हैं, फिर भी नियमों का पालन करने में एहतियात बरतते हैं। मगर यहां तो बिना डिग्री के भी दुकान खुली रही, चलती रही और फलती-फूलती रही।
स्वास्थ्य विभाग का मैदानी अमला इतना बड़ा फैला हुआ है कि अगर अफसर चाहें तो चंद मिनटों में झोलाछाप डॉक्टरों का पूरा डाटा उनके सामने आ जाए। गांव-गांव में तैनात मितानिन, सुपरवाइजर, स्वास्थ्य कार्यकर्ता, सब मिलकर एक फोन कॉल में यह बता सकते हैं कि किस मोहल्ले में कौन बिना डिग्री के क्लिनिक चला रहा है।
अगर चाहें तो लोगों को सरकारी अस्पताल तक पहुंचाने के लिए एक बाकायदा जागरूकता मुहिम भी चलाई जा सकती है, ताकि गांव-देहात के लोग झोलाछाप के झांसे में आने से पहले ही सजग हो जाएं। मगर होगा क्या, जनाब सरकारी नौकरी है, कागजों में ही खेलते रहिए, फील्ड में उतरने की जरूरत किसे है। मीटिंग होती रहे, रिपोर्ट बनती रहे, फाइल आगे बढ़ती रहे, बस असली जमीन पर कदम रखने की नौबत न आए। और अगर कभी पहुंच भी गए तो वहां तो पहले से ही सब सेट है, जैसे यह किसी अनकहे समझौते का हिस्सा हो।
नियम-कायदे कागजों में, हकीकत में कुछ और
यह भी गौर करने वाली बात है कि नर्सिंग एक्ट में साफ-साफ प्रावधान है कि कौन क्लिनिक चला सकता है, किसे दवा देने का अधिकार है और किसे नहीं। कानून की किताब में सब कुछ करीने से लिखा है। मगर जमीन पर उतरते ही यह किताब मानो गायब हो जाती है। यही वजह है कि जिस ब्लॉक में झोलाछाप डॉक्टरों की भरमार थी, वहां सालों तक किसी को खबर तक नहीं लगी, या फिर खबर लगी भी तो किसी ने कान पर जूं नहीं रेंगने दी। यह तंत्र की उस पुरानी बीमारी की तरफ इशारा करता है, जहां कानून सिर्फ फाइलों में जिंदा रहता है और सड़क पर उसकी सांसें उखड़ी रहती हैं।
अब सवाल यह भी उठता है कि जब एक अफसर के पास इतने दायित्व सौंपे जाते हैं, तो क्या विभाग को यह अंदाजा नहीं था कि नर्सिंग एक्ट जैसा संवेदनशील काम अनदेखा रह सकता है? अगर अंदाजा था, तो फिर अतिरिक्त जिम्मेदारी किसी और सक्षम अफसर को क्यों नहीं सौंपी गई? और अगर अंदाजा नहीं था, तो यह प्रशासनिक योजना की खामी है, जिसका खामियाजा आखिरकार आम आदमी को भुगतना पड़ा।
हर बार एक मासूम की जान के बाद ही क्यों जागता है सिस्टम
झोलाछाप डॉक्टरों पर कार्यवाही का यह सिलसिला कोई नया नहीं है। पिछले साल भी इक्का-दुक्का कार्यवाही देखने को मिली थी, जब जिला मुख्यालय में एक सात साल के मासूम की जान झोलाछाप डॉक्टर के इलाज की वजह से चली गई थी। उस वक्त भी दो-चार दिन हलचल मची, कुछ क्लिनिकों पर ताले लगे, कुछ बयान आए और फिर धीरे-धीरे मामला ठंडा पड़ गया। और अब यह मुहिम तब तेज हुई है, जब एक तीन साल के बच्चे की मौत हो गई। यानी सिस्टम को जागने के लिए हर बार किसी मासूम की जान ही क्यों चाहिए? क्या समय रहते चेतावनी के संकेत नहीं मिलते? या फिर संकेत मिलते हैं, मगर उन्हें अनदेखा कर दिया जाता है, जब तक कोई हादसा सुर्खियां न बन जाए।

