जांजगीर-चांपा। सरकारी दफ्तरों में रिश्वतखोरी का खेल कहीं थमने का नाम नहीं ले रहा, और इसी कड़ी में एक और बड़ा मामला जांजगीर-चांपा जिले से सामने आया है। यहां शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय किरारी की प्राचार्य और स्कूल के ही एक लिपिक को एंटी करप्शन ब्यूरो यानी ACB की टीम ने रंगे हाथों दबोच लिया। दोनों पर आरोप है कि उन्होंने एक कर्मचारी से उसी की सैलरी बढ़ोतरी का बकाया पैसा दिलाने के नाम पर 10 हजार रुपये की रिश्वत मांगी थी। जैसे ही रकम हाथ में आई, ACB की टीम ने दोनों को दबोच लिया और पूरा मामला उजागर हो गया। महतारी वंदन योजना: नए वर्गों को जोड़ने और पोर्टल फिर खोलने की तैयारी में सरकार
पूरा मामला क्या है, जरा सिलसिलेवार समझिए
बात शुरू होती है स्कूल में पदस्थ बाबू मनीष राठौर से। मनीष को उसकी वेतन वृद्धि के बकाया यानी एरियर के रूप में करीब 80 हजार रुपये मिलने थे। यह उसका हक का पैसा था, जिसे पाने के लिए उसे किसी की मेहरबानी की जरूरत नहीं होनी चाहिए थी। लेकिन जब मनीष ने अपनी यह राशि निकलवाने की बात की, तो स्कूल की प्राचार्य अंजुलता सोनी और लिपिक विकास मसीह ने सीधे-सीधे उससे रिश्वत मांग ली। कहा गया कि अगर उसे अपने ही मेहनत के पैसे जल्दी और आसानी से चाहिए, तो पहले उन्हें 10 हजार रुपये चुकाने होंगे।

अब सोचने वाली बात यह है कि जो पैसा मनीष की अपनी मेहनत और हक का था, उसे पाने के लिए भी उसे रिश्वत देनी पड़ रही थी। यही वो बात थी जिसने मनीष को अंदर से झकझोर दिया। उसने तय किया कि वह इस गलत मांग के आगे झुकेगा नहीं, बल्कि इसकी शिकायत करेगा। और यहीं से शुरू हुई इस पूरे मामले की असली कहानी।
मनीष ने की हिम्मत, ACB तक पहुंचाई बात
रिश्वत की मांग से परेशान होकर मनीष राठौर ने सीधे एंटी करप्शन ब्यूरो का दरवाजा खटखटाया। उसने पूरी बात ACB को बताई—कैसे उसकी अपनी वेतन वृद्धि की रकम के लिए भी उससे पैसे मांगे जा रहे हैं। ACB ने शिकायत को गंभीरता से लिया और सबसे पहले इसकी सत्यता जांचने का काम शुरू किया।
जांच में जब यह बात सही पाई गई कि सच में प्राचार्य और लिपिक द्वारा रिश्वत की मांग की जा रही है, तो ACB ने आगे की रणनीति बनानी शुरू कर दी। यह कोई आम कार्रवाई नहीं थी, बल्कि पूरी तरह से सोची-समझी योजना के तहत ट्रैप बिछाया गया, ताकि आरोपी रंगे हाथों पकड़े जा सकें और कोई सबूत छूटने न पाए। दिल्ली में गूंजा छत्तीसगढ़ का जल मंत्र, पीएम मोदी ने सराहा मॉडल, हर राज्य के लिए ‘कैच द रेन प्लान’ का सुझाव
रंगे हाथों पकड़े गए दोनों आरोपी
योजना के मुताबिक शिकायतकर्ता मनीष राठौर को रिश्वत की रकम के साथ आरोपियों के पास भेजा गया। जैसे ही मनीष ने 10 हजार रुपये प्राचार्य और लिपिक को सौंपे, और दोनों ने वह रकम अपने हाथ में ली, ठीक उसी वक्त पहले से घात लगाकर बैठी ACB की टीम ने मौके पर छापा मार दिया।
इस पूरी कार्रवाई में प्राचार्य अंजुलता सोनी और लिपिक विकास मसीह दोनों को 10 हजार रुपये लेते रंगे हाथों गिरफ्तार कर लिया गया। टीम ने मौके से रिश्वत की पूरी रकम भी बरामद कर ली। पकड़े जाने के बाद दोनों आरोपियों को हिरासत में लेकर पूछताछ शुरू कर दी गई। इसी के साथ-साथ मामले से जुड़े तमाम दस्तावेजों और अन्य सबूतों की भी बारीकी से जांच की जा रही है, ताकि यह साफ हो सके कि क्या यह पहली बार था या इससे पहले भी इसी तरह की मांगें की जाती रही हैं।
ACB के 13 अफसरों की टीम ने दिया अंजाम
यह कोई छोटी-मोटी कार्रवाई नहीं थी। इस पूरे ऑपरेशन को अंजाम देने के लिए ACB ने कुल 13 अधिकारियों की एक खास टीम तैनात की थी। इतनी बड़ी टीम का मौके पर मौजूद रहना यह दिखाता है कि ACB इस मामले को लेकर कितनी गंभीर थी और किसी भी तरह की चूक की गुंजाइश नहीं छोड़ना चाहती थी। छत्तीसगढ़ एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB)
टीम ने आरोपियों से पूछताछ के साथ-साथ रिश्वतखोरी से जुड़े हर एक दस्तावेज और सबूत को खंगालना शुरू कर दिया है। अधिकारियों का कहना है कि जांच के दौरान जो भी तथ्य सामने आएंगे, उनके आधार पर आगे की कानूनी कार्रवाई तय की जाएगी। यानी यह मामला यहीं खत्म नहीं होने वाला, बल्कि जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ेगी, और भी कई बातें सामने आ सकती हैं।
ACB एक्शन से शिक्षा विभाग में हड़कंप, अफसरों की सांसें अटकीं
जिस स्कूल के प्राचार्य और लिपिक इस तरह रिश्वत लेते पकड़े गए हों, वहां हड़कंप मचना लाजमी है। मगर यह हड़कंप सिर्फ उस एक स्कूल तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पूरे शिक्षा विभाग में हलचल मच गई। आखिर सवाल यह उठता है कि जब किसी कर्मचारी को उसकी अपनी हक की रकम पाने के लिए भी रिश्वत देनी पड़े, तो आम जनता के कामों में क्या हाल होता होगा?
