रायपुर। छत्तीसगढ़ की सार्वजनिक वितरण प्रणाली यानी PDS को लेकर केंद्र सरकार के खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण विभाग ने वर्ष 2025-26 की पहली छमाही की मूल्यांकन रिपोर्ट जारी की है। इस रिपोर्ट में राशन वितरण के मामले में छत्तीसगढ़ को देश के बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों में गिना गया है। लेकिन इसी रिपोर्ट में एक ऐसा पहलू भी सामने आया है, जिसने राज्य सरकार के सामने बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। जानकारी के अनुसार राशन वितरण में जहां छत्तीसगढ़ शानदार प्रदर्शन कर रहा है, वहीं योजनाओं की जानकारी हितग्राहियों तक पहुंचाने में राज्य बुरी तरह पिछड़ गया है।

PDS Evaluation / Monitoring Report
PDS Evaluation, Monitoring and Research – भारत सरकार
राशन वितरण में छत्तीसगढ़ बना मिसाल, फिर भी उठे सवाल
रिपोर्ट के मुताबिक छत्तीसगढ़ में राशन वितरण की व्यवस्था बेहद प्रभावी पाई गई है। राज्य के 99.8 प्रतिशत हितग्राहियों को उनका पूरा और निर्धारित मात्रा में राशन वितरण हो रहा है। यह आंकड़ा अपने आप में काबिले तारीफ है, क्योंकि देश के कई राज्य इतने बड़े स्तर पर सटीक राशन वितरण करने में नाकाम रहते हैं।
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सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) Public Distribution System
जानकारी के अनुसार सबसे खास बात यह है कि आदिवासी बहुल और भौगोलिक रूप से दुर्गम इलाकों में भी राशन वितरण में किसी तरह की रुकावट नहीं आई। पहाड़ी और जंगली क्षेत्रों में जहां पहुंचना ही मुश्किल होता है, वहां भी राशन वितरण की निरंतरता बनी रही, यह वाकई एक बड़ी उपलब्धि मानी जा सकती है। विशेषज्ञों के मुताबिक स्थानीय और विकेंद्रीकृत खरीद-वितरण मॉडल ने इसमें अहम भूमिका निभाई है।

लेकिन सवाल यह उठता है कि जब राशन वितरण की व्यवस्था इतनी मजबूत है, तो फिर सरकार इसी मजबूती को जागरूकता फैलाने में इस्तेमाल क्यों नहीं कर पा रही? यही वह सवाल है, जो इस पूरी रिपोर्ट का सबसे कमजोर पहलू उजागर करता है।
हर पांचवां हितग्राही ही जानता है योजना के बारे में, बाकियों को कुछ पता नहीं
रिपोर्ट का सबसे चौंकाने वाला हिस्सा प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना यानी PMGKAY को लेकर सामने आया है। राशन वितरण की गति भले तेज हो, लेकिन इस योजना की जानकारी रखने वाले हितग्राहियों की संख्या सिर्फ 20.1 प्रतिशत है। यानी सीधे शब्दों में कहें तो राज्य में हर पांच में से सिर्फ एक व्यक्ति ही जानता है कि उसे जो राशन वितरण के जरिए अनाज मिल रहा है, वह किस योजना के तहत आ रहा है।
प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना (PMGKAY)
PM Garib Kalyan Anna Yojana
यह आंकड़ा राज्य सरकार के लिए वाकई शर्मनाक कहा जा सकता है। जब राशन वितरण जैसी बुनियादी सुविधा का पूरा ढांचा इतना मजबूत खड़ा किया जा चुका है, तो फिर उसी सुविधा के बारे में जानकारी देने में इतनी बड़ी चूक कैसे हो रही है? सवाल यह भी है कि क्या सरकार सिर्फ आंकड़ों में अच्छा दिखने के लिए राशन वितरण पर ध्यान दे रही है, जबकि हितग्राहियों के अधिकारों और जागरूकता को लेकर उसकी गंभीरता कहीं पीछे छूट गई है।
