रायपुर। छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद के मुद्दे को लेकर सियासी बयानबाजी एक बार फिर तेज हो गई है। जानकारी के अनुसार स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल ने पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पर सीधा निशाना साधते हुए नक्सलवाद के मुद्दे पर कांग्रेस की भूमिका को लेकर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। मंत्री के इस तीखे बयान के बाद प्रदेश की सियासत में नक्सलवाद का मुद्दा एक बार फिर सुर्खियों में आ गया है।

मंत्री ने अपने बयान में बेहद तीखे अंदाज में सवाल उठाया कि अगर सरकार या विपक्ष के पास नक्सलवाद से जुड़े किसी भी मामले में ठोस सबूत हैं, तो उन्हें आज तक सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि विपक्ष को नक्सलवाद जैसे संवेदनशील मुद्दे पर सिर्फ राजनीति करने के बजाय जनता के सामने स्पष्ट तथ्य रखने चाहिए। मंत्री के इस बयान के बाद नक्सलवाद के मुद्दे पर सियासी हलकों में हलचल मच गई है।
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हिड़मा के नाम पर बढ़ा सियासी पारा
जानकारी के अनुसार मंत्री ने अपने बयान में मारे गए माओवादी कमांडर हिड़मा का भी जिक्र किया। नक्सलवाद के इस पूरे मुद्दे में हिड़मा का नाम आते ही बहस और तेज हो गई। मंत्री ने कहा कि हिंसा से जुड़े किसी भी व्यक्ति को आदर्श या प्रतीक के तौर पर पेश करना बिल्कुल भी उचित नहीं है। नक्सलवाद जैसी गंभीर समस्या से जुड़े किसी नाम को महिमामंडित करना समाज के लिए सही संदेश नहीं देता।

बीजेपी नेताओं की ओर से इससे पहले भी कई बार हिड़मा को लेकर कांग्रेस पर तीखे सवाल उठाए जा चुके हैं। पार्टी का कहना रहा है कि नक्सलवाद के खिलाफ चल रही लड़ाई में किसी भी तरह की नरमी या राजनीतिक सहानुभूति खतरनाक साबित हो सकती है। मंत्री ने भी अपने ताजा बयान में इसी बात को दोहराते हुए कहा कि नक्सलवाद जैसे मुद्दे पर किसी भी तरह की ढिलाई प्रदेश के हित में नहीं है।
बस्तर में लंबे समय से झेली गई नक्सलवाद की मार
मंत्री के बयान के अनुसार बस्तर क्षेत्र लंबे समय से नक्सलवाद की हिंसा का दंश झेलता आया है। जानकारी के अनुसार इस हिंसा के कारण आम लोगों को भारी नुकसान उठाना पड़ा है, वहीं सुरक्षाबलों के जवानों ने भी नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई में अपनी जान गंवाई है। इसके साथ ही क्षेत्र में विकास कार्यों की रफ्तार पर भी नक्सलवाद की वजह से बुरा असर पड़ा है।
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मंत्री का कहना है कि नक्सलवाद जैसे गंभीर मुद्दे को राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से ऊपर रखकर देखने की जरूरत है। सूत्रों के मुताबिक उनका मानना है कि जब तक सभी राजनीतिक दल नक्सलवाद के खिलाफ एकजुट होकर काम नहीं करेंगे, तब तक इस समस्या का पूरी तरह खात्मा कर पाना मुश्किल होगा। उन्होंने विपक्ष से अपील की कि नक्सलवाद के मुद्दे को सियासी हथियार बनाने के बजाय इसे मिलकर सुलझाने की दिशा में काम करना चाहिए।
नक्सलवाद पर सत्तापक्ष और विपक्ष आमने-सामने
छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद को लेकर सरकार और विपक्ष के बीच यह कोई पहला मौका नहीं है, जब तीखी बयानबाजी हुई हो। इससे पहले भी कई मौकों पर नक्सलवाद के मुद्दे को लेकर सत्तापक्ष और विपक्ष आमने-सामने आ चुके हैं। दोनों ही तरफ से एक-दूसरे पर आरोप लगाने का सिलसिला लंबे समय से चला आ रहा है।
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केंद्र सरकार का भी लगातार यह दावा रहा है कि बस्तर क्षेत्र में नक्सलवाद के खिलाफ सुरक्षा अभियान के साथ-साथ अब विकास और बुनियादी सुविधाओं को भी तेजी से आगे बढ़ाया जा रहा है। सड़क, बिजली, पानी और शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाएं पहुंचाकर नक्सलवाद प्रभावित इलाकों को मुख्यधारा से जोड़ने की कोशिश की जा रही है।
नक्सलवाद पर मंत्री के बयान का सियासी असर
स्वास्थ्य मंत्री के इस ताजा बयान के बाद प्रदेश की राजनीति में नक्सलवाद के मुद्दे पर बहस और तेज होने के पूरे आसार नजर आ रहे हैं। सूत्रों के मुताबिक बीजेपी की रणनीति यही रही है कि नक्सलवाद के मुद्दे पर कांग्रेस को घेरते हुए यह दिखाया जाए कि विपक्ष के पास इस समस्या से निपटने के लिए कोई ठोस योजना नहीं रही।

