डेढ़ साल से सिर्फ ‘फाइलों’ में जिंदा है बिलासपुर का नया तहसील भवन, टपकती छत के नीचे बैठने को मजबूर है पूरा अमला!

तहसील भवन डेढ़ साल से फाइलों में, छत से टपक रहा पानी

तहसील भवन डेढ़ साल से फाइलों में, निर्माण अब भी अटका

बिलासपुर। सरकारी दफ्तर आम आदमी की उम्मीदों का ठिकाना होते हैं, जहां वो अपनी जमीन-जायदाद और राजस्व से जुड़ी परेशानियां लेकर पहुंचता है। मगर बिलासपुर के नेहरू चौक स्थित तहसील भवन की सूरत देखकर यह उम्मीद भी दम तोड़ती नजर आती है। मौजूदा तहसील भवन इतना जर्जर हो चुका है कि बारिश के मौसम में छत से पानी टपकना अब आम बात हो गई है।

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हैरानी की बात यह है कि इस बदहाली को खत्म करने के लिए नया तहसील भवन बनाने की योजना डेढ़ साल पहले बनी थी, मगर आज तक यह योजना सिर्फ कागजों और फाइलों के बीच घूम रही है। जमीन पर एक ईंट तक नहीं रखी गई। सवाल यह उठता है कि आखिर नए तहसील भवन की इस लेटलतीफी के पीछे असली वजह क्या है — बजट की कमी, इच्छाशक्ति की कमी, या फिर सिस्टम की वही पुरानी सुस्ती जिसका खामियाजा हमेशा आम जनता को ही भुगतना पड़ता है?

तहसील भवन की टपकती छत के नीचे काम करने को मजबूर अमला

जरा सोचिए, जिस कमरे में बैठकर तहसीलदार साहब नामांतरण, सीमांकन और राजस्व के पेचीदा मामलों पर फैसले सुनाते हैं, वहीं अगर बारिश में छत से पानी टपकने लगे तो इंसाफ की उम्मीद कैसे बंधेगी? जानकारी के अनुसार तहसील भवन के हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि खुद तहसीलदार अपने ही कक्ष में बैठने से कतराने लगे हैं। जब जिम्मेदार अफसर तहसील भवन के अपने दफ्तर में बैठने से बचने लगे, तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि आम फरियादियों की क्या हालत होती होगी।

तहसील भवन परिसर में आने वाले पक्षकारों के लिए न धूप से बचने का इंतजाम है, न बारिश से। लोग या तो भीगते हैं या तपती धूप में इंतजार करते हैं। यह सिर्फ असुविधा नहीं, बल्कि एक तरह से आम जनता के आत्मसम्मान पर चोट है — कि जिस तहसील भवन में वो अपने हक की लड़ाई लड़ने आते हैं, वहीं उन्हें बुनियादी सहूलियत तक नसीब नहीं।

तहसील भवन की टपकती छत के नीचे काम करने को मजबूर अमला

बिलासपुर जिला प्रशासन की आधिकारिक वेबसाइट

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नए भवन को लेकर सरकारी मशीनरी की सुस्ती का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि डेढ़ साल का लंबा वक्त गुजर जाने के बावजूद निर्माण कार्य शुरू ही नहीं हो पाया। प्रशासनिक हलकों की मानें तो इसकी दो बड़ी वजहें सामने आती हैं — पहली, शासन स्तर से अब तक बजट जारी न होना, और दूसरी, पुराने तहसील भवन को किसी अस्थाई ठिकाने पर शिफ्ट करने की प्रक्रिया का लटका रहना। यानी न पैसा आया, न पुराना तहसील भवन खाली हुआ, और नतीजा यह कि पूरी योजना अधर में झूल रही है। यह हैरानी की बात है कि जिस काम को प्राथमिकता के आधार पर पूरा किया जाना चाहिए था, उसे लेकर सरकार और प्रशासन दोनों के स्तर पर एक अजीब-सी उदासीनता दिखाई दे रही है।

तहसील भवन की जगह का विवाद सुलझा, फिर भी निर्माण शुरू नहीं

दिलचस्प बात यह है कि नए भवन की जगह को लेकर भी पहले खासा विवाद हो चुका है। शुरुआत में योजना यह थी कि तहसील को कोनी इलाके में शिफ्ट कर दिया जाए। मगर जैसे ही यह प्रस्ताव सामने आया, स्थानीय वकीलों के तबके में इसे लेकर नाराजगी फैल गई। वकीलों की दलील थी कि कोनी शिफ्ट होने से उनकी रोजमर्रा की सहूलियत बुरी तरह प्रभावित होगी, आना-जाना मुश्किल होगा और उनके पेशेवर काम-काज पर असर पड़ेगा। इसके बाद महीनों तक चिट्ठी-पत्री, बैठकों और खींचतान का दौर चला। आखिरकार प्रशासन को झुकना पड़ा और तय हुआ कि नया तहसील भवन नेहरू चौक की मौजूदा जगह पर ही बनेगा। इस फैसले से भले ही जगह का विवाद थम गया हो, मगर इसने तहसील भवन के निर्माण कार्य में एक और देरी जोड़ दी। और जब यह अड़चन दूर हुई, तब तक एक नई मुसीबत सामने खड़ी हो गई थी।

