रायपुर/बिलासपुर। छत्तीसगढ़ भाजपा में नए प्रदेश अध्यक्ष को लेकर चल रही कवायद अब लगभग अंतिम चरण में पहुंचती दिख रही है। पार्टी सूत्रों के मुताबिक, केंद्रीय मंत्री और बिलासपुर सांसद तोखन साहू का नाम इस पद के लिए सबसे आगे चल रहा है। हालांकि भाजपा की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है, और पार्टी नेतृत्व की परंपरा के मुताबिक अंतिम फैसला केंद्रीय नेतृत्व ही करेगा, लेकिन संगठन के भीतर से मिल रहे संकेत साफ बता रहे हैं कि तोखन साहू का पलड़ा फिलहाल सबसे भारी है। बीजेपी छत्तीसगढ़
जानकारों का कहना है कि यह मामला अब सिर्फ प्रदेश अध्यक्ष पद तक सीमित नहीं रह गया है। इसके पीछे ओबीसी राजनीति, साहू समाज का चुनावी असर, आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारी, संगठन की जमीनी हालत, कार्यकर्ताओं की नाराजगी और केंद्र में छत्तीसगढ़ के प्रतिनिधित्व जैसे कई पहलू जुड़े बताए जा रहे हैं। यानी तोखन साहू के नाम पर मुहर सिर्फ एक नियुक्ति नहीं, बल्कि भाजपा की आगामी चुनावी रणनीति का पहला औपचारिक संकेत मानी जा रही है।
तोखन साहू ही क्यों — पार्टी सूत्रों का तर्क
पार्टी सूत्रों के मुताबिक तोखन साहू के पक्ष में सबसे बड़ा आधार उनकी राजनीतिक पृष्ठभूमि और मौजूदा भूमिका है। तोखन साहू लोरमी से पहली बार विधायक बने, तत्कालीन रमन सिंह सरकार में संसदीय सचिव रहे, इसके बाद लोकसभा पहुंचे और वर्तमान में केंद्र सरकार में मंत्री हैं। विधानसभा से लोकसभा और फिर केंद्रीय मंत्रिमंडल तक का यह अनुभव पार्टी के भीतर उनके पक्ष में सबसे बड़ी दलील के तौर पर गिनाया जा रहा है।
संगठन के सूत्रों का यह भी कहना है कि तोखन साहू की छवि कार्यकर्ताओं के बीच सहज और मिलनसार नेता की रही है, जो सिर्फ बैठकों तक सीमित नहीं रहते बल्कि जमीनी स्तर पर सक्रिय रहते हैं। पार्टी को ऐसे ही चेहरे की तलाश है जो जिलों और मंडलों तक लगातार सक्रिय रह सके और सरकार-संगठन के बीच बेहतर तालमेल बना सके।
छत्तीसगढ़ की सियासत में साहू समाज की चुनावी अहमियत को लेकर भी सूत्र लगातार इशारा कर रहे हैं। प्रदेश की कई विधानसभा सीटों पर साहू समाज का सीधा असर माना जाता है। मौजूदा समय में सरकार की कमान आदिवासी नेतृत्व के हाथ में है, ऐसे में संगठन की बागडोर किसी ओबीसी चेहरे को सौंपे जाने को सत्ता और संगठन के बीच सामाजिक संतुलन साधने की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है, और तोखन साहू इस समीकरण में सबसे उपयुक्त नाम माने जा रहे हैं।
सरकार भाजपा की, फिर भी संगठन में तोखन साहू पर समीक्षा क्यों ?
