छत्तीसगढ़ के स्कूली बच्चे अब पढ़ेंगे अपनी माटी की कहानी, तैयार हो रही देश की पहली आर्ट रिपोजिटरी

रायपुर। छत्तीसगढ़ स्कूल शिक्षा विभाग अब कक्षा 6वीं से 12वीं तक के बच्चों को किताबी पढ़ाई के साथ-साथ अपनी माटी, अपनी संस्कृति और अपनी परंपराओं से भी जोड़ने की तैयारी में जुट गया है। इसके लिए विभाग एक खास आर्ट रिपोजिटरी तैयार करा रहा है, जिसमें छत्तीसगढ़ की कला, संस्कृति, इतिहास और लोक परंपराओं को समेटा जाएगा। यह आर्ट रिपोजिटरी सिर्फ एक पाठ्यक्रम नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की पूरी सांस्कृतिक धरोहर का एक बड़ा दस्तावेज बनने जा रही है। स्कूल शिक्षा विभाग, छत्तीसगढ़

आर्ट रिपोजिटरी : छत्तीसगढ़ स्कूल शिक्षा विभाग

आर्ट रिपोजिटरी : 100 विशेषज्ञ, 100 विषय, एक बड़ा मिशन

जानकारी के अनुसार इस आर्ट रिपोजिटरी को तैयार करने के लिए प्रदेशभर से करीब 100 साहित्यकार, संस्कृतिविद, शोधकर्ता और विषय विशेषज्ञ जुटे हैं। ये सभी विशेषज्ञ मिलकर 100 अलग-अलग विषयों पर सामग्री तैयार कर रहे हैं। इतनी बड़ी संख्या में विशेषज्ञों का एक साथ काम करना यह दिखाता है कि सरकार इस आर्ट रिपोजिटरी को लेकर कितनी गंभीर है।

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राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अनुरूप छत्तीसगढ़ अब उस दिशा में आगे बढ़ रहा है, जहां वह अपने ही संसाधनों से स्थानीय कला और सांस्कृतिक विरासत पर आधारित पूरक पाठ्य और दृश्य सामग्री तैयार करने वाला देश का पहला राज्य बन सकता है। यानी यह आर्ट रिपोजिटरी सिर्फ छत्तीसगढ़ के लिए नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए एक मिसाल बनने की क्षमता रखती है।

SCERT में तीन दिन की वर्कशॉप, 26 अगस्त तक चलेगा काम

इस पूरे काम के लिए राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद यानी SCERT, शंकर नगर रायपुर में तीन दिवसीय आवासीय कार्यशाला आयोजित की जा रही है, जो 26 अगस्त तक चलेगी। इस वर्कशॉप में विषय विशेषज्ञों को आर्ट रिपोजिटरी तैयार करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है।

SCERT छत्तीसगढ़ जानकारी के अनुसार वर्कशॉप में करीब 100 विषयों को अलग-अलग समूहों में बांटकर उन पर लेख और सामग्री तैयार कराई जा रही है। इसके बाद विशेषज्ञों की टीम इन सभी सामग्रियों की बारीकी से समीक्षा भी कर रही है। 25 अगस्त को सामग्री में जरूरी बदलाव करके इसका अंतिम ड्राफ्ट तैयार किया जाएगा, वहीं 26 अगस्त को इसी आर्ट रिपोजिटरी से जुड़ी लघु फिल्मों की पटकथा पेश की जाएगी। इसके बाद पटकथा का अंतिम संपादन कर मंजूरी दी जाएगी।

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किताब ही नहीं, हर विषय पर बनेगी शॉर्ट फिल्म भी

इस आर्ट रिपोजिटरी की सबसे दिलचस्प बात यह है कि यह सिर्फ किताबों तक सीमित नहीं रहेगी। जानकारी के अनुसार हर विषय पर 5 से 10 मिनट की एक शॉर्ट फिल्म भी बनाई जाएगी, जिसके लिए अलग से स्टोरी तैयार की जाएगी। इसका मकसद यही है कि बच्चे सिर्फ किताबी भाषा में नहीं, बल्कि रोचक और आसान तरीके से भी छत्तीसगढ़ की कला और संस्कृति को समझ सकें।

