रायपुर/अंबिकापुर. छत्तीसगढ़ के अंबिकापुर से एक ऐसी शर्मनाक तस्वीर सामने आई है, जिसने सत्ता के नशे में चूर एक PA की गुंडागर्दी की पोल खोलकर रख दी है। मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े के PA ओम प्रकाश राजवाड़े का जो चेहरा सामने आया, उसने बता दिया कि वर्दी और रुतबे के पीछे छिपी PA की गुंडागर्दी आम आदमी के लिए कितनी खतरनाक साबित हो सकती है। एक टोल बैरियर गिरा, बस इतनी सी बात पर PA की गुंडागर्दी इस कदर हावी हुई कि एक मेहनतकश टोलकर्मी को सरेआम थप्पड़ों से पीट डाला गया। यह घटना अब सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि पूरे सरगुजा संभाग में सत्ता के रौब और आम जनता की बेबसी की मिसाल बनकर उभर रही है।
आधी रात को हुआ पूरा तमाशा, यूं शुरू हुई PA की गुंडागर्दी
घटना 2 सितंबर की रात की है, जब मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े बिलासपुर से अंबिकापुर लौट रही थीं। रात के करीब साढ़े 12 बज रहे थे, सड़कों पर सन्नाटा पसरा था, और लहपटरा टोल प्लाजा पर ड्यूटी कर रहे कर्मचारी अपने रोज़मर्रा के काम में जुटे थे। किसी को अंदाजा नहीं था कि अगले कुछ ही पलों में PA की गुंडागर्दी का ऐसा नंगा नाच होने वाला है, जो पूरे प्रदेश में सुर्खियां बन जाएगा। मंत्री के काफिले में उस रात सिर्फ दो गाड़ियां थीं – सबसे आगे इनोवा, ठीक उसके पीछे मंत्री की फॉर्च्यूनर।
नियम के मुताबिक जैसे ही आगे वाली इनोवा टोल बैरियर पार करके निकली, बूम अपने आप नीचे आ गया। ठीक उसी वक्त पीछे से आ रही मंत्री की फॉर्च्यूनर वहां से गुजर रही थी, और गिरता हुआ बूम सीधे गाड़ी के ऊपर जा टकराया।

गाड़ी को हुए इस मामूली से नुकसान ने ही PA की गुंडागर्दी की पूरी पटकथा लिख दी। जो हादसा एक टेक्निकल गड़बड़ी थी, उसे मंत्री के PA ने अपनी हनक दिखाने का मौका बना लिया। यह पूरा घटनाक्रम बताता है कि कैसे सत्ता के करीबी लोग छोटी-छोटी बातों पर भी आपा खो बैठते हैं, और PA की गुंडागर्दी जैसी घटनाएं आम जनता के जीवन में डर बनकर उतर आती हैं।
उतरते ही आगबबूला हुआ PA, बरसा दिए थप्पड़ पर थप्पड़
गाड़ी रुकते ही PA ओम प्रकाश राजवाड़े आग-बबूला होकर उतरे और सीधे टोल कर्मचारी महेंद्र राजवाड़े पर टूट पड़े। न कोई बात, न कोई सवाल-जवाब, सीधे गाली-गलौज शुरू हो गई। कुछ ही पलों में गाली-गलौज मारपीट में बदल गई, और PA की गुंडागर्दी अपने चरम पर पहुंच गई। पांच थप्पड़ों की गूंज उस रात टोल प्लाजा पर गूंजी, और हर थप्पड़ के साथ PA की गुंडागर्दी का असली रंग सामने आता गया।

बेचारा टोलकर्मी हाथ जोड़कर माफी मांगता रहा, गिड़गिड़ाता रहा, बार-बार यही कहता रहा कि गलती जानबूझकर नहीं हुई, यह तो सिस्टम का नियम था। लेकिन सत्ता के गुरूर में डूबे PA का दिल नहीं पसीजा। एक तरफ बेबस टोलकर्मी अपनी सफाई देने की कोशिश कर रहा था, दूसरी तरफ PA की गुंडागर्दी उसे चुप कराने के लिए और आक्रामक होती जा रही थी। यह दृश्य हर उस आम इंसान के लिए डरावना है, जो रोजी-रोटी कमाने के लिए ऐसी जगहों पर ड्यूटी करता है, जहां कभी भी कोई रसूखदार व्यक्ति उन पर हावी हो सकता है।