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जानकारी के अनुसार बाकी बड़ी आबादी को यह तक साफ नहीं है कि अगर राशन वितरण में कोई गड़बड़ी हो जाए, तो शिकायत कहां और कैसे दर्ज कराई जाए। यह स्थिति सीधे तौर पर दिखाती है कि राज्य सरकार ने सिर्फ अनाज पहुंचाने पर ध्यान दिया, लेकिन लोगों को उनके अधिकारों के बारे में बताने की जिम्मेदारी को हल्के में लिया।
राशन वितरण में क्या बदलना जरूरी है, आखिर सरकार कब उठाएगी कदम
रिपोर्ट में इस समस्या को सुधारने के लिए कुछ अहम सुझाव भी दिए गए हैं। सबसे पहले तो राशन दुकानों पर योजना संबंधी जानकारी वाले डिस्प्ले बोर्ड अनिवार्य रूप से लगाए जाने चाहिए और उन्हें समय-समय पर अपडेट भी किया जाना चाहिए। लेकिन सवाल यही है कि इतनी सामान्य सी व्यवस्था को लागू करने में भी सरकार अब तक क्यों नाकाम रही है।
इसके अलावा ग्राम स्तर पर जागरूकता शिविर या सूचना अभियान चलाने की जरूरत भी बताई गई है। जब राज्य में मोबाइल लिंकिंग की सुविधा पहले से ही इतनी मजबूत है, तो SMS या मोबाइल ऐप के जरिए सीधे हितग्राहियों तक योजना की जानकारी पहुंचाई जा सकती है। यह तकनीक पहले से मौजूद है, बस उसका सही इस्तेमाल करने की इच्छाशक्ति सरकार को दिखानी होगी।
मोबाइल लिंकिंग में छत्तीसगढ़ राष्ट्रीय औसत से आगे, पर सुविधा का इस्तेमाल कितना?
डिजिटल कनेक्टिविटी के मोर्चे पर छत्तीसगढ़ ने वाकई अच्छा प्रदर्शन किया है। जानकारी के अनुसार राज्य में 97.5 प्रतिशत राशन कार्ड मोबाइल नंबर से जुड़े हुए हैं, जबकि इस मामले में राष्ट्रीय औसत सिर्फ 84.1 प्रतिशत है। यानी छत्तीसगढ़ राष्ट्रीय औसत से करीब 13 प्रतिशत अंक आगे है और 95 प्रतिशत से अधिक मोबाइल लिंकिंग वाले चुनिंदा राज्यों की सूची में भी अपनी जगह बना चुका है।
लेकिन यहां भी एक बड़ा सवाल खड़ा होता है। रिपोर्ट खुद इस बात की ओर इशारा करती है कि मोबाइल नंबर लिंक होना अलग बात है और उस लिंकिंग के जरिए मिलने वाली डिजिटल सुविधाओं का वास्तविक इस्तेमाल होना बिल्कुल अलग बात है। यानी सिर्फ मोबाइल नंबर जुड़ जाने से हितग्राही को कोई फायदा नहीं मिलता, जब तक सरकार उस लिंक का इस्तेमाल करके असल जानकारी और सेवाएं उन तक न पहुंचाए। सवाल यह है कि जब ढांचा पहले से इतना तैयार है, तो फिर सरकार उसका पूरा फायदा उठाने में देरी क्यों कर रही है।

हर चौथी दुकान पर रसीद गायब, पारदर्शिता पर बड़ा सवाल
राशन वितरण प्रक्रिया कितनी पारदर्शी है, इसे परखने के लिए रिपोर्ट में रसीद देने की व्यवस्था का भी आकलन किया गया। और इस मोर्चे पर नतीजे वाकई चिंताजनक निकले। जानकारी के अनुसार राज्य की करीब एक-चौथाई उचित मूल्य दुकानों यानी FPS में हितग्राहियों को प्रिंटेड रसीद ही नहीं दी जाती।