कहीं कोई गुरुजी ही झोलाछाप डॉक्टर बनकर बैठा मिल रहा है, तो कहीं ऐसे लोग क्लिनिक चला रहे हैं, जिनके पास कंपाउंडर बनने लायक भी योग्यता नहीं है। यह सुनने में जितना अजीब लगता है, हकीकत उससे कहीं ज्यादा तकलीफदेह है। एक तरफ सरकार स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने के दावे करती है, दूसरी तरफ गांव-कस्बों में ऐसे लोग सुई लगाते और दवा बांटते पाए जाते हैं, जिन्होंने कभी मेडिकल की किताब तक नहीं खोली। मरीज भी मजबूरी में इन्हीं के पास जाते हैं, क्योंकि सरकारी अस्पताल दूर है, वहां लाइन लंबी है, या फिर डॉक्टर मिलने की गारंटी नहीं। यही मजबूरी झोलाछाप डॉक्टरों के धंधे की असली जमीन तैयार करती है।
अगर स्वास्थ्य विभाग चाहता तो समय-समय पर ऐसी कार्यवाही करता रहता, तो शायद यह मनहूस दिन देखने ही नहीं पड़ते। एक मासूम की जिंदगी किसी फाइल में दर्ज आंकड़े जैसी नहीं होती, जिसे बाद में सुधार लिया जाए। एक बार जान चली गई, तो कोई कार्यवाही, कोई जांच, कोई कड़ी टिप्पणी उस बच्चे को वापस नहीं ला सकती। मगर मामला यही है कि इच्छाशक्ति की ही कमी दिखती है, थोड़ा काम भी तो कर लिया करें साहब लोग।
जिम्मेदारी तय करने का वक्त आ गया है
अब जबकि कलेक्टर साहब के सख्त निर्देश पर कार्यवाही शुरू हुई है, तो यह वक्त सिर्फ झोलाछाप डॉक्टरों को पकड़ने भर का नहीं है। यह वक्त उन अफसरों से भी सवाल पूछने का है, जिनकी जिम्मेदारी थी कि यह नौबत आए ही नहीं। नर्सिंग एक्ट अफसर की गैरमौजूदगी, बीएमओ साहब पर दायित्वों का बोझ और मैदानी अमले की खामोशी, यह सब मिलकर उस पूरी तस्वीर को साफ करते हैं कि आखिर झोलाछाप डॉक्टरों का धंधा इतने बरसों तक कैसे फलता-फूलता रहा।
सवाल यह भी है कि क्या इस कार्यवाही के बाद जिम्मेदार अफसरों से भी जवाबतलबी होगी, या सारा गुस्सा सिर्फ उन झोलाछाप डॉक्टरों पर उतार दिया जाएगा, जो इस पूरी नाकामी की सबसे छोटी कड़ी हैं? क्योंकि जनाब, कोई भी अवैध क्लिनिक रातों-रात नहीं खुलता। वह सालों तक चलता है, बढ़ता है, फलता-फूलता है, और यह सब तभी मुमकिन होता है जब निगरानी करने वाला तंत्र या तो सोया रहता है या फिर जानबूझकर आंखें मूंद लेता है।
आगे की राह क्या हो
अगर सचमुच इस धंधे पर लगाम कसनी है, तो सिर्फ छापेमारी काफी नहीं होगी। नर्सिंग एक्ट अफसर की जवाबदेही तय होनी चाहिए, यह देखा जाना चाहिए कि उनकी मौजूदगी दफ्तर में कितनी रहती है और मैदान में कितनी। जिन अफसरों पर एक साथ कई दायित्व लादे गए हैं, वहां या तो अतिरिक्त स्टाफ की तैनाती हो या फिर जिम्मेदारियों का बंटवारा हो, ताकि कोई भी विभाग सिर्फ कागजी खानापूर्ति तक सीमित न रह जाए। साथ ही आम लोगों में भी यह जागरूकता जरूरी है कि छोटी-मोटी बीमारी के लिए भी बिना डिग्री वाले क्लिनिकों की तरफ रुख करना कितना खतरनाक साबित हो सकता है।