सूत्रों के मुताबिक प्रदेश में भाजपा की सरकार होने के बावजूद संगठन के भीतर जमीनी हालात की लगातार समीक्षा चल रही है। वरिष्ठ नेताओं के जिलेवार दौरे, संगठन की बैठकें और कार्यकर्ताओं से सीधा संवाद इसी कवायद का हिस्सा बताए जा रहे हैं। पार्टी नेतृत्व यह जानने की कोशिश में जुटा है कि सरकार की योजनाओं और संगठन की गतिविधियों का असर जमीन पर किस हद तक पहुंच रहा है।
जानकारी के अनुसार, जिलों से मिल रहा फीडबैक पूरी तरह सकारात्मक नहीं है। स्थानीय अधिकारियों की कार्यशैली, कार्यकर्ताओं की सुनवाई न होने और संगठन-सरकार के बीच तालमेल की कमी जैसे मुद्दे लगातार सामने आ रहे हैं। भाजपा की सबसे बड़ी ताकत उसका बूथ स्तर का संगठन माना जाता रहा है, ऐसे में कार्यकर्ताओं की नाराजगी को नजरअंदाज करना पार्टी के लिए महंगा साबित हो सकता है — यही वजह है कि तोखन साहू जैसे “जमीन से जुड़े” नेता को कमान सौंपे जाने की चर्चा तेज हुई है।
बिजली बिल का मुद्दा भी इस पूरी समीक्षा के केंद्र में बताया जा रहा है। सूत्रों के मुताबिक, 400 यूनिट तक बिजली से जुड़ी पुरानी राहत व्यवस्था में बदलाव को लेकर उपभोक्ताओं में नाराजगी है, और विपक्ष लगातार इसे सरकार के खिलाफ मुद्दा बनाकर उठा रहा है। पार्टी के भीतर यह आकलन है कि आम जनता से सीधे जुड़े ऐसे मुद्दे आगामी विधानसभा चुनाव में असर डाल सकते हैं, इसलिए संगठन को इन पर लगातार नजर रखनी होगी।
किरण सिंह देव की गैरमौजूदगी से तेज हुई कवायद
मौजूदा प्रदेश अध्यक्ष किरण सिंह देव पिछले कुछ समय से स्वास्थ्य कारणों से सक्रिय राजनीतिक गतिविधियों से दूर बताए जा रहे हैं। जानकारी के मुताबिक, बागेश्वर धाम से लौटते समय हुए हादसे के बाद वे दिल्ली में इलाज करा रहे हैं और उनकी सक्रिय वापसी में अभी समय लगने की बात कही जा रही है।
भाजपा में संगठन को लगातार सक्रिय रखने की परंपरा रही है, और विधानसभा चुनाव में भले अभी दो साल का समय बाकी हो, संगठनात्मक तैयारियां अभी से शुरू हो चुकी हैं। इसी वजह से प्रदेश अध्यक्ष का संभावित बदलाव अब सिर्फ स्वास्थ्य कारणों से जुड़ा मसला नहीं रह गया, बल्कि इसे आगामी चुनावी रणनीति की एक कड़ी के तौर पर देखा जा रहा है।
रमन सिंह की भूमिका अहम क्यों मानी जा रही
पार्टी सूत्रों के मुताबिक, इस पूरी कवायद में वर्तमान विधानसभा अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह की राय का भी अपना वजन है। छत्तीसगढ़ भाजपा में लंबे अनुभव और व्यापक स्वीकार्यता के चलते किसी भी बड़े संगठनात्मक फैसले में उनकी भूमिका अहम मानी जाती है।
गौरतलब है कि तोखन साहू के राजनीतिक करियर की शुरुआत भी रमन सिंह के मुख्यमंत्रित्व काल में ही हुई थी, जब लोरमी से विधायक बनने के बाद उन्हें संसदीय सचिव बनाया गया था। सूत्रों का कहना है कि यह पुराना जुड़ाव तोखन साहू के पक्ष में एक अतिरिक्त राजनीतिक संकेत माना जा रहा है, हालांकि इसे किसी गुटीय समर्थन के तौर पर देखना जल्दबाजी होगी।
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शिवरतन शर्मा और संतोष पांडे भी दौड़ में, पर बढ़त तोखन साहू के पास