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यह स्थिति वाकई गंभीर है, क्योंकि रसीद न मिलने का मतलब है कि हितग्राही के पास यह साबित करने का कोई ठोस सबूत नहीं होता कि उसे राशन वितरण में कितनी मात्रा में अनाज मिला। भविष्य में अगर कोई शिकायत या विवाद खड़ा होता है, तो रसीद के अभाव में हितग्राही खुद को असहाय महसूस कर सकता है। सवाल उठता है कि जब राशन वितरण के आंकड़े इतने बेहतरीन हैं, तो फिर रसीद जैसी बुनियादी और सस्ती व्यवस्था को हर दुकान में लागू करने में सरकार क्यों चूक रही है।
हालांकि इसी रिपोर्ट का एक सकारात्मक पहलू भी है। निगरानी समितियों के गठन के मामले में राज्य की स्थिति संतोषजनक बताई गई है। जानकारी के अनुसार 95 प्रतिशत से अधिक दुकान संचालकों ने अपने यहां सतर्कता समिति सक्रिय होने की जानकारी दी है। लेकिन सवाल यह भी है कि क्या ये समितियां सिर्फ कागजों पर सक्रिय हैं या असल में जमीन पर भी अपना काम कर रही हैं।
राशन दुकानों की बुनियादी सुविधाएं: औसत दर्जे का प्रदर्शन
रिपोर्ट में राज्य की उचित मूल्य दुकानों यानी FPS को अनुपालन के आधार पर तीन श्रेणियों में बांटा गया है। जानकारी के अनुसार सिर्फ 15 प्रतिशत दुकानें ही उच्च अनुपालन की श्रेणी में आती हैं, जबकि सबसे ज्यादा 79 प्रतिशत दुकानें मध्यम अनुपालन की श्रेणी में हैं। वहीं 6 प्रतिशत दुकानें कम अनुपालन की श्रेणी में दर्ज की गई हैं।
डिस्प्ले बोर्ड की स्थिति में भी मिला-जुला नतीजा सामने आया है। जानकारी के अनुसार 64 प्रतिशत दुकानों में डिस्प्ले बोर्ड उच्च स्तर पर मौजूद पाया गया, जबकि 24 प्रतिशत दुकानों में इसकी हालत खराब बताई गई। इससे साफ जाहिर होता है कि ज्यादातर दुकानें सिर्फ न्यूनतम मानकों को पूरा कर रही हैं, जबकि बुनियादी ढांचे को अगले स्तर तक ले जाने की गुंजाइश अभी भी काफी बाकी है। ऐसे में सवाल उठता है कि सरकार सिर्फ औसत प्रदर्शन से संतुष्ट क्यों है, जबकि राशन वितरण के मामले में राज्य पहले ही देश में अव्वल साबित हो चुका है।
दुकान संचालकों को राष्ट्रीय औसत से ज्यादा कमीशन, फिर भी सेवा में कमी क्यों?

आर्थिक पहलू पर नजर डालें तो छत्तीसगढ़ में उचित मूल्य दुकान संचालकों को औसतन हर महीने करीब 9,370 रुपए कमीशन मिलता है, जो राष्ट्रीय औसत 8,967 रुपए से भी अधिक है। जानकारी के अनुसार दुकान की आर्थिक सेहत का सीधा असर उसकी सेवा गुणवत्ता, डिजिटल व्यवस्था और नियमित राशन वितरण पर पड़ता है।
दिलचस्प बात यह है कि देशभर में सिर्फ 34 प्रतिशत FPS संचालक ही अपनी दुकान को आर्थिक रूप से टिकाऊ मानते हैं, जिससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि छत्तीसगढ़ की स्थिति इस मामले में तुलनात्मक रूप से बेहतर है। लेकिन फिर भी सवाल यह उठता है कि जब दुकान संचालकों को राष्ट्रीय औसत से ज्यादा कमीशन मिल रहा है, तो फिर रसीद जैसी बुनियादी सुविधा हर दुकान में क्यों नहीं दी जा रही। क्या यह मान लिया जाए कि कमीशन ज्यादा मिलने के बावजूद जवाबदेही में कमी बरती जा रही है।
राशन वितरण में जीत, पर जागरूकता की जंग अभी बाकी