आखिर में बात इतनी सी है कि प्रशासन की यह ताबड़तोड़ कार्यवाही अगर सिर्फ सुर्खियां बटोरने तक सीमित रह गई, तो कुछ महीनों बाद हालात फिर वहीं पहुंच जाएंगे, जहां से यह पूरा किस्सा शुरू हुआ था। मगर अगर इसे एक ईमानदार शुरुआत मान लिया जाए और जवाबदेही तय करने का सिलसिला आगे भी जारी रहे, तो शायद अगली बार किसी मासूम की जान जाने का इंतजार नहीं करना पड़ेगा।
गांव-देहात की मजबूरी, झोलाछाप का सहारा
अब जरा इस पूरे मसले को दूसरे नजरिए से भी देख लिया जाए। आखिर लोग झोलाछाप डॉक्टरों के पास जाते ही क्यों हैं? जवाब उतना पेचीदा नहीं है, जितना बनाया जाता है। गांव में सरकारी अस्पताल है तो दूर, वहां डॉक्टर की तैनाती अक्सर कागजों में ज्यादा और असल में कम मिलती है। मरीज पहुंचता भी है तो घंटों लाइन में खड़ा रहना पड़ता है, दवाइयां कभी उपलब्ध होती हैं तो कभी बाहर से लाने की सलाह मिल जाती है। ऐसे में गांव के किसी कोने में बैठा झोलाछाप डॉक्टर, जो बिना ज्यादा पूछताछ के फौरन सुई लगा दे और बुखार-दर्द में राहत का भरोसा दे दे, लोगों को आसान रास्ता लगता है। यही मजबूरी इस पूरे धंधे की जड़ में है।
जनाब, यह भी समझने वाली बात है कि झोलाछाप डॉक्टर कोई अकेले पनपने वाला पौधा नहीं है। यह उसी जमीन में उगता है, जहां असली स्वास्थ्य सेवा की जड़ें कमजोर पड़ जाती हैं। जिस दिन सरकारी अस्पताल भरोसे लायक बन जाएंगे, डॉक्टर वक्त पर मिलने लगेंगे और दवाइयां मुफ्त में मिलने लगेंगी, उस दिन झोलाछाप डॉक्टरों की दुकान अपने आप बंद हो जाएगी। मगर तब तक के लिए सिर्फ छापेमारी और कार्यवाही से काम चलाने की कोशिश एक अधूरा इलाज ही साबित होगी, बीमारी की जड़ पर वार किए बगैर।
मीडिया की सुर्खियां और असल जमीनी हकीकत
एक और पहलू है, जो अक्सर नजरअंदाज हो जाता है। जब तक कोई बड़ा हादसा नहीं होता, तब तक झोलाछाप डॉक्टरों का मुद्दा अखबार के किसी कोने में दबा रहता है। न कोई हेडलाइन बनती है, न कोई चैनल इस पर बहस कराता है। मगर जैसे ही कोई मासूम इस लापरवाही का शिकार बनता है, अचानक सारा तंत्र हरकत में आ जाता है, कैमरे पहुंचते हैं, बयान आते हैं और नेता-अफसर सब मुस्तैद नजर आने लगते हैं। सवाल यह है कि यह मुस्तैदी हादसे से पहले क्यों नहीं दिखती? क्या प्रशासन को सचमुच इतनी बड़ी तादाद में झोलाछाप क्लिनिकों की खबर नहीं थी, या फिर खबर होते हुए भी उसे तवज्जो नहीं दी गई, क्योंकि तब तक कोई मीडिया दबाव नहीं बना था?