यह पूरा तमाशा सीसीटीवी कैमरे में कैद हो गया, जो अब PA की गुंडागर्दी का सबसे बड़ा सबूत बनकर सामने है। फुटेज में साफ देखा जा सकता है कि किस तरह एक जिम्मेदार पद पर बैठा शख्स अपना आपा खो बैठा, और किस तरह एक निर्दोष कर्मचारी सिर्फ मार खाता रहा। गनीमत रही कि सुरक्षाकर्मियों ने बीच-बचाव किया और PA को खींचकर वापस गाड़ी में बिठाया, वरना PA की गुंडागर्दी और कितना खौफनाक रूप लेती, कहा नहीं जा सकता।
PA की गुंडागर्दी : गाड़ी में बैठी रहीं मंत्री, नहीं आया मामले को सुलझाने का ख्याल
हैरानी की बात यह रही कि इतना बवाल मचने के बावजूद मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े अपनी गाड़ी से एक बार भी नीचे नहीं उतरीं, अंदर बैठी रहीं, मानो PA की गुंडागर्दी से उन्हें कोई सरोकार ही न हो। सामने अपने ही PA को एक कर्मचारी की पिटाई करते देखकर भी मंत्री का खामोश रहना कई सवाल खड़े करता है। क्या यह खामोशी PA की गुंडागर्दी को परोक्ष समर्थन थी? क्या मंत्री को अंदाजा नहीं था कि बाहर क्या हो रहा है? या फिर सत्ता के इस माहौल में ऐसी घटनाएं इतनी सामान्य हो चुकी हैं कि किसी को रोकने-टोकने की जरूरत ही महसूस नहीं होती? यही सवाल अब पूरे इलाके में लोगों की जुबान पर हैं।
अगले दिन थाने पहुंचा पीड़ित, गांव वालों ने दिया साथ
घटना के अगले दिन पीड़ित महेंद्र राजवाड़े जब हिम्मत जुटाकर अपने साथी कर्मचारियों और गांव वालों के साथ लखनपुर थाने पहुंचा, तो PA की गुंडागर्दी के खिलाफ पूरा गांव उसके साथ खड़ा नजर आया। यह इस बात का सबूत था कि यह घटना सिर्फ एक व्यक्ति के साथ हुई ज्यादती नहीं, बल्कि पूरे इलाके के आत्मसम्मान से जुड़ा मसला बन चुकी थी। शिकायत दर्ज कराई गई, पुलिस ने पीड़ित का एमएलसी भी करा लिया, लेकिन गुरुवार शाम तक FIR दर्ज नहीं हुई थी। यही देरी अब गांव वालों के गुस्से को हवा दे रही है।

लोगों का कहना है कि अगर यह वारदात किसी आम आदमी ने की होती, तो शायद कुछ ही घंटों में FIR दर्ज हो चुकी होती। लेकिन जब मामला मंत्री के PA से जुड़ा हो, तो PA की गुंडागर्दी पर पुलिस का रवैया भी सुस्त पड़ जाता है। यही वजह है कि ग्रामीणों ने साफ चेतावनी दे डाली कि अगर पुलिस ने PA की गुंडागर्दी के खिलाफ FIR दर्ज नहीं की, तो लहपटरा में बड़ा आंदोलन खड़ा कर दिया जाएगा। ग्रामीणों की यह चेतावनी बताती है कि लोगों का सब्र अब जवाब देने लगा है, और वे अब चुप बैठने को तैयार नहीं हैं। सवाल उठ रहा है कि क्या सत्ता के करीबी होने की वजह से PA की गुंडागर्दी पर पुलिस भी नरमी बरत रही है, और आखिर कब तक आम आदमी को इंसाफ के लिए यूं दर-दर भटकना पड़ेगा?
मामूली टेक्निकल गड़बड़ी बनी बड़े बवाल की वजह
दिलचस्प यह भी है कि जिस वजह से यह पूरा बवाल हुआ, वो टेक्निकल गड़बड़ी अपने-आप में बेहद मामूली थी। बताया जा रहा है कि पीएम नरेंद्र मोदी की अपील के बाद मंत्री ने अपने काफिले से फॉलो वाहन हटा दिया था, ताकि लंबे-चौड़े काफिले का बोझ कम हो सके। लेकिन इसी फैसले ने अनजाने में इस पूरे विवाद की जमीन तैयार कर दी। फॉलो वाहन न होने की वजह से टोलकर्मी यह समझ ही नहीं पाए कि पीछे चल रही गाड़ी मंत्री की है, और नियम के मुताबिक बूम नीचे गिरा दिया, जिससे मंत्री की फॉर्च्यूनर को भी नुकसान पहुंचा।
अगर फॉलो वाहन मौजूद होता, तो टोलकर्मी समय रहते बूम को ऊपर उठा देते और यह पूरा विवाद सिरे से टल जाता। लेकिन ऐसा नहीं हुआ, और नतीजा यह निकला कि एक टेक्निकल खामी की सजा एक निर्दोष कर्मचारी को अपने गाल पर झेलनी पड़ी। यानी गलती न टोलकर्मी की थी, न सिस्टम की, बस इतनी सी बात पर PA की गुंडागर्दी ने एक निर्दोष कर्मचारी की इज्जत तार-तार कर दी। यह घटना इस बात की मिसाल है कि कैसे मामूली-सी तकनीकी चूक भी, अगर सामने वाला रसूखदार हो, तो बड़े बवाल का रूप ले सकती है।
दो साल पहले हुई थी नियुक्ति, अब सवालों के घेरे में करियर
गौरतलब है कि ओम प्रकाश राजवाड़े को साल 2024 में सामान्य प्रशासन विभाग के आदेश पर महिला एवं बाल विकास तथा समाज कल्याण मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े का PA नियुक्त किया गया था। यह नियुक्ति उस वक्त एक सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया के तहत हुई थी, लेकिन किसी को अंदाजा नहीं था कि दो साल के भीतर ही PA की गुंडागर्दी की यह घटना सामने आएगी, जो पूरे प्रदेश में चर्चा का विषय बन जाएगी।

