वन नेशन वन इलेक्शन 2034 में नहीं, अब 2029 में ही लागू हो सकता है, हरिद्वार के संत समागम में केंद्रीय मंत्री का बड़ा संकेत

वन नेशन वन इलेक्शन: 2029 में लागू होगा? शिवराज का बड़ा संकेत

दिल्ली/हरिद्वार। देश की राजनीति में एक बार फिर वन नेशन वन इलेक्शन का मुद्दा जोर पकड़ता नजर आ रहा है। अब तक माना जा रहा था कि वन नेशन वन इलेक्शन की व्यवस्था साल 2034 तक ही धरातल पर उतर पाएगी, लेकिन केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान के ताजा बयान ने इस पूरी तस्वीर को बदल दिया है। अगर देश में हालात सामान्य बने रहे और राजनीतिक समीकरण बीजेपी के अनुकूल रहे, तो वन नेशन वन इलेक्शन की यह योजना 2034 की बजाय 2029 में ही साकार हो सकती है।

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हरिद्वार के संत समागम से मिला बड़ा संकेत

यह बात किसी सामान्य सियासी मंच से नहीं बल्कि हरिद्वार के प्राचीन अवधूत मंडल आश्रम में आयोजित एक संत समागम से सामने आई है। यहां साधु-संतों के बीच पहुंचे केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने वन नेशन वन इलेक्शन के मुद्दे को नए सिरे से हवा दे दी। उनके बयान से साफ झलकता है कि सरकार अब इस दिशा में पहले से ज्यादा तेजी दिखाने की तैयारी में है।

वन नेशन वन इलेक्शन : हरिद्वार के संत समागम से मिला बड़ा संकेत

गौर करने वाली बात यह है कि यह पहला मौका है जब किसी केंद्रीय मंत्री ने वन नेशन वन इलेक्शन को लेकर इतनी स्पष्टता से समय-सीमा का जिक्र किया है। अब तक इस विषय पर सिर्फ अटकलें और चर्चाएं ही चलती रही थीं, लेकिन शिवराज सिंह चौहान के इस बयान ने इसे एक ठोस दिशा दे दी है।

वन नेशन वन इलेक्शन में चुनाव आयोग को लगेगा सिर्फ 6 महीने का समय

जानकारी के अनुसार वन नेशन वन इलेक्शन की थ्योरी को अमल में लाने और इसकी चुनावी तैयारी के लिए भारत निर्वाचन आयोग को करीब 6 महीने का समय लगेगा। यानी अगर सरकार इस दिशा में हरी झंडी दे देती है, तो आयोग के लिए इतनी बड़ी व्यवस्था खड़ी करना कोई असंभव काम नहीं होगा। हालांकि अभी यह पूरा मामला मंथन और चर्चा के स्तर पर ही सीमित बताया जा रहा है, यानी आधिकारिक तौर पर अभी कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है।

राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी तेज हो गई है कि अगर हालात अनुकूल रहे, तो केंद्र सरकार वन नेशन वन इलेक्शन की दिशा में जल्द ही कोई ठोस कदम उठा सकती है। सूत्रों के मुताबिक इस पूरी कवायद के पीछे सरकार की मंशा देश में बार-बार होने वाले चुनावों के खर्च और समय को बचाना है।

बीजेपी शासित 22 राज्यों का समर्थन, बाकी अभी असमंजस में

वन नेशन वन इलेक्शन के मुद्दे पर देश के राज्यों में भी साफ विभाजन नजर आ रहा है। जानकारों के मुताबिक बीजेपी शासित 22 से ज्यादा राज्य पहले से ही एक राष्ट्र, एक चुनाव की मांग को लेकर मुखर हैं। वहीं दूसरी तरफ बाकी राजनीतिक दल और उनकी सरकारें अभी भी इस थ्योरी पर पूरी तरह भरोसा नहीं जता पाई हैं।