यह वही पुराना ढर्रा है, जहां व्यवस्था प्रतिक्रिया में तो तेज है, मगर रोकथाम में सुस्त। हादसा होने के बाद जांच कमेटी बैठती है, रिपोर्ट बनती है, कुछ दिन कार्यवाही चलती है और फिर धीरे-धीरे मामला ठंडा पड़ जाता है, अगले हादसे तक के लिए। यह चक्र अगर टूटना है, तो इसके लिए जरूरी है कि निगरानी सिर्फ हादसे के बाद नहीं, बल्कि लगातार बनी रहे।
जवाबदेही सिर्फ कागजों तक सीमित न रहे
अंत में एक बात और जरूर कहनी होगी। कार्यवाही की शुरुआत जरूर अच्छी है, मगर असली परीक्षा तो इसकी निरंतरता में है। अगर अगले महीने, अगले साल भी यही तेजी बनी रहे, तभी यह मुहिम अपने मकसद में सफल मानी जाएगी। वरना यह सिर्फ एक और फाइल बनकर रह जाएगी, जो किसी दिन फिर किसी हादसे के बाद खोली जाएगी और फिर वही सवाल दोहराए जाएंगे कि आखिर नर्सिंग एक्ट अफसर कहां थे, बीएमओ साहब का इतना बोझ क्यों था और मैदानी अमला खामोश क्यों रहा। जनाब, उम्मीद यही रखी जा सकती है कि इस बार जवाब सिर्फ कागजों में दर्ज होकर न रह जाए, बल्कि जमीन पर भी दिखे।
दवा दुकानों की भी हो जांच की जद
एक बात और गौर करने लायक है। जब झोलाछाप डॉक्टरों के क्लिनिकों में एक्सपायरी दवाइयां मिल रही हैं, तो सवाल यह भी उठता है कि यह दवाइयां आईं कहां से। कोई न कोई सप्लाई चेन तो जरूर होगी, जिसके जरिए यह ब्रांडेड दवाइयां बिना डिग्री वाले इन क्लिनिकों तक पहुंचती हैं। अगर सचमुच जड़ तक पहुंचना है, तो सिर्फ क्लिनिकों पर ताला लगाकर बात खत्म नहीं होती। यह भी पता लगाना जरूरी है कि आखिर किन मेडिकल दुकानों या थोक विक्रेताओं से यह दवाइयां इन झोलाछाप डॉक्टरों तक पहुंच रही हैं। वरना एक क्लिनिक बंद होगा, तो दूसरी जगह वही सप्लाई चेन एक नया क्लिनिक खड़ा कर देगी।
यह पूरा धंधा दरअसल एक जंजीर की तरह है, जहां हर कड़ी दूसरी कड़ी से जुड़ी हुई है। झोलाछाप डॉक्टर अकेला नहीं चलता, उसके पीछे दवा सप्लाई करने वाला भी होता है, कोई न कोई स्थानीय संरक्षण भी होता है और कहीं न कहीं निगरानी तंत्र की खामोशी भी शामिल होती है। जब तक इस पूरी जंजीर की हर कड़ी पर हाथ नहीं डाला जाता, तब तक सिर्फ एक-दो क्लिनिक बंद कर देने से यह धंधा जड़ से खत्म नहीं होगा।
जनता की भी है कुछ जिम्मेदारी
यह भी सच है कि इस पूरे मसले में सिर्फ प्रशासन को कठघरे में खड़ा करना ही काफी नहीं। आम जनता को भी थोड़ी सजगता दिखानी होगी। किसी भी क्लिनिक में इलाज कराने से पहले यह जानना जरूरी है कि वहां बैठा शख्स सचमुच डॉक्टर है भी या नहीं, उसकी डिग्री असली है या नहीं। मगर गांव-कस्बों में अक्सर यह सवाल पूछने की न फुर्सत होती है, न ही जानकारी। लोग बस इतना देखते हैं कि दर्द में फौरन आराम मिल जाए, बाकी बातें गौण हो जाती हैं। ऐसे में सरकार और प्रशासन की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है कि वह न सिर्फ कार्यवाही करे, बल्कि लोगों को जागरूक भी बनाए, ताकि अगली बार कोई मासूम किसी झोलाछाप के भरोसे अपनी जान न गंवाए।
कुल मिलाकर बात यही है कि यह कार्यवाही एक शुरुआत भर है, मंजिल नहीं। असली कामयाबी तब मानी जाएगी, जब न सिर्फ झोलाछाप डॉक्टरों पर शिकंजा कसे, बल्कि उस पूरे तंत्र की जवाबदेही भी तय हो, जिसकी वजह से यह धंधा वर्षों तक फलता-फूलता रहा। वरना जनाब, यह किस्सा भी उन्हीं पुरानी फाइलों की तरह अलमारी में बंद होकर रह जाएगा, जब तक कोई अगला हादसा उसे फिर से खोलने पर मजबूर न कर दे।

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