वहीं दूसरी ओर कांग्रेस की तरफ से भी समय-समय पर सरकार पर नक्सलवाद के मुद्दे पर नाकाम रहने के आरोप लगाए जाते रहे हैं। जानकारी के अनुसार अब देखना यह होगा कि मंत्री के इस ताजा बयान पर विपक्ष की ओर से क्या प्रतिक्रिया आती है और नक्सलवाद के मुद्दे पर सियासी बयानबाजी आगे किस दिशा में बढ़ती है।
नक्सलवाद बना प्रदेश की सबसे संवेदनशील राजनीतिक बहस
छत्तीसगढ़ की राजनीति में माओवाद हमेशा से एक ऐसा मुद्दा रहा है, जिस पर हर पार्टी अपनी-अपनी राय रखती आई है। बस्तर और आसपास के इलाकों में नक्सलवाद की समस्या दशकों पुरानी है और इसे खत्म करने के लिए अलग-अलग सरकारों ने अपने-अपने तरीके से प्रयास किए हैं। इसके बावजूद माओवाद पूरी तरह खत्म नहीं हो सका है, जिसके चलते यह मुद्दा हर चुनाव और हर सियासी बहस में बार-बार उठता रहता है।
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मंत्री का यह बयान भी उसी लंबी बहस की एक और कड़ी माना जा रहा है, जिसमें सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों ही माओवाद के मुद्दे पर एक-दूसरे को घेरने की कोशिश करते नजर आते हैं। सूत्रों के मुताबिक आम जनता की सबसे बड़ी उम्मीद यही रहती है कि नक्सलवाद के मुद्दे पर सियासी बयानबाजी से आगे बढ़कर ठोस और असरदार कदम उठाए जाएं, ताकि प्रभावित इलाकों में शांति और विकास दोनों सुनिश्चित हो सके।
आगे क्या हो सकता है
फिलहाल मंत्री के इस बयान के बाद कांग्रेस की प्रतिक्रिया का इंतजार किया जा रहा है। जानकारी विपक्ष की ओर से जल्द ही इस मुद्दे पर पलटवार किए जाने की संभावना जताई जा रही है। माओवाद जैसे संवेदनशील विषय पर दोनों पक्षों की बयानबाजी आने वाले दिनों में और तेज हो सकती है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि नक्सलवाद के मुद्दे पर इस तरह की बहस चुनावी माहौल में और भी तेज हो जाती है, क्योंकि दोनों ही पार्टियां इस मुद्दे को अपने पक्ष में भुनाने की कोशिश करती हैं। जानकारी के अनुसार आने वाले दिनों में नक्सलवाद को लेकर और भी बड़े बयान सामने आ सकते हैं, जिससे प्रदेश की सियासी फिजा और गर्म होने के आसार हैं।
फिलहाल छत्तीसगढ़ की जनता की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि माओवाद के मुद्दे पर चल रही यह सियासी जंग आगे किस मोड़ पर पहुंचती है और क्या इससे प्रभावित इलाकों में शांति बहाली की दिशा में कोई ठोस पहल हो पाती है।

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