प्रदेश अध्यक्ष पद के लिए शिवरतन शर्मा का नाम भी गंभीरता से लिया जा रहा है। संगठन में उनका लंबा अनुभव और कार्यकर्ताओं के बीच सक्रियता उनकी सबसे बड़ी ताकत मानी जाती है। इसके अलावा राजनांदगांव सांसद संतोष पांडे को पसंद करने वाला एक वर्ग भी सक्रिय बताया जा रहा है।
भाजपा जैसे बड़े संगठन में अलग-अलग नामों पर चर्चा होना स्वाभाविक है, और अंतिम फैसला केंद्रीय नेतृत्व को ही करना है। लेकिन मौजूदा सामाजिक समीकरण और तोखन साहू की केंद्र से लेकर राज्य तक फैली पहचान उन्हें बाकी दावेदारों से आगे रखती है।
तोखन साहू अध्यक्ष बने तो केंद्र में भी बदलेगा समीकरण
भाजपा में एक व्यक्ति-एक पद की परंपरा को देखते हुए, अगर तोखन साहू को प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी मिलती है तो उनके केंद्रीय मंत्री पद को लेकर भी नई कवायद शुरू होना स्वाभाविक माना जा रहा है। सूत्रों के मुताबिक, ऐसी स्थिति में छत्तीसगढ़ के किसी अन्य सांसद को केंद्र में जिम्मेदारी मिल सकती है, और आगे मंत्रिमंडल में फेरबदल या विस्तार होने पर प्रदेश के अन्य सांसदों के नाम भी सामने आ सकते हैं।
इसी क्रम में सामान्य वर्ग से आने वाले रायपुर सांसद ब्रजमोहन अग्रवाल का नाम भी चर्चा में है। पार्टी सूत्रों के मुताबिक, अगर संगठन की कमान ओबीसी वर्ग से आने वाले तोखन साहू को सौंपी जाती है, तो सामाजिक संतुलन बनाए रखने के लिहाज से ब्रजमोहन अग्रवाल जैसे अनुभवी नेता की केंद्रीय राजनीति में भूमिका बढ़ने की संभावनाओं पर भी नए सिरे से चर्चा शुरू हो सकती है। हालांकि इस बारे में केंद्र सरकार या भाजपा नेतृत्व की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक संकेत नहीं मिला है।
गणेशोत्सव-नवरात्रि के दौरान हो सकती है घोषणा
पार्टी सूत्रों के मुताबिक, बड़े संगठनात्मक फैसलों के ऐलान के लिए तिथियों का चयन भी अक्सर सोच-समझकर किया जाता है। ऐसे में आगामी गणेशोत्सव या इसके बाद नवरात्रि के दौरान प्रदेश अध्यक्ष के नाम की घोषणा होने की संभावना जताई जा रही है। इन पर्वों के दौरान संगठनात्मक सक्रियता वैसे ही चरम पर रहती है, ऐसे में नए चेहरे की घोषणा को केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि सोची-समझी राजनीतिक टाइमिंग के तौर पर देखा जा सकता है।

सरकार अपनी, फिर भी संगठन को “संजीवनी” की तलाश
अब जरा इस पूरे घटनाक्रम पर एक तीखी नजर डालते हैं। प्रदेश में भाजपा की अपनी सरकार है, विधायक हैं, मंत्री हैं, फिर भी संगठन को नई “संजीवनी” की तलाश है — यह अपने आप में इस बात का सबूत है कि सत्ता और संगठन के बीच सब कुछ उतना सहज नहीं जितना बाहर से दिखाया जाता है। कार्यकर्ताओं की नाराजगी की चर्चा, बिजली बिल पर जनता की खीज, और अध्यक्ष का “स्वास्थ्य अवकाश” — यह तीनों मिलकर पार्टी को यह सोचने पर मजबूर कर रहे हैं कि सिर्फ सरकार चलाने से काम नहीं चलेगा, संगठन को भी उतनी ही मेहनत से चलाना होगा।
और ऐसे में तोखन साहू का नाम बार-बार उभरकर सामने आना कोई इत्तेफाक नहीं, बल्कि पार्टी की सोची-समझी सामाजिक और चुनावी गणित का हिस्सा माना जा रहा है।
तोखन साहू के सामने आने वाले संभावित दायित्व
पार्टी सूत्रों के मुताबिक, अगर तोखन साहू को प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी मिलती है तो उनके सामने ये चुनौतियां हो सकती हैं—
- कार्यकर्ताओं को सक्रिय और संतुष्ट रखना