नए तहसील भवन के लिए बजट का इंतजार, शिफ्टिंग भी अटकी

नया भवन बनाने के लिए सबसे पहली शर्त यही है कि मौजूदा तहसील भवन को किसी अस्थाई ठिकाने पर शिफ्ट किया जाए, ताकि पुरानी जगह पर निर्माण कार्य शुरू हो सके। इसके लिए सुपेला और जरहाभाठा चौक स्थित पुराने कमिश्नर कार्यालय को चुना गया था। मगर यह इमारत लंबे अरसे से खाली पड़ी होने की वजह से खुद बदहाली का शिकार हो चुकी है।

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जानकारी के मुताबिक इस भवन से पंखे, लाइटें और बिजली के तार तक चोरी हो चुके हैं। यानी जिस जगह पर तहसील भवन को अस्थाई तौर पर बसाया जाना था, उसे पहले खुद रहने लायक बनाना पड़ेगा। इसके लिए भारी मरम्मत की जरूरत है, मगर सबसे बड़ी अड़चन यह है कि नगर निगम और पीडब्ल्यूडी के बीच अभी तक यह साफ नहीं हो पाया है कि इस मरम्मत की जिम्मेदारी आखिर किसके कंधों पर है। एक तरफ बजट अटका है, दूसरी तरफ जिम्मेदारी की रस्साकशी चल रही है — और बीच में पिस रहा है वो आम आदमी, जो रोज तहसील भवन के चक्कर काटने को मजबूर है।

प्रशासन की सफाई — ‘बारिश में शिफ्टिंग मुनासिब नहीं’

इस पूरे मामले पर जब प्रशासन से बात की गई तो अफसरों ने अपनी सफाई पेश की। बिलासपुर एसडीएम मनीष कुमार साहू के मुताबिक नए तहसील भवन का निर्माण दो शर्तों पर टिका हुआ है — पहली, शासन से बजट की मंजूरी मिलना, और दूसरी, कार्यालय की सफल शिफ्टिंग होना। उनका कहना है कि बारिश के मौसम में शिफ्टिंग की प्रक्रिया शुरू करने से तहसील भवन के रोजमर्रा के कामकाज पर असर पड़ सकता है, इसलिए फिलहाल इसे टाला गया है।

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एसडीएम के अनुसार नए तहसील भवन के लिए बजट की स्वीकृति अभी तक नहीं मिली है, और बारिश का मौसम गुजर जाने के बाद ही शिफ्टिंग को लेकर आगे कोई फैसला लिया जाएगा। यानी अभी के लिए प्रशासन के पास इंतजार के अलावा कोई ठोस जवाब नहीं है। सवाल यह है कि क्या सिर्फ मौसम को वजह बताकर तहसील भवन की डेढ़ साल की देरी को जायज ठहराया जा सकता है?

बजट का इंतजार कब तक? कोई साफ जवाब नहीं

सबसे बड़ी परेशानी की बात यह है कि नए तहसील भवन के बजट को लेकर अभी तक कोई स्पष्ट समयसीमा सामने नहीं आई है। न यह पता है कि बजट कब आएगा, न यह साफ है कि आया तो कितना आएगा। इस अनिश्चितता की वजह से पूरी योजना हवा में लटकी हुई है। जब तक शासन से हरी झंडी नहीं मिलती, तब तक नए तहसील भवन का सपना सिर्फ कागजों तक सीमित रहेगा। और इस बीच मौजूदा जर्जर तहसील भवन में काम-काज जारी रखना, न सिर्फ अधिकारियों के लिए बल्कि आम जनता के लिए भी हर दिन एक नई मुसीबत बनता जा रहा है।

किन-किन लोगों पर पड़ रही है इस देरी की मार?

इस पूरे मामले में सबसे ज्यादा नुकसान उन आम लोगों को उठाना पड़ रहा है, जो अपने रोजमर्रा के जरूरी कामों के लिए तहसील भवन के चक्कर काटते हैं। जरा गौर कीजिए इन कामों पर, जिनके लिए लोग रोज इस जर्जर तहसील भवन में पहुंचते हैं:

  • नामांतरण के मामलों में जमीन के मालिकाना हक से जुड़े दस्तावेज बदलवाने वाले लोग
  • सीमांकन के लिए अपनी जमीन की हदबंदी करवाने आने वाले किसान और जमीन मालिक
  • राजस्व रिकॉर्ड दुरुस्त करवाने पहुंचने वाले आम नागरिक
  • जरूरी प्रमाण-पत्र और दस्तावेज बनवाने आने वाले पक्षकार

इन सभी लोगों को जर्जर तहसील की इमारत में बैठने, बारिश में भीगने और बुनियादी सुविधाओं की कमी झेलने के बाद भी अपना काम पूरा कराने के लिए घंटों इंतजार करना पड़ता है। सिर्फ आम जनता ही नहीं, बल्कि खुद अफसर और कर्मचारी भी तहसील भवन की इस बदइंतजामी का शिकार हो रहे हैं। जब दफ्तर का माहौल ही ऐसा हो, तो जाहिर है कि कामकाज की रफ्तार पर भी इसका सीधा असर पड़ता है, जिससे फाइलें निपटने में और वक्त लगता है।

वकीलों की जीत, मगर आम आदमी की हार?