यह घटना एक तरह से पूरे सिस्टम पर सवाल खड़ा करती है। स्कूल जैसी जगह, जहां बच्चों को ईमानदारी और नैतिकता का पाठ पढ़ाया जाता है, वहीं के जिम्मेदार अधिकारी अगर इस तरह की हरकतों में लिप्त पाए जाएं, तो यह पूरे शिक्षा तंत्र की साख पर बट्टा लगाने जैसा है। यही वजह है कि विभागीय स्तर पर भी इस मामले को बेहद गंभीरता से लिया जा रहा है और आला अधिकारी पूरी स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं।
बिलासपुर ACB की यह 56वीं ट्रैप कार्रवाई
इस पूरे मामले की एक और खास बात यह है कि यह बिलासपुर एंटी करप्शन ब्यूरो की लगातार 56वीं ट्रैप कार्रवाई है। यानी यह कोई इक्का-दुक्का मामला नहीं, बल्कि यह दिखाता है कि ACB लगातार अलग-अलग विभागों में रिश्वतखोरी के खिलाफ अभियान चला रही है और उसमें लगातार सफलता भी हासिल कर रही है।
56वीं ट्रैप कार्रवाई का आंकड़ा अपने आप में यह बताने के लिए काफी है कि प्रदेश के सरकारी महकमों में रिश्वतखोरी की जड़ें कितनी गहरी हैं। हर बार कोई न कोई कर्मचारी, अधिकारी या फिर विभागीय जिम्मेदार व्यक्ति अपने पद का गलत इस्तेमाल करते हुए पकड़ा जा रहा है। हालांकि इतनी बड़ी संख्या में ट्रैप कार्रवाई का होना यह भी दिखाता है कि जो लोग शिकायत करने की हिम्मत जुटा रहे हैं, ACB उनकी बात को गंभीरता से सुन रही है और तेजी से कार्रवाई भी कर रही है।
आम आदमी के लिए क्या है इसमें सीख
इस पूरे घटनाक्रम से एक बड़ी सीख निकलकर सामने आती है—अगर कोई सरकारी कर्मचारी या अधिकारी आपसे अपने ही जायज काम के लिए रिश्वत मांगे, तो चुपचाप बर्दाश्त करने के बजाय शिकायत करने की हिम्मत दिखानी चाहिए। मनीष राठौर की ही मिसाल लीजिए—अगर उसने चुपचाप रिश्वत दे दी होती, तो शायद यह मामला कभी सामने ही नहीं आता और प्राचार्य व लिपिक इसी तरह और लोगों से भी वसूली करते रहते।
ACB जैसी एजेंसियां आम नागरिकों की शिकायतों पर ही काम करती हैं। जब तक पीड़ित खुद आगे आकर शिकायत नहीं करेंगे, तब तक इस तरह की रिश्वतखोरी पर लगाम लगाना मुश्किल है। इसलिए यह घटना सिर्फ एक खबर भर नहीं, बल्कि एक संदेश भी है कि सिस्टम में बदलाव तभी संभव है जब लोग खुद आवाज उठाएं।
आगे क्या होगा, जांच अभी जारी
फिलहाल दोनों आरोपी अंजुलता सोनी और विकास मसीह ACB की हिरासत में हैं और उनसे पूछताछ जारी है। नियमानुसार आगे की कानूनी प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। जांच अधिकारियों का कहना है कि जैसे-जैसे मामले की तह तक जाएंगे, वैसे-वैसे और भी तथ्य सामने आ सकते हैं। यह भी देखा जाएगा कि क्या इन दोनों ने पहले भी किसी और कर्मचारी या शिक्षक से इसी तरह पैसे ऐंठे हैं या नहीं।
शिक्षा विभाग के अंदरखाने भी इस बात की चर्चा जोरों पर है कि आखिर एक ही स्कूल के प्राचार्य और लिपिक मिलकर इस तरह की वसूली में कैसे शामिल हो गए। क्या यह पहली बार था, या फिर यह उनका पुराना तरीका था, इसका खुलासा जांच पूरी होने के बाद ही हो पाएगा।
बहरहाल, इतना तय है कि ACB की इस कार्रवाई ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि सरकारी विभागों में रिश्वतखोरी के खिलाफ चलाया जा रहा अभियान थमा नहीं है, बल्कि लगातार आगे बढ़ रहा है। जांजगीर-चांपा के इस मामले ने पूरे प्रदेश में एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि आखिर कब तक आम कर्मचारियों और नागरिकों को अपने ही जायज हक के लिए रिश्वत की जेब ढीली करनी पड़ेगी।