- सरकार और संगठन के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करना
- बूथ स्तर तक संगठन को मजबूत करना
- जनता से जुड़े मुद्दों पर संगठन की सक्रियता बढ़ाना
- आगामी विधानसभा चुनाव की रणनीति तैयार करना
- आदिवासी-ओबीसी सामाजिक समीकरण को संतुलित रखना
बृजमोहन अग्रवाल का पुराना कद और नई संभावनाएं
रायपुर सांसद बृजमोहन अग्रवाल छत्तीसगढ़ भाजपा के उन चुनिंदा नेताओं में गिने जाते हैं, जिनकी पहचान राज्य बनने से पहले की राजनीति से जुड़ी है। लंबे समय तक राज्य सरकार में मंत्री रहने के बाद अब वे रायपुर से सांसद हैं, और पार्टी संगठन में उनकी गहरी पकड़ मानी जाती है।

पार्टी सूत्रों के मुताबिक, अगर प्रदेश संगठन की कमान ओबीसी वर्ग से आने वाले तोखन साहू को मिलती है, तो सामाजिक संतुलन के लिहाज से सामान्य वर्ग के किसी अनुभवी चेहरे को आगे बढ़ाने की जरूरत महसूस हो सकती है, और इस पंक्ति में बृजमोहन अग्रवाल का नाम सबसे स्वाभाविक विकल्प के तौर पर देखा जा रहा है। हालांकि यह पूरी तरह अटकलों पर आधारित है, और केंद्र सरकार या पार्टी नेतृत्व की ओर से इस बारे में कोई पुष्टि नहीं की गई है। बावजूद इसके, राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा लगातार बनी हुई है कि प्रदेश अध्यक्ष का बदलाव सिर्फ एक फैसला नहीं, बल्कि कई नए राजनीतिक समीकरणों की शुरुआत भी बन सकता है।
भीतरखाने से मिली “अनऑफिशियल” प्रतिक्रिया
पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि तोखन साहू का नाम संगठन में बहुत पहले से चर्चा में था, बस औपचारिक ऐलान बाकी था। उनका कहना है कि तोखन साहू की सबसे बड़ी खूबी यह है कि वे विधानसभा, लोकसभा और केंद्रीय मंत्रिमंडल — तीनों स्तर की राजनीति को करीब से समझते हैं, और यही अनुभव उन्हें बाकी दावेदारों से अलग खड़ा करता है। दूसरे नेता ने यह भी जोड़ा कि संगठन को अब सिर्फ “बयानबाज” नहीं, बल्कि “मैदानी” अध्यक्ष चाहिए, और इस कसौटी पर तोखन साहू फिट बैठते हैं।

हालांकि पार्टी के भीतर एक धड़ा यह भी मानता है कि किसी भी बड़े फैसले से पहले जल्दबाजी में किसी नाम को फाइनल मान लेना ठीक नहीं। इस धड़े का तर्क है कि भाजपा में अंतिम फैसला हमेशा संगठन की सबसे ऊपरी इकाई से ही आता है, और आधिकारिक घोषणा से पहले किसी भी नाम को तय मान लेना राजनीतिक जल्दबाजी होगी। बावजूद इसके, संगठन के भीतर से आ रही ज्यादातर आवाजें तोखन साहू के पक्ष में ही झुकती दिख रही हैं।
साहू समाज और ओबीसी वोट बैंक — चुनावी गणित की असली कुंजी
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि छत्तीसगढ़ की चुनावी राजनीति में ओबीसी वर्ग किसी भी दल के लिए निर्णायक भूमिका निभाता रहा है, और इस वर्ग के भीतर साहू समाज की गिनती सबसे मजबूत सामाजिक समूहों में होती है। प्रदेश की कई विधानसभा सीटों पर यह समाज जीत-हार तय करने की स्थिति में माना जाता है।
पार्टी सूत्रों के मुताबिक, अगर तोखन साहू को प्रदेश अध्यक्ष बनाया जाता है तो इसका सीधा संदेश साहू समाज और व्यापक ओबीसी वर्ग को जाएगा कि भाजपा उनकी राजनीतिक भागीदारी को गंभीरता से ले रही है। यह संदेश खासतौर पर उन सीटों पर असरदार माना जा रहा है, जहां पिछले चुनावों में यह वर्ग किसी वजह से पार्टी से छिटका हुआ नजर आया था। यानी तोखन साहू की ताजपोशी को सिर्फ एक व्यक्ति की तरक्की नहीं, बल्कि पूरे सामाजिक समूह को साधने की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है।