यह भी गौर करने वाली बात है कि जब जगह बदलने का मसला आया था, तब वकीलों के विरोध के आगे प्रशासन को झुकना पड़ा और तहसील भवन नेहरू चौक पर ही बनाने का फैसला हुआ। मगर सवाल यह है कि क्या इस फैसले के बाद तहसील भवन के निर्माण कार्य को तेजी से आगे बढ़ाने की कोई ठोस कोशिश हुई? आंकड़े और हालात बताते हैं कि नहीं। जगह का विवाद सुलझने के बाद भी काम जस का तस पड़ा रहा। इससे यह सवाल उठना लाजमी है कि क्या प्रशासन के पास नए तहसील भवन के इस मुद्दे को लेकर कोई ठोस योजना और इच्छाशक्ति है भी या नहीं, या फिर यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा।

अस्थाई ठिकाने की बदहाली — एक और मुसीबत में उलझी योजना

सुपेला और जरहाभाठा चौक स्थित जिस पुराने कमिश्नर कार्यालय को तहसील भवन की अस्थाई शिफ्टिंग के लिए चुना गया, उसकी हालत खुद किसी जर्जर खंडहर से कम नहीं। लंबे समय से खाली पड़े होने की वजह से इस भवन की देखभाल की गई ही नहीं। नतीजा यह हुआ कि यहां से बिजली के तार, पंखे और लाइटें तक चोरी हो गईं। अब इस भवन को दोबारा इस्तेमाल लायक बनाने के लिए भारी मरम्मत की जरूरत है, ताकि तहसील भवन का अमला यहां शिफ्ट हो सके। मगर सबसे बड़ा पेच यह है कि नगर निगम और पीडब्ल्यूडी के बीच जिम्मेदारी को लेकर स्थिति साफ नहीं है। दोनों महकमों के बीच यह उलझन बनी हुई है कि आखिर मरम्मत का खर्च और जिम्मेदारी किसकी बनती है। इस लापरवाही और जिम्मेदारी की टालमटोल के चलते तहसील भवन की अस्थाई शिफ्टिंग की योजना भी फिलहाल अधर में लटकी हुई है।

सिर्फ आश्वासन, समयसीमा नदारद

प्रशासन के मौजूदा रुख से यह साफ झलकता है कि फिलहाल इंतजार के अलावा कोई ठोस कदम नजर नहीं आ रहा। बारिश का मौसम बीतने के बाद ही तहसील की इमारत की शिफ्टिंग और निर्माण से जुड़ी अगली कार्रवाई शुरू होने की बात कही जा रही है। मगर बजट की मंजूरी को लेकर अब तक कोई स्पष्ट समयसीमा तय नहीं हो पाई है। ऐसे में यह कहना मुश्किल है कि आखिर कब तक बिलासपुर के लोगों को जर्जर तहसील भवन की मार झेलनी पड़ेगी और कब उन्हें एक सुरक्षित, सुविधाजनक नए तहसील भवन में अपने काम निपटाने का मौका मिलेगा।

आखिर कब जागेगा सिस्टम?

डेढ़ साल का वक्त कोई मामूली अरसा नहीं होता। इतने लंबे समय में अगर किसी सरकारी योजना पर सिर्फ फाइलें ही दौड़ती रहें और जमीन पर कुछ न बदले, तो यह सीधे तौर पर सिस्टम की सुस्ती और लापरवाही की तरफ इशारा करता है। एक तरफ आम जनता तहसील ऑफिस की जर्जर छत के नीचे धूप-बारिश झेलने को मजबूर है, दूसरी तरफ जिम्मेदार महकमे आपस में जिम्मेदारी टालने में लगे हैं। सवाल यह है कि आखिर कब शासन बजट जारी करेगा, कब पुराना कमिश्नर कार्यालय मरम्मत के बाद इस्तेमाल लायक बनेगा, और कब बिलासपुर को उसका नया, सुरक्षित तहसील भवन नसीब होगा। तब तक के लिए, नेहरू चौक का यह तहसील भवन का सपना सिर्फ फाइलों में ही कैद रहने वाला है — और इसका खामियाजा भुगतते रहेंगे वही आम लोग, जो रोज अपने हक की लड़ाई लेकर इस जर्जर तहसील इमारत की दहलीज पर दस्तक देते हैं।

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