विभाग का मानना है कि जब बच्चे किताब के साथ-साथ फिल्म के जरिए भी अपनी संस्कृति को देखेंगे, तो उनकी समझ और गहरी होगी। इस तरह आर्ट रिपोजिटरी का यह मॉडल पढ़ाई के पारंपरिक तरीके से हटकर एक नया और आधुनिक प्रयोग साबित हो सकता है।

गुरु घासीदास से लेकर तीजन बाई तक, हर महापुरुष को मिलेगी जगह

इस आर्ट रिपोजिटरी में छत्तीसगढ़ की महान विभूतियों, संतों, महापुरुषों और साहित्यकारों के योगदान को भी शामिल किया जाएगा। जानकारी के अनुसार इसमें गुरु घासीदास, गहिरा गुरु, शबरी माता, राजा चक्रधर, पद्मश्री तीजन बाई, विनोद कुमार शुक्ल, मिनीमाता, माधवराव सप्रे, पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, मुकुटधर पांडेय, पं. सुंदरलाल शर्मा, शहीद वीर नारायण सिंह और गुंडाधुर जैसे कई प्रमुख व्यक्तित्व शामिल होंगे।

इन सभी महापुरुषों के जीवन और योगदान को पढ़कर बच्चे यह समझ पाएंगे कि छत्तीसगढ़ की धरती ने समय-समय पर कैसे-कैसे महान लोगों को जन्म दिया है। इस तरह की जानकारी आर्ट रिपोजिटरी के जरिए अब हर स्कूली छात्र तक पहुंचाई जाएगी।

भोरमदेव से बस्तर दशहरा तक, धार्मिक-ऐतिहासिक स्थल भी होंगे शामिल

पाठ्य सामग्री में छत्तीसगढ़ के प्रमुख धार्मिक और ऐतिहासिक स्थलों को भी जगह दी जाएगी। जानकारी के अनुसार इस आर्ट रिपोजिटरी में कौशल्या मंदिर, सिरपुर, भोरमदेव, दंतेश्वरी मंदिर, बम्लेश्वरी मंदिर, चंद्रहासिनी मंदिर, मां महामाया मंदिर रतनपुर और राजिम के राजीव लोचन मंदिर पर विशेष सामग्री तैयार की जाएगी।

इसके साथ ही सतनाम पंथ, कबीर पंथ, रामनामी पंथ, घोटुल, मितान-बदना, मामा-भांजा, लमसेना और मानस मंडली जैसी लोक परंपराओं को भी बच्चों को पढ़ाया जाएगा। हरेली, नवाखाई, बस्तर दशहरा, गोंचा पर्व, गौरी-गौरा, छेरछेरा, तीजा-पोला, भोजली और मड़ई जैसे प्रमुख पर्व-त्योहार भी इस आर्ट रिपोजिटरी का हिस्सा होंगे।

डोकरा कला, पंथी नृत्य और पारंपरिक व्यंजन भी शामिल

छत्तीसगढ़ की अलग पहचान मानी जाने वाली डोकरा कला, टेराकोटा, बांस शिल्प, लौह शिल्प, गोदना और रजवार भित्ति चित्रों पर भी इस आर्ट रिपोजिटरी में विशेष सामग्री तैयार होगी। जानकारी के अनुसार लोक संगीत में पंथी, सुवा, ददरिया, फाग, भरथरी और चंदैनी जैसे पारंपरिक गीतों को भी शामिल किया जाएगा।

मांदर, मोहरी, ढोल, बांसुरी, सारंगी, धनकुल और टिमकी जैसे पारंपरिक वाद्ययंत्रों की जानकारी भी बच्चों को इसी आर्ट रिपोजिटरी के जरिए दी जाएगी। साथ ही पंथी, राउत नाचा, गेड़ी, ककसाड़, गौर, शैला, सुवा और सरहुल जैसे लोक नृत्यों के साथ-साथ नाचा, पंडवानी और लोककथाओं पर भी विशेष सामग्री तैयार की जा रही है।

इतना ही नहीं, इस आर्ट रिपोजिटरी में छत्तीसगढ़ की पारंपरिक पाक कला को भी शामिल किया गया है। बच्चे अब ठेठरी, खुरमी, फरा-मुठिया, अंगाकर रोटी, चौसेला, बफौरी, चापड़ा चटनी, माड़िया पेज और पपची जैसे पारंपरिक व्यंजनों के बारे में भी जान सकेंगे।