यह घटना बताती है कि जिम्मेदार पद पर बैठे लोग किस तरह आम जनता के साथ पेश आ रहे हैं, और कैसे एक साधारण नौकरी करने वाला टोलकर्मी भी PA की गुंडागर्दी का शिकार बन सकता है। सवाल यह भी उठता है कि क्या भविष्य में भी ऐसे पदों पर नियुक्ति से पहले लोगों के स्वभाव और व्यवहार को परखा जाएगा, ताकि PA की गुंडागर्दी जैसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकी जा सके।

मंत्री से संपर्क की कोशिश नाकाम, चुप्पी पर उठे सवाल
इस पूरे मामले में मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े से संपर्क करने की भरपूर कोशिश की गई, लेकिन उनकी तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई। न कोई सफाई, न कोई माफी, न कोई बयान। यह चुप्पी भी अब PA की गुंडागर्दी जितनी ही चर्चा का विषय बनती जा रही है। लोगों का कहना है कि अगर मंत्री खुद इस मामले में आगे आकर पीड़ित से माफी मांगतीं और अपने PA के खिलाफ सख्त कार्रवाई की बात करतीं, तो शायद जनता का गुस्सा कुछ हद तक शांत हो सकता था। लेकिन उनकी खामोशी ने PA की गुंडागर्दी को और बड़ा मुद्दा बना दिया है।
पूरे इलाके में गुस्सा, हर तरफ एक ही चर्चा
अब पूरे लहपटरा और आसपास के गांवों में PA की गुंडागर्दी को लेकर आक्रोश साफ देखा जा सकता है। चाय की दुकानों से लेकर गांव की पगडंडियों तक, हर जगह एक ही चर्चा है — PA की गुंडागर्दी। लोग एक-दूसरे से यही पूछते नजर आ रहे हैं कि आखिर कब तक आम आदमी सत्ता के रसूख के आगे यूं बेबस बना रहेगा। सोशल मीडिया पर भी सीसीटीवी फुटेज वायरल हो रहा है, और लोग खुलकर PA की गुंडागर्दी की निंदा कर रहे हैं।
इलाके के बुजुर्गों का कहना है कि उन्होंने अपने जीवन में ऐसी कई घटनाएं देखी हैं, जहां सत्ता के करीबी लोगों ने आम जनता पर रौब गांठा हो, लेकिन इस बार PA की गुंडागर्दी का यह मामला कैमरे में कैद होने की वजह से छिप नहीं पाया। युवाओं का कहना है कि अगर इस बार भी कार्रवाई नहीं हुई, तो यह संदेश जाएगा कि सत्ता से जुड़े लोग कुछ भी करके बच सकते हैं, और यही डर उन्हें आंदोलन की राह पर धकेल रहा है।
अब सबकी निगाहें FIR और कार्रवाई पर टिकीं
गुरुवार शाम तक जब FIR दर्ज नहीं हुई थी, तब से लेकर अब तक पूरे इलाके की निगाहें पुलिस प्रशासन पर टिकी हैं। लोग जानना चाहते हैं कि क्या PA की गुंडागर्दी के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई होगी, या फिर यह मामला भी बाकी मामलों की तरह ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा। ग्रामीणों की चेतावनी के बाद अब यह देखना दिलचस्प होगा कि पुलिस प्रशासन किस दिशा में कदम उठाता है।
आखिर में सवाल वही खड़ा है — क्या PA की गुंडागर्दी करने वाले शख्स पर कोई सख्त कार्रवाई होगी? क्या मंत्री अपनी चुप्पी तोड़ेंगी? क्या पीड़ित महेंद्र राजवाड़े को इंसाफ मिलेगा? या फिर यह मामला भी सत्ता के दबाव में दबकर रह जाएगा? फिलहाल पूरा इलाका इन्हीं सवालों के जवाब का इंतजार कर रहा है, और PA की गुंडागर्दी की यह घटना छत्तीसगढ़ की सियासत में एक बड़ा मुद्दा बनती जा रही है।

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