जानकारों का यह भी कहना है कि जो राज्य अभी वन नेशन वन इलेक्शन को लेकर असमंजस में हैं, उन्हें राजी करने में करीब एक साल का समय लग सकता है। यानी सिर्फ चुनाव आयोग की तैयारी ही काफी नहीं होगी, बल्कि राजनीतिक सहमति बनाना भी उतना ही बड़ा काम है। इसी बीच राष्ट्रहित के नाम पर वन नेशन वन इलेक्शन की सुगबुगाहट अब पहले से ज्यादा तेज हो चुकी है।

वन नेशन वन इलेक्शन का उत्तराखंड के मुख्यमंत्री ने किया समर्थन

इस पूरे कार्यक्रम में उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी भी मौजूद रहे। रविवार को उन्होंने एक देश एक चुनाव के विचार का खुलकर समर्थन करते हुए इसका स्वागत किया। मुख्यमंत्री धामी ने इसे सिर्फ किसी पार्टी का नहीं बल्कि राष्ट्रहित, सुशासन और जनकल्याण से जुड़ा हुआ राष्ट्रीय विषय बताया।

वन नेशन वन इलेक्शन का उत्तराखंड के मुख्यमंत्री ने किया समर्थन

कार्यक्रम में मौजूद शिवराज सिंह चौहान ने भी बार-बार होने वाले चुनावों को देश की प्रगति में सबसे बड़ी बाधा बताया। दोनों ही शीर्ष नेताओं ने वन नेशन वन इलेक्शन की इस पूरी पहल को लोकतांत्रिक प्रक्रिया को और अधिक प्रभावी बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम करार दिया।

साधु-संतों से जनजागरण की अपील

हरिद्वार के इस संत समागम में केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने साधु-संतों से एक राष्ट्र-एक चुनाव के विचार को जन-जन तक पहुंचाने की अपील की। उन्होंने कहा कि यह सिर्फ एक सांविधानिक बदलाव भर नहीं है, बल्कि पूरे देश के भविष्य से जुड़ा हुआ बड़ा फैसला है। उन्होंने संत समाज से अनुरोध किया कि वे अपने प्रवचनों और सत्संगों के जरिए इस विचार को आम जनता तक पहुंचाएं और इसके पक्ष में माहौल बनाएं।

यह बेहद दिलचस्प है कि किसी राजनीतिक-प्रशासनिक फैसले के समर्थन के लिए धार्मिक और आध्यात्मिक मंच का इस्तेमाल किया जा रहा है। इससे साफ पता चलता है कि सरकार वन नेशन वन इलेक्शन के मुद्दे को सिर्फ संसद या सियासी गलियारों तक सीमित नहीं रखना चाहती, बल्कि इसे समाज के हर तबके तक पहुंचाने की रणनीति पर काम कर रही है।

वन नेशन वन इलेक्शन के लिए साधु-संतों से जनजागरण की अपील

बार-बार चुनाव से रुकती है पढ़ाई, धीमी पड़ती है विकास की रफ्तार

अपने संबोधन में शिवराज सिंह चौहान ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एक राष्ट्र-एक चुनाव के संकल्प को एक बार फिर दोहराया। उन्होंने कहा कि यह संकल्प देश के लिए बेहद जरूरी है। उन्होंने कहा कि बार-बार होने वाले चुनाव विकास की गति और जनसेवा को गहरा नुकसान पहुंचाते हैं। इससे समय, पैसा और प्रशासनिक ऊर्जा तीनों की भारी बर्बादी होती है।

एक स्थानीय उदाहरण देते हुए मंत्री ने कहा कि जब भी किसी राज्य में चुनाव होते हैं, तो अक्सर स्कूलों की पढ़ाई तक बाधित हो जाती है, क्योंकि शिक्षक और स्कूल भवन चुनावी ड्यूटी में लगा दिए जाते हैं। उन्होंने कहा कि हर साल किसी न किसी राज्य में प्रशासनिक मशीनरी चुनावी तैयारियों में उलझी रहती है, जिसकी वजह से विकास कार्यों की रफ्तार धीमी पड़ जाती है।