कार्यकर्ताओं की नाराजगी — जमीनी स्तर की वह टीस जिसे संगठन नजरअंदाज नहीं कर सकता
सूत्रों के मुताबिक, जिला और मंडल स्तर के कई कार्यकर्ताओं की शिकायत है कि सरकार बनने के बाद संगठन से जुड़े लोगों की सुनवाई पहले जैसी नहीं रही। स्थानीय प्रशासनिक अधिकारियों की कार्यशैली को लेकर भी कार्यकर्ताओं में असंतोष बताया जा रहा है। कई कार्यकर्ताओं का मानना है कि सरकार और संगठन के बीच तालमेल में कमी आई है, जिसका सीधा असर बूथ स्तर की सक्रियता पर पड़ रहा है।

यूँ कहें कि भाजपा जिस बूथ मैनेजमेंट के मॉडल पर गर्व करती रही है, वही मॉडल अब खुद पार्टी के लिए सिरदर्द बनता दिख रहा है। जब कार्यकर्ता ही नाराज हों, तो बूथ पर जोश कहां से आएगा — यही सवाल संगठन के भीतर सबसे ज्यादा पूछा जा रहा है। यही वजह है कि पार्टी को ऐसे नेतृत्व की तलाश है जो सिर्फ कुर्सी पर बैठकर नहीं, बल्कि गांव-गांव जाकर कार्यकर्ताओं का भरोसा वापस जीत सके — और इस कसौटी पर भी तोखन साहू का नाम सबसे आगे बताया जा रहा है।
बिजली बिल का मुद्दा — विपक्ष के हाथ लगा हथियार
जानकारों के मुताबिक बिजली बिल का मुद्दा फिलहाल सरकार के लिए सबसे संवेदनशील मुद्दों में से एक बन गया है। 400 यूनिट तक की पुरानी राहत व्यवस्था में बदलाव के बाद कई उपभोक्ताओं के बिल में इजाफा देखा गया, जिसे लेकर विपक्ष लगातार सरकार को घेरने की कोशिश कर रहा है। पार्टी के भीतर इस बात की समझ बन चुकी है कि यह मुद्दा सीधे आम आदमी के जेब से जुड़ा है, और अगर समय रहते इसका जवाब नहीं दिया गया तो आगामी विधानसभा चुनाव में इसका खामियाजा भुगतना पड़ सकता है।

यहां भी संगठन की भूमिका अहम मानी जा रही है — क्योंकि सरकार की नीतियों को जनता तक सही तरीके से पहुंचाना और विपक्ष के दुष्प्रचार का जवाब देना, यह जिम्मेदारी अंततः संगठन और उसके नए मुखिया की ही होगी।
तोखन साहू बनाम बाकी दावेदार — कौन कितने पानी में
राजनीतिक हलकों में तुलनात्मक चर्चा भी खूब हो रही है। शिवरतन शर्मा को संगठन का अनुभवी चेहरा माना जाता है, लेकिन उनके पास तोखन साहू जैसा केंद्रीय मंत्रिमंडल का अनुभव नहीं है। संतोष पांडे युवा और सक्रिय सांसद माने जाते हैं, लेकिन उनके समर्थकों का दायरा फिलहाल सीमित बताया जा रहा है। इसके उलट तोखन साहू के पास विधानसभा, लोकसभा और केंद्र — तीनों स्तर का अनुभव है, साथ ही साहू समाज और ओबीसी वर्ग का सामाजिक समीकरण भी उनके पक्ष में मजबूती से खड़ा है।
यही वजह है कि पार्टी सूत्रों के मुताबिक, तुलनात्मक तौर पर देखा जाए तो तोखन साहू फिलहाल सबसे मजबूत स्थिति में नजर आते हैं, भले ही आधिकारिक घोषणा अभी बाकी हो।
2028 की रणनीति और नए प्रदेश अध्यक्ष की भूमिका
जानकारों के मुताबिक, नए प्रदेश अध्यक्ष की सबसे बड़ी जिम्मेदारी सिर्फ मौजूदा हालात संभालना नहीं, बल्कि 2028 के विधानसभा चुनाव की जमीन तैयार करना होगी। इसके लिए संगठन को बूथ स्तर तक फिर से सक्रिय करना, कार्यकर्ताओं का भरोसा जीतना और सामाजिक समीकरणों को साधना — यह तीनों काम साथ-साथ करने होंगे।