इस पूरी रिपोर्ट को गहराई से समझें, तो एक बात साफ हो जाती है। छत्तीसगढ़ सरकार ने राशन वितरण के ढांचे को खड़ा करने में जरूर मेहनत की है, और इसका नतीजा भी बेहतरीन आंकड़ों के तौर पर सामने आया है। लेकिन किसी भी योजना की सफलता सिर्फ अनाज पहुंचाने से पूरी नहीं होती। जब तक लाभार्थी को यह न पता हो कि उसे यह सुविधा किस योजना के तहत मिल रही है, उसके क्या अधिकार हैं और शिकायत की स्थिति में वह कहां जाए, तब तक उस योजना का असली मकसद अधूरा ही रहता है।
सरकार ने भौतिक ढांचे यानी राशन वितरण की व्यवस्था पर तो जमकर निवेश किया, लेकिन सूचना और जागरूकता के मोर्चे पर उतनी गंभीरता नहीं दिखाई। यह एक बड़ी नीतिगत चूक मानी जा सकती है, क्योंकि किसी भी कल्याणकारी योजना की असली कामयाबी तभी मानी जाती है, जब लाभार्थी खुद अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हो।
राशन वितरण को लेकर सरकार से जनता के बड़े सवाल
इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद अब जनता के मन में कई सवाल उठ रहे हैं। पहला सवाल यही है कि जब राशन वितरण का ढांचा इतना मजबूत खड़ा किया जा चुका है, तो योजना की जानकारी हितग्राहियों तक पहुंचाने में इतनी देरी क्यों हो रही है। दूसरा सवाल यह है कि क्या सरकार सिर्फ आंकड़ों में अच्छा दिखने के लिए राशन वितरण पर जोर दे रही है, जबकि जागरूकता और पारदर्शिता जैसे मुद्दों को दरकिनार कर दिया गया है।
तीसरा और सबसे अहम सवाल यह है कि जब मोबाइल लिंकिंग की सुविधा पहले से इतनी मजबूत है, तो फिर SMS या ऐप के जरिए योजना की जानकारी हितग्राहियों तक पहुंचाने में सरकार को किस बात का इंतजार है। और आखिरी सवाल यह भी है कि हर चौथी दुकान पर रसीद न मिलने की समस्या को सुधारने के लिए सरकार कब ठोस कदम उठाएगी।
आगे क्या करना चाहिए
रिपोर्ट के निष्कर्षों से यह बिल्कुल साफ संकेत मिलता है कि छत्तीसगढ़ के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती राशन वितरण की नहीं, बल्कि उसके साथ सही और पूरी जानकारी पहुंचाने की है। जानकारी के अनुसार आने वाले समय में राज्य सरकार से उम्मीद की जा रही है कि वह FPS दुकानों पर जागरूकता संबंधी जानकारी को और प्रभावी बनाए, रसीद जारी करने की प्रक्रिया को हर हाल में अनिवार्य रूप से लागू करवाए और मोबाइल लिंकिंग के डेटा का सही इस्तेमाल करते हुए सीधे हितग्राहियों तक योजना की जानकारी पहुंचाए।
अगर सरकार इस दिशा में गंभीरता से काम करती है और राशन वितरण के साथ-साथ जागरूकता के इस अंतर को भी पाट देती है, तो छत्तीसगढ़ का PDS मॉडल देश के अन्य राज्यों के लिए एक मिसाल बन सकता है। लेकिन अगर यही स्थिति बनी रही, तो सिर्फ अच्छे आंकड़ों के सहारे सरकार वाहवाही तो लूट सकती है, मगर आम जनता के अधिकारों की असली रक्षा नहीं हो पाएगी।
फिलहाल राज्य की जनता और सामाजिक संगठनों की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि सरकार इस रिपोर्ट को कितनी गंभीरता से लेती है और राशन वितरण के साथ-साथ जागरूकता बढ़ाने के लिए कौन से ठोस कदम उठाए जाते हैं।

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