आर्ट रिपोजिटरी से सिर्फ बच्चे नहीं, शिक्षक और अभिभावक भी होंगे लाभान्वित

इस आर्ट रिपोजिटरी का फायदा सिर्फ विद्यार्थियों तक सीमित नहीं रहेगा। जानकारी के अनुसार इसके जरिए शिक्षक, प्रशिक्षक और अभिभावक भी छत्तीसगढ़ की संस्कृति और परंपराओं से अच्छी तरह परिचित हो सकेंगे। यानी यह आर्ट रिपोजिटरी एक ऐसा दस्तावेज बनेगी, जिसे स्कूल की चारदीवारी से बाहर भी पूरे समाज में इस्तेमाल किया जा सकेगा।

कई बार देखा गया है कि आज की पीढ़ी को अपनी ही संस्कृति की बारीकियों के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं होती। ऐसे में यह आर्ट रिपोजिटरी उस खाई को पाटने का काम करेगी, जो नई पीढ़ी और पुरानी परंपराओं के बीच धीरे-धीरे बनती जा रही थी।

विभाग का मानना: जड़ों से जुड़ेगी नई पीढ़ी

स्कूल शिक्षा विभाग का मानना है कि इस आर्ट रिपोजिटरी के जरिए विद्यार्थियों में अपनी स्थानीय धरोहर के प्रति समझ, संवेदना और गौरव की भावना विकसित होगी। जानकारी के अनुसार प्रस्तावित आर्ट रिपोजिटरी के माध्यम से छत्तीसगढ़ की कला, संस्कृति, लोक परंपराओं और विरासत को सीधे शिक्षा व्यवस्था से जोड़ा जाएगा।

विभाग की मंशा यही है कि नई पीढ़ी सिर्फ आधुनिक विषयों तक सीमित न रहे, बल्कि अपनी जड़ों को भी अच्छी तरह जाने। साथ ही वह इन परंपराओं के संरक्षण और संवर्धन के प्रति भी जागरूक हो सके। अगर बच्चे बचपन से ही अपनी संस्कृति को गर्व के साथ जानेंगे, तो आने वाले समय में वे इसे संजोकर रखने में भी उतनी ही दिलचस्पी दिखाएंगे।

क्यों खास है छत्तीसगढ़ की आर्ट रिपोजिटरी

देश के ज्यादातर राज्यों में स्कूली पाठ्यक्रम राष्ट्रीय स्तर की एक जैसी किताबों पर आधारित होता है, जिसमें स्थानीय संस्कृति को बहुत कम जगह मिल पाती है। ऐसे में छत्तीसगढ़ की यह आर्ट रिपोजिटरी पहल एक अलग रास्ता दिखाती है, जहां राज्य अपने संसाधनों से खुद अपनी सांस्कृतिक पहचान को पाठ्यक्रम का हिस्सा बना रहा है।

अगर यह रिपोजिटरी सफलतापूर्वक तैयार हो जाती है, तो यह देश के दूसरे राज्यों के लिए भी एक उदाहरण बन सकती है कि कैसे स्थानीय संस्कृति और आधुनिक शिक्षा को एक साथ जोड़ा जा सकता है। यही वजह है कि शिक्षा जगत में इस आर्ट रिपोजिटरी को लेकर खासी उत्सुकता देखी जा रही है।

आगे क्या होगा

फिलहाल SCERT में चल रही वर्कशॉप का काम 26 अगस्त तक पूरा हो जाएगा, जिसके बाद इस आर्ट रिपोजिटरी का अंतिम स्वरूप सामने आएगा। जानकारी के अनुसार इसके बाद इसे धीरे-धीरे स्कूलों में लागू करने की प्रक्रिया शुरू होगी, ताकि कक्षा 6वीं से 12वीं तक के बच्चे इस आर्ट रिपोजिटरी के जरिए अपनी संस्कृति को नए और रोचक अंदाज में सीख सकें।

छत्तीसगढ़ की यह पहल आने वाले समय में सिर्फ शिक्षा के क्षेत्र में ही नहीं, बल्कि राज्य की सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करने की दिशा में भी एक बड़ा कदम साबित हो सकती है।

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