यह भी कहना है कि भाजपा आगामी चुनाव में आदिवासी और ओबीसी वर्ग को साथ लेकर चलने की रणनीति पर काम कर रही है, और इसी रणनीति के तहत संगठन की कमान किसी ओबीसी चेहरे को सौंपे जाने की चर्चा तेज हुई है। ऐसे में तोखन साहू की संभावित नियुक्ति को सिर्फ एक व्यक्ति की तरक्की नहीं, बल्कि पार्टी की दीर्घकालिक चुनावी रणनीति के पहले औपचारिक कदम के तौर पर देखा जा रहा है।
अब निगाह दिल्ली के फैसले पर
फिलहाल छत्तीसगढ़ भाजपा के नए प्रदेश अध्यक्ष को लेकर कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। पार्टी सूत्रों के मुताबिक अंतिम फैसला केंद्रीय नेतृत्व को करना है, लेकिन संगठन के भीतर से मिल रहे संकेत साफ बता रहे हैं कि तोखन साहू के नाम पर सहमति की स्थिति लगभग बन चुकी है। शिवरतन शर्मा और संतोष पांडे जैसे नामों की मौजूदगी के बावजूद, सामाजिक समीकरण, केंद्रीय मंत्री के तौर पर बनी पहचान और वरिष्ठ नेतृत्व से तालमेल के आधार पर तोखन साहू का पलड़ा सबसे भारी बताया जा रहा है।

अब सवाल तोखन साहू के नाम पर नहीं, बल्कि घोषणा की तारीख पर टिका है। यदि यह घोषणा गणेशोत्सव या नवरात्रि के मौकों पर होती है, तो इसे केवल संगठनात्मक फैसला नहीं, बल्कि आगामी विधानसभा चुनाव की रणनीति का पहला औपचारिक संकेत माना जाएगा।
कुर्सी एक, दावेदार अनेक, फैसला दिल्ली का
राजनीति की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि जिस कुर्सी को लेकर रायपुर से लेकर बिलासपुर तक चर्चा गरम है, उसका फैसला वहां से हजारों किलोमीटर दूर बैठे कुछ चुनिंदा लोग करेंगे। स्थानीय कार्यकर्ता चाय की दुकान पर बहस कर रहे हैं, सोशल मीडिया पर समर्थक अपने-अपने पसंदीदा नाम को लेकर पोस्टर बना रहे हैं, लेकिन असली मुहर तो दिल्ली के किसी बंद कमरे में लगेगी। यही भाजपा के संगठनात्मक अनुशासन की खासियत भी है और पार्टी कार्यकर्ताओं की बेचैनी की वजह भी। बीजेपी दिल्ली

बहरहाल, जिस तरह से पार्टी सूत्रों की जुबान पर बार-बार एक ही नाम आ रहा है, उससे साफ है कि तोखन साहू का पलड़ा फिलहाल सबसे भारी है। सवाल अब यह नहीं कि प्रदेश अध्यक्ष कौन बनेगा, बल्कि यह है कि इस नाम पर औपचारिक मुहर कब लगेगी और किस मौके पर लगेगी।
संगठन बदलेगा, संदेश भी बदलेगा
छत्तीसगढ़ भाजपा में प्रदेश अध्यक्ष पद को लेकर चल रही यह पूरी कवायद अंततः एक बड़े राजनीतिक संदेश की ओर इशारा करती है। पार्टी सूत्रों के मुताबिक, अगर तोखन साहू को यह जिम्मेदारी मिलती है, तो यह सिर्फ एक व्यक्ति की तरक्की नहीं होगी, बल्कि साहू समाज और ओबीसी वर्ग को भाजपा की ओर से दिया गया एक स्पष्ट राजनीतिक संदेश होगा। साथ ही केंद्र में छत्तीसगढ़ के प्रतिनिधित्व और ब्रजमोहन अग्रवाल जैसे वरिष्ठ नेताओं की भूमिका को लेकर भी नई बहस शुरू हो सकती है।
फिलहाल पूरा प्रदेश और पार्टी कार्यकर्ता उस औपचारिक ऐलान का इंतजार कर रहे हैं, जिसकी तस्वीर लगभग साफ हो चुकी बताई जा रही है। पार्टी सूत्रों के शब्दों में कहें तो, “नाम तय है, बस समय और मौका तय होना बाकी है।” और उस नाम पर, फिलहाल हर तरफ से जो आवाज सबसे मुखर होकर उभर रही है, वह है — तोखन साहू।

One thought on “कुर्सी खाली है, नाम तय है, बस मुहर बाकी है — छत्तीसगढ़ भाजपा में “तोखन” ठहराव पर सस्पेंस बरकरार!”