उनका कहना है कि अगर लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ कराए जाएं, तो इससे संसाधनों की बड़ी बचत होगी। समय की भी बचत होगी और सबसे बड़ी बात यह कि प्रशासनिक अमला बार-बार चुनावी काम में उलझने की बजाय पूरी तरह विकास कार्यों पर ध्यान केंद्रित कर पाएगा।

वन नेशन वन इलेक्शन - एक पार्टी नहीं, पूरे देश का मुद्दा - शिवराज सिंह चौहान

वन नेशन वन इलेक्शन – एक पार्टी नहीं, पूरे देश का मुद्दा

अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए शिवराज सिंह चौहान ने साधु-संतों से फिर अपील की कि वे अपनी उपस्थिति और समाज में अपने प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए वन नेशन वन इलेक्शन के पक्ष में जनजागरण अभियान चलाएं। उन्होंने साफ कहा कि यह किसी एक पार्टी का मुद्दा नहीं है, बल्कि पूरे देश के हित से जुड़ा विषय है।

उन्होंने एक दिलचस्प बात भी कही कि अगर देश आगे बढ़ेगा, तभी राजनीतिक पार्टियां भी आगे बढ़ पाएंगी। यानी उनका इशारा साफ था कि वन नेशन वन इलेक्शन कोई सियासी फायदे का खेल नहीं बल्कि राष्ट्र निर्माण की दिशा में एक जरूरी कदम है।

स्थानीय स्तर पर क्या हो सकता है असर

अगर एक राष्ट्र-एक चुनाव वाकई 2029 में लागू हो जाता है, तो इसका सीधा असर हर राज्य और हर जिले पर पड़ेगा। बार-बार होने वाले पंचायत, नगर निकाय, विधानसभा और लोकसभा चुनावों की जगह अगर एक साथ मतदान होगा, तो इससे स्थानीय प्रशासन को बार-बार चुनावी ड्यूटी में उलझने से राहत मिलेगी। स्कूल-कॉलेज जो अक्सर मतदान केंद्र या चुनावी ट्रेनिंग सेंटर बना दिए जाते हैं, उन्हें भी साल भर स्थिर तरीके से चलने का मौका मिलेगा।

स्थानीय व्यापारियों और आम जनता के लिए भी यह राहत की बात हो सकती है, क्योंकि हर चुनाव के साथ आचार संहिता लागू होने से कई सरकारी योजनाएं और विकास कार्य अस्थायी रूप से रुक जाते हैं। अगर वन नेशन वन इलेक्शन लागू होता है, तो इस तरह की रुकावटें भी कम हो सकती हैं।

आगे क्या होगा

फिलहाल एक राष्ट्र-एक चुनाव को लेकर सारी बातें संकेत और अनुमान के स्तर पर ही हैं। जानकारी के अनुसार अभी इस पूरे मुद्दे पर मंथन का दौर चल रहा है और आने वाले महीनों में इस पर और स्पष्टता सामने आ सकती है। चुनाव आयोग की तैयारी, राज्यों के बीच सहमति बनाना और संवैधानिक प्रक्रिया पूरी करना, यह सब मिलाकर एक लंबा रास्ता तय करना बाकी है।

लेकिन हरिद्वार के इस संत समागम में जिस तरह से केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान और मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने वन नेशन वन इलेक्शन को लेकर खुलकर बात की, उससे यह साफ संकेत मिलता है कि सरकार अब इस मुद्दे को गंभीरता से आगे बढ़ाना चाहती है। अब देखना यह होगा कि विपक्षी दल और असमंजस में खड़े राज्य इस दिशा में सरकार का साथ देते हैं या